रिश्तों का तराजू – गरिमा चौधरी

*जब समर्पण का मूल्य केवल एक तरफ से चुकाया जाए, तो वह रिश्ता नहीं, सौदा बन जाता है। क्या एक पत्नी का धर्म सिर्फ पति के माता-पिता की सेवा करना है, जबकि पति उसके माता-पिता का हाल तक न पूछे?*

“मैं तुलना नहीं कर रही समीर, मैं समानता मांग रही हूँ,” रागिनी ने कहा। “आप जानते हैं, कल जब मैं बाबूजी के पैर दबा रही थी, तो मेरा मन कर रहा था कि काश कोई मेरे पापा के पास भी बैठकर उनके हालचाल पूछ ले। मेरे भाई तो हैं, पर क्या दामाद होने के नाते आपका कोई कर्तव्य नहीं बनता? जब आप मेरे पिता से बात करना भी अपनी शान के खिलाफ समझते हैं, तो किस हक से उम्मीद करते हैं कि मैं आपके माता-पिता को भगवान मानूँ?”

सुबह की पहली किरण खिड़की से अंदर आ रही थी, लेकिन रागिनी के जीवन में जैसे थकावट का अंधेरा छाया हुआ था। घड़ी में सुबह के पांच बज रहे थे। अलार्म बजने से पहले ही उसकी आँख खुल गई थी, या यूं कहें कि रात भर ठीक से सोई ही नहीं थी। बगल में उसका पति, समीर, गहरी नींद में सो रहा था। रागिनी ने एक बार समीर के चेहरे को देखा, फिर एक गहरी सांस लेकर बिस्तर छोड़ दिया।

रसोई में जाकर उसने सबसे पहले गुनगुना पानी किया। यह समीर के पिताजी, यानी उसके ससुर जी, दीनानाथ जी के लिए था। उन्हें गठिया की बीमारी थी और सुबह उठते ही उन्हें गर्म पानी और दवा चाहिए होती थी। रागिनी ने पानी का गिलास लिया और ससुर जी के कमरे की ओर बढ़ गई।

“बाबूजी, पानी,” रागिनी ने धीमी आवाज़ में कहा।

दीनानाथ जी ने कराहते हुए करवट बदली और रागिनी के हाथ से गिलास ले लिया। “जीती रहो बेटा। आज रात भर पैरों में बहुत दर्द था, तुम्हें आवाज़ देने का सोचा पर लगा तुम सो रही होगी,” उन्होंने कहा।

“अरे बाबूजी, आप आवाज़ दे देते। मेरी नींद तो वैसे भी कच्ची है,” रागिनी ने मुस्कुराते हुए कहा, हालांकि उसकी आँखों के नीचे पड़े काले घेरे उसकी थकान की गवाही दे रहे थे। उसने तुरंत तेल गर्म किया और ससुर जी के पैरों की मालिश करने लगी। करीब आधे घंटे बाद जब उन्हें थोड़ा आराम मिला, तो वह वापस रसोई में आई।

अब सास, सुमित्रा जी के लिए चाय और नाश्ता बनाने का वक्त था। फिर समीर का टिफिन, घर की सफाई, कपड़े… कामों की एक लंबी सूची थी जो कभी खत्म नहीं होती थी। रागिनी एक मशीन की तरह काम करती थी। वह एक आदर्श बहू, एक आदर्श पत्नी थी। लेकिन इस आदर्शवादी छवि के पीछे एक बेटी का दिल रोज़ घुटता था।

दोपहर के करीब दो बजे, जब घर के सारे काम निपटाकर रागिनी ने अपने लिए थाली परोसी, तो उसका फोन बजा। स्क्रीन पर ‘माँ’ का नाम देखकर उसके चेहरे पर एक फीकी मुस्कान आ गई। उसने तुरंत फोन उठाया।

“हाँ माँ, कैसी हो? पापा की तबीयत कैसी है अब?” रागिनी ने उत्सुकता से पूछा।

उधर से माँ की आवाज़ थोड़ी भारी थी। “क्या बताऊँ बेटा, तेरे पापा का बी.पी. कल रात बहुत बढ़ गया था। डॉक्टर को दिखाया है, उन्होंने आराम करने को कहा है। पर तुझे तो पता है, वो जिद्दी हैं। कह रहे थे कि रागिनी को मत बताना, वो परेशान होगी।”

रागिनी के हाथ से निवाला छूट गया। “माँ, आपने मुझे रात को क्यों नहीं बताया? और समीर… समीर ने तो कहा था कि उन्होंने कल शाम को पापा से बात की थी। क्या पापा ने उन्हें नहीं बताया?”

माँ थोड़ी देर चुप रहीं, फिर बोलीं, “बेटा, समीर का कोई फोन नहीं आया। तेरे पापा ने पिछले हफ़्ते उन्हें फोन किया था, पर उन्होंने उठाया नहीं और न ही कॉल बैक किया। शायद काम में व्यस्त होंगे।”

रागिनी का दिल बैठ गया। उसने फोन रख दिया। उसकी भूख मर चुकी थी। उसे याद आया कि पिछले हफ़्ते उसने समीर से कई बार कहा था, “समीर, पापा का रिटायरमेंट का कुछ पेपरवर्क फंसा है, वो थोड़े तनाव में हैं, प्लीज एक बार उनसे बात कर लीजियेगा, उन्हें अच्छा लगेगा।” समीर ने हर बार “हाँ, करता हूँ” कहकर टाल दिया था।

शाम को जब समीर ऑफिस से आया, तो वह बहुत अच्छे मूड में था। “रागिनी, एक गिलास ठंडा पानी लाना और सुनो, आज पकोड़े बना लो, मौसम बहुत अच्छा है,” उसने सोफे पर बैठते हुए और टाई ढीली करते हुए कहा।

रागिनी पानी लेकर आई। समीर ने पानी पीते हुए पूछा, “माँ-बाबूजी ने दवाई ले ली ना समय पर? और हाँ, बाबूजी की डॉक्टर की अपॉइंटमेंट कल की है, तुम याद से ले जाना। मुझे ऑफिस में ज़रूरी मीटिंग है, मैं नहीं जा पाऊँगा।”

रागिनी ने शांत स्वर में कहा, “हाँ, मैं ले जाऊँगी। समीर, क्या आपने कल मेरे पापा से बात की थी?”

समीर ने मोबाइल में देखते हुए लापरवाही से जवाब दिया, “अरे यार, दिमाग से निकल गया। बहुत काम था। वैसे भी क्या बात करूँ? वही पुरानी बातें होंगी उनकी, रिटायरमेंट, राजनीति और महँगाई। बोर हो जाता हूँ मैं।”

रागिनी को लगा जैसे किसी ने उसके सीने पर पत्थर रख दिया हो। “समीर, उनका बी.पी. बढ़ गया था। वो बीमार हैं। एक दामाद का फोन जाने से उन्हें तसल्ली मिलती।”

समीर ने झुंझलाते हुए कहा, “रागिनी, प्लीज! घर आते ही शुरू मत हो जाया करो। बीमार हैं तो डॉक्टर को दिखाएं ना, मेरे फोन करने से उनका बी.पी. ठीक हो जाएगा क्या? और तुम्हारे भाई-भाभी हैं तो वहां, वो देख लेंगे। मुझे अभी रिलैक्स करने दो।”

रागिनी चुपचाप वहां से चली गई। उस रात उसने पकोड़े बनाए, सबको खिलाए, ससुर जी के पैर दबाए, सास को रामायण पढ़कर सुनाई, लेकिन उसके अंदर कुछ टूट रहा था।

अगले दिन सुबह, रागिनी दीनानाथ जी को लेकर अस्पताल गई। वहां काफी भीड़ थी। वह लाइन में लगकर पर्ची कटवा रही थी, ससुर जी को व्हीलचेयर पर इधर-उधर ले जा रही थी। डॉक्टर ने चेकअप के बाद नई दवाइयां लिखीं। रागिनी ने मेडिकल स्टोर की लाइन में लगकर दवाइयां लीं। जब वे घर लौटे, तो दोपहर हो चुकी थी। रागिनी पसीने से तर-बतर थी।

शाम को समीर घर आया। उसने आते ही देखा कि डाइनिंग टेबल पर पानी की बोतल नहीं रखी है।

“रागिनी! पानी की बोतल क्यों नहीं है यहाँ?” वह चिल्लाया।

रागिनी रसोई से बाहर आई। वह थकी हुई लग रही थी। “भूल गई थी, अभी लाती हूँ।”

“भूल गई थी? तुम घर पर रहती हो, करती क्या हो दिन भर? एक बोतल भरने का होश नहीं है? बाबूजी का ख्याल ठीक से रखा या नहीं आज?” समीर ने अपनी भड़ास निकाली।

रागिनी ने पानी की बोतल मेज पर पटकी। आवाज़ इतनी तेज़ थी कि समीर चौंक गया। आज तक रागिनी ने कभी चीज़ें नहीं पटकी थीं।

“समीर, आज अस्पताल में चार घंटे खड़े रहने के बाद बाबूजी को लेकर आई हूँ। उनकी एक-एक दवाई, उनके खाने का समय, उनके पैरों की मालिश, माँ जी की पूजा की तैयारी—सब किया है मैंने। मैं थकी हुई हूँ।”

समीर ने उसे घूरते हुए कहा, “तो क्या एहसान किया? वो मेरे माता-पिता हैं, तुम्हारा फ़र्ज़ है उनकी सेवा करना। हर औरत करती है, तुम कोई अनोखा काम नहीं कर रही।”

“फ़र्ज़?” रागिनी की आँखों में आंसू आ गए, लेकिन आवाज़ में कम्पन नहीं था। “समीर, फ़र्ज़ सिर्फ़ बहुओं का होता है? दामादों का नहीं? मेरे माता-पिता ने अपनी ज़िंदगी भर की कमाई लगाकर मेरी शादी आपसे की, अपना जिगर का टुकड़ा आपको सौंपा। और आप? आप महीने में एक बार दो मिनट उनसे बात करने के लिए ‘व्यस्त’ हो जाते हैं?”

समीर का अहंकार चोटिल हो गया। “देखो रागिनी, तुलना मत करो। मैं इस घर का बेटा हूँ, और तुम बहू हो। मेरे माता-पिता की ज़िम्मेदारी तुम्हारी है। तुम्हारे माता-पिता के लिए तुम्हारे भाई हैं। मुझे इमोशनल ब्लैकमेल मत करो।”

“मैं तुलना नहीं कर रही समीर, मैं समानता मांग रही हूँ,” रागिनी ने कहा। “आप जानते हैं, कल जब मैं बाबूजी के पैर दबा रही थी, तो मेरा मन कर रहा था कि काश कोई मेरे पापा के पास भी बैठकर उनके हालचाल पूछ ले। मेरे भाई तो हैं, पर क्या दामाद होने के नाते आपका कोई कर्तव्य नहीं बनता? जब आप मेरे पिता से बात करना भी अपनी शान के खिलाफ समझते हैं, तो किस हक से उम्मीद करते हैं कि मैं आपके माता-पिता को भगवान मानूँ?”

समीर गुस्से में खड़ा हो गया। “तो अब तुम हिसाब करोगी? इस घर में रहना है तो मेरे हिसाब से चलना होगा। मेरे माँ-बाप की सेवा करनी पड़ेगी, चाहे तुम्हारा मन हो या न हो।”

उस रात घर में खाना नहीं बना। रागिनी अपने कमरे में जाकर लेट गई। सुमित्रा जी और दीनानाथ जी सब सुन रहे थे।

अगले दो दिन तक रागिनी ने अपना काम किया, लेकिन एक मौन व्रत के साथ। वह मशीन की तरह काम करती, लेकिन समीर से एक शब्द नहीं बोलती। न उसकी तरफ देखती, न मुस्कुराती। समीर को लगा कि दो दिन में उसका गुस्सा शांत हो जाएगा।

तीसरे दिन रविवार था। समीर सोकर उठा तो देखा कि रागिनी तैयार हो रही है। उसने साड़ी पहन रखी थी और बैग पैक कर रही थी।

“कहाँ जा रही हो?” समीर ने पूछा।

“अपने मायके,” रागिनी ने बिना उसकी तरफ देखे कहा। “पापा की तबीयत ठीक नहीं है। मैं उन्हें देखने जा रही हूँ।”

“और यहाँ कौन काम करेगा? आज मेरे दोस्त लंच पर आ रहे हैं। माँ से इतना काम नहीं होगा,” समीर ने आदेशात्मक स्वर में कहा।

रागिनी ने बैग की ज़िप लगाई और समीर की आँखों में देखा।

“समीर, रिश्ते ज़ोर-जबरदस्ती से नहीं, प्रेम और सम्मान से चलते हैं। पिछले पाँच सालों से मैं आपके माता-पिता को अपना मानकर सेवा कर रही हूँ, क्योंकि मुझे लगा था कि हम एक परिवार हैं। लेकिन परसों आपने साफ़ कर दिया कि यह परिवार नहीं, एक तरफा समझौता है। आप मेरे माता-पिता को ‘बोरिंग’ और ‘पराया’ समझते हैं, तो मुझे भी हक़ है कि मैं अपनी प्राथमिकता तय करूँ। आज मेरे पिता को मेरी ज़रूरत है।”

समीर ने रास्ता रोकने की कोशिश की। “तुम ऐसे नहीं जा सकती। अगर तुम आज गई, तो सोच लेना…”

तभी कमरे के दरवाज़े पर दीनानाथ जी की खटखटाहट हुई। वे लाठी के सहारे खड़े थे।

“समीर, हट जा रास्ते से,” दीनानाथ जी की आवाज़ में एक अजब सी कड़काई थी।

समीर और रागिनी दोनों ने दरवाज़े की तरफ देखा।

दीनानाथ जी धीरे-धीरे अंदर आए। उन्होंने रागिनी के सिर पर हाथ रखा। “बहू, तू जा। अपने पिता के पास जा। उनकी सेवा कर।”

फिर उन्होंने समीर की तरफ मुड़कर देखा। उनकी आँखों में गुस्सा था।

“और तुम… तुम्हें शर्म आनी चाहिए। यह लड़की पिछले पांच साल से मेरे बूढ़े शरीर की गंदगी साफ़ कर रही है, मेरे पैर दबा रही है, मेरी हर बात मान रही है। और तुम इसके पिता को एक फोन नहीं कर सकते? अरे, जो इज़्ज़त देता है, उसे इज़्ज़त पाने का हक़ भी होता है।”

समीर ने सफाई देने की कोशिश की, “बाबूजी, आप नहीं समझते, मेरा शेड्यूल…”

“चुप रहो!” दीनानाथ जी चिल्लाए। “24 घंटे में से 2 मिनट नहीं निकाल सकता तू? अगर कल को रागिनी का भाई भी ऐसा ही कहे कि उसके पास मेरे लिए वक्त नहीं है, तो कैसा लगेगा तुझे? हम बूढों को तुम्हारा पैसा नहीं चाहिए होता बेटा, बस यह तसल्ली चाहिए होती है कि हमारी बेटी जहाँ ब्याही है, वहां उसे और उसके मायके को सम्मान मिल रहा है। तूने आज मुझे छोटा साबित कर दिया। रागिनी ने हमरी सेवा करके अपना फ़र्ज़ निभाया, पर तूने उसके परिवार को अपना न मानकर अपना धर्म तोड़ा है।”

कमरे में सन्नाटा छा गया। समीर पहली बार अपने पिता की आँखों में अपने लिए इतनी नाराज़गी देख रहा था।

दीनानाथ जी ने रागिनी से कहा, “बेटा, तू जा। और जब तक यह नलायक तेरे पिता से माफ़ी मांगकर, उनका हालचाल लेकर तुझे लेने खुद न आए, तब तक वापस मत आना। इस घर का काम हम देख लेंगे। बहुत सेवा करवा ली हमने, अब हमें भी तो पता चले कि बिना बहू के घर कैसा होता है।”

रागिनी की आँखों से आंसू बह निकले। उसने ससुर जी के पैर छुए और अपना बैग लेकर निकल गई। समीर खड़ा देखता रहा। उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि उसके ही माता-पिता ने उसका साथ देने के बजाय बहू का साथ दिया।

अगले दो दिन समीर के लिए नरक समान थे। घर बिखरा पड़ा था। माँ बीमार थीं, तो खाना ठीक से नहीं बन पा रहा था। पिताजी को समय पर पानी और दवा देने वाला कोई नहीं था। नौकरानी आती थी, पर वह रागिनी जैसा अपनापन और बारीकी कहाँ से लाती? समीर को ऑफिस जाने से पहले चाय खुद बनानी पड़ रही थी, और शाम को आकर थके-हारे घर को समेटना पड़ रहा था।

घर में एक अजीब सी मनहूसियत छाई थी। वो हंसी, वो रौनक, वो सुकून जो रागिनी के होने से था, सब गायब हो गया था। समीर को हर पल रागिनी की कमी खल रही थी। लेकिन उससे भी ज़्यादा, उसे अपने पिता की वो बात चुभ रही थी—*”रिश्ते ज़ोर-जबरदस्ती से नहीं चलते।”*

तीसरे दिन शाम को, समीर अपनी बालकनी में बैठा था। उसने अपना फोन निकाला। रागिनी के पापा का नंबर डायल करने के लिए उसकी उंगलियां कांप रही थीं। अहंकार और आत्मग्लानि के बीच जंग चल रही थी। आखिरकार, उसने कॉल बटन दबा दिया।

दो रिंग के बाद फोन उठा।

“हेलो?” एक कमज़ोर सी आवाज़ आई। रागिनी के पापा की आवाज़ थी।

समीर का गला सूख गया। “हेलो… बाबूजी? मैं… मैं समीर बोल रहा हूँ।”

उधर से थोड़ी खामोशी रही, फिर आवाज़ आई, “अरे समीर बेटा, खुश रहो। कैसे हो? सब ठीक तो है?” उनकी आवाज़ में कोई शिकायत नहीं थी, बस वही पुराना स्नेह था।

समीर की आँखों में पानी भर आया। यह वही व्यक्ति था जिसे वह ‘बोरिंग’ कहता था, लेकिन आज वही व्यक्ति उसकी आवाज़ सुनकर खुश हो रहा था, बावजूद इसके कि समीर ने उन्हें महीनों से फोन नहीं किया था।

“मैं ठीक हूँ बाबूजी। आपकी तबीयत कैसी है? रागिनी ने बताया कि बी.पी. बढ़ गया था…” समीर ने हिम्मत जुटाकर पूछा।

“हाँ बेटा, बुढ़ापा है। ऊपर-नीचे होता रहता है। तुम परेशान मत होना। रागिनी आ गई है तो सब संभाल लिया है उसने। तुम बताओ, काम कैसा चल रहा है? दीनानाथ जी कैसे हैं?”

समीर ने अगले पंद्रह मिनट तक उनसे बात की। राजनीति पर, मौसम पर, सेहत पर। और आश्चर्यजनक रूप से, उसे बोरियत नहीं हुई। उसे एक सुकून मिला। उसे महसूस हुआ कि वह सिर्फ़ एक औपचारिकता नहीं निभा रहा, बल्कि एक ऐसे पिता से बात कर रहा है जिसने उसे अपनी बेटी दी है।

फोन रखने के बाद समीर ने एक और कॉल किया। इस बार रागिनी को।

रागिनी ने फोन उठाया, “हेलो?”

“रागिनी,” समीर की आवाज़ भर्राई हुई थी। “बाबूजी से बात हुई मेरी। वो… वो ठीक हैं। कह रहे थे कि शाम को वॉक पर भी गए थे।”

रागिनी चुप रही। उसे समीर की आवाज़ में आए बदलाव का अहसास हो गया था।

“रागिनी, मैं कल आ रहा हूँ,” समीर ने कहा। “तुम्हें लेने। और… और बाबूजी के साथ बैठकर चाय पीने। मैंने बहुत बड़ी गलती की। मुझे माफ़ कर दो। मैं भूल गया था कि जैसे मेरे माता-पिता मेरे लिए भगवान हैं, वैसे ही तुम्हारे माता-पिता तुम्हारे लिए हैं। मैं हक़दार नहीं था तुम्हारी सेवा का, पर अब बनना चाहता हूँ।”

रागिनी की सिसकी सुनाई दी। “समीर, मुझे कोई बड़ा तोहफा नहीं चाहिए था, बस यह सम्मान चाहिए था।”

“जानता हूँ,” समीर ने धीरे से कहा। “रिश्ते तराजू के दो पलड़े होते हैं, मैं एक को भारी और दूसरे को खाली रख रहा था। अब संतुलन बनाना सीख रहा हूँ। तुम आओगी ना?”

“हाँ,” रागिनी ने कहा।

अगले दिन जब समीर रागिनी के घर पहुँचा, तो उसने सबसे पहले रागिनी के पिता के पैर छुए। उसने झुककर माफ़ी नहीं मांगी, बल्कि अपने व्यवहार से जता दिया कि वह बदल गया है। जब वे वापस अपने घर लौटे, तो दीनानाथ जी दरवाज़े पर ही खड़े थे।

समीर ने रागिनी का हाथ पकड़कर घर में प्रवेश किया। उसने पिता की ओर देखा और सिर झुका लिया।

दीनानाथ जी ने मुस्कुराते हुए समीर की पीठ थपथपाई। “देर आए, दुरुस्त आए। याद रखना बेटा, बहू घर की लक्ष्मी तब बनती है जब दामाद उस लक्ष्मी के मायके का मान रखता है।”

उस रात घर में फिर से वही रौनक थी। रागिनी ने खाना बनाया, लेकिन आज समीर ने खुद उठकर सबको पानी परोसा। यह एक छोटी सी शुरुआत थी, लेकिन एक मज़बूत नींव पड़ चुकी थी। समीर समझ गया था कि **जब तुम दामाद होकर एक मिनट का समय निकालकर अपनी पत्नी के माता-पिता का हाल नहीं पूछ सकते, तो तुम बिल्कुल भी हक़दार नहीं हो कि अपने माता-पिता की सेवा उस लड़की से कराओ।** सम्मान दो, तभी सम्मान मिलेगा।

**कहानी के अंत में आपसे एक सवाल:**

क्या समीर का पछतावा सच्चा था? क्या हमारे समाज में अक्सर दामाद अपने ससुराल वालों की अनदेखी करते हैं जबकि बहू से सारी उम्मीदें रखी जाती हैं? क्या यह सोच बदलनी चाहिए? अपनी राय कमेंट में जरूर लिखें।

**“अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ और आँखों को नम किया, तो लाइक, कमेंट और शेयर करें ताकि यह संदेश हर घर तक पहुँच सके। अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक और पारिवारिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें। धन्यवाद!”**

मूल लेखिका : गरिमा चौधरी 

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