रिश्ते अधिकार से नहीं करुणा से  निभते हैं। – संजय सिंह

राजू और रानी की शादी हो गई। दोनों के  परिवारों की सहमति से यह शादी हुई थी ।फर्क सिर्फ इतना था कि दोनों ने एक दूसरे को पसंद किया था ।रानी अपने माता-पिता की इकलौती लड़की थी और राजू अपने तीन बड़े भाइयों में सबसे छोटा था ।दोनों इस शादी से काफी खुश थे। राजू एक प्राइवेट नौकरी करता था ।

कहने को उसके तीन बड़े भाई थे परंतु सभी भाई घर से बाहर शहर में किसी न किसी नौकरी में लगे हुए थे ।उनके परिवार भी उनके साथ रहते थे। माता-पिता की जिम्मेवारी राजू के कंधों पर ही थी ।दूसरी तरफ राजू की पत्नी रानी की हालत भी कुछ ऐसी ही थी।

वह अपने माता-पिता की इकलौती संतान थी। जिस कारण माता-पिता की जिम्मेवारी भी उसी के ऊपर थी। राजू शादी से पहले यह सब जानता था परंतु उसने वक्त पर सब कुछ छोड़ दिया था ।शादी होने के पश्चात उसने अपनी पत्नी रानी को उसके माता-पिता के पास ही रहने दिया और स्वयं अपने माता-पिता के पास रहने लगा।

वह सुबह नौकरी को चला जाता और शाम को वापस लौटता। माता-पिता के पास रहता। दूसरी तरफ रानी अपने माता-पिता के साथ रहती  थी। राजू रानी के पास एक हफ्ते में छुट्टी के दिन जाया करता और दूसरे दिन सुबह अपने माता-पिता के पास लौटता था।

राजू के माता-पिता कई बार उसे कहते कि वह अपनी पत्नी को अपने साथ रखें क्योंकि यह उसका अधिकार है ।राजू के मित्र भी अक्सर यही बात कहते।  राजू सभी की सुनता परंतु करता अपने मन की ।कई बार में तैश में आकर रानी को कहता कि अब वह उसकी पत्नी है और उसको उसके साथ ही रहना चाहिए परंतु जब उसके माता-पिता की तरफ देखता तो वह इस

विचार को अपने मन से हटा देता और मन ही मन में सोचता कि आखिरकार वह अपने माता-पिता की इकलौती संतान है। उसके अलावा उसके माता-पिता को कौन संभालेगा? उनकी देखरेख कौन करेगा और यदि उसको इस परिवारिक रिश्ते को बढ़िया से चलाना है तो अपने रिश्तों को अधिकार से नहीं, करुणा से चलना होगा।

बस यह सोचकर वह अपने माता-पिता की सेवा में लग जाता ।कभी कबार रानी के माता-पिता को जब उसकी आवश्यकता पड़ती तो वह वहां पर पहुंच जाता और बड़े ही प्रेम से उनकी सहायता करता। जिस समय उसको रानी की आवश्यकता पड़ती तो रानी भी जैसे तैसे करके उसके पास पहुंचकर उसके माता-पिता की सेवा में जुड़ जाती।

इसी स्थिति में धीरे-धीरे समय बीतता गया।राजू और रानी को एक कन्या की प्राप्ति हुई। राजू अब पिता बन चुका था और रानी  मां ।राजू की बेटी अपने ननिहाल में ही रहती और राजू उससे कई बार मिलने आता परंतु वह कभी भी उन पर अधिकार नहीं जमाता बल्कि प्रेम भाव से रिश्तों को निभाने की सलाह देता। यह स्थिति इसी तरह आगे बढ़ती गई ।एक समय वह आया।

जब रानी के माता-पिता इस संसार से चले गए और उधर राजू की माता भी इस संसार को अलविदा कह कर चली गई। अब राजू के पास सिर्फ उसके पिता ही बचे थे ।राजू के भाई की पत्नी अब राजू के पिता को संभालने के लिए घर पर आ गई और उनकी सेवा में जुट गई। धीरे-धीरे समय बदलता गया और राजू की पत्नी भी सरकारी नौकरी में लग गई। समय ने करवट ली और राजू की पत्नी राजू के घर पर आकर रहने लगी क्योंकि उसकी सरकारी नौकरी राजू के गांव में ही लगी थी।

समय की विडंबना यह थी कि अब  रानी के माता-पिता ने जो घर बनाया था। वह एकांत में था और  वहां रहने वाला कोई नहीं था इसलिए राजू को वक्त के हाथों मजबूर होना पड़ा और वह अपने पिता को अपनी पत्नी रानी और अपनी भाभी के पास छोड़कर रानी के घर पर रहने लगा क्योंकि मैं जानता था

कि रानी के पिता ने वह घर बहुत ही मेहनत से बनाया है और वह उसको बर्बाद नहीं होने दे सकता क्योंकि उसमें रानी के माता-पिता की यादें छुपी है। सारा समाज राजू को उसकी इस स्थिति पर तरह-तरह की सलाह देता परंतु राजू कभी भी किसी की सलाह में नहीं आता और सब कुछ समय पर छोड़ देता क्योंकि मैं जानता था कि यदि वह इस नाजुक रिश्ते में अधिकार को प्रयोग करेगा तो उसका रिश्ता पूर्ण रूप से खराब हो जाएगा।

वह सिर्फ समय पर सब कुछ छोड़ देता है और उसके संस्कार भी यही कहते हैं कि रिश्तो को अधिकार से नहीं निभाया जा सकता। उसे सिर्फ करुणा से निभाया जा सकता है। जिसे वह पूर्ण रूप से निभा रहा है और ईश्वर से उम्मीद करता है कि एक दिन अवश्य ऐसा आएगा। जब उसकी यह बात पूर्ण रूप से सत्य होगी कि उसने जो किया वह बिल्कुल सही किया। 

धन्यवाद। 

लेखक :संजय सिंह ।

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