“सुधा! अभी तक बाबूजी नहीं आए?” समीर ने अपनी पत्नी से ऊँची आवाज़ में पूछा, जो रसोई में खाना गर्म कर रही थी।
सुधा बाहर आई, उसके चेहरे पर भी चिंता थी। “नहीं, मैंने फोन भी किया था, पर वो उठा नहीं रहे। बारिश बहुत तेज़ है, शायद कहीं रुक गए होंगे। आप नाहक ही इतना गुस्सा कर रहे हैं।”
“गुस्सा न करूँ तो क्या करूँ?” समीर सोफे पर धम्म से बैठ गया, “सत्तर साल की उम्र है। रिटायर हुए दस साल हो गए। पर घर में टिकना ही नहीं है। सुबह निकलते हैं पार्क के बहाने और रात को घर लौटते हैं। मोहल्ले वाले पूछते हैं—’अरे समीर, तुम्हारे पिता जी दिन भर कहाँ गायब रहते हैं?’ क्या जवाब दूँ मैं? मेरी भी कोई इज़्ज़त है या नहीं समाज में? लोग सोचते होंगे कि बेटा-बहू घर में रखते नहीं, इसलिए बुड्ढा मारा-मारा फिर रहा है।”
सुधा ने पानी का गिलास समीर की तरफ बढ़ाया। “शांत हो जाइये। बाबूजी बच्चे तो हैं नहीं, आ जाएंगे। शायद किसी दोस्त के घर रुक गए हों।”
“दोस्त?” समीर ने कड़वाहट से हँसते हुए कहा, “इनके सारे दोस्त तो या तो ऊपर चले गए या बिस्तर पकड़ चुके हैं। पता नहीं ये कौन सी दुनिया बसाए हुए हैं। पिछले महीने मैंने देखा था, अपनी पेंशन के पैसे भी न जाने कहाँ खर्च कर देते हैं। जब पूछा तो बोले—’दवाइयां ली थीं’। अरे भाई, दवाइयां तो मैं लाकर देता हूँ। फिर पैसे कहाँ जाते हैं?”
तभी दरवाजे की घंटी बजी।
समीर झटके से उठा। “लो, आ गए नवाब साहब। आज तो फैसला होकर रहेगा। या तो वो वक्त पर घर आएंगे, या फिर घर पर ही रहेंगे।”
सुधा ने उसे रोकने की कोशिश की, “प्लीज, धीरे बोलियेगा। वो आपके पिता हैं।”
समीर ने अनसुना कर दिया और दरवाज़ा खोला।
सामने का मंज़र देखकर समीर के शब्द गले में ही अटक गए।
दरवाजे पर बाबूजी, यानी मास्टर दीनानाथ, पूरी तरह भीगे हुए खड़े थे। उनका पुराना कोट पानी से लथपथ था, और वो काँप रहे थे। लेकिन वो अकेले नहीं थे। उन्हें सहारा देकर खड़े थे सामने वाले फ्लैट में रहने वाले मिश्रा जी।
मिश्रा जी का चेहरा तमतमाया हुआ था।
“समीर! शर्म नहीं आती तुम्हें?” मिश्रा जी ने बिना किसी भूमिका के सीधे डांटना शुरू कर दिया।
समीर, जो अभी खुद अपने पिता को डांटने के लिए तैयार था, मिश्रा जी के तेवर देखकर सकपका गया। “क्या हुआ अंकल? और आप बाबूजी को इस हालत में…”
“अंदर चलो, बात करनी है,” मिश्रा जी ने दीनानाथ जी को सोफे पर बैठाया। सुधा दौड़कर तौलिया ले आई। दीनानाथ जी की आँखों में एक अजीब सी शर्मिंदगी थी, वो समीर से नज़रें नहीं मिला पा रहे थे।
“क्या तदाशा है ये?” समीर का गुस्सा फिर लौट आया, “बाबूजी, आपको कितनी बार कहा है कि मौसम देख लिया कीजिये। और मिश्रा अंकल, आप मुझे शर्मिंदा क्यों कर रहे हैं? मैंने तो इन्हें मना नहीं किया घर रहने से, ये खुद ही…”
“चुप रह समीर!” मिश्रा जी ने हाथ दिखाकर उसे रोका। “तुझे पता भी है तेरा बाप कहाँ था?”
समीर चुप हो गया।
मिश्रा जी ने अपनी जेब से एक लिफाफा निकाला और मेज पर पटक दिया। लिफाफा थोड़ा गीला हो गया था।
“ये पकड़,” मिश्रा जी ने कहा।
“ये क्या है?” समीर ने हैरान होकर पूछा।
“पैसे हैं। पच्चीस हज़ार रुपये,” मिश्रा जी ने बताया।
समीर की आँखें फटी की फटी रह गईं। “पच्चीस हज़ार? बाबूजी के पास इतने पैसे कहाँ से आए?”
दीनानाथ जी ने कांपते हुए हाथ से मिश्रा जी को रोकने की कोशिश की, “रहने दो मिश्रा, बच्चे को मत बताओ। बेकार में परेशान होगा।”
“नहीं दीनानाथ, आज बताने दो। इस नालायक को लगता है कि तुम आवारागर्दी करते हो,” मिश्रा जी ने गुस्से में कहा।
फिर मिश्रा जी समीर की ओर मुड़े। “तुझे याद है समीर, तीन महीने पहले तू फोन पर किसी से बात कर रहा था? तू कह रहा था कि बिज़नेस में घाटा हुआ है और गाड़ी की ईएमआई (किश्त) टूटने वाली है? बैंक वाले गाड़ी उठा ले जाएंगे?”
समीर को याद आया। हाँ, उसने यह बात सुधा से कही थी, और शायद बाबूजी ने सुन ली थी। पर उसने बाबूजी को कभी बताया नहीं था ताकि वो परेशान न हों।
“हाँ… पर उसका इससे क्या लेना-देना?” समीर ने पूछा।
“लेना-देना है,” मिश्रा जी ने दीनानाथ जी के घुटने पर जमी मिट्टी झाड़ी। “तेरे पिता पिछले तीन महीने से रोज़ शहर के उस पार, पुरानी मंडी में मुंशी का काम करने जाते हैं। सत्तर साल की उम्र में, वो बही-खाते लिखते हैं, ताकि तेरी गाड़ी की किश्त के पैसे जमा कर सकें।”
समीर के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। “क्या? मुंशी का काम?”
“हाँ,” मिश्रा जी की आवाज़ अब थोड़ी धीमी हो गई थी, “आज बारिश बहुत तेज़ थी। मंडी में शेड के नीचे फिसलन थी। ये वहाँ गिर गए। पैर में मोच आ गई। सेठ जी ने इन्हें आज ही पगार दी थी। ये गिरते हुए भी मुट्ठी भींचे हुए थे कि कहीं नोट की गड्डी पानी में न गिर जाए। मैं उधर से गुज़र रहा था, तो मैंने देखा। मुझे लगा कोई मजदूर पड़ा है। पास गया तो देखा दीनानाथ जी थे।”
समीर ने अपने पिता की ओर देखा। वो सिकुड़े हुए बैठे थे, जैसे कोई चोरी करते पकड़े गए हों।
“बाबूजी…” समीर के मुँह से बस इतना ही निकला।
दीनानाथ जी ने नज़रें उठाईं और फीकी मुस्कान के साथ बोले, “बेटा, वो… मुझे लगा कि नई गाड़ी है, लोग क्या कहेंगे अगर बैंक वाले ले गए तो? तेरी इज़्ज़त का सवाल था। मैं तो बुड्ढा हूँ, घर बैठे-बैठे क्या करता? थोड़ा हाथ-पाँव चल जाते हैं, तो चार पैसे आ जाते हैं।”
समीर को अपना वो हर ताना याद आने लगा जो उसने पिछले महीनों में दिया था—’आप दिन भर कहाँ रहते हैं?’, ‘आपको घर की कोई फिक्र नहीं’। उसे याद आया कि कैसे वो अपने दोस्तों से कहता था कि उसके पिता ‘रिटायरमेंट एन्जॉय’ कर रहे हैं, जबकि असल में उसके पिता उसकी ‘इज्जत’ बचाने के लिए मजदूरी कर रहे थे।
समीर घुटनों के बल पिता के पैरों के पास बैठ गया। उसने देखा कि पिता के पैरों में सूजन थी। वही पैर, जिन पर चलकर उन्होंने समीर को उंगली पकड़ना सिखाया था।
“मुझे माफ़ कर दीजिये बाबूजी,” समीर फूट-फूट कर रोने लगा। “मैं कितना अंधा था। मैं अपनी झूठी शान और बिज़नेस के तनाव में यह देख ही नहीं पाया कि मेरा भगवान मेरे लिए क्या कर रहा है। मैंने आपको बोझ समझा, और आप मेरा बोझ उठा रहे थे।”
दीनानाथ जी ने अपने काँपते हाथ बेटे के सिर पर रखे। “अरे पगले, रोता क्यों है? बाप हूँ तेरा। जब तू छोटा था और मेला देखने की ज़िद करता था, तो मैं एक्स्ट्रा क्लास लेकर तुझे खिलौने दिलाता था। आज तू बड़ा हो गया, खिलौना भी बड़ा है, तो मेहनत थोड़ी ज्यादा हो गई। इसमें कौन सी बड़ी बात है?”
सुधा भी एक कोने में खड़ी अपनी साड़ी के पल्लू से आँखें पोंछ रही थी। मिश्रा जी का गुस्सा अब शांत हो चुका था। उन्होंने समीर के कंधे पर हाथ रखा।
“समीर, दुनिया में सब कुछ मिल सकता है, पर माँ-बाप का वो साया नहीं मिलता जो धूप में खुद जलकर तुम्हें छाँव देता है। तू लकी है जो तेरे पास ये हैं। इनका ख्याल रख, अपनी इमेज का नहीं।”
समीर उठा और उसने वो पैसों का लिफाफा उठाया।
“ये पैसे बैंक में नहीं जाएंगे बाबूजी,” समीर ने दृढ़ता से कहा।
“तो कहाँ जाएंगे?” दीनानाथ जी ने पूछा।
“कल हम सब डॉक्टर के पास जाएंगे, आपके पैर का इलाज कराने। और उसके बाद… एक नया कोट लेने। आपका यह कोट बहुत पुराना हो गया है बाबूजी, बिल्कुल मेरे विचारों की तरह। अब मुझे उसे बदलना है।”
समीर ने पिता को गले लगा लिया। दीनानाथ जी के भीगे हुए कोट की ठंडक समीर के दिल को चीर गई, लेकिन उस ठंडक में एक ऐसी गर्माहट थी जो दुनिया के किसी भी एसी कमरे में नहीं मिल सकती थी—वो थी पिता के आशीर्वाद की गर्माहट।
उस रात समीर को समझ आ गया था कि घर की दीवारें ईंटों से मज़बूत नहीं होतीं, बल्कि बुजुर्गों के त्याग और तपस्या से मज़बूत होती हैं। उसने तय किया कि चाहे गाड़ी रहे या न रहे, लेकिन अब वो अपने पिता को कभी दोबारा काम पर नहीं जाने देगा।
खाना ठंडा हो चुका था, लेकिन जब सबने साथ मिलकर खाया, तो उसमें एक अलग ही स्वाद था—रिश्तों की मिठास का स्वाद। बारिश बाहर अब भी हो रही थी, लेकिन घर के अंदर का तूफान थम चुका था।
दोस्तों, हमारे माता-पिता अक्सर हमारी खुशियों के लिए अपनी ज़रूरतों, अपने आराम और अपने स्वाभिमान तक का बलिदान कर देते हैं, और हम नादान बच्चे उसे उनका ‘फर्ज’ मानकर नज़रअंदाज़ कर देते हैं। हम अपनी परेशानियों में इतना उलझ जाते हैं कि उनकी खामोश कुर्बानी हमें दिखाई ही नहीं देती। याद रखिये, जिस दिन ये छत सर से उठ गई, उस दिन दुनिया की सबसे तेज़ धूप आपको जला देगी। वक्त रहते अपने माता-पिता को गले लगाइये, उन्हें वो सम्मान दीजिये जिसके वो हकदार हैं।
क्या आपके माता-पिता ने भी कभी आपकी खुशी के लिए अपनी इच्छाओं को मारा है? कमेंट बॉक्स में अपने अनुभव जरूर साझा करें।
अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो लाइक, कमेंट और शेयर करें। अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें। धन्यवाद।