*सरकार तो सिर्फ कागज के नोटों का रंग बदलती है, लेकिन जब अपनी ही खून-पसीने से पाली हुई औलाद का रंग बदलता है, तो इंसान जीते जी मर जाता है।*
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*तुम्हारी हवेली के पैसे तुम्हें मुबारक हों। हमने उसे तुम्हें ‘दान’ कर दिया। लेकिन अपना स्वाभिमान हम तुम्हें दान नहीं कर सकते। मैं और तुम्हारी माँ वापस जा रहे हैं—गांव नहीं, वृद्धाश्रम। कम से कम वहां हमें अजनबी कहकर तो नहीं पुकारा जाएगा। वहां हम ‘अनाथ’ कहलाएंगे, वो मंज़ूर है, लेकिन ‘बेगैरत माँ-बाप’ कहलाना हमें मंज़ूर नहीं।*
शाम की धुंधलकी में अपनी पुरानी आराम कुर्सी पर बैठे दीनानाथ जी की नज़रें दीवार पर टंगी उस घड़ी पर टिकी थीं, जिसकी टिक-टिक अब उनके दिल की धड़कनों से ज्यादा तेज़ सुनाई देती थी। घर के बाहर एक लंबी गाड़ी के रुकने की आवाज़ आई। दीनानाथ जी के चेहरे पर एक फीकी सी मुस्कान तैर गई, ठीक वैसी ही जैसी किसी सूखे हुए पेड़ पर बारिश की पहली बूंद गिरने पर आती है। उनकी पत्नी, सुमति, रसोई से हाथ पोंछते हुए बाहर आईं। उनके चेहरे पर भी झुर्रियों के बीच उम्मीद की एक लकीर थी।
उनका बेटा, ‘समीर’, आज दो साल बाद विदेश से लौटा था।
समीर घर में दाखिल हुआ। विदेशी कपड़ों की महक और महंगे परफ्यूम की खुशबू उसके साथ अंदर आई, जिसने घर की पुरानी अगरबत्ती की भीनी महक को पल भर में दबा दिया। उसने झुककर माँ-पिता के पैर छुए जरूर, लेकिन उसकी नज़रें बार-बार अपनी कलाई पर बंधी महंगी घड़ी और मोबाइल की स्क्रीन पर जा रही थीं।
दीनानाथ जी ने बेटे को गले लगाया। वह शरीर तो समीर का था, पर स्पर्श में वो गर्माहट नदारद थी जो बचपन में हुआ करती थी। तब समीर स्कूल से आते ही पिता के गले से लिपट जाया करता था और पसीने की बदबू की परवाह किए बिना अपनी दिन भर की कहानियां सुनाता था। आज वह साफ़-सुथरा था, महक रहा था, लेकिन ‘अपना’ नहीं लग रहा था।
रात के खाने पर सन्नाटा पसरा हुआ था। सुमति ने समीर की पसंद की खीर बनाई थी। समीर ने एक चम्मच खाया और नैपकिन से मुंह पोंछते हुए बोला, “माँ, इसमें चीनी बहुत है। मैं डाइट पर हूँ।” सुमति का उत्साह जैसे वहीं जम गया।
तभी समीर ने असली बात छेड़ी। “पापा, मैं सोच रहा था कि अब आप दोनों की उम्र हो गई है। इस पुराने शहर और इस जर्जर हवेली में अकेले रहना सेफ नहीं है। क्यों न आप इस घर को बेच दें और मेरे साथ मुंबई चलें? वहां मेरा बड़ा फ्लैट है, नौकर-चाकर हैं, मेडिकल सुविधाएं हैं। आप दोनों वहां आराम से रहेंगे।”
दीनानाथ जी के हाथ से निवाला छूट गया। यह हवेली उनके पूर्वजों की निशानी थी। ईंट-ईंट जोड़कर उन्होंने इसे संवारा था। इसी आंगन में समीर ने चलना सीखा था, इसी नीम के पेड़ के नीचे उसकी शादी का मंडप सजा था।
“बेटा, यह घर नहीं, हमारी आत्मा है,” दीनानाथ जी ने धीमी आवाज़ में कहा।
समीर ने थोड़ा झुंझलाते हुए कहा, “पापा, इमोशन से दुनिया नहीं चलती। प्रैक्टिकल बनिए। इस प्रॉपर्टी के अच्छे दाम मिल रहे हैं। मैंने एक बिल्डर से बात कर ली है। वो कल पेपर लेकर आएगा। उस पैसे से मैं अपने बिज़नेस का लोन भी चुका दूंगा और आपके नाम पर एफ.डी. भी कर दूंगा। प्लीज, ज़िद मत कीजिये।”
उस रात दीनानाथ जी सो नहीं पाए। सुमति ने करवट बदलते हुए पूछा, “क्या सोच रहे हैं?”
दीनानाथ जी ने छत की ओर देखते हुए कहा, “सुमति, उसे पैसों की ज़रूरत है। शायद इसीलिए आया है। औलाद के सामने बाप का स्वाभिमान वैसे भी हार जाता है। अगर हमारे घर बेचने से उसका भविष्य सुधरता है, तो यही सही।”
अगले ही दिन दीनानाथ जी ने कांपते हाथों से रजिस्ट्री के कागजात पर हस्ताक्षर कर दिए। वो कलम नहीं, बल्कि अपनी सांसें गिरवी रख रहे थे। समीर के चेहरे पर जीत की चमक थी, ठीक वैसी ही चमक जैसी लॉटरी लगने पर होती है।
एक महीने के भीतर हवेली बिक गई। जो पैसा आया, वह समीर ने अपने अकाउंट में ट्रांसफर करवा लिया, यह कहकर कि वह मुंबई में उनके लिए इन्वेस्ट करेगा। दीनानाथ जी और सुमति, अपनी ज़िंदगी भर की यादों को दो सूटकेस में समेटकर, बेटे के साथ मुंबई आ गए।
मुंबई का फ्लैट वाकई बहुत शानदार था। संगमरमर के फर्श और कांच की दीवारों वाला। लेकिन वहां दीनानाथ जी और सुमति के लिए जो जगह तय की गई थी, वह उस आलीशान घर का ‘गेस्ट रूम’ नहीं, बल्कि रसोई के पास वाला एक छोटा सा कमरा था, जिसे शायद स्टोर रूम की तरह इस्तेमाल किया जाता था।
शुरुआत के कुछ दिन ठीक बीते। लेकिन धीरे-धीरे समीर और उसकी पत्नी, राधिका का असली रंग सामने आने लगा।
सुबह की चाय के लिए दीनानाथ जी को इंतज़ार करना पड़ता। राधिका अक्सर अपनी किटी पार्टी की बातों में व्यस्त रहती और सास-ससुर को ऐसे नज़रअंदाज़ करती जैसे वो घर के पुराने फर्नीचर हों।
एक दिन दीनानाथ जी को अपनी दवाइयों के लिए कुछ पैसों की ज़रूरत थी। उन्होंने समीर से कहा, “बेटा, मेरे खाते में जो पैसे डाले थे, उसमें से कुछ निकाल दोगे? मेरी बी.पी. की गोलियां खत्म हो गई हैं।”
समीर लैपटॉप पर काम कर रहा था। उसने बिना नज़र हटाए कहा, “पापा, अभी कैश नहीं है। और वो पैसे मैंने बिज़नेस में लगा दिए हैं। आप राधिका से मांग लीजियेगा।”
जब दीनानाथ जी ने राधिका से कहा, तो उसने नाक-भौं सिकोड़ते हुए कहा, “बाबूजी, आप लोग दवाई खाते हैं या फांकते हैं? पिछले हफ्ते ही तो मंगवाई थीं। इतनी महंगाई है, थोड़ा हाथ रोककर चला कीजिये।”
दीनानाथ जी सन्न रह गए। जिस बेटे के लिए उन्होंने करोड़ों की हवेली एक पल में बेच दी, आज वही बेटा और बहू उन्हें सौ-दो सौ रुपये की दवा के लिए ताने दे रहे थे? उन्हें वो दिन याद आया जब समीर को क्रिकेट किट चाहिए थी और दीनानाथ जी ने अपनी पुरानी साइकिल बेचकर उसे किट दिलाई थी। तब उन्होंने नहीं सोचा था कि महंगाई है।
वक्त के साथ हालात बदतर होते गए। अब घर में कोई मेहमान आता, तो समीर और राधिका, दीनानाथ जी और सुमति को उनके कमरे में ही रहने की हिदायत देते।
“पापा, आज मेरे क्लाइंट्स आ रहे हैं। आप लोग बाहर मत निकलिएगा। वो लोग बहुत मॉडर्न हैं, आपकी खांसने की आवाज़ और पुराने कपड़े उन्हें अच्छे नहीं लगेंगे,” समीर ने एक दिन साफ-साफ कह दिया।
दीनानाथ जी उस दिन अंदर से टूट गए। वो पिता, जिसने बेटे को उंगली पकड़कर समाज में चलना सिखाया, आज उसी बेटे के लिए ‘शर्मिंदगी’ का कारण बन गया था।
एक शाम, समीर के घर एक बड़ी पार्टी थी। उसकी कंपनी को बड़ा मुनाफा हुआ था—उसी पैसे से जो हवेली बेचकर मिला था। घर रोशनी से जगमगा रहा था। सुमति को प्यास लगी थी। वह पानी लेने के लिए कमरे से बाहर आईं। उनके कपड़े साधारण सूती साड़ी थे और बाल बिखरे हुए।
तभी समीर के एक अमीर दोस्त की नज़र उन पर पड़ी। “अरे समीर, ये कौन हैं? नई मेड रखी है क्या?”
समीर उस वक्त दोस्तों के बीच व्हिस्की का गिलास लिए खड़ा था। उसने एक पल के लिए अपनी माँ को देखा। उसकी आंखों में शर्म थी, अपनापन नहीं। उसने हंसते हुए कहा, “अरे नहीं यार, वो… वो गांव से आई हुई एक दूर की रिश्तेदार हैं। बस कुछ दिन के लिए पड़ी हैं यहाँ। इग्नोर करो।”
सुमति के कानों में ये शब्द पिघले हुए सीसे की तरह उतरे। वह पानी लिए बिना ही उल्टे पांव कमरे में लौट आईं और फूट-फूट कर रोने लगीं। दीनानाथ जी ने जब पत्नी को रोते देखा, तो उन्होंने कारण पूछा। सुमति ने सिसकते हुए सब बता दिया।
दीनानाथ जी उस रात चुप रहे। बहुत चुप। वह खामोशी किसी तूफान से पहले की नहीं थी, बल्कि किसी चीज़ के हमेशा के लिए मर जाने की थी।
अगली सुबह, जब समीर और राधिका सोकर उठे, तो घर में अजीब सी शांति थी। स्टोर रूम का दरवाजा खुला था। अंदर सामान नहीं था, न ही दीनानाथ जी और सुमति थे।
समीर को लगा शायद सुबह की सैर पर गए होंगे। लेकिन तभी उसकी नज़र डाइनिंग टेबल पर रखे एक लिफाफे पर पड़ी। पास में ही 500 रुपये का एक पुराना, बंद हो चुका नोट रखा था।
समीर ने धड़कते दिल से चिट्ठी उठाई। उसमें दीनानाथ जी की कांपती हुई लिखावट थी:
*”बेटा समीर,*
*कल रात तुमने अपने दोस्त से कहा कि हम तुम्हारे दूर के रिश्तेदार हैं। तुम गलत थे बेटा। हम तो तुम्हारे वो ‘पुराने नोट’ हैं, जो कभी तुम्हारी ज़रूरतें पूरी करने के काम आते थे, लेकिन आज नए ज़माने में हम ‘अमान्य’ (Demonetized) हो चुके हैं। हमारा रंग पुराना पड़ गया है, इसलिए अब हम तुम्हारी चमकती हुई दुनिया में नहीं चलते।*
*तुम्हें लगा कि हवेली बेचकर तुमने हमें बेघर कर दिया? नहीं बेटा, घर ईंटों से नहीं, सम्मान से बनता है। जब तुमने पहली बार दवा के लिए पैसे मांगे जाने पर मुंह बनाया था, हम उसी दिन बेघर हो गए थे।*
*तुम्हारी हवेली के पैसे तुम्हें मुबारक हों। हमने उसे तुम्हें ‘दान’ कर दिया। लेकिन अपना स्वाभिमान हम तुम्हें दान नहीं कर सकते। मैं और तुम्हारी माँ वापस जा रहे हैं—गांव नहीं, वृद्धाश्रम। कम से कम वहां हमें अजनबी कहकर तो नहीं पुकारा जाएगा। वहां हम ‘अनाथ’ कहलाएंगे, वो मंज़ूर है, लेकिन ‘बेगैरत माँ-बाप’ कहलाना हमें मंज़ूर नहीं।*
*और हाँ, यह पुराना 500 का नोट साथ रख रहा हूँ। इसे देखोगे तो याद आएगा कि जब नोट का रंग और मूल्य बदलता है तो वो रद्दी हो जाता है। और जब औलाद का रंग बदलता है, तो मां-बाप ज़िंदा लाश बन जाते हैं। खुश रहना, अपनी नई करेंसी के साथ।*
*- तुम्हारे वो रिश्तेदार, जो कभी तुम्हारे माँ-बाप थे।”*
समीर के हाथ से चिट्ठी छूटकर गिर गई। वह बदहवास होकर बाहर भागा। “पापा! माँ!” वह चिल्लाया। उसने लिफ्ट की तरफ दौड़ लगाई, सीढ़ियां कूदीं, सोसाइटी के गेट तक गया। गार्ड ने बताया कि दो बुजुर्ग अभी-अभी ऑटो रिक्शा में बैठकर स्टेशन की तरफ गए हैं।
समीर ने अपनी कार निकाली और पागलों की तरह स्टेशन की तरफ भागा। उसकी आँखों के सामने बचपन की सारी रील घूमने लगी—पापा का कंधे पर बैठाना, माँ का अपने हिस्से की रोटी उसे खिलाना। उसे महसूस हुआ कि हवेली के करोड़ों रुपये उस सुकून को नहीं खरीद सकते जो माँ के आंचल में था, जिसे उसने आज हमेशा के लिए खो दिया था।
स्टेशन पहुंचकर उसने हर प्लेटफार्म छान मारा। ट्रेन जा चुकी थी। वह पटरी के किनारे घुटनों के बल बैठ गया और जोर से चिल्लाया। उसके पास अब दौलत थी, बड़ा घर था, लेकिन वो ‘छत’ नहीं थी जो दुआओं के रूप में उसके सिर पर तनी रहती थी।
उस दिन समीर को समझ आया कि नोट बदलने से तो सिर्फ बाजार में खलबली मचती है, लेकिन जब रिश्तों की नियत बदलती है, तो इंसान अंदर से खोखला हो जाता है। वह घर लौट आया, पर वो आलीशान फ्लैट अब उसे काटने को दौड़ता था। उसने हवेली तो बेच दी थी, लेकिन उस सौदे में उसने अपना ‘सुकून’ और ‘ईश्वर’ दोनों बेच दिया था।
दीनानाथ जी और सुमति ने फिर कभी मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने अपनी बची हुई पेंशन से एक छोटा सा कमरा किराए पर लिया और स्वाभिमान से जीने लगे। उन्होंने साबित कर दिया कि माँ-बाप बच्चों की बैसाखी नहीं होते, वो वो बरगद के पेड़ होते हैं जो अगर अपनी जड़ें समेट लें, तो ज़मीन बंजर हो जाती है।
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**कहानी के अंत में आपसे एक सवाल:**
क्या समीर को माफ़ी मिलनी चाहिए? क्या दीनानाथ जी का फैसला सही था?
आज के दौर में हम अक्सर अपने माता-पिता को ‘पुराने ख्यालात’ का कहकर किनारे कर देते हैं, लेकिन क्या हम कभी सोचते हैं कि जब हम पुराने हो जाएंगे, तो हमारे साथ क्या होगा?
**“अगर इस कहानी ने आपकी आँखों को नम किया और दिल को छुआ, तो लाइक, कमेंट और शेयर जरूर करें ताकि यह संदेश हर उस औलाद तक पहुंचे जो अपने बूढ़े माँ-बाप को बोझ समझता है। अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक और दिल को छू लेने वाली पारिवारिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें। धन्यवाद!”**
मूल लेखिका : मीना गुप्ता