क्या दौलत की चमक अपनों के उस निस्वार्थ प्यार को फीका कर सकती है, जो किसी शोरूम के टैग में नहीं, बल्कि रातों की नींद और भावनाओं में बुना होता है? पढ़िए कैसे एक महंगी जीवनशैली के नशे में चूर ननद ने अपनी ही भाभी के प्यार को ठुकराया, और कैसे एक समझदार सास ने उसे रिश्तों की असली कीमत समझाकर एक टूटते हुए परिवार को बचा लिया।
“ये क्या मजाक है भाभी?” स्नेहा की आवाज़ में जहर घुला हुआ था। “आपको अंदाजा भी है कि आप कहाँ खड़ी हैं? यह मल्होत्रा परिवार है। यहाँ काम करने वाली बाइयाँ भी ऐसी साड़ियाँ नहीं पहनतीं जैसी आप मेरे लिए उठाकर ले आई हैं। माना कि आप लोग मिडिल क्लास हैं, लेकिन कम से कम बड़े घर में लेन-देन का क्या सलीका होता है, यह तो सीख लीजिए! अगर हैसियत नहीं थी तो खाली हाथ आ जातीं, पर मेरे ससुराल वालों और सहेलियों के सामने मेरी बेइज्जती कराने की क्या जरूरत थी?”
शहर के सबसे पॉश इलाके में स्थित ‘मल्होत्रा मेंशन’ आज रंग-बिरंगी रोशनियों और विदेशी फूलों से सजा हुआ था। मौका था मल्होत्रा परिवार की इकलौती बहू, स्नेहा की गोदभराई का। घर के लॉन में शहर के नामी-गिरामी लोगों का जमावड़ा था। वेटर महँगे स्नैक्स परोस रहे थे, और बैकग्राउंड में हल्की-हल्की शहनाई की धुन बज रही थी। स्नेहा, जो आज किसी बॉलीवुड हीरोइन से कम नहीं लग रही थी, एक भारी डिज़ाइनर लहंगे और हीरे के गहनों से लदी हुई सोफे पर बैठी थी। उसकी सहेलियाँ और देवरानियाँ-जिठानियाँ उसे घेरकर बैठी थीं, और हर कोई उसके रूप और उसके ससुराल की हैसियत की तारीफ कर रहा था।
स्नेहा मूल रूप से एक बहुत ही साधारण और मध्यमवर्गीय परिवार से थी। उसके पिता एक सरकारी स्कूल में क्लर्क थे और उसके बड़े भाई, विकास, एक प्राइवेट कंपनी में मामूली सी नौकरी करते थे। लेकिन स्नेहा की किस्मत अच्छी थी कि उसकी शादी एक बहुत बड़े उद्योगपति के बेटे से हो गई। शादी के बाद से ही स्नेहा की दुनिया बदल गई थी। धीरे-धीरे उस पर दौलत का नशा इस कदर छाने लगा कि वह अपने पुराने जीवन और उन लोगों को भूलने लगी, जिन्होंने उसे यहाँ तक पहुँचाने के लिए अपने हिस्से की खुशियों का बलिदान दिया था।
उसी महफ़िल में एक कोने में सिमटी हुई खड़ी थी स्नेहा की भाभी, नीता। नीता ने एक साधारण सी सूती सिल्क की साड़ी पहनी हुई थी और उसके गहने भी बहुत मामूली थे। वह बस से सफर करके आई थी, इसलिए उसके चेहरे पर थकान साफ झलक रही थी। उसके हाथों में एक कपड़े का थैला था, जिसे वह बहुत ही सहेज कर पकड़े हुए थी। नीता कई बार स्नेहा के पास जाने की कोशिश कर चुकी थी, लेकिन स्नेहा अपनी अमीर सहेलियों के बीच इतनी मगन थी कि उसने अपनी भाभी की तरफ देखने की जहमत भी नहीं उठाई। या शायद, वह जानबूझकर उन्हें अनदेखा कर रही थी क्योंकि उसे अपनी सहेलियों के सामने अपनी ‘मिडिल-क्लास’ भाभी से बात करने में शर्म आ रही थी।
कार्यक्रम खत्म होने के बाद, जब कुछ खास रिश्तेदार और सहेलियाँ स्नेहा के शानदार बेडरूम में बैठे हुए तोहफे खोल रहे थे, तब नीता भी धीरे से कमरे में दाखिल हुई। उसने अपना वो थैला स्नेहा की तरफ बढ़ाया और बहुत ही प्यार से कहा, “स्नेहा, मेरी तरफ से होने वाले बच्चे और तेरे लिए एक छोटा सा आशीर्वाद है। इसे खोलकर देख।”
स्नेहा की सहेलियों की नज़रें उस साधारण से कपड़े के थैले पर टिक गईं। एक सहेली ने मुँह बनाते हुए कहा, “अरे वाह स्नेहा, तुम्हारी भाभी तो बड़ा ‘विंटेज’ और ‘इको-फ्रेंडली’ पैकिंग लेकर आई हैं।” कमरे में एक दबी हुई हँसी गूँज उठी।
स्नेहा का चेहरा शर्म और गुस्से से लाल हो गया। उसने झटके से थैला खोला। अंदर कोई महँगा डिब्बा नहीं था, बल्कि एक हल्के पीले रंग की, हाथ की कढ़ाई की हुई सूती साड़ी थी, और साथ में बच्चे के लिए हाथ से बुने हुए ऊनी कपड़े थे। उस साड़ी पर कोई बड़े ब्रांड का टैग नहीं था, बल्कि वो एक बहुत ही साधारण सी दिखने वाली साड़ी थी।
यह देखकर स्नेहा का पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया। अपनी सहेलियों के सामने हुए इस ‘अपमान’ से उसका अहंकार बुरी तरह आहत हुआ था। उसने बिना यह सोचे कि कमरे में कौन-कौन है, वह साड़ी पलंग पर से उठाई और नीता के पैरों के पास फर्श पर फेंक दी।
“ये क्या मजाक है भाभी?” स्नेहा की आवाज़ में जहर घुला हुआ था। “आपको अंदाजा भी है कि आप कहाँ खड़ी हैं? यह मल्होत्रा परिवार है। यहाँ काम करने वाली बाइयाँ भी ऐसी साड़ियाँ नहीं पहनतीं जैसी आप मेरे लिए उठाकर ले आई हैं। माना कि आप लोग मिडिल क्लास हैं, लेकिन कम से कम बड़े घर में लेन-देन का क्या सलीका होता है, यह तो सीख लीजिए! अगर हैसियत नहीं थी तो खाली हाथ आ जातीं, पर मेरे ससुराल वालों और सहेलियों के सामने मेरी बेइज्जती कराने की क्या जरूरत थी?”
नीता के पैरों तले से ज़मीन खिसक गई। उसने सपने में भी नहीं सोचा था कि जिस ननद को उसने अपनी बेटी की तरह पाला है, वह दौलत के नशे में इस कदर अंधी हो जाएगी। नीता का गला रुँध गया, उसकी आँखों से आँसुओं की धारा बह निकली। वह कुछ कहना चाहती थी, लेकिन उसके होंठ काँप रहे थे। उसने फर्श पर गिरी हुई उस साड़ी को देखा, फिर अपनी ननद को, और बिना एक शब्द कहे, अपने आँसू पोंछती हुई कमरे से बाहर निकल गई।
स्नेहा की सहेलियाँ भी माहौल की गंभीरता को भाँपकर धीरे-धीरे कमरे से खिसक गईं। स्नेहा अभी भी गुस्से में हाँफ रही थी। तभी कमरे के दरवाजे पर खड़ी स्नेहा की सास, रुक्मिणी देवी अंदर आईं। उन्होंने पूरा तमाशा अपनी आँखों से देखा था। रुक्मिणी देवी एक बहुत ही सुलझी हुई, समझदार और ज़मीन से जुड़ी हुई महिला थीं। उन्होंने झुककर फर्श पर गिरी उस पीले रंग की साड़ी को उठाया, उसकी धूल झाड़ी और उसे बहुत ही सम्मान के साथ अपने सीने से लगा लिया।
“मम्मी जी, आप इस कबाड़ को क्यों उठा रही हैं? मैंने नौकरानी को बुलाकर इसे बाहर फिकवाने के लिए ही नीचे डाला था,” स्नेहा ने मुँह बनाते हुए कहा।
रुक्मिणी देवी ने एक गहरी साँस ली। उनकी आँखों में गुस्सा नहीं, बल्कि स्नेहा के लिए एक गहरी निराशा थी। उन्होंने बहुत ही शांत लेकिन सख्त आवाज़ में कहा, “स्नेहा, दौलत ने तुम्हारे शरीर को तो बहुत कीमती कपड़ों से ढक दिया है, लेकिन तुम्हारी सोच को इतना नंगा और गरीब कर दिया है, यह मुझे आज पता चला।”
स्नेहा हैरान रह गई। “मम्मी जी, आप मुझे क्यों डाँट रही हैं? आपने देखा नहीं वो कैसी साड़ी लाई थीं? मेरे मायके वाले हमारी हैसियत का जरा भी खयाल नहीं रखते।”
रुक्मिणी देवी स्नेहा के पास आईं और वो साड़ी उसके हाथों में थमा दी। “जरा इस साड़ी को गौर से देखो स्नेहा। यह कोई बाजार से खरीदी हुई मामूली साड़ी नहीं है। इसके पल्लू पर जो कढ़ाई है, वो मशीन की नहीं, हाथों की है। जानती हो, तुम्हारी भाभी की आँखों की रोशनी कमजोर हो रही है? कल जब तुम्हारे भाई का फोन आया था, तो वो मुझे बता रहे थे कि नीता ने पिछले छह महीनों से रात-रात भर जागकर तुम्हारे लिए यह साड़ी और तुम्हारे बच्चे के लिए ये ऊनी कपड़े बुने हैं। वो चाहती थी कि जब तुम्हारा बच्चा इस दुनिया में आए, तो वो बाजार के केमिकल वाले कपड़ों में नहीं, बल्कि अपनी मामी के प्यार और आशीर्वाद के धागों में लिपटा हो।”
स्नेहा की भृकुटी तन गई, लेकिन रुक्मिणी देवी ने उसे बोलने का मौका नहीं दिया और अपनी बात जारी रखी।
“तुम हैसियत और सलीके की बात कर रही हो ना? तो सुनो। आज तुम जिस सोने के पलंग पर बैठी हो और जिन हीरों पर गुमान कर रही हो, उसकी नींव उसी ‘मिडिल क्लास’ भाई और भाभी ने रखी है। क्या तुम भूल गई कि तीन साल पहले जब तुम्हारे पिताजी के पास तुम्हारी शादी के लिए पर्याप्त पैसे नहीं थे, तब तुम्हारी इसी भाभी ने अपने मायके से मिले अपने सारे पुश्तैनी गहने बेच दिए थे? ताकि तुम्हारी शादी मल्होत्रा परिवार में पूरे सम्मान के साथ हो सके? उस दिन नीता ने एक बार भी नहीं सोचा था कि उसका क्या होगा। उसने अपना सब कुछ तुम्हारे दिखावे की वेदी पर चढ़ा दिया, और आज तुम उसे ‘सलीका’ सिखा रही हो?”
रुक्मिणी देवी की हर एक बात स्नेहा के दिल पर हथौड़े की तरह लग रही थी।
“बेटी…” रुक्मिणी देवी की आवाज़ अब थोड़ी नरम हो गई थी, “पैसा तो आज है, कल नहीं रहेगा। लेकिन ये जो रिश्ते होते हैं ना, ये रेशम के धागों से भी ज्यादा नाजुक होते हैं। दो पल के अहंकार और गुस्से से जब ये धागे टूटते हैं, तो उनकी गाँठ उम्र भर चुभती है। तुम्हारी भाभी ने तुम्हें साड़ी नहीं दी थी, उसने अपना कलेजा निकालकर तुम्हारे सामने रख दिया था, और तुमने उसे अपने पैरों तले रौंद दिया। बहुत छोटी हो गई हो तुम स्नेहा, बहुत छोटी।”
रुक्मिणी देवी साड़ी वहीं छोड़कर कमरे से बाहर चली गईं।
कमरे में अब एक खौफनाक सन्नाटा था। स्नेहा के हाथों में वो पीली साड़ी थी। उसने जब उस साड़ी की कढ़ाई को करीब से देखा, तो उसे महसूस हुआ कि हर धागे में कितनी सफाई और कितनी मेहनत थी। उसे याद आ गया कि कैसे बचपन में जब भी वह बीमार पड़ती थी, तो यही नीता भाभी रात-रात भर उसके सिरहाने बैठकर उसके सिर पर पट्टियाँ रखती थीं। कैसे उसकी हर छोटी-बड़ी जिद पूरी करने के लिए विकास भैया अपनी जरूरतें मार लेते थे। और आज, उसी विकास भैया की पत्नी को उसने सहेलियों के सामने जलील करके घर से निकाल दिया था।
गिल्ट और पश्चाताप के बोझ से स्नेहा का दिल फटने लगा। उसके हाथ काँपने लगे और आँखों से झर-झर आँसू बह निकले। उसने उस साड़ी को अपने चेहरे से लगा लिया। उसमें उसे बाजार के किसी महंगे परफ्यूम की नहीं, बल्कि अपने घर की, अपनी भाभी के आँचल की वो जानी-पहचानी खुशबू आ रही थी।
“मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई… मैं कितनी अंधी हो गई थी,” स्नेहा खुद से बुदबुदाते हुए फूट-फूट कर रोने लगी।
उसने बिना एक पल गँवाए अपना भारी डिज़ाइनर दुपट्टा वहीं फेंका, अपने पैर से ऊँची हील के सैंडल उतारे, और उसी भारी लहंगे में नंगे पैर कमरे से बाहर भागी। वह सीढ़ियाँ उतरते हुए लगभग लड़खड़ा रही थी। मेहमान अब जा चुके थे। उसने बाहर जाकर गार्ड से पूछा, “भैया, मेरी भाभी… जो अभी अंदर से रोते हुए आई थीं, वो कहाँ गईं?”
गार्ड ने बताया, “मैडम जी, वो तो अभी पैदल ही मेन रोड की तरफ गई हैं, बस पकड़ने के लिए।”
स्नेहा ने आव देखा न ताव, वह उसी लहंगे में मेन रोड की तरफ दौड़ पड़ी। रात का समय था, सड़क पर गाड़ियाँ दौड़ रही थीं। कुछ दूर जाने पर उसने देखा कि बस स्टॉप की एक बेंच पर नीता अकेली बैठी हुई है। उसका सिर झुका हुआ था और वह अपने आँसू पोंछ रही थी।
स्नेहा हाँफती हुई वहाँ पहुँची और सीधे नीता के पैरों में गिर पड़ी।
“भाभी… मेरी माँ… मुझे माफ कर दीजिए!” स्नेहा दहाड़ मार कर रोने लगी।
नीता ने अपनी ननद को इस हालत में देखा तो वह घबरा गई। उसने तुरंत नीचे झुककर स्नेहा को उठाया और अपने सीने से लगा लिया। “ये क्या कर रही है पागल? उठ, किसी ने देख लिया तो क्या कहेगा? तेरी तबीयत खराब हो जाएगी, इस तरह सड़क पर क्यों आ गई?”
“भाभी, मैं दौलत के नशे में अंधी हो गई थी। मुझे माफ कर दीजिए। आप मेरे लिए साड़ी नहीं, अपना प्यार लाई थीं और मैंने उसे ठुकरा दिया। मुझे अपनी वो पुरानी स्नेहा वापस चाहिए भाभी, मुझे ये घमंड नहीं चाहिए। प्लीज मेरे साथ घर चलिए, वरना मैं खुद को कभी माफ नहीं कर पाऊँगी।” स्नेहा बच्चों की तरह बिलख रही थी।
नीता का दिल तो वैसे ही मोम का था। उसने अपनी ननद के आँसू पोंछे और उसके माथे को चूम लिया। “पागल लड़की, परिवार में किससे गलतियाँ नहीं होतीं? तू तो मेरी बेटी जैसी है। चल, रोना बंद कर। तुझे इस हालत में देखकर बच्चे पर क्या असर पड़ेगा?”
उस रात जब स्नेहा अपनी भाभी का हाथ पकड़कर वापस घर लौटी, तो दरवाजे पर रुक्मिणी देवी मुस्कुराते हुए उनका इंतज़ार कर रही थीं। स्नेहा ने अगले दिन होने वाली पूजा में वही पीले रंग की सूती साड़ी पहनी, जिसे उसने फर्श पर फेंका था। जब उसकी सहेलियों ने उसे उस साधारण सी साड़ी में देखा और आश्चर्य से पूछा, तो स्नेहा ने बहुत ही गर्व और मीठी मुस्कान के साथ जवाब दिया, “ये कोई मामूली साड़ी नहीं है, यह दुनिया के सबसे महंगे ‘ब्रांड’ की साड़ी है—इसका ब्रांड मेरी भाभी का प्यार है, जिसकी कीमत इस दुनिया की कोई दौलत नहीं चुका सकती।”
उस दिन स्नेहा ने सिर्फ एक साड़ी नहीं पहनी थी, बल्कि उसने रिश्तों की अहमियत का वो गहना पहन लिया था, जो उसे उसकी समझदार सास ने दिया था। दौलत से घर बनते हैं, लेकिन परिवार तो सिर्फ प्यार, सम्मान और एक-दूसरे के प्रति त्याग से ही बनते हैं।
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