सविता की तबीयत दिन-ब-दिन अधिक बिगड़ने लगी थी। वह कई दिनों से बस एक ही बात दोहराती रहती—“मेरी बिटिया को देखना है… एक बार उसे देख लूं… बस एक बार।”
उस दिन दोपहर के वक्त फोन बजा। नंबर मायके का था। दिल धक से रह गया, लेकिन जैसे ही मैंने रिसीवर उठाया, उधर से भाई की घबराई हुई आवाज आई—
“दीदी… मां आपकी राह देखते-देखते तड़प रही हैं। प्लीज़… मुझसे नहीं… आपसे बात करना चाहती हैं। बस एक बार बात कर लो।”
मेरे हाथ कांप गए। मैं कुछ बोलती, उससे पहले ही पीछे से किचन में खड़ी सास की भारी कदमों की आवाज आई। उन्होंने मेरे हाथ से फोन लगभग छीन लिया और रूखे स्वर में भाई से बोलीं—
“नहीं, तुम्हारी मां तड़पे या मरे, हमें कुछ लेना-देना नहीं। हमारे घर आज खास मेहमान आने वाले हैं। बहू अभी फोन पर बात नहीं करेगी। खाना बन रहा है। बाद में करना।”
फिर उन्होंने फोन पटककर रख दिया, जैसे कोई मामूली चीज़ हो।
मैं वहीं खड़ी रह गई। उस एक वाक्य ने मेरे अंदर कुछ तोड़ दिया। मेरा सिर सुन्न हो गया, आंखों के आगे धुंध-सी छा गई। सास बिना देखे ही बड़बड़ाने लगीं—
“इसीलिए लोग लोकल ससुराल ढूंढते हैं। जब चाहे बहू को बुला लो। मायके वाले भी बहाने बना-बनाकर बीमार होने का ड्रामा करते हैं।”
उनका हर शब्द मेरी छाती पर हथौड़े की तरह पड़ रहा था।
शाम तक मैं मन ही मन बुरी-बुरी आशंकाओं में घिरी रही। मेरा हाथ आटा गूंथते-गूंथते रुक जाता। सब्ज़ी में नमक डालते हुए लगता जैसे हाथ सुन्न हो गए हों। मन में बार-बार वही ख्याल आता—“कुछ अनहोनी होने वाली है… मां… मां…”
पर किससे कहती? जिस घर में मेरी सांसों तक पर पहरा हो, वहां मन की बात कहना भी गुनाह था। पति—विनोद—ऑफिस से थका-हारा आता, खाना खाता और नींद के हवाले हो जाता। उसे मेरे भीतर उठती आग, मेरी आंखों में थमी बरसात, कुछ भी दिखाई नहीं देता। और जो दिखता, उस पर वह बस इतना कह देता—“अम्मा को गुस्सा मत दिलाना, घर की शांति बनाए रखो।”
शांति?
ये कैसी शांति थी, जिसमें एक बेटी अपनी मां के आखिरी दर्शन तक नहीं कर सकती?
रात को मैं पलंग पर लेटी रही, आंखों में नींद नहीं थी। बाहर बरामदे में सास की आवाज गूंज रही थी—“कल सुबह मेहमान आएंगे, घर चमकना चाहिए।”
मेरा मन चीख रहा था—“मेरी मां… मेरी मां…”
सुबह फिर फोन आया। इस बार भाई रो रहा था।
“दीदी… मां की सांसें उखड़ रही हैं… वो आपका नाम ले रही हैं… प्लीज़… आ जाओ…”
मैंने कांपते हुए सास के पास जाकर कहा—“मम्मी जी, मां बहुत बीमार हैं। मुझे अभी जाना है।”
उन्होंने मेरी तरफ ऐसे देखा, जैसे मैं कोई चाल चल रही हूं।
“आज? जब मेहमान आ रहे हैं? अभी नहीं। कल जाना।”
मेरे भीतर कुछ टूटकर गिर पड़ा। मैं गिड़गिड़ाई—“मम्मी जी, मां का आखिरी वक्त हो सकता है…”
उन्होंने ताने की तरह कहा—“अच्छा, तो आज ही आखिरी वक्त है? मायके वालों का यही ड्रामा होता है।”
उस पल लगा जैसे मैं पत्थर से बात कर रही हूं। पत्थर भी शायद पिघल जाए, पर वह नहीं।
मैंने फिर फोन उठाया। भाई की आवाज अब डूब रही थी—“दीदी… मां…”
और तभी किचन के बाहर पड़ोस के शर्मा अंकल का बेटा—निखिल—आ गया। वह हमारे घर आता-जाता रहता था। चेहरे पर घबराहट थी।
“भाभी, मैंने चाचा जी से सुना… आपकी मां… बहुत सीरियस हैं। गाड़ी मैंने बुलाई है। आपको अभी चलना होगा।”
सास ने चौंककर उसकी ओर देखा।
“तुम्हें किसने बुलाया?”
निखिल ने विनम्रता से कहा—“आंटी, मैं खुद आया हूं। उनके घर से रोते हुए फोन आया था। भाभी को अभी जाना चाहिए।”
सास के चेहरे पर गुस्सा था, पर बाहरवाले के सामने उनकी आवाज थोड़ी नरम पड़ गई। वह मुझे घूरते हुए बोलीं—
“ठीक है, जा… पर अपने कुछ कपड़े रख लेना। हो सकता है वहां कुछ दिन रुकना पड़े।”
मैंने उन्हें देखा। मन में शंका की लहर दौड़ गई। जो सास कल तक मायके जाने नहीं देती थी, आज खुद कह रही है “कुछ दिन रुकना पड़े”?
ज़रूर कोई गड़बड़ है…
पर उस वक्त गड़बड़ समझने की फुर्सत कहाँ थी? मां… मां… बस मां थी।
मैं भागकर कमरे में गई। हाथ कांप रहे थे। कुछ कपड़े उठाए, दुपट्टा सिर पर रखा, और दरवाजे से निकल गई। निकलते वक्त सास की एक बात कान में पड़ी—
“जाकर वहीं रहो। यहां कौन सा तुम्हारे बिना घर रुक जाएगा!”
उस वाक्य ने मेरे गले में कुछ अटका दिया, लेकिन मैं दौड़ती रही।
गाड़ी में बैठते ही आंखों से आंसू बहने लगे। रास्ते में खेत, पेड़, दुकानें—सब धुंधले लग रहे थे। मुझे बस मां का चेहरा दिख रहा था। बचपन में मेरी चोट पर फूंक मारती मां… मेरी पहली रसोई पर माथा चूमती मां… मेरे आंसू पोंछकर कहती मां—“मेरा बच्चा है तू।”
मैंने सोचा, “मैं पहुंचते ही मां को पकड़कर कहूंगी—माफ कर देना, मां… मुझे देर हो गई…”
पर कुछ देर बाद ही भाई का संदेश आया—
“दीदी… मां… चली गईं…”
मेरी चीख गाड़ी के अंदर ही दबकर रह गई। सांस जैसे रुक गई। हाथ-पैर ठंडे पड़ गए। मैं रोई नहीं… बस भीतर कुछ मर गया।
मैं मायके पहुंची तो घर में मातम था। रिश्तेदार, पड़ोसी—सब थे। लेकिन मेरी मां नहीं थी।
मैं मां के कमरे की तरफ दौड़ी, जहां वह हमेशा बैठकर पूजा करती थीं। वहां उनकी चौकी खाली थी। उनकी चप्पल एक तरफ रखी थी। उनका दुपट्टा कुर्सी पर पड़ा था।
मैं उस दुपट्टे से लिपटकर फूट-फूटकर रो पड़ी।
“मां… मैं आ गई… मां…”
भाई ने मुझे संभाला। पिता की आंखें सूख चुकी थीं, जैसे रो-रोकर पत्थर हो गए हों।
“बेटा, मां तुम्हारी राह देखते-देखते गई,” पापा का गला भर आया। “वो बार-बार बोलती रही—मेरी बिटिया आएगी… मेरी बिटिया…”
मेरे मन में एक आग उठी। मैं खुद को कोस रही थी। मैं सास को कोस रही थी। मैं अपने पति को कोस रही थी। मैं उस समाज को कोस रही थी, जो बहू को “घर की इज्जत” के नाम पर उसकी मां से भी दूर कर देता है।
कई दिन मायके में रही। मां की चीजें समेटते हुए, हर कपड़े से उनकी खुशबू आती। और हर खुशबू मुझे फिर से तोड़ देती।
जब मैं ससुराल वापस लौटी, तब घर वैसा ही था—दीवार पर सजावट, रसोई में बर्तनों की खनक, सास का आदेशों वाला स्वर।
पर अब मैं वैसी नहीं थी।
पहली बार मेरे भीतर स्वाभिमान ने सिर उठाया।
उस दिन रात को पति विनोद ने कहा—“अम्मा कह रही थीं, अब तुम्हें समझ आ गया होगा कि मायके वाले कैसे बहाने बनाते हैं…”
मैंने पहली बार सीधे उसकी आंखों में देखा।
“विनोद, मेरी मां मर गई। और मैं उनकी आंखें बंद नहीं कर सकी… क्योंकि तुम्हारी मां ने मुझे रोका।”
विनोद सन्न रह गया।
“तुम… तुम क्या कह रही हो?”
मैंने कांपते हुए कहा—“तुम्हें पता है, मां मेरा नाम लेते-लेते चली गईं। और मैं यहां… मेहमानों के लिए पूड़ियाँ तल रही थी।”
विनोद की आंखें झुक गईं। वह पहली बार चुप था।
अगली सुबह सास ने मेरे हाथ में काम थमाते हुए कहा—“आज बाजार चलना है, सामान…”
मैंने शांत स्वर में कहा—“मम्मी जी, आज नहीं। आज मैं अपने लिए बाहर जा रही हूं।”
उन्होंने घूरकर देखा—“क्यों?”
मैंने कहा—“क्योंकि मैं अपनी मां को खो चुकी हूं। अब मैं किसी और रिश्ते को इस वजह से नहीं खोऊंगी कि मैं ‘इजाजत’ के इंतजार में बैठी रहूं।”
सास के चेहरे पर हैरानी थी।
“बड़ी जुबान चलने लगी है,” उन्होंने ताना मारा।
मैंने पहली बार बिना डरे जवाब दिया—“जुबान नहीं, सच्चाई चल रही है। आप चाहें तो नाराज़ हो जाएं, पर मेरी जिंदगी फिर किसी के अहंकार के कारण अधूरी नहीं होगी।”
उस दिन के बाद मेरे भीतर एक नई बेटी जन्मी—जो मां को खो चुकी थी, पर अब किसी और बेटी को मां से दूर नहीं देख सकती थी।
समय बीत गया। मैं खुद मां बन गई। मेरी बेटी—अन्वी—जब बड़ी हुई, शादी के बाद एक दिन रोते हुए मेरे पास आई।
“मम्मी, सासू मां कहती हैं, बार-बार मायके नहीं जाते।”
मैंने उसका सिर अपने सीने से लगाया। मेरी आंखों में पुरानी टीस जाग उठी।
“बेटा, जब मां-बाप बूढ़े होते हैं, तो सबसे ज्यादा अपने बच्चों को देखने के लिए तरसते हैं। मैंने अपनी मां को तरसते हुए खोया है… मैं नहीं चाहती कि तू भी किसी दिन यही दर्द लेकर जिए।”
मैंने उसी दिन उसके पति—रुद्र—से बात की।
“बेटा, मैं आपकी मां की इज्जत करती हूं, पर मेरी बेटी को मां-बाप से दूर मत करो। जरूरत पड़े, तो तुम भी साथ जाओ। रिश्ते रोकने से नहीं, निभाने से टिकते हैं।”
रुद्र ने मेरी बात समझी।
उसने अपनी मां से कहा—“मां, अन्वी जब भी जाएगी, मैं खुद छोड़कर आऊंगा। क्योंकि उसके मां-बाप भी मेरे अपने हैं।”
उस दिन मुझे लगा जैसे मां की आत्मा कहीं दूर से मुस्कुरा रही है।
जमाना बदल चुका है। अब बहू के पास फोन है, रास्ते हैं, और हिम्मत भी है। अब वह “मैं मायके जा रही हूं” कहकर निकल सकती है—और इसमें कुछ गलत नहीं। गलत यह है कि किसी औरत की पीड़ा को किसी औरत द्वारा ही नज़रअंदाज कर दिया जाए, सिर्फ पद और अहंकार के कारण।
अगर मेरी सास ने उस दिन मेरी मां को “बहाना” न कहा होता…
अगर मेरे पति ने “घर की शांति” के नाम पर मुझे न रोका होता…
तो शायद मैं मां के माथे पर हाथ रखकर कह पाती—“मैं आ गई मां…”
पर मेरी जिंदगी में वह “मैं आ गई” कभी पूरा नहीं हुआ।
बस इसी अधूरेपन ने मुझे एक वादा दिया—कि मैं किसी बहू की खुशियों को, किसी बेटी के अधिकार को, किसी मां की आखिरी इच्छा को… कभी “मेहमान” और “इज्जत” के नाम पर कुचलने नहीं दूंगी।
क्योंकि रिश्ते अधिकार से नहीं, करुणा से चलते हैं।
और बदलते समय को स्वीकार करना ही सबसे बड़ी समझदारी है—वरना अहंकार के पत्थर के नीचे इंसानियत कब दब जाए, पता ही नहीं चलता।
लेखिका : सिम्मी मल्होत्रा