सरोज के पति छोड़ के क्या गए,कि प्यार के दो बोल के लिए तरस गई थी वह।अब तो घर में जिसे देखो वही उसे काटने को दौड़ता था।बेटा रोहित ऑफिस के काम में इतना व्यस्त रहता है कि उसे सरोज से बात करने का समय ही नहीं मिलता और अगर कभी सरोज आगे बढ़कर कहे कि बेटा आ दो मिनिट मेरे पास बैठ तो बस तुनककर यही जवाब देता-“माँ,मेरे पास अभी समय नहीं है ऑफिस का बहुत काम करना है।”सरोज बेचारी मन मसोसकर रह जाती।वह यही सोचती,कि उसके पति भी बड़े पद पर कार्यरत थे उनके ऊपर तो ऑफिस और परिवार दोनों की जिम्मेदारी थी।फिर भी वो हमेशा उसे और बच्चों को समय देते थे और प्यार से बात करते थे।
बहु,सीधे मुँह बात करना तो दूर बस हर समय यही जताती रहती,कि..बच्चे को पढ़ाना और घर सम्भालना कितना मुश्किल होता है?कभी कभी तो बेटे आरव की परीक्षाओं के समय अपने पति से कहती थी,कि आप माँ जी को कुछ समय के लिए उनके घर छोड़ आओ मेरे बेटे के कम नंबर आए तो मैं अपने को माफ नहीं कर पाऊँगी।कहने को आरव अभी पहली कक्षा में था।सरोज की तबियत ठीक नहीं रहती थी फिर भी वो बहु के साथ घर के कामों में मदद कराती थी पर बहु को तो बहाना चाहिए था उसे घर से निकालने का।सरोज को लगता,उसने भी बेटे को पढ़ाया लिखाया पर सास ससुर को हमेशा अपने साथ रखा।उन्हें कभी घर से जाने के लिए नहीं कहा।
बेचारी आँखों में आँसू भरकर रह जाती क्योंकि वो तो अब अकेले नहीं रह सकती थी।उसके घुटनों में काफी तकलीफ रहती थी..ठीक से चल भी नहीं पाती थी।कभी सरोज बहुत उदास होती तो उसका मन पोते के साथ खेलने को करता।वो आरव को अपने पास बुलाती तो वो भी चिल्लाकर बोलता-“दादी मुझे आपके साथ नहीं खेलना।आप अपने कमरे में जाओ।”सरोज का मन और भी व्यथित हो जाता।
सरोज के पति का जन्मदिन था,घर में किसी को भी याद नहीं था।वो मंदिर जाना चाहती थी पर उसके घुटनों में बहुत दर्द था।संयोग से रविवार था तो रोहित घर पर ही था इसलिए वो उससे बोली-“बेटा,मुझे मंदिर जाना है पर मेरे घुटनों में बड़ा दर्द है तू गाड़ी से ले चल।”
“क्या माँ,एक सन डे मिलता है आराम करने के लिए और आप इस दिन भी चैन से नहीं बैठने देतीं।मंदिर पास ही तो है,रिक्शा करके चली जाओ।”रोहित गुस्सा करते हुए बोला।तभी सरोज की बहु रसोई से चिल्लाते हुए बोली-“अजी सुनते हो,मुझे पार्लर जाना है गाड़ी से छोड़ आओ।बाहर बहुत धूप है।”
“हाँ बेबी,मैं अभी गाड़ी निकालता हूँ तुम तैयार होकर आ जाओ।”
बेटे के दोगले व्यवहार को देख सरोज की आँखों में आँसू आ गए।आँसू पोछते हुए वह मंदिर के लिए निकल पड़ी।दूर दूर तक कोई ऑटो,रिक्शा नज़र नहीं आ रहा था।सरोज लँगड़ा लँगड़ाकर पैदल ही जा रही थी,तभी पीछे से घंटी की आवाज सुनाई दी।वह वहीं रुक गई।उसके पास एक रिक्शेवाला आकर रुका और बोला-“अरे,माजी लगता है आपके पैरों में बहुत तकलीफ़ हैै,बताइए कहाँ जाना है?मैं छोड़ देता हूँ।”
“बस भैया हनुमान मंदिर तक जाना है।”कहकर सरोज रिक्शे मैं जैसे तैसे बैठ गई।रिक्शेवाले ने उसकी बैठने में मदद की।मंदिर आ गया तो सरोज को रिक्शेवाले ने नीचे उतारा।सरोज उसे पैसे देने लगी तो वो बोला-“आप दर्शन करके आ जाइए मैं तबतक यहीं खड़ा हूँ।क्योंकि आपको घर जाने के लिए पता नहीं कब तक रिक्शा मिले।इतनी धूप और तकलीफ में आप कैसे खड़ी रहेंगी।मैं आपको घर तक छोड़ दूँगा।”
सरोज ने दर्शन किए और फिर रिक्शे में बैठकर घर आ गई।जाते जाते रिक्शेवाले ने अपना फोन नंबर दिया और बोला-“माजी, आपको कभी भी मंदिर जाना हो तो मुझे फोन कर देना मैं तुरंत आ जाऊंगा।ऐसी हालत में आपका पैदल चलना ठीक नहीं।”
रिक्शेवाले के प्यारभरे दो शब्दों ने सरोज के लिए जैसे दवा का काम किया।उसे अब दर्द में थोड़ी राहत महसूस हो रही थी।
सरोज को अब कभी भी मंदिर जाना होता तो वो फोन करके रिक्शेवाले को बुला लेती।रोहित को तो पता ही नहीं रहता,कि सरोज कब और कैसे मंदिर जाती है क्योंकि रोज वो शाम को जब ऑफिस से आता तब तक सरोज मंदिर से होकर आ जाती थी।और बहु को तो उससे कोई लेना देना था ही नहीं,वो कहीं जाए या ना जाए उसकी बला से।संडे को रोहित अपने परिवार को गाड़ी में बिठाकर घूमने निकल जाता था।
आज रोहित ऑफिस से थोड़ा जल्दी घर आ गया,अमूमन उसे घर आते आते रात के आठ बज जाते थे।जैसे ही उसने गाड़ी घर के बाहर रोकी तो देखा,कि सरोज रिक्शे पर बैठ रही थी और रिक्शेवाला बड़े प्यार से उसे बैठने में मदद कर रहा था..एक पल को उसे थोड़ा बुरा लगा फिर अपने को संभालते हुए बोला -“मां,कहां जा रही हो?”
“बेटा,मंदिर जा रही हूं और कहां जाना है मुझे।”
“आपके घुटने में दर्द होता है,तो रिक्शे में बैठने में बहुत मुश्किल होती होगी कैसे जाएंगी?फिर वहां उतरना भी पड़ेगा?चलो मैं छोड़ आता हूं।”
“बेटा,अब कोई दिक्कत नहीं होती क्योंकि रिक्शेवाले भैया मुझे रोज बड़े आराम से बिठाकर ले जाते हैं।और तो और रास्ते में बाते भी करते रहते हैं तो दर्द का पता ही नहीं चलता।जब कोई प्यार के दो मीठे बोल बोलता है तो आधी तकलीफ इंसान की वैसे ही खत्म हो जाती है।”सरोज की बात सुनकर रोहित को महसूस हुआ,कि उसकी मां को तन की पीड़ा के साथ साथ अकेलापन कितना सताता है?जिस बारे में उसने कभी ध्यान ही नहीं दिया।क्या फायदा यदि बेटे के होते मां को दूसरों का सहारा लेना पड़े।उस दिन के बाद से उसके व्यवहार में धीरे धीरे सुधार होने लगा।वो अब ऑफिस से आकर कुछ देर सरोज के पास बैठता और उससे प्यार से बात करता।पत्नी और बेटे को भी सरोज से अच्छा व्यवहार करने के लिए कहता।उसने सरोज को कह दिया,कि अब आपको रिक्शे से मंदिर जाने की जरूरत नहीं है।मैं ऑफिस से आकर आपको ले मंदिर ले जाया करूंगा।बच्चों का साथ व स्नेह पाकर सरोज अब तकलीफ में भी खुश रहने लगी।
सच हमें घर के बुजुर्गों से हमेशा प्यार से बात करनी चाहिए।कभी भी कठोर शब्द बोलकर उनका दिल नहीं दुखाना चाहिए।हमारी यही कोशिश रहनी चाहिए कि हम उनके साथ बैठें उनसे बातें करें।जिन्होंने हमपर सारी उम्र न्योछावर कर दी उनके लिए हम इतना तो कर ही सकते हैं ना।क्योंकि इस उम्र में उन्हें धन दौलत की नहीं बच्चों के साथ व स्नेह की जरूरत होती है।प्यार के दो मीठे बोल उनके जीने की वजह बन जाते हैं।
संपादक महोदय,
नमस्कार
साप्ताहिक कहानी प्रतियोगिता “प्यार के दो मीठे बोल ” के अंतर्गत मैं अपनी कहानी “प्यार के दो मीठे बोल..बुजुर्गों का सहारा”
भेज रही हूं आशा है आप इसे स्वीकार करेंगे।
कमलेश आहूजा