शाम के धुंधलके ने पूरे घर को अपनी चादर में लपेट लिया था, लेकिन उस दिन घर के भीतर का सन्नाटा किसी आने वाले भयानक तूफान की गवाही दे रहा था। बैठक में भारी खामोशी पसरी थी। सोफे पर ससुर जी, दीनानाथ जी, सिर पकड़े बैठे थे। उनके सामने उनके ही पुराने मित्र और उनके बेटे के ऑफिस के सीनियर मैनेजर, माथुर साहब बैठे थे। माथुर साहब की नज़रें भी झुकी हुई थीं। वे जिस मकसद से आए थे, उसने इस हँसते-खेलते परिवार की नींव को हिला कर रख दिया था।
रसोई के दरवाज़े के पास खड़ी पल्लवी के पैरों तले ज़मीन खिसक चुकी थी। उसके हाथ में चाय की ट्रे काँप रही थी। माथुर साहब ने अभी-अभी दीनानाथ जी को जो बताया था, वह किसी भी पत्नी के लिए मौत के फरमान से कम नहीं था। पल्लवी का पति, विकास, पिछले छह महीनों से ऑफिस की ही एक नई लड़की, तान्या के साथ रिश्ते में था। बात सिर्फ हल्की-फुल्की नहीं थी; दोनों को कई बार ऑफिस के बाहर, होटलों और पार्टियों में आपत्तिजनक स्थिति में देखा गया था। ऑफिस में विकास की इस हरकत की वजह से कंपनी की बदनामी हो रही थी, इसलिए एक पुराने पारिवारिक मित्र होने के नाते माथुर साहब ने यह कड़वा सच दीनानाथ जी को बताना अपना फर्ज़ समझा।
दीनानाथ जी की पत्नी, सुमित्रा देवी, जो थोड़ी देर पहले तक अपनी छह महीने की पोती को गोद में खिला रही थीं, अब पत्थर की मूरत बन चुकी थीं। उनके होंठ काँप रहे थे। जिस बेटे को उन्होंने इतने लाड़-प्यार और संस्कारों से बड़ा किया था, वह इतना गिर जाएगा, यह उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था। सुमित्रा देवी की हिम्मत नहीं हो रही थी कि वह पल्लवी से आँखें मिला सकें। उन्हें अपनी ही परवरिश पर घिन आ रही थी। पल्लवी, जो सुबह पाँच बजे उठकर पूरे घर को सँभालती थी, जिसके दिन की शुरुआत सास-ससुर की चाय से और रात बच्ची की मालिश से खत्म होती थी, उस बेदाग लड़की के साथ उनके बेटे ने इतना बड़ा धोखा किया था। सुमित्रा देवी की आँखों से पश्चाताप और दुख के आँसू बह निकले।
माथुर साहब के जाने के बाद घर में कोई कुछ नहीं बोला। पल्लवी चुपचाप अपने कमरे में चली गई। छह महीने की छोटी सी परी, आरूही, बिस्तर पर सो रही थी। पल्लवी उस मासूम चेहरे को देखती रही और उसकी आँखों से आंसुओं का सैलाब फूट पड़ा। वह सोच रही थी कि आखिर उससे कहाँ कमी रह गई? क्या घर को मंदिर बनाना और एक माँ की ज़िम्मेदारियों में डूब जाना उसका अपराध था? रात गहराती जा रही थी और पल्लवी का दिल एक अजीब सी बेचैनी के साथ विकास का इंतज़ार कर रहा था। वह इस सच को खुद विकास के मुँह से सुनना चाहती थी।
रात के करीब ग्यारह बज रहे थे जब बाहर कार रुकने की आवाज़ आई। दरवाज़ा खुलने की आवाज़ के साथ ही विकास की लड़खड़ाती हुई चाल और उसकी गुनगुनाती हुई आवाज़ पूरे घर में गूँज उठी। वह शराब के गहरे नशे में था और किसी बेफिक्र इंसान की तरह कोई पुराना गाना गुनगुना रहा था। लेकिन जैसे ही वह बैठक में पहुँचा, उसके कदम ठिठक गए। सामने दीनानाथ जी, सुमित्रा देवी और पल्लवी खड़े थे। घर का माहौल देखकर विकास का नशा थोड़ा उतरा, लेकिन इससे पहले कि वह कुछ समझ पाता, दीनानाथ जी ने आगे बढ़कर एक ज़ोरदार तमाचा विकास के गाल पर जड़ दिया।
तमाचे की गूँज से सन्नाटा टूट गया। विकास ने अपना गाल सहलाते हुए गुस्से से पिता को देखा, “ये क्या बदतमीज़ी है पापा? आप मुझ पर हाथ क्यों उठा रहे हैं?”
“बदतमीज़ी मैंने की है या तूने इस घर की इज़्ज़त को बाज़ार में नीलाम करके की है?” दीनानाथ जी की आवाज़ गुस्से से काँप रही थी। “माथुर साहब आए थे आज। सब बता गए तेरी और उस तान्या की बेशर्मी के किस्से। शर्म नहीं आई तुझे अपनी पत्नी और इस छोटी सी बच्ची को धोखा देते हुए?”
विकास की कुछ पल के लिए घिग्गी बँध गई। उसे अंदाज़ा नहीं था कि उसका राज़ इस तरह घर तक पहुँच जाएगा। एक पल के लिए उसके चेहरे पर घबराहट दिखी, लेकिन अगले ही पल उसने अपनी उस घबराहट को एक भयानक ढिठाई में बदल लिया। उसने अपने कंधे उचकाए और सोफे पर धप्प से बैठ गया। उसकी आँखों में कोई पछतावा नहीं था, बल्कि एक अजीब सा अहंकार था।
उसने पल्लवी की तरफ एक हिकारत भरी नज़र डाली और बोला, “अच्छा है, आपको सब पता चल ही गया। वैसे भी मैं खुद यह बात बताने ही वाला था। अब मुझसे यह नाटक और नहीं होता।”
पल्लवी ने काँपते होंठों से पूछा, “नाटक? हमारी शादी, हमारा बच्चा… सब तुम्हारे लिए एक नाटक था विकास?”
“हाँ!” विकास ज़ोर से चिल्लाया। “मेरा मन भर गया है तुमसे पल्लवी। और सच कहूँ तो मैं अब तुम्हारे साथ एक छत के नीचे नहीं रहना चाहता। तुम खुद को आईने में देखा है तुमने? सुबह से शाम तक बस रसोई में घुसी रहती हो, तुम्हारे कपड़ों से हमेशा दूध, हल्दी और मसालों की महक आती है। जब मैं ऑफिस से थक कर आता हूँ, तो मुझे एक पार्टनर चाहिए होती है जिसके साथ मैं हँस सकूँ, बाहर जा सकूँ। और तुम? तुम या तो इस रोती हुई बच्ची को सँभाल रही होती हो या अपनी सास के पैर दबा रही होती हो। रात भर ये बच्ची रोती है, मैं ढंग से सो भी नहीं पाता। मेरी ज़िंदगी नरक बन गई है तुम्हारे इस ‘आदर्श बहू और माँ’ वाले ड्रामे के चक्कर में!”
विकास के ये शब्द किसी ज़हरीले तीर की तरह पल्लवी के सीने में उतर गए। जिस बच्ची के जन्म पर विकास ने पूरे अस्पताल में मिठाइयाँ बाँटी थीं, आज वही बच्ची उसकी नींद खराब कर रही थी। जिस रसोई में पल्लवी अपने पति की पसंद का खाना बनाने के लिए घंटों गर्मी में खड़ी रहती थी, आज उसी रसोई की महक विकास को बदबू लग रही थी। पल्लवी अवाक रह गई। वह रोना चाहती थी, लेकिन उसके आँसू सूख चुके थे। इंसान इतना स्वार्थी और अंधा कैसे हो सकता है, यह आज पल्लवी ने अपनी आँखों से देख लिया था।
“शर्म कर निर्लज्ज!” सुमित्रा देवी दहाड़ उठीं। उन्होंने आगे बढ़कर विकास का कॉलर पकड़ लिया। “जिस महक को तू बदबू कह रहा है ना, वो एक माँ और पत्नी के त्याग की महक है। तू भूल गया कि तेरी माँ भी उसी रसोई में अपनी ज़िंदगी गला कर तुझे इस लायक बना पाई है? तेरी बच्ची रोती है तो तेरी नींद खराब होती है, और यह बेचारी रात-रात भर जागकर उसे सीने से लगाती है, सुबह उठकर तेरे लिए टिफिन बनाती है, तब इसकी नींद का क्या? तू एक नंबर का कायर और नीच इंसान है जो अपनी अय्याशियों का ठीकरा अपनी पत्नी की जिम्मेदारियों पर फोड़ रहा है।”
विकास ने झटके से अपनी माँ का हाथ हटाया और मुँह फेरते हुए बोला, “माँ, आप पुरानी सोच की हैं, आपको नहीं समझ आएगा। मुझे तान्या के साथ खुशी मिलती है। वह मेरे स्टेटस को मैच करती है। पल्लवी अब मेरे किसी काम की नहीं है।”
दीनानाथ जी ने गहरी साँस ली। उनकी आँखों में अब गुस्सा नहीं, बल्कि एक अंतिम फैसला था। उन्होंने पल्लवी के कंधे पर हाथ रखा और विकास की तरफ देखते हुए कहा, “ठीक है विकास। अगर पल्लवी तेरे किसी काम की नहीं है, तो तू भी आज से हमारे किसी काम का नहीं है।”
विकास ने चौंक कर पिता को देखा।
दीनानाथ जी ने उंगली दरवाज़े की तरफ दिखाते हुए कहा, “निकल जा इस घर से। यह घर मैंने अपनी मेहनत से बनाया है और इस घर में उस इंसान के लिए कोई जगह नहीं है जिसके पास ज़मीर न हो। पल्लवी मेरी बहू नहीं, मेरी बेटी है। और यह बच्ची मेरे घर का चिराग है। तू जा अपनी उस नकली और खोखली दुनिया में, जहाँ स्टेटस देखा जाता है, त्याग नहीं।”
विकास हक्का-बक्का रह गया। उसे लगा था कि पल्लवी रोएगी, गिड़गिड़ाएगी और उसके माता-पिता हमेशा की तरह अपने बेटे का ही साथ देंगे। लेकिन पासा पलट चुका था। पल्लवी ने अपने आँसू पोंछे और अपनी सास के पास जाकर खड़ी हो गई। उसने समझ लिया था कि जो इंसान अपनी ज़िम्मेदारियों को बोझ और अपनी वासना को प्यार का नाम दे, उसके लिए रोना अपनी ही आत्मा का अपमान करना है।
विकास को उसी रात उस घर से बाहर निकाल दिया गया। पल्लवी के लिए आगे का सफर आसान नहीं था, लेकिन उसे इस बात का सुकून था कि उसके साथ खड़े होने वाले उसके सास-ससुर थे, जिन्होंने एक धोखेबाज़ बेटे से ज़्यादा एक सच्ची बेटी का साथ दिया। पल्लवी ने अपनी बच्ची के भविष्य के लिए खुद को मज़बूत किया। जो हाथ कल तक सिर्फ रोटियाँ बेलते थे, उन्होंने अब अपनी किस्मत खुद लिखने की ठान ली थी।
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लेखिका : वर्षा मंडल