नहीं चाचाजी हमारे साथ रहेंगे -यह करूणा थी जो अपने पति से लड़-झगड़कर उन्हें रखना चाहती थी जबकि उसका पति करूणेश उन्हें गांव भेजना चाहता था।
ठीक है कहकर करूणेश अपने माता-पिता को लेकर गांव चला गया जबकि विजयी भाव से करूणा अपने पापा को फोन करने लगी।
अरे यह क्या किया?-उस बूढे को क्यों रखना,बस खांसता रहेगा-उसके पापा मना करते बोले।
नहीं पापा,वे बहुत उपयोगी है, हमारा बहुत ध्यान रखते हैं।
फिर भी तुम्हारी नयी शादी है उसमें वह बूढ़ा?–वे अटकते बोले।
उधर पापा से बात करने के बाद चाचाजी को देखने गयी। चाचाजी यानि रामनरेश मिश्रा जी इसके श्वसुर श्री अभय मिश्रा के अनुज थे । अचानक उनका परिवार बरसात में खत्म हो गया था।तबसे इन्हीं सबके साथ रहते थे और आराम से अपना कमाकर खाते थे।
मिलनसार और सहयोगी स्वभाव के चाचाजी इसकी शादी के बाद खास हो गये।
उस दिन सुबह-सुबह सात बजे वह उठी थी कि चाचाजी सबको चाय पिला रहे थे।इसे भी पिला दिया।
सारी उठने में लेट हो गया -यह सकुचाती हुई बोली।
बहू,चाय पियो -कहकर आशीष देते हुए वे काम पर चले गए।
शादी के बाद वे अपने घर जाते मगर यह उनका हाथ पकड़ कर काका आप यहीं रहेंगे और मेरा बनाया -वह बोली तो वह रूंआसे हो गये।
फिर तो दिन निकलने लगे और चाचाजी शहर में थे। यहीं आटो चलाते थे।बाहरवाले कमरे में रहते थे।पूरे समय काम करते।इसकी भी मदद करते थे।सो उस दिन –बहुत ज्यादा बरसात हो रही थी और इसकी तबियत खराब थी।वहीं चाचाजी डाक्टर के पास ले गए थे।पूरी प्राइवेसी थी।
बाद में सास और ससुर ने डांटा भी चाचा श्वसुर के साथ गयी कुछ हो जाता तो-
क्या होता मां,हम जवान औरतें आंखों की भाषा जानती हैं -अब किसी के पास कोई जवाब नहीं था।
फिर तो दिन निकलते गये।इसका पति भी निश्चिंत होकर काम करता था जबकि चाचाजी बस काम से मतलब रखते थे।
बस चुपचाप काम करना, धीरे से मदद करना और अदृश्य होना।
यही कारण था कि आज सास ससुर को आसानी से गांव भेज दिया मगर पति से चाचाजी को लेकर उलझ पड़ी।कारण रिश्ते अधिकार से नहीं करूंणा से निभते हैं। प्यार के पीछे गैर भी सिर कटवाने को तैयार हो जाते हैं।
#देय वाक्य-रिश्ते अधिकार से नहीं करूणा से निभते हैं।
#दिनांक-13-2-2026
#रचना मौलिक और अप्रकाशित है।इसे मात्र यहीं प्रेषित कर रहा हूं।
#रचनाकार-परमा दत्त झा, भोपाल।