जब से रामकिशन रमिया को इस घर में ब्याह कर लाया । तब से वह प्यार के दो मोर मीठे बोल के लिए तरस कर रह गया। उसने बहुत चाव से अपना ब्याह रचाया, घर बसाया की एक दिन उसका घर भी हंसी से गूंजेगा,आंगन में बच्चों की किलकारियां गूंजेगी मगर ठीक इसके विपरीत रमिया का मीठे बोल और अच्छे व्यवहार से तो दूर-दूर तक कोई नाता ही नहीं था।
वह तो सुबह उठते ही बेफिजूल का बड़बड़ाना या फिर सजना संवरना शुरू कर देती,यहां तक की रामकिशन कुछ अच्छी बात भी कहता तो उसे बुरी ही लगती। वो कोई भी बात समझती ही नहीं थी और ना ही समझने की कोशिश करती थी। रामकिशन के प्रति उसके मन में जरा सा भी स्नेह या दया का भाव नहीं था।
रामकिशन अक्सर रमिया को गृहस्थी के फर्ज समझाने की कोशिश करता मगर रमिया ठहरी बड़ी हठी और नासमझ।
रामकिशन जितना अपने साथ उसे अपनी राह पर चलाने की कोशिश करता । वो उतनी ही किसी दूसरी राह पर चलने लग जाती थी।
रामकिशन की बूढी मां लाजो जी से यह सब देखा ना जाता
मगर रमिया तो अपने अल्हड़पन के चलते कभी अपनी बूढ़ी सास की भी कदर नहीं की ।
जब भी रमिया खाना बनाती तो जल्दबाजी में कभी दाल में नमक ज्यादा तो कभी सब्जी में मिर्च ज्यादा और तो और जब रोटी बनाती, तो इतनी सख्त बना देती की रामकिशन तो जैसे तैसे चबाकर खा लेता ।
मगर लाजो जी उसे दाल में कई देर डूबा कर रखती, फिर वह नरम होती । तब जाकर ही वो उस सख्त रोटी को खा पाती थी।
लाजो जी उसे सिखाने की भरसक प्रयास करती मगर रमिया को अपनी सास का सिखाना भी उसे टोकना लगता। इसे वह अपना अपमान समझ बैठती। अब धीरे-धीरे लाजो जी और रामकिशन दोनों ने ही रमिया से कुछ भी कहना छोड़ दिया।
कभी-कभी रामकिशन अपनी मां लाजो जी से बोल उठता मां रमिया में कब समझदारी आएगी? कब उसे अपनी जिम्मेदारी का एहसास होगा। अपने बेटे की बात सुनकर लाजो जी तुरंत समझाते हुए बोल उठती। देख बेटा लगता है इसने अपने मायके में अल्हड़पन के सिवा कुछ देखा नहीं है। तभी तो इसका अभी तक अल्हड़ बन गया ही नहीं,मगर तुम फिकर ना करो धीरे-धीरे रमिया बहू अपने आप जिम्मेदारी को समझने लगेगी। हमें थोड़ा धैर्य रखना होगा, फिर देखना सब ठीक हो जाएगा।
रामकिशन अपनी मां की बात सुनकर तसल्ली से भर उठता और उस दिन का इंतजार करने लगता।
इसी तरह कुछ महीने गुजरे ,आज अचानक रमिया को बुखार आ गया और बुखार भी ऐसा आया कि वो बिस्तर से उठ भी ना सकी।
लाजो जी और रामकिशन जी रमिया की तीमारदारी में लग गए। लाजो जी गरम और नरम रोटियां बनाती और साथ ही गरम दाल भी बनाती । रामकिशन उसे अपने हाथों से खिलाता और इस बीच समय समय पर रमिया को दवा देना भी बिल्कुल नहीं भूलता था। तब चौथे दिन जाकर रमिया कुछ स्वस्थ हुई।
आज अचानक सुबह जब रामकिशन की आंख खुली तो बिस्तर पर रमिया को नहीं देखकर वो चिंतित हो उठा मगर जैसे ही रसोई की ओर गया तो देखा रमिया गरमा गरम तीन प्याली में चाय और साथ में बिस्किट लिए आ रही है। यह देखकर रामकिशन तुरंत रमिया से बोल उठा ।
अरे तुम इतनी जल्दी क्यों उठ गई। क्या अब तुम्हें ठीक लग रहा है, वो क्या है ना.. तुम थोड़ा और सो लेती ।
पति के प्यार भरे बोल सुनकर रमिया तुरंत प्यार से बोल उठी। सुनिए जी मैं पहले ही कई महीनो से बहुत ज्यादा सो चुकी हूं और कितना सोऊंगी। अब तो मेरे जागने का समय आ गया है और मैं अच्छी तरह जाग भी चुकी हूं ।
रामकिशन कुछ और कहता इसके पहले ही रमिया मुस्कुराते हुए बोल उठी ।
मां आप भी आ जाए। आज हम तीनों बैठकर एक साथ चाय पीते हैं और आप दोनों जरा बताना, चाय कैसी बनी है ।
जब लाजो जी और रामकिशन ने चाय की पहली चुस्की ली तो दोनों ने एक साथ कहा। आज की चाय में कुछ खाश वाली मिठास है । जो हमें बहुत अच्छी लग रही है। जैसे ही चाय खत्म हुई।
रमिया अपनी सासू मां लाजो जी के गले लग पड़ी और क्षमा मांगते हुए कहने लगी। मां मुझे क्षमा कर दीजिए। आपने मुझे इतना प्यार और सम्मान दिया । मैं ही हठी और बावरी निकली जो आपके इस प्यार की कदर नहीं कर पाई।
लाजो जी रमिया की बात सुनकर बड़े प्यार से आशीर्वाद देते हुए बोल पड़ी। देख रमिया जब नई बहू घर में आती है तो पराए आंगन की कच्ची और कोरी मिट्टी होती है तो उसे उस नए वातावरण में ढलने में, जिम्मेदारी को समझने में कुछ वक्त तो लगता ही है । हां यह बात अलग है कोई अपनी जिम्मेदारी जल्दी समझ लेती है तो किसी को थोड़ा वक्त लग जाता है मगर धीरे-धीरे वह अपने गृहस्थी में ढल ही जाती है जैसा कि आज तुम कहकर लाजो जी मुस्कुराने लगी।
आज रामकिशन बहुत खुश था उसके हाथ बहुत जल्दी-जल्दी चल रहे थे और वह नहा धोकर तैयार होकर दुकान की ओर जाने के लिए निकलने लगा। तभी रमिया ने अपने पति रामकिशन का हाथ थाम लिया और कहने लगी।
मुझे क्षमा कर दीजिए मैंने आपका बहुत दिल दुखाया है। मेरा घर और आपके प्रति जो भी जिम्मेदारी बनती थी। मैं अब तक नहीं समझ पाई थी। सच कहूं तो अब इस तीन दिन की बुखार ने मुझे सब सिखा दिया है। आज खाने में आपकी पसंद की सब्जी और नरम गरम रोटियां ही बनाऊंगी और हां सुनिए आज आते वक्त जरा रजनीगंधा फूल का गजरा लेते आना। वह मुझे बहुत पसंद है। अपनी पत्नी रमिया की बात सुनकर रामकिशन तुरंत मुस्कुराते हुए बोल उठा । अब बीती बातें भूल जा रमिया। शाम को आते वक्त रजनीगंधा फूल का गजरा जरूर लेते आऊंगा और तुम्हारे बालों में अपने हाथों से लगाऊंगा भी और हां चाय बहुत ज्यादा अच्छी बनी थी कहकर रामकिशन दुकान की ओर चल पड़ा । आज उसके कदम बड़ी खुशी से आगे बढ़ रहे थे क्योंकि अब उसकी पत्नी रमिया पहले वाली रमिया नहीं रही थी। उसके कानों में अभी भी चलते वक्त रमिया के प्यार के वह मीठे बोल ही गूंज रहे थे।
जो रमिया ने रामकिशन के दुकान पर निकलने से पहले कहे थे। इस तीन दिन की बुखार ने उसका जीवन बदल के रख दिया था। वह जीवन के प्रति अपनी जिम्मेदारियां बहुत अच्छी तरह समझ चुकी थी तो रामकिशन और लाजो जी को और क्या चाहिए था भला।
स्वरचित
सीमा सिंघी
गोलाघाट असम