सावन का महीना अपनी पूरी रंगत पर था। बाहर हल्की-हल्की बारिश हो रही थी और मिट्टी की सौंधी खुशबू महानगर के उस आलीशान फ्लैट की बालकनी तक पहुँच रही थी। आज रक्षाबंधन का दिन था। सुबह से ही घर में एक खास तरह की चहल-पहल थी। अनिकेत अपने कमरे में तैयार हो रहा था। उसने अपना पसंदीदा कुर्ता पहना था और आईने के सामने खड़ा होकर अपने बाल संवार रहा था। आज उसे अपनी सगी बहन, कविता के घर जाना था। कविता उसी शहर में लगभग बीस किलोमीटर दूर रहती थी। अनिकेत ने सोचा था कि सुबह-सुबह जाकर बहन से राखी बंधवाएगा, उसके साथ कुछ पुरानी यादें ताज़ा करेगा और फिर शाम तक घर लौट आएगा।
तभी दरवाजे की घंटी बजी। अनिकेत की पत्नी, राधिका ने दरवाज़ा खोला। बाहर डाकिया खड़ा था।
“अनिकेत सर का एक स्पीड पोस्ट है,” डाकिये ने एक खाकी रंग का लिफाफा राधिका की ओर बढ़ाते हुए कहा।
राधिका ने लिफाफा लिया और कमरे में आकर अनिकेत को थमाते हुए बोली, “लीजिए, आपके नाम से कोई चिट्ठी आई है। बाहर बारिश हो रही है, तो शायद डाकिया थोड़ा भीग गया था, इसलिए लिफाफा भी हल्का सा सीलन खा गया है।”
अनिकेत ने अपनी घड़ी देखते हुए कहा, “यार राधिका, मुझे कविता के घर निकलने में वैसे ही देर हो रही है। पता नहीं किसका लिफाफा आ गया इस वक्त।” अनिकेत ने लिफाफे को ध्यान से देखा। उस पर भेजने वाले का कोई नाम या पता नहीं था। बस अनिकेत का नाम और उसके घर का पूरा पता लिखा हुआ था। वह भौंचक्का सा वहीं खड़ा रह गया। उसने मन ही मन सोचा— “मेरी सभी चचेरी और ममेरी बहनों की राखियां तो तीन दिन पहले ही आ चुकी हैं। बुआ की बेटी ने भी कल ही कूरियर से राखी भेज दी थी। फिर आज सुबह-सुबह यह किसका लिफाफा आ गया?”
राधिका अनिकेत के चेहरे पर उभरते हुए उलझन के भावों को देख रही थी। उसने उत्सुकता से पूछा, “किसकी राखी है जी? भेजने वाले का नाम नहीं लिखा क्या?”
अनिकेत ने कंधा उचकाते हुए कहा, “पता नहीं राधिका, इसमें तो कोई नाम ही नहीं है। मैं इसे फाड़ कर देखता हूँ।”
अनिकेत ने लिफाफे का एक सिरा सावधानी से फाड़ा। लिफाफा खोलते ही उसके अंदर से एक छोटा सा पारदर्शी प्लास्टिक का पैकेट निकला। अनिकेत ने उसे बाहर निकाला। उस पैकेट के अंदर दो राखियां, थोड़े से चावल के अक्षत और एक छोटी सी पुड़िया में रोली रखी हुई थी। राखियों का रंग बेहद साधारण था। एक राखी तो बाजार में मिलने वाली आम रेशमी राखी थी, लेकिन दूसरी राखी देखकर अनिकेत ठिठक गया। वह दूसरी राखी बाजार की नहीं थी, बल्कि कच्चे सूत के धागों में छोटे-छोटे मोतियों को पिरोकर अपने हाथों से बनाई गई थी।
“ये कैसी राखी है? और दो राखियां क्यों? क्या लिफाफे के अंदर कोई चिट्ठी है?” राधिका ने लिफाफे के अंदर झांकते हुए पूछा।
अनिकेत ने पूरा लिफाफा खाली कर दिया, लेकिन उसमें कोई भी कागज या खत नहीं था। अनिकेत की उलझन और बढ़ गई। “मुझे समझ नहीं आ रहा राधिका। मेरी कोई भी ऐसी बहन नहीं है जो गुमनाम लिफाफा भेजे। और मैं तो वैसे भी कविता के घर जा ही रहा था।”
अभी अनिकेत सोच ही रहा था कि अचानक उसके मोबाइल की घंटी बज उठी। स्क्रीन पर उसकी बहन ‘कविता’ का नंबर चमक रहा था।
अनिकेत ने झट से फोन उठाया और खुशमिजाज लहजे में बोला, “अरे दीदी! बस मैं निकल ही रहा हूँ। गाड़ी की चाबी हाथ में ही है। आधे घंटे में आपके पास पहुँच जाऊंगा। आपने मेरी मनपसंद खीर बनाकर रखी है ना?”
फोन के दूसरी तरफ से एक भारी और रुंधे हुए गले की आवाज़ आई। “भाई… तू मत निकल। मैं घर पर नहीं हूँ।”
अनिकेत की मुस्कान एकदम से गायब हो गई। “क्या हुआ दीदी? आप रो क्यों रही हैं? सब ठीक तो है ना? जीजाजी तो ठीक हैं?”
कविता ने सिसकते हुए कहा, “हाँ भाई, यहाँ सब ठीक है। लेकिन कल रात अचानक मेरे सास-ससुर की तबीयत खराब हो गई थी, तो मुझे और तुम्हारे जीजाजी को रात को ही अचानक उनके गाँव निकलना पड़ा। मुझे पता था तू सुबह आएगा, लेकिन हालात ऐसे बन गए कि मैं तुझे बता भी नहीं पाई। भाई, तेरी राखी मैंने कल ही स्पीड पोस्ट से भेज दी थी। शायद आज सुबह तक तुझे मिल जाएगी।”
अनिकेत की नज़रें अपने हाथ में रखे उस खुले हुए लिफाफे पर गईं। “दीदी, आपकी राखी तो मुझे बस अभी-अभी मिली है। मैं उसी लिफाफे को हाथ में लेकर खड़ा हूँ।”
“अच्छा, मिल गई? चलो, कम से कम मेरी राखी सही वक्त पर पहुँच तो गई,” कविता की आवाज़ में थोड़ी राहत थी।
लेकिन अनिकेत का दिमाग अभी भी सुन्न था। उसने धीरे से पूछा, “दीदी, आपने राखी भेजी, वो तो ठीक है। लेकिन इस लिफाफे में भेजने वाले का नाम क्यों नहीं लिखा? और सबसे बड़ी बात… इस लिफाफे में एक नहीं, बल्कि दो राखियां हैं। एक राखी तो साधारण है, लेकिन दूसरी वाली हाथ से बुनी हुई कच्ची डोरी की है। दीदी, ये दूसरी राखी किसकी है?”
अनिकेत का यह सवाल सुनते ही फोन के दूसरी तरफ एक गहरा सन्नाटा छा गया। सिर्फ कविता के सिसकने की आवाज़ें आ रही थीं।
“दीदी! आप रो क्यों रही हैं? मुझे बताइए ये दूसरी राखी किसकी है?” अनिकेत की बेचैनी बढ़ने लगी थी। राधिका भी परेशान होकर अनिकेत के चेहरे को देख रही थी।
कुछ पलों की खामोशी के बाद कविता ने एक गहरी सांस ली और कांपती हुई आवाज़ में कहा, “भाई… वो दूसरी राखी तेरी ‘गुड़िया’ की है।”
‘गुड़िया!’ यह नाम अनिकेत के कानों में किसी बम के धमाके की तरह गूंजा। गुड़िया… उनके पुश्तैनी गाँव में रहने वाले उनके पुराने केयरटेकर और खेत-मज़दूर रामदीन काका की इकलौती बेटी थी। रामदीन काका ने अनिकेत और कविता को बचपन में अपने हाथों से खिलाया था। गुड़िया उम्र में अनिकेत से बस दो साल छोटी थी। अनिकेत का पूरा बचपन गुड़िया के साथ गाँव की पगडंडियों पर दौड़ते, आम के बागों में छुपम-छुपाई खेलते और बारिश में कागज़ की नावें तैराते हुए बीता था।
गुड़िया अनिकेत को अपना सगा भाई मानती थी। जब भी रक्षाबंधन आता, गुड़िया अपनी गुल्लक के पैसे निकालकर अनिकेत के लिए राखी लाती थी। अनिकेत भी उसे चिढ़ाता, उससे लड़ता, लेकिन पूरे गाँव में अगर कोई गुड़िया को कुछ कह दे, तो अनिकेत उससे भिड़ जाता था। एक बार अनिकेत साइकिल से गिर गया था और उसके घुटने से खून बहने लगा था। तब गुड़िया ने अपनी फ्रॉक का किनारा फाड़कर उसके घुटने पर बांध दिया था और खुद फूट-फूट कर रोई थी। अनिकेत ने उस दिन गुड़िया के सिर पर हाथ रखकर कसम खाई थी, “पगली रोती क्यों है? मैं तेरा बड़ा भाई हूँ ना। जीवन भर तेरी रक्षा करूंगा।”
लेकिन फिर वक्त का पहिया घूमा। अनिकेत उच्च शिक्षा के लिए दिल्ली चला गया। फिर वहां से एमबीए करके एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी लग गई। वह शहर की भागदौड़, कॉर्पोरेट मीटिंग्स, टारगेट्स और अपने करियर की सीढ़ियां चढ़ने में इतना अंधा हो गया कि गाँव, रामदीन काका और गुड़िया सब पीछे छूट गए।
रामदीन काका के गुज़रने के बाद गुड़िया की शादी एक शराबी और लालची आदमी से हो गई थी। गुड़िया ने कई बार अनिकेत को खत लिखे, फोन पर बात करने की कोशिश की, लेकिन अनिकेत हमेशा ‘मीटिंग में हूँ’, ‘बाद में बात करता हूँ’ कहकर फोन काट देता था। कुछ साल पहले गुड़िया ने रोते हुए अनिकेत को फोन किया था कि उसका पति उसे बहुत मारता है और उसे मदद की ज़रूरत है। अनिकेत ने उस वक्त कुछ पैसे उसके अकाउंट में ट्रांसफर कर दिए और सोचा कि उसने एक भाई का फर्ज़ निभा दिया। लेकिन वह भूल गया था कि गुड़िया को पैसों की नहीं, बल्कि अपने उस भाई के साये की ज़रूरत थी जिसने बचपन में उसकी रक्षा करने की कसम खाई थी।
“दीदी…” अनिकेत की आवाज़ अब गले में फंसने लगी थी। “गुड़िया की राखी? लेकिन गुड़िया ने आपको क्यों दी? उसने सीधा मुझे क्यों नहीं भेजी?”
कविता फफक-फफक कर रो पड़ी। “क्योंकि भाई… गुड़िया अब इस दुनिया में नहीं है।”
अनिकेत के हाथों से मोबाइल छूटते-छूटते बचा। उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। “क्या… क्या कह रही हो दीदी?”
“हाँ अनिकेत। गुड़िया का वो शराबी पति उसे रोज़ पीटता था। पिछले महीने उसे बहुत तेज़ बुखार आया, लेकिन उसके पति ने उसे डॉक्टर के पास ले जाने के बजाय घर में ही पड़ा रहने दिया। जब मुझे गाँव से खबर मिली, तो मैं भागकर वहां गई। मैंने उसे अस्पताल में भर्ती करवाया। उसे पीलिया बिगड़ कर इन्फेक्शन बन गया था। मैंने तुझे कई बार फोन किया, लेकिन तू अपने उस अमेरिका वाले प्रोजेक्ट में इतना बिजी था कि तेरा फोन हमेशा स्विच ऑफ आता था।”
अनिकेत की आँखों से अब आंसुओं की धारा बह निकली थी। राधिका ने आगे बढ़कर अनिकेत का कंधा पकड़ लिया।
कविता आगे बोल रही थी, “अस्पताल में जब उसे लगा कि वह अब नहीं बचेगी, तो उसने नर्स से कुछ कच्चे सूत के धागे और मोतियां मंगवाई थीं। वह अस्पताल के बिस्तर पर लेटे-लेटे कांपते हाथों से यह राखी बुन रही थी। जब मैंने उससे पूछा कि वह क्या कर रही है, तो उसने कहा था— ‘दीदी, मेरा अनिकेत भइया बहुत बड़ा आदमी बन गया है। उसके पास मेरे लिए वक्त नहीं है, लेकिन मैं तो उसकी बहन हूँ ना। मेरी मौत के बाद ये राखी भइया को दे देना। उनसे कहना कि इस जन्म में मैं उनके साथ और नहीं खेल पाई, लेकिन अगले जन्म में मैं फिर से उनकी बहन बनकर आऊंगी।’ अनिकेत… वह राखी मुझे देकर गुड़िया ने हमेशा के लिए अपनी आंखें मूंद लीं। वह तुझे याद करते-करते चली गई।”
अनिकेत फोन हाथ में पकड़े वहीं ज़मीन पर धड़ाम से बैठ गया। वह फूट-फूट कर रोने लगा। “मुझे माफ कर दो दीदी… मैं कितना स्वार्थी हो गया था। मैंने पैसों और रुतबे को रिश्तों से बड़ा मान लिया। मेरी गुड़िया मुझे पुकारती रही और मैं अपनी झूठी दुनिया में खोया रहा। मैं हत्यारा हूँ दीदी, मैं हत्यारा हूँ।”
राधिका ने अनिकेत को सीने से लगा लिया। वह भी अनिकेत के बचपन के किस्से जानती थी। वह समझ रही थी कि आज अनिकेत का जो अहंकार टूटा था, उसकी चुभन कितनी गहरी थी।
अनिकेत ने रुंधे हुए गले से पूछा, “दीदी… गुड़िया का कोई और है क्या?”
कविता ने रोते हुए बताया, “उसकी एक पाँच साल की बेटी है, रिया। गुड़िया के जाने के बाद उसका पति उस बच्ची को भी अनाथालय में छोड़ने की बात कर रहा है। वह आदमी किसी काम का नहीं है।”
अनिकेत ने अपने आंसू पोंछे। उसकी आँखों में अब पछतावे के साथ-साथ एक अजीब सा दृढ़ निश्चय था। उसने फोन पर कहा, “दीदी, आप जहाँ हैं, वहीं रुकिए। मैं और राधिका आज ही गाँव जा रहे हैं।”
अनिकेत ने फोन काटा। उसने राधिका की तरफ देखा। उसे कुछ कहने की ज़रूरत नहीं पड़ी। राधिका ने तुरंत कहा, “आप गाड़ी निकालिए। मैं पांच मिनट में कपड़े पैक करती हूँ। हम गुड़िया की बेटी को हमेशा के लिए अपने घर लाएंगे। वह बच्ची अनाथालय में नहीं, अपने मामा के घर पलेगी।”
अनिकेत ने उस कच्चे सूत की राखी को अपने हाथों में उठाया। वह राखी नहीं थी, बल्कि उसके बचपन का वो कर्ज था जिसे अब उसे अपनी ज़िंदगी भर चुकाना था। उसने उस राखी को चूमा और अपनी कलाई पर बांध लिया। आज उस साधारण से धागे ने अनिकेत को शहर के एक मशीन जैसे इंसान से वापस एक भावनाओं से भरा हुआ इंसान बना दिया था।
अनिकेत और राधिका बारिश के बीच अपनी गाड़ी से गाँव की ओर निकल पड़े थे। सड़क पर बारिश की बूंदें गिर रही थीं, लेकिन अनिकेत के दिल के अंदर जो मैल जमा था, वह आज आंसुओं की शक्ल में पूरी तरह धुल चुका था। आज रक्षाबंधन का सही अर्थ अनिकेत की समझ में आया था। राखी सिर्फ एक त्योहार नहीं है, बल्कि यह उन यादों, उन वादों और उस विश्वास का प्रतीक है, जिसे कोई भी दूरी या समय मिटा नहीं सकता।
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लेखिका : नेहा पटेल