ट्रेन की रफ़्तार के साथ-साथ सुमन के दिल की धड़कनें भी बढ़ती जा रही थीं। खिड़की से बाहर भागते हुए पेड़ और खेत उसे अपने बचपन की याद दिला रहे थे। पूरे तीन साल बाद वह अपने मायके, अपने शहर लखनऊ वापस आ रही थी। गोद में छह महीने का बेटा ‘आरव’ सो रहा था और मन में पिता से मिलने की बेताबी थी।
सुमन की शादी पुणे में हुई थी। पति की नौकरी और फिर अपनी गर्भावस्था के कारण वह चाहकर भी पिछले तीन सालों से घर नहीं आ पाई थी। वैसे तो भाई ‘रोहित’ और भाभी ‘शिखा’ से फोन पर बात हो जाती थी, लेकिन पिता ‘दीनानाथ जी’ से बात करना मुश्किल हो गया था। जब भी वह पिता के मोबाइल पर फोन करती, अक्सर फोन भाभी या भाई उठाते और कहते— “बाबूजी अभी सो रहे हैं,” “बाबूजी पार्क गए हैं,” या “बाबूजी का फोन खराब हो गया है, रिपेयरिंग के लिए दिया है।”
दीनानाथ जी एक रिटायर्ड हेडमास्टर थे। जीवन भर की जमा-पूंजी और पेंशन से उन्होंने शहर के पॉश इलाके में एक सुंदर सा मकान बनवाया था—’शांति कुंज’। सुमन को याद था कि कैसे बाबूजी ने एक-एक ईंट अपनी निगरानी में रखवाई थी। माँ के गुज़र जाने के बाद वही घर और बच्चे ही उनकी दुनिया थे।
स्टेशन पर उतरकर सुमन ने टैक्सी ली। उसने भाई को आने की खबर नहीं दी थी, वह उन्हें सरप्राइज़ देना चाहती थी। मन ही मन वह सोच रही थी कि बाबूजी अपने नाती को देखकर कितने खुश होंगे। वह उनके लिए उनका पसंदीदा शॉल और ढेर सारी मिठाइयां लाई थी।
टैक्सी ‘शांति कुंज’ के गेट पर रुकी। सुमन के चेहरे पर मुस्कान थी, लेकिन अगले ही पल वह मुस्कान एक गहरे सदमे में बदल गई।
घर का रंग-रोगन बदल चुका था। गेट पर नेमप्लेट पर ‘दीनानाथ सदन’ की जगह ‘गुप्ता विला’ लिखा था।
सुमन का माथा ठनका। उसने सोचा शायद भाई ने रिनोवेशन करवाया होगा। उसने डोरबेल बजाई। एक अनजान आदमी ने दरवाजा खोला।
“जी, किससे मिलना है?” उस व्यक्ति ने पूछा।
सुमन हकलाते हुए बोली, “वो… रोहित जी का घर यही है ना? दीनानाथ जी?”
आदमी ने अजीब नज़रों से देखा और बोला, “मैडम, रोहित जी ने तो यह मकान हमें छह महीने पहले ही बेच दिया था। अब यह हमारा घर है।”
सुमन के पैरों तले से ज़मीन खिसक गई। “क्या? मकान बेच दिया? लेकिन क्यों? और वो लोग कहाँ गए?”
आदमी ने लापरवाही से कहा, “सुना है गोमती नगर में कोई बड़ा फ्लैट लिया है उन्होंने। एड्रेस तो नहीं पता मुझे।”
सुमन का दिमाग सुन्न हो गया। जिस घर को बाबूजी अपनी जान से ज्यादा प्यार करते थे, उसे रोहित ने बेच दिया? और उसे खबर तक नहीं दी? उसने कांपते हाथों से रोहित को फोन लगाया।
तीन बार घंटी बजने के बाद फोन उठा।
“अरे सुमन! कैसी हो बहना?” रोहित की आवाज़ में बनावटी मिठास थी।
“भैया, मैं लखनऊ में हूँ… पुराने घर के बाहर खड़ी हूँ। यहाँ पता चला कि आपने घर बेच दिया? बाबूजी कहाँ हैं? आप लोग कहाँ हो?” सुमन की आवाज़ में गुस्सा और घबराहट दोनों थी।
उधर एक पल की खामोशी छाई, फिर रोहित संभलते हुए बोला, “अरे… वो तुझे सरप्राइज़ देना था। हमने नया फ्लैट लिया है, बहुत आलीशान। पुराने घर में बहुत सीलन थी, बाबूजी को दमा हो रहा था। इसलिए बेचना पड़ा। तू एड्रेस नोट कर, जल्दी आ जा।”
सुमन ने एड्रेस लिया और टैक्सी को नए पते की ओर मोड़ दिया। गोमती नगर की एक हाई-राइज़ सोसाइटी के 10वें फ्लोर पर रोहित का नया फ्लैट था। घर वाकई आलीशान था। महंगी इटालियन मार्बल, झूमर और मखमली सोफे।
शिखा भाभी ने दरवाजा खोला। “अरे ननद रानी! तुम अचानक? बताया भी नहीं?” शिखा के चेहरे पर घबराहट साफ़ थी।
सुमन ने घर में नज़र दौड़ाई। रोहित सोफे पर बैठा था।
“बाबूजी कहाँ हैं?” सुमन ने सीधे पूछा। उसने पानी तक नहीं पिया।
रोहित ने नज़रें चुराते हुए कहा, “वो… बाबूजी को शहर के शोर-शराबे से दिक्कत हो रही थी। डॉक्टर ने कहा था कि उन्हें खुली हवा की ज़रूरत है। इसलिए वो कुछ दिनों के लिए गाँव वाले पुराने पैतृक मकान में रहने गए हैं। उन्हें वहां बहुत शांति मिलती है।”
“गाँव?” सुमन चीख पड़ी। “भैया, गाँव वाला घर तो खंडहर है! वहां तो पिछले दस साल से कोई नहीं गया। न बिजली ठीक है, न पानी। आप बाबूजी को वहां छोड़ आए? अकेले?”
शिखा बीच में बोली, “अरे नहीं सुमन, तुम तो राई का पहाड़ बना रही हो। हमने वहां सब ठीक करवा दिया है। और एक केयरटेकर भी रखा है। बाबूजी अपनी मर्जी से गए हैं। कहते थे मुझे अब पूजा-पाठ करना है, यहाँ बच्चों के शोर में डिस्टर्ब होता है।”
सुमन को उनकी एक भी बात पर विश्वास नहीं हो रहा था। उसे दाल में काला नहीं, पूरी दाल ही काली लग रही थी। उसका दिल गवाही दे रहा था कि कुछ बहुत गलत हुआ है।
उसने कहा, “मुझे अभी गाँव जाना है। मैं बाबूजी से मिले बिना एक निवाला नहीं खाऊंगी।”
रोहित ने रोकने की कोशिश की, “अरे अभी रात हो गई है, कल चले जाना।”
“नहीं, मतलब नहीं। टैक्सी अभी नीचे खड़ी है,” सुमन ने ज़िद पकड़ ली।
रोहित और शिखा एक-दूसरे को देखने लगे। मजबूरी में रोहित को भी साथ चलना पड़ा।
शहर से 60 किलोमीटर दूर उनका पैतृक गाँव था। रास्ता कच्चा और उबड़-खाबड़ था। रात के 9 बज चुके थे जब गाड़ी गाँव के उस पुराने मकान के सामने रुकी।
चारों तरफ अंधेरा था। घर की दीवारें टूटी हुई थीं और छत का प्लास्टर गिर रहा था। सुमन गाड़ी से उतरकर पागलों की तरह दौड़ी।
“बाबूजी! बाबूजी!”
आंगन में एक टिमटिमाता हुआ दिया जल रहा था। वहां एक टूटी हुई खाट पर एक दुबली-पतली आकृति लेटी थी।
सुमन पास गई और जैसे ही उसने मोबाइल की टॉर्च जलाई, उसके मुंह से चीख निकल गई।
सामने दीनानाथ जी लेटे थे। शरीर हड्डियों का ढांचा बन चुका था। कपड़े मैले-कुचैले थे। पास में एक लोटा पानी और कुछ सूखे बिस्कुट रखे थे। उनकी आँखों के नीचे गहरे काले गड्ढे थे।
“बाबूजी…” सुमन फफक कर रो पड़ी।
दीनानाथ जी ने कांपती आँखों से देखा। उन्हें विश्वास नहीं हुआ। “सुम्मो… बिटिया? तू आ गई?” उनकी आवाज़ में इतना दर्द था कि पत्थर भी पिघल जाए।
सुमन ने उन्हें गले लगा लिया। “ये क्या हालत बना रखी है आपकी इन लोगों ने? भैया तो कह रहे थे यहाँ केयरटेकर है, सब सुविधा है?”
दीनानाथ जी ने रोहित की तरफ देखा जो अंधेरे में मुंह छुपाए खड़ा था।
दीनानाथ जी की आँखों से आंसू बह निकले। वो बोले, “बिटिया, कोई केयरटेकर नहीं है। यह मुझे यहाँ मरने के लिए छोड़ गया था। जिस दिन मकान बिका, उसी दिन इसने कहा—बाबूजी, नए फ्लैट में आपके लिए जगह नहीं है। वहां का कल्चर अलग है, आपके खांसने से हमारे दोस्तों को परेशानी होगी।”
सुमन सन्न रह गई।
दीनानाथ जी आगे बोले, “इसने मुझसे धोखे से पेंशन के सारे कागज़ात और मकान के पेपर पर साइन ले लिए। कहा कि लोन के लिए चाहिए। और फिर घर बेचकर करोड़ों रुपये डकार गया। जब मैंने विरोध किया, तो तुम्हारी भाभी ने कहा कि अगर चुपचाप गाँव नहीं गए तो पागलखाने में भर्ती करवा देंगे। मैं डर गया था बिटिया… मुझे लगा तुम भी अपने ससुराल में व्यस्त हो, तुम्हें क्या परेशान करूँ। इसलिए चुपचाप यहाँ अपनी मौत का इंतज़ार कर रहा था।”
पिता की बातें सुनकर सुमन के अंदर का ज्वालामुखी फट पड़ा। वो उठी और रोहित के पास गई।
तड़ाक!
एक जोरदार थप्पड़ रोहित के गाल पर पड़ा।
“शर्म नहीं आई तुझे भैया? जिस पिता ने अपनी पीएफ (PF) की पाई-पाई जोड़कर तुझे इंजीनियरिंग करवाई, तेरी शादी करवाई, उन्हें तूने कचरे की तरह फेंक दिया? जानवर भी अपने माँ-बाप के साथ ऐसा नहीं करते।”
रोहित गाल सहलाते हुए बेशर्मी से बोला, “सुमन, तू जज़्बाती मत हो। प्रैक्टिकल बन। उनकी उम्र हो गई है, वो शहर की लाइफस्टाइल में फिट नहीं बैठते। और मैंने प्रॉपर्टी बेची तो क्या हुआ? वारिस तो मैं ही हूँ ना।”
“वारिस?” सुमन ने गुस्से में कहा। “वारिस वो होता है जो विरासत और संस्कारों को संभाले। तू तो कपूत है। और सुन ले, अब यह ‘बिटिया’ चुप नहीं रहेगी।”
सुमन ने उसी वक्त पुलिस को फोन लगाया। रोहित और शिखा के हाथ-पांव फूल गए।
“सुमन, यह क्या कर रही है? घर की बात घर में रहने दे। पुलिस आएगी तो बदनामी होगी,” शिखा गिड़गिड़ाने लगी।
सुमन ने कड़क आवाज़ में कहा, “बदनामी? बदनामी तो तब हुई जब तुम लोगों ने एक बुज़ुर्ग पिता को अनाथ कर दिया। अब बदनामी नहीं, अब न्याय होगा।”
पुलिस आई। सुमन ने सीनियर सिटीजन एक्ट के तहत शिकायत दर्ज करवाई। उसने पुलिस को पिता की हालत दिखाई। पुलिस अधिकारी भी दीनानाथ जी की हालत देखकर दंग रह गए। उन्होंने तुरंत रोहित और शिखा को हिरासत में ले लिया।
सुमन अपने पिता को लेकर उसी रात शहर लौटी, लेकिन रोहित के फ्लैट पर नहीं, बल्कि एक होटल में रुकी। अगले दिन उसने सबसे अच्छे वकील से बात की।
कानूनी लड़ाई शुरू हुई। दीनानाथ जी ने कोर्ट में गवाही दी कि कैसे धोखे से प्रॉपर्टी बेची गई और उन्हें प्रताड़ित किया गया।
अदालत ने सख्त फैसला सुनाया। रोहित को आदेश दिया गया कि या तो वह मकान बेचने से मिले सारे पैसे पिता को लौटाए और साथ ही ब्याज दे, या फिर जेल जाए। इसके अलावा, माता-पिता भरण-पोषण अधिनियम के तहत उसे कड़ी फटकार लगाई गई।
रोहित का आलीशान फ्लैट सील कर दिया गया। उसका घमंड चकनाचूर हो गया। उसके ऑफिस में बात फैल गई और उसे नौकरी से सस्पेंड कर दिया गया। शिखा के मायके वालों ने भी उनसे मुंह मोड़ लिया। जो दोस्त उनकी पार्टियों में आते थे, अब फोन तक नहीं उठाते थे।
कुछ महीनों बाद…
दीनानाथ जी अब पूरी तरह स्वस्थ थे। सुमन उन्हें अपने साथ पुणे ले जाना चाहती थी, लेकिन दीनानाथ जी ने कहा, “नहीं बिटिया, अब मैं अपने हक के घर में रहूँगा, सम्मान से। मैंने एक छोटा फ्लैट ले लिया है। कोर्ट से मिले पैसों से अब मैं आराम से रहूँगा।”
सुमन ने एक भरोसेमंद सेवक उनके लिए रखा।
जाने वाले दिन सुमन ने पिता को गले लगाया।
दीनानाथ जी बोले, “बेटा, लोग कहते हैं बेटा कुल का दीपक होता है। लेकिन आज तूने साबित कर दिया कि बेटियां वो मशाल होती हैं जो घोर अंधेरे में भी रास्ता दिखाती हैं। अगर तू न आती, तो मैं उस खंडहर में घुट-घुट कर मर जाता।”
सुमन ने मुस्कुराते हुए कहा, “बाबूजी, रिश्ते खून से नहीं, एहसास से बनते हैं। भैया ने खून का रिश्ता निभाया (जायदाद के लिए), और मैंने रूह का।”
रोहित और शिखा आज किराए के मकान में रह रहे हैं, कोर्ट-कचहरी के चक्कर काट रहे हैं और समाज में मुंह दिखाने लायक नहीं रहे। उन्हें हर पल एहसास होता है कि बुजुर्गों की आहें आलीशान महलों को भी खाक में मिला सकती हैं।
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**कहानी के अंत में आपसे एक सवाल:**
दोस्तों, आज के समाज में रोहित जैसे बेटे बढ़ते जा रहे हैं जो माता-पिता को केवल संपत्ति का जरिया समझते हैं। क्या सुमन ने अपने सगे भाई को जेल भेजने की कगार पर खड़ा करके सही किया? या उसे “घर की बात” मानकर समझौता कर लेना चाहिए था?
**अगर इस कहानी ने आपकी आँखों को नम किया और दिल को झकझोर दिया, तो लाइक, कमेंट और शेयर जरूर करें। बुजुर्ग हमारे घर की छत होते हैं, उन्हें बोझ न समझें। अगर आप इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसी ही सच्चाई से रूबरू कराने वाली मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें। धन्यवाद!**
लेखक : मुकेश पटेल