क्या एक सास का अपनी पुरानी यादों और पसंद से मोह, एक नई बहू के प्यार और अनकही कोशिशों पर भारी पड़ सकता है? एक मामूली सी दिखने वाली साड़ी कैसे दो पीढ़ियों के बीच की उस अदृश्य दीवार को गिरा सकती है जिसे सालों की रवायतों ने खड़ा किया हो, पढ़िए इस मार्मिक कहानी में।
सौम्या की आँखों में एक पल के लिए नमी तैर गई, लेकिन उसने खुद को संभाल लिया। “जी माँ जी, जैसी आपकी इच्छा।” वह चुपचाप वहाँ से पलटी और कमरे से बाहर निकल गई। उसका दिल बहुत भारी हो गया था। उसे लगा कि वह चाहे कितनी भी कोशिश कर ले, सुमित्रा जी के दिल में अपनी जगह कभी नहीं बना पाएगी।
शाम का धुंधलका गहराने लगा था और घर में चारों ओर उत्सव की गहमागहमी थी। सुमित्रा जी के घर में उनके इकलौते भतीजे, सार्थक की शादी की तैयारियाँ जोरों पर थीं। घर रिश्तेदारों से भरा हुआ था। दालान में गद्दे बिछे थे, आँगन में हलवाई की भट्ठियां सुलग रही थीं और कमरों के भीतर औरतों की हंसी-ठिठोली गूंज रही थी। सुमित्रा जी इस घर की सबसे बड़ी और सम्मानित सदस्या थीं। उनके पति के गुजरने के बाद उन्होंने ही पूरे परिवार को एक धागे में पिरो कर रखा था। उनका स्वभाव थोड़ा सख्त और अपनी चीजों को लेकर बेहद संजीदा था।
उनके बेटे विकास की शादी को अभी मुश्किल से आठ महीने ही हुए थे। विकास की पत्नी, सौम्या, एक बहुत ही सुलझी हुई, पढ़ी-लिखी और आधुनिक विचारों वाली लड़की थी। सुमित्रा जी ने सौम्या को बहू के रूप में स्वीकार तो कर लिया था, लेकिन उनके मन के किसी कोने में अभी भी एक फासला कायम था। सौम्या शहर की पली-बढ़ी थी और सुमित्रा जी को लगता था कि वह उनके पारंपरिक तौर-तरीकों और उनकी पसंद को कभी समझ नहीं पाएगी। इसलिए, सुमित्रा जी अक्सर सौम्या की कोशिशों को नजरअंदाज कर देती थीं।
शादी का मुख्य समारोह अगले दिन था। सुमित्रा जी अपने कमरे में बैठी अपनी पुरानी अलमारी टटोल रही थीं। वे अपनी वो गहरे हरे रंग की बनारसी साड़ी निकाल रही थीं, जो उनकी बेटी अंजलि ने अपनी पहली तनख्वाह से उन्हें खरीद कर दी थी। सुमित्रा जी के लिए वह साड़ी सिर्फ एक लिबास नहीं, बल्कि उनकी बेटी के प्यार का प्रतीक थी। उन्होंने सोच रखा था कि भतीजे की शादी में वे वही पहनेंगी।
तभी दरवाजे पर एक हल्की सी दस्तक हुई। सुमित्रा जी ने मुड़कर देखा, दरवाजे पर सौम्या खड़ी थी। उसके हाथों में एक खूबसूरत सा डिब्बा था जिस पर सुनहरे रंग का रिबन बंधा हुआ था। सौम्या के चेहरे पर एक मीठी सी झिझक और आँखों में ढेर सारी उम्मीदें थीं।
“माँ जी, आप अंदर आ सकती हूँ?” सौम्या ने बहुत ही नम्रता से पूछा।
“हाँ बहू, आ जाओ। क्या बात है? नीचे संगीत में नहीं गई तुम?” सुमित्रा जी ने साड़ी को बिस्तर पर फैलाते हुए कहा।
सौम्या धीरे से अंदर आई और वह डिब्बा सुमित्रा जी के सामने बिस्तर पर रख दिया। “माँ जी, कल सार्थक भैया की शादी है। मैंने… मैंने आपके लिए कुछ लिया था। मुझे पता है आपकी पसंद बहुत खास है, पर मुझे लगा कि शायद आपको यह अच्छा लगेगा।”
सुमित्रा जी ने बिना कोई खास उत्सुकता दिखाए डिब्बे की तरफ देखा और फिर अपनी उस पुरानी हरी साड़ी को सहलाने लगीं। “इसकी क्या जरूरत थी बहू? मेरे पास तो साड़ियों का पूरा संदूक भरा पड़ा है। और वैसे भी, मैंने कल के लिए अपनी ये हरी बनारसी निकाल ली है। अंजलि ने दी थी मुझे, मेरी बहुत पसंदीदा है।”
सौम्या का चेहरा थोड़ा उतर गया। उसने बहुत प्यार से वह डिब्बा खोला। अंदर हल्के गुलाबी (पीच) रंग की एक बेहद खूबसूरत चंदेरी सिल्क की साड़ी रखी थी। उस पर बारीक लखनवी कढ़ाई का काम था। सौम्या जानती थी कि सुमित्रा जी को अब भारी साड़ियाँ पहनने में घुटनों और कमर में दर्द होता है, इसलिए उसने पूरे शहर के बाजार छानकर यह हल्की लेकिन बेहद शाही दिखने वाली साड़ी चुनी थी।
“माँ जी, बस एक बार देख लीजिए। यह बहुत हल्की है, आपको पहनने में आराम रहेगा और यह रंग आप पर बहुत जंचेगा,” सौम्या ने उम्मीद से कहा।
सुमित्रा जी ने साड़ी के पल्लू को बस उँगलियों से छुआ और रूखेपन से कह दिया, “रंग बहुत फीका है बहू। हमारे यहाँ शादियों में इतने हल्के रंग नहीं पहने जाते। तुम इसे रख लो, किसी और दिन घर में ही पहन लूँगी। कल तो मैं यही हरी वाली पहनूँगी।”
सौम्या की आँखों में एक पल के लिए नमी तैर गई, लेकिन उसने खुद को संभाल लिया। “जी माँ जी, जैसी आपकी इच्छा।” वह चुपचाप वहाँ से पलटी और कमरे से बाहर निकल गई। उसका दिल बहुत भारी हो गया था। उसे लगा कि वह चाहे कितनी भी कोशिश कर ले, सुमित्रा जी के दिल में अपनी जगह कभी नहीं बना पाएगी।
सौम्या के बाहर जाते ही अंजलि, जो सुमित्रा जी की बेटी है और शादी में शामिल होने के लिए आई हुई है, कमरे के अंदर दाखिल हुई। वह दरवाजे के पीछे खड़ी होकर सब सुन रही थी। अंजलि बहुत ही समझदार और अपनी माँ के स्वभाव को अच्छे से जानने वाली लड़की है।
अंजलि ने कमरे में आकर बिस्तर पर रखी उस गुलाबी साड़ी को देखा और फिर अपनी माँ की तरफ देखा। सुमित्रा जी अभी भी अपनी हरी साड़ी की तहें ठीक करने में लगी थीं।
अंजलि ने आगे बढ़कर उस हरी बनारसी साड़ी को सुमित्रा जी के हाथों से ले लिया और उसे वापस अलमारी में रखने लगी।
“अरे, ये क्या कर रही है अंजलि? कल मुझे वही पहननी है,” सुमित्रा जी ने हैरानी से कहा।
अंजलि वापस मुड़ी, उसने वो गुलाबी चंदेरी साड़ी उठाई और उसे सुमित्रा जी के कंधों पर रखते हुए बोली, “अरे छोड़ो ना माँ, सौम्या आपके लिए कितनी सुंदर साड़ी लाई है। लाओ… दो मुझे… मैं इसमें अभी फ़ॉल और पीको लगा देती हूँ, कल शादी में आप यही पहन लेना। बहू को अच्छा लगेगा।”
सुमित्रा जी ने थोड़ा झल्लाते हुए कहा, “तुझे तो पता है ना कि मुझे तेरी दी हुई साड़ी कितनी पसंद है! और यह रंग देख, कितना फीका है। मैं बुढ़िया सी लगूँगी इसमें। मुझे नहीं पहननी ये नए जमाने की चीजें।”
अंजलि अपनी माँ के पास बिस्तर पर बैठ गई। उसने सुमित्रा जी के दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए। “माँ, मेरी दी हुई साड़ी तो आप पिछले चार सालों में हर छोटे-बड़े फंक्शन में पहन चुकी हैं। मुझे पता है कि आप मुझसे बहुत प्यार करती हैं। लेकिन माँ, सौम्या इस घर में अभी नई है। वो अपनी जड़ें जमाने की कोशिश कर रही है। क्या आपने देखा नहीं कि वो कितनी उम्मीद से यह साड़ी लेकर आई थी?”
सुमित्रा जी ने नजरें चुरा लीं, “तो मैं क्या करूँ? जो चीज पसंद नहीं, वो सिर्फ उसका दिल रखने के लिए पहन लूँ?”
“हाँ माँ, कभी-कभी सिर्फ किसी का दिल रखने के लिए कुछ चीजें अपना लेनी चाहिए,” अंजलि ने बहुत ही कोमलता से समझाया। “माँ, आपको याद है, जब मेरी शादी हुई थी और मेरी सास ने मुँह दिखाई में मुझे वो भारी सा सोने का हार दिया था? मुझे वो बिल्कुल पसंद नहीं था, वो बहुत पुराना और अजीब सा डिजाइन था। लेकिन मैंने उसे पूरे एक साल तक हर जगह पहना। क्यों? क्योंकि मैं अपनी सास का दिल जीतना चाहती थी। मैं चाहती थी कि उन्हें लगे मैं उनकी पसंद का सम्मान करती हूँ।”
सुमित्रा जी चुपचाप सुन रही थीं।
अंजलि ने आगे कहा, “माँ, सौम्या ने यह साड़ी ऐसे ही किसी दुकान से नहीं उठा ली है। कल वो मुझसे पूछ रही थी कि आपको घुटनों में दर्द रहता है, तो कौन सा फैब्रिक आपके लिए हल्का और आरामदायक रहेगा। उसने पूरा दिन बाजार में घूमकर आपके आराम के लिए यह साड़ी खोजी है। इस साड़ी के रंग में उसका प्यार और आपकी फिक्र बुनी हुई है माँ। जब आप कल मेरी दी हुई हरी साड़ी पहनकर बाहर निकलेंगी, तो लोगों को आपका मुझसे प्यार दिखेगा, लेकिन सौम्या को अपनी हार दिखेगी। उसे लगेगा कि वह इस घर में कभी आपकी बेटी नहीं बन सकती, हमेशा एक ‘बाहर वाली’ ही रहेगी।”
सुमित्रा जी का दिल अब पसीजने लगा था। उन्हें अचानक अपनी जवानी के दिन याद आ गए। जब वे नई-नई ब्याह कर आई थीं, तो उन्होंने अपनी सास के लिए बहुत मेहनत से एक स्वेटर बुना था। लेकिन उनकी सास ने यह कहकर वह स्वेटर संदूक में डाल दिया था कि उसका रंग बहुत चटक है। सुमित्रा जी को आज तक याद था कि उस दिन वे अकेले में कितना रोई थीं।
“क्या मैं सच में सौम्या के साथ वही कर रही हूँ, जो मेरी सास ने मेरे साथ किया था?” सुमित्रा जी ने मन ही मन सोचा।
उन्होंने अपने कांपते हाथों से उस गुलाबी चंदेरी साड़ी को छुआ। उसका कपड़ा सच में बहुत मुलायम था, बिल्कुल सौम्या के स्वभाव की तरह।
अंजलि ने मुस्कुराते हुए साड़ी का पल्लू माँ के सिर पर रखा, “देखो माँ, ये रंग आप पर कितना खिल रहा है। कल जब आप ये पहनकर मंडप में बैठेंगी ना, तो सौम्या का सीना गर्व से चौड़ा हो जाएगा कि मेरी सास ने मेरी लाई हुई साड़ी पहनी है। एक साड़ी ही तो है माँ, लेकिन यह आप दोनों के बीच के उस फासले को पाट देगी जो जाने-अनजाने में बन गया है।”
सुमित्रा जी की आँखों में आँसू आ गए। उन्होंने साड़ी को सीने से लगा लिया और अंजलि का माथा चूमते हुए बोलीं, “तू सच कह रही है बिटिया। मैं पुरानी चीजों के मोह में यह भूल ही गई थी कि नए रिश्तों को सींचना भी तो मेरी ही जिम्मेदारी है। ला, दे मुझे, मैं खुद अपनी बहू की लाई साड़ी में फ़ॉल लगाऊँगी।”
अंजलि के चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान फैल गई।
अगले दिन, शादी का माहौल अपने चरम पर था। शहनाई की धुनें बज रही थीं और मेहमानों से पूरा हॉल भरा हुआ था। सौम्या एक कोने में खड़ी होकर मेहमानों की खातिरदारी देख रही थी। उसका मन अभी भी उदास था। उसकी नजरें बार-बार सुमित्रा जी के कमरे की तरफ जा रही थीं। वह सोच रही थी कि माँ जी अब अपनी वही हरी बनारसी साड़ी पहनकर बाहर आएंगी।
तभी कमरे का दरवाजा खुला। सुमित्रा जी बाहर आईं। सौम्या की आँखें फटी की फटी रह गईं।
सुमित्रा जी ने वही हल्के गुलाबी रंग की चंदेरी साड़ी पहनी हुई थी। माथे पर छोटी सी बिंदी, बालों में मोगरे का गजरा और चेहरे पर एक अलौकिक शांति। वे उस साड़ी में सचमुच किसी राजमाता से कम नहीं लग रही थीं।
सौम्या के पैर खुद-ब-खुद सुमित्रा जी की तरफ बढ़ गए।
सुमित्रा जी ने पास आकर सौम्या के सिर पर हाथ रखा और मुस्कुराते हुए बोलीं, “कैसी लग रही हूँ मैं? मेरी बहू की पसंद है, तो अच्छी ही लग रही होगी ना?”
पास ही खड़ी सुमित्रा जी की जेठानी ने कहा, “अरे सुमित्रा, आज तो तू बिल्कुल नई दुल्हन की तरह चमक रही है। रंग बहुत जंच रहा है तुझ पर।”
सुमित्रा जी ने गर्व से सौम्या के कंधे पर हाथ रखा और बोलीं, “जंचेगा क्यों नहीं जीजी, मेरी सौम्या ने जो इतने प्यार से मेरे लिए छांट कर लाई है। मेरी बहू को पता है कि उसकी सास को किस चीज में आराम मिलता है।”
यह सुनते ही सौम्या की आँखों से खुशी के आँसू छलक पड़े। उसने झुककर सुमित्रा जी के पैर छुए। सुमित्रा जी ने उसे उठाकर अपने सीने से लगा लिया।
उस एक पल में, उस गुलाबी साड़ी के मुलायम रेशमी धागों ने सास और बहू के बीच के सारे फासलों को मिटा दिया था। सौम्या को समझ आ गया था कि उसने सिर्फ एक साड़ी नहीं पहनाई है, बल्कि अपनी सास के दिल में हमेशा के लिए अपनी जगह बना ली है। और सुमित्रा जी ने जान लिया था कि पुरानी यादें अपनी जगह कीमती होती हैं, लेकिन नए रिश्तों की मिठास घर को स्वर्ग बना देती है।
एक सवाल आप सभी के लिए: क्या आपके जीवन में भी कभी ऐसा कोई पल आया है जब आपने किसी अपने की खुशी के लिए अपनी पसंद को किनारे रख दिया हो और उस छोटे से त्याग ने एक खूबसूरत रिश्ते की शुरुआत की हो? अपना अनुभव जरूर बताएं।
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