सुबह के 8 बज रहे थे, लेकिन सिंग साहब
की रसोई में किसी युद्ध मैदान जैसी हलचल मची थी। एक तरफ गैस पर चाय चढ़ रही थी, दूसरी तरफ दूध उबलने की कगार पर था, तवे पर परांठे सिक रहे थे और इस सब के बीच खड़ी थीं स्नेहा – घर की बड़ी बहू।
अचानक पीछे से एक कड़क आवाज़ गूंजी, “भाभी! मैंने कितनी बार समझाया है, फोन लेकर किचन में नहीं आया करते। बहू के हाथ में हर वक्त मोबाइल रहना शोभा नहीं देता।”
स्नेहा ने मुस्कुराने की कोशिश की और बोली, “ठीक है मोनी आगे से ध्यान रखूंगी।” तभी विमलाजी अंदर दाखिल हुईं, “क्या चल रहा है ? सुबह-सुबह इतनी बहस क्यों?”
मोनी ने तुरंत जवाब दिया, “कुछ खास नहीं मम्मी, बस भाभी को समझा रही थी कि दिन भर फोन में घुसी न रहें। आजकल की लड़कियों को तो बस स्क्रीन से चिपके रहने की आदत हो गई है।”
विमलाजी ने स्नेहा की ओर देखा, “बहू, मोनी सही कह रही है। तुम दिन भर ऑफिस में रहती हो, वहां कितना फोन चलाती हो ये कोई नहीं जानता क्या….। कम से कम घर में तो इस आदत को छोड़ दो।” स्नेहा ने चुपचाप सिर हिला दिया। मन तो किया कह दे कि “ऑफिस में फोन नहीं, काम करती हूँ, इसी कमाई से तो इस घर का चूल्हा जलता है”, लेकिन जुबान पर ताला लग गया।
स्नेहा की शादी हुए अभी डेढ़ साल ही हुए थे। वह शहर के एक प्रतिष्ठित स्कूल में शिक्षिका थीं। सुबह 7 बजे घर का काम निपटाकर 8 बजे स्कूल निकल जातीं और दोपहर 2 बजे लौटकर फिर रसोई संभाल लेतीं।
मोनी अभी कुंवारी थी, बी.एड कर रही थी और खुद को घर की ‘मालिकाना हक जताने वाली बेटी’ समझती थी। सास के सामने बहू को टोकना उसका अपना अधिकार बन चुका था। उस शाम जब सब खाने पर बैठे, तो बात फिर उसी मोड़ पर आ गई।
विमलाजी ने सब्जी परोसते हुए कहा, “देखो बेटा अमित, आजकल की बहुओं को घर से ज्यादा फोन प्यारा होता है। स्नेहा फिर भी संभली हुई है, पर इसे भी संभाल कर रखना। कल को माँ बनने के बाद भी अगर फोन ही संभालती रही तो बच्चे का क्या होगा?”
अमित ने माहौल हल्का करने के लिए मुस्कुराते हुए कहा, “अरे मम्मी, इतना चिंता क्यों करती हो। स्नेहा का फोन भी स्कूल की कॉपी जैसा ही है, या तो बच्चों की फोटो या नोट्स।” मोनृ तुरंत कूद पड़ी, “भैया, आप हमेशा इनका ही पक्ष क्यों लेते हो? मम्मी आप ही सोचो, आने वाली पीढ़ी क्या सीखेगी? हमारी दादी कहती थीं बहू को पराये मर्दों से बात नहीं करनी चाहिए, ये तो रोज स्कूल के प्रिंसिपल, बच्चों के पिताओं से फोन पर बात करती हैं। बहू की भी कुछ मर्यादा होती है।”
अमित के माथे पर बल पड़ गए, “मोनी ये आज का जमाना है। टीचर है, बात तो करनी ही पड़ेगी। ऐसे बहू-बहू कब तक करती रहोगी यदि ऐसा रहा तो बाहर काम करने वाली कोई लड़की ही नहीं मिलेगी।”
विमला ने गहरी सांस ली, “देख बेटा, हमें पुराने जमाने की बातें अच्छी लगती हैं, ये सच है। पर सब छोड़ भी दें तो भी बहू को थोड़ा तो घर के रंग में रंगना ही पड़ेगा ना। मोनी भी तो तुम्हारी भलाई के लिए ही कहती है।” मोनी ने वहीँ से वार किया, “हाँ भैया, मैं बस चाहती हूँ कि आपकी पत्नी आदर्श बहू बने। समाज में सब तारीफ करें कि सिंग साहब जी के घर की बहू कितनी संस्कारी है।”
स्नेहा ने प्लेट में चावल मिलाते हुए सोचा, “संस्कारी होने का मतलब क्या सिर्फ चुप रहना है?” दीदी क्यों टोंकती रहती है….
मैंने तो इतने दिनों से कभी प्यार के बोल बोलते नहीं देखा, पर जब ये बहू बनेंगी तब देखूंगी।खैर छोंडो…..
दिन बीतते गए। हर छोटी बात पर मोनी की ‘सलाहें’ चलती रहीं।
“भाभी, साड़ी की पिन ऊपर मत लगाइए, गला ढका रहना चाहिए।”
“भाभी, हंसते हुए जोर से नहीं बोलते, पड़ोसियों को अच्छा नहीं लगता।”
“भाभी, अनजान आदमी की आंखों में आंखें डालकर बात नहीं करते, बहुत आज़ाद लगती हैं आप।”
स्नेहा कभी-कभी मन ही मन गिनती करतीं, “आज मोनी ने ‘भाभी’ कहकर कितनी बार टोका?”
पर फिर खुद को समझा लेतीं, “यही मेरा घर है, यही अपने लोग हैं। झगड़ा करूंगी तो बेअदब कहलाऊंगी। चुप रहूंगी तो कम से कम शांति तो बनी रहेगी।”
एक साल बाद मोनी की शादी तय हुई—माल्होत्रा जी के बेटे मनीष से। अच्छी नौकरी, अच्छा घर, अच्छी फैमिली, बड़ी किराना दुकान और ऊपर दो फ्लैट वाला मकान।
शादी के शगुन में जब पहली बार मनीष की मां, पुष्पा जी घर आईं, तो उन्होंने मोनी की खूब तारीफ की, “बहुत सुशील लगती है आपकी बेटी। बस एक बात का ध्यान रखना बहन जी, हमारे यहां बहुएं मोबाइल बहुत कम चलाती हैं। घर, दुकान, परिवार—सब में ध्यान देना होता है। आजकल की लड़कियों को फोन की लत लग जाती है न, तो बस…” मोनी उस वक्त मुंह नीचा करके मीठी मुस्कान दे रही थी, पर मन ही मन सोच रही थी— “मैं तो वैसे भी फोन ज्यादा नहीं चलाती। भाभी तो दिन भर फोन-फोन करती हैं, मैं थोड़े ही…
शादी धूम-धाम से हुई। मोनी दुल्हन बनकर नए घर पहुंची। चार-पांच दिन तो रस्मों और मेहमानों में निकल गए। फिर धीरे-धीरे असली जिंदगी शुरू हुई।
सवेरे पांच बजे ही पुष्पा जी की आवाज़ आती, “मोनी उठ गई? दूध वाला गया क्या? देखकर आ, नीचे दूध ले ले। फिर पूजा भी करनी है। हमारे घर में बहू की पूजा के बिना कोई खाना नहीं खा सकता।”
छह बजे तक रसोई में चाय, नाश्ता, ससुर जी के लिए हल्का फुल्का, देवर के लिए टिफिन, पति के लिए परांठा, सास के लिए स्पेशल सेवइयां… और इन सब के बीच फोन की स्क्रीन सिर्फ एक बार जलती—जब मां का मिसड कॉल आता। एक दिन मोनी ने सोचा, “थोड़ी देर काम निपटाकर ही सही, मम्मी से आराम से बात करूंगी।”
वह दूध चढ़ाकर स्टोव पर रख ही रही थी कि साइड में रखे मोबाइल पर व्हाट्सएप की आवाज़ हुई। उसने जल्दी से स्क्रीन देखी—भाभी स्नेहा का मैसेज था, “कैसी हो मोनी ? थक जाती होगी न? यहां से तो रोज वीडियो कॉल पर पूछा करती थीं ‘भाभी का मोबाइल मत छोड़िएगा’, वहां क्या हाल है?”
मोनी के होंठों पर हल्की सी हंसी आई। उसने टाइप करना शुरू किया— “भाभी, फोन छूने का टाइम ही कहाँ मिलता है, सुबह से…” तभी पीछे से पुष्पा जी की तेज आवाज गूंजी, “मोनी! दूध उबलकर नीचे गिर रहा है और तुझे फोन की पड़ी है? बहू के हाथ में सुबह-सुबह मोबाइल अच्छा लगता है क्या? अभी शादी को महीना भी नहीं हुआ और ये हाल…”
मोनी चौंक गई, घबराकर गैस धीमी की, फर्श पोंछने लगी। मन ही मन हल्का सा खटका लगा, “भाभी को तो मैं कितना सुनाती थी मोबाइल के लिए, यहाँ तो खुद ही डांट खा रही हूँ, भाभी सब सुन लिया होगा….।
पर असली मुसीबत तो तब शुरू हुई, जब एक दिन दोपहर में उसने थोड़ी देर के लिए टीवी चालू कर लिया। दुकान पर सब गए हुए थे, घर में सिर्फ मोनी और उसकी सास थीं। काम निपटाकर वह ड्राइंग रूम में आकर बैठी और सोचा— “थोड़ी सास-बहू सीरियल ही देख लूँ मन हल्का हो जाएगा।”
ये सोचकर जैसे ही उसने रिमोट उठाया, पुष्पा जी ने सामने से टोका, “क्या कर रही है मोनी?”
“मां जी, जरा सा…”
“दिन में टीवी? अब इसी की कमी रह गई थी घर में। बहू अगर दिन में टीवी देखना शुरू कर दे तो घर के काम कौन करेगा? अभी कपड़े धूप में उलटने हैं, ऊपर वाले कमरे की झाडू भी नहीं हुई। हमारे यहाँ तो बेटियां भी मायके में दिन में टीवी नहीं देखतीं, बहू तो फिर भी बहू है।”
मोनी ने टीवी बंद कर दिया। उसे याद आया, वो खुद कितनी बार स्नेहा से कहती थी—”भाभी, दिन में सीरियल मत देखो, घर की बहू टीवी के आगे बैठी रहे तो अच्छा लगता है क्या?”
उसी रात, जब सब सो गए, मोनी बालकनी में आई। खुली हवा में उसने गहरी सांस ली। फोन उठाकर उसने पहली बार स्नेहा को कॉल लगाया। दूसरी ही रिंग पर उधर से स्नेहा की हंसती सी आवाज आई, “अरे, आज बहन साहिबा को याद आ गई भाभी की?”
मोनी की आवाज भर्रा गई, “भाभी… आप सच्ची कह रही थीं, न दामाद बदलते हैं, न बहुएं, बस भूमिका बदलती है।”
स्नेहा शांत हो गईं, “क्या हुआ, सब ठीक है न? पुष्पा मम्मी कुछ कहती हैं क्या?”
“कहती क्या नहीं… भाभी, मुझे तो अब हर एक वाक्य अपने ही पुराने शब्दों में सुनाई देता है। मैं जो-जो तुम्हें समझाती थी, वही सब अब मेरे ऊपर लागू हो रहा है। वो कहती हैं – बहू को हर समय मोबाइल अच्छा नहीं लगता। बहू को दिन में टीवी नहीं देखना चाहिए। बहू को बड़ी बेटी बनने की कोशिश नहीं करनी चाहिए… और मैं सोचती रहती हूँ – ये सब बातें मैंने भी तो तुमसे कही थीं।” उधर से हल्की सी हंसी आई, “चल, कम से कम अब तुझे एहसास हो रहा है।”
“मजाक मत करो भाभी, सच में… मन बहुत भारी है। पति भी बस मम्मी की ही सुनता है। मैंने कहा कि कभी-कभी उसके साथ बाजार घूमने चलें, तो बोलता है – ‘माँ के पैर दर्द करते हैं, उनके साथ बैठा करूंगा।’ मैं तो जैसे इस घर में ‘अतिरिक्त’ हूँ।”
स्नेहा ने कुछ देर चुप रहकर कहा, “देख मोनी दुख है मुझे ये सब सुनकर, सच में। पर मैं तुझे टोकूंगी नहीं, क्योंकि अब तुझे खुद आईना दिखाई दे रहा है। एक बात पूछूं?”
“पूछिए…”
“जब तू मुझे ये सब नियम-कायदे समझाती थी, तब कभी ये सोचा था कि कल तू भी किसी के घर की बहू बनेगी?”
मोनी की आंखें भर आईं, “नहीं… लगता था मेरा तो बहुत ‘कूल’ ससुराल होगा। मैं तो बस तुम्हें ‘आदर्श बहू’ बनाने निकली थी भाभी।” दोनों तरफ कुछ पल सन्नाटा रहा। फिर स्नेहा ने बात हल्की करते हुए कहा, “चल, चिंता मत कर। तू भी धीरे-धीरे अपना रास्ता निकाल लेगी। बस इतना याद रख – अभी तू जिस दर्द से गुजर रही है, कल को अगर तेरी ननद या कोई और बहू आए, तो उस पर वही नियम मत थोप देना।”
“ननद?” मोनी हंस पड़ी, “यहाँ तो मैं ही ननद और बहू दोनों हूँ फिलहाल। लेकिन हाँ, भाभी, मैं वादा करती हूँ, अगर कभी मेरा बेटा हुआ, बहू आई, तो मैं उसे ‘बहू’ कम, ‘बेटी’ ज्यादा रखूंगी।”
साल डेढ़ साल गुजर गए। मोनी धीरे-धीरे अपनी ससुराल के माहौल में ढल गई, पर उसने अपने भीतर कुछ बातें मजबूत कर लीं—
फोन वो पहले से कम चलाती थी, अब ज्यादा नहीं चलाती थी, लेकिन जरूरत होने पर बात करना नहीं छोड़ती। टीवी दिन में नहीं, रात में पति के साथ देख लेती। सबसे बड़ी बात – सास की बात के साथ-साथ अपने लिए भी छोटे-छोटे कोने निकालना सीख लिया।
उधर स्नेहा और अमित का भी एक बेटा हुआ आयुष।विमला जी पोते के चक्कर में थोड़ा मुलायम पड़ने लगीं। घर का माहौल हल्का-हल्का बदलने लगा था।
दो साल बाद, गर्मियों की छुट्टियों में मोनी पहली बार मायके आई। इस बार उसकी आंखों में सिर्फ शिकायत नहीं थी, अनुभव भी था।
घर में सब उसके आने पर खुश हो गए। विमला जी ने उसे गले लगाया, “कैसी है मेरी बेटी? ससुराल वाले परेशान तो नहीं करते न?” रितु हंसती हुई बोली, “परेशान तो नहीं करते, पर नियम-कायदे बहुत हैं मम्मी। वैसे अब समझने लगी हूँ – जब बहू होती है न, तो नियम ज्यादा दिखते हैं, अपने घर में कम।”
तभी रसोई से स्नेहा की आवाज आई, “रीना, जरा आटा देना, आयुष गोदी से उतरने का नाम नहीं ले रहा।”
मोनी भागकर रसोई में गई। स्नेहा ने टॉप-पैंट पहन रखा था, बाल खुले थे, माथे पर सिर्फ एक पतली सी काली बिंदी, बिना दुपट्टे के वो आराम से परांठे बेल रही थीं।
मोनी ने अनायास ही कहा, “भाभी, आपने… पल्लू… मतलब, दुपट्टा नहीं लिया?”
स्नेहा ने उसे देखकर मुस्कुरा कर जवाब दिया, “जब तू मुझे रोज याद दिलाती थी, तब लेती थी न। अब तेरी पंचायत बंद हो गई, तो मैंने भी पल्लू लेना बंद कर दिया। वैसे मम्मी बोलती हैं क्या अब भी?”
विमला जी बाहर से ही बोलीं, “अरे अब क्या कहें बहू को? छोटा बच्चा है, दौड़ती भागती रहती है, गिर जाएगी दुपट्टे में उलझ कर। और वैसे भी अब जमाना बदल गया है।”
मोनी ने मां की तरफ देखा, “जमाना तब नहीं बदला था क्या, जब भाभी अकेली इस घर की बहू थी?”
अमित, जो बाहर से ये सब सुन रहा था, हल्की सी मुस्कान दबाता हुआ अंदर आया, “ये बात मैं तब भी कहता था, अब भी कह रहा हूँ। फर्क बस इतना है कि अब दोनों बहुएं मिलकर माँ को समझाती हैं, तब अकेली स्नेहा बोलती थी तो ‘जुबान चलाती है’ कहलाती थी।”
मोनी ने सिर झुका लिया, “भैया, मैंने बहुत गलत किया न भाभी के साथ?”
अमित ने उसकी पीठ थपथपाई, “गलत-सही छोड़ दे। इंसान तब सीखता है, जब खुद उस जगह खड़ा होता है। तू अब समझ गई न, कि बात समझाने का भी तरीका होता है, और हर नियम हर किसी पर एक जैसा नहीं चलता।” स्नेहा ने आटा छुड़ाते हुए रितु की तरफ देखा, और कहा- “अब जो भी हो रितु, मुझे खुशी इस बात की ज्यादा है कि तू बदल गई है। बस इतना ध्यान रखना – अब तुझे किसी और पर ननद-टाइप हक जताने से पहले उसकी जगह पर खुद को खड़ा कर के देख लेना।”
“भाभी…”,मोनी की आवाज भर आई, “मैंने आपको बहुत टोका-टोकी की है। मोबाइल, कपड़े, हंसना-बोलना… आपको शायद तब बहुत बुरा लगता होगा।”
स्नेहा ने हल्की हंसी के साथ कहा, “बुरा तो लगता था। पर अब सोचती हूँ, अगर तू इतनी ‘सख्त टीचर’ न होती, तो शायद मैं अपनी बात उतनी मजबूती से सीख ही नहीं पाती। अब जब आयुष बड़ा होगा और कभी उसकी बहू आएगी, मैं तेरी लाइनों को उल्टा इस्तेमाल करूंगी।”
मोनी चौंकी, “कैसे भाभी?” स्नेहा ने प्यार से कहा, “उसे कहूंगी – ‘बहू, तुम बहू हो, तो बहू की मर्यादा निभाओ… और मेरी मर्यादा ये है कि मैं तुम्हें हमेशा बेटी की तरह रखूंगी। तुम जो हो, जैसी हो, वैसी ही अच्छी हो। बस किसी और की खुशियों पर अपनी खुशी कुर्बान मत करना, और किसी की खुशी के लिए उसे खुद से दूर मत करना।”
मोनी की आंखों से आंसू टपक पड़े। उसने आगे बढ़कर स्नेहा को कस कर गले लगा लिया।
विमलाजी दरवाजे की ओट से ये दृश्य देख रही थीं। उनके चेहरे पर हल्की सी शर्म और गहरी सी राहत दोनों झलक रहे थे।
“शायद अब सचमुच जमाना बदल रहा है,” उन्होंने मन ही मन सोचा, “अब बहू-ननद वाला घर कम, बहन-बहन वाला घर ज्यादा हो जाएगा।”
दोस्तों -जब बेटी बहू बन जाती है तब एहसास होता है कि आदर्श बहू बनना कितना कठिन है,इसीलिए प्यार के मीठे बोल ही बोलने चाहिए , न कि ताने देने चाहिए,इससे आपसी रिश्ते ही खराब होते है। ये कहानी कैसी लगी ? अपनी राय देकर कमेन्ट कीजिए। प्लीज कहानी को लाइक करे।
धन्यवाद
कहानी का शीर्षक -ननद भाभी का रिश्ता
स्वरचित मौलिक रचना
अमिता कुचया