दीवार पर टंगे कैलेंडर की तारीखें जैसे पंख लगाकर उड़ रही थीं। वंदना के लिए यह सफर सिर्फ़ एक शादी में शामिल होने का नहीं था, बल्कि अपनी ममता के एक हिस्से को विदा करने का था। वह अपनी ननद, सुनिधि, की इकलौती बेटी प्रिया की शादी में शामिल होने के लिए इंदौर पहुंची थी।
वंदना का प्रिया से रिश्ता सिर्फ़ मामी-भांजी का नहीं था। प्रिया का जन्म वंदना के बेटे, रोहन, के जन्म के कुछ महीनों बाद ही हुआ था। सुनिधि की तबीयत बिगड़ गई थी, उसे पीलिया हो गया था और डॉक्टर ने उसे बच्चे को दूध पिलाने से मना कर दिया था। उस नाज़ुक समय में वंदना ने ही प्रिया को अपना दूध पिलाया था। सुनिधि अक्सर भावुक होकर कहती थी, “भाभी, यह मेरी कोख से ज़रूर जन्मी है, पर इसकी रगों में खून और पोषण तो आपका ही है।”
स्टेशन पर वंदना को लेने उसके ननदोई, महेश जी, और उनका बेटा आर्यन आए थे। वंदना ने ट्रेन से उतरते ही देखा कि महेश जी का चेहरा उतरा हुआ था। उनकी आँखों के नीचे गहरे काले घेरे थे, जो शायद रातों की नींद हराम होने की गवाही दे रहे थे। वह बार-बार पसीना पोंछ रहे थे, जबकि मौसम में हल्की ठंडक थी।
“जीजाजी, सब ठीक तो है? आप बहुत परेशान लग रहे हैं,” कार में बैठते ही वंदना ने पूछा।
महेश जी ने रियर-व्यू मिरर में एक जबरदस्ती की मुस्कान दिखाई। “अरे नहीं भाभी जी, बस शादी की भागदौड़ है। काम का बोझ है, और कुछ नहीं। आप आ गईं, अब सब ठीक हो जाएगा।”
घर पहुँचते ही प्रिया दौड़कर आई और वंदना के गले लग गई। “मामी! मैं कब से आपका इंतज़ार कर रही थी!” प्रिया का चेहरा खुशी से दमक रहा था। घर में शादी वाला माहौल था—ढोलक की थाप, रिश्तेदारों की आवाजाही और पकवानों की खुशबू। लेकिन वंदना की पारखी नज़रें सुनिधि की आँखों में छिपी उदासी को भांप गईं। सुनिधि हर काम में आगे थी, पर उसका मन कहीं और था।
दोपहर के खाने के बाद, प्रिया वंदना का हाथ पकड़कर अपने कमरे में ले गई।
“मामी, चलो न, तुम्हें मेरी शॉपिंग देखनी है। मैंने लिस्ट बनाकर रखी है, तुम एक-एक चीज़ चेक करके बताओ।”
कमरे में बिस्तर पर मखमली डिब्बों का पहाड़ लगा था। प्रिया ने एक-एक कर चीज़ें दिखानी शुरू कीं।
“यह देखो मामी, सब्यसाची का लहंगा। पूरे डेढ़ लाख का है। और यह देखो, सास के लिए कांजीवरम साड़ी, असली ज़री की, पैंतीस हज़ार की। ननद के लिए यह डायमंड पेंडेंट…”
वंदना की आँखें फटी की फटी रह गईं। महेश जी एक साधारण सरकारी कर्मचारी थे, जो दो साल पहले रिटायर हो चुके थे। उनकी पेंशन से घर चलता था। इतनी महंगी चीज़ें? डेढ़ लाख का लहंगा?
“प्रिया, यह सब… बहुत सुंदर है, पर बेटा, यह बहुत महंगा नहीं है?” वंदना ने झिझकते हुए पूछा।
प्रिया चहकी, “अरे मामी, शादी एक ही बार तो होती है। और पापा ने कहा है कि उनकी गुड़िया की शादी में कोई कमी नहीं रहनी चाहिए। वो कह रहे थे कि लड़के वाले बड़े रहीस हैं, उनके सामने हमारी नाक नहीं कटनी चाहिए। इसलिए सब बेस्ट लिया है।”
शाम को प्रिया के ऑफिस के कुछ दोस्त आने वाले थे, जो उसका ‘दहेज’ और शादी का सामान देखने के लिए उत्सुक थे। यह एक अजीब रस्म थी, जहाँ लड़की वाले अपनी दी हुई चीज़ों की नुमाइश करते थे। प्रिया ने वंदना से कहा, “मामी, आप मम्मी के साथ मिलकर किचन में कुछ अच्छा सा बना दीजिये न, मेरे फ्रेंड्स आ रहे हैं।”
वंदना किचन में गई। सुनिधि वहां पहले से ही समोसे तल रही थी। वंदना ने देखा कि सुनिधि का ध्यान कढ़ाई में नहीं, बल्कि कहीं शून्य में था।
“सुनिधि,” वंदना ने उसके कंधे पर हाथ रखा। सुनिधि चौंक गई।
“अरे भाभी, आप क्यों आईं? मैं कर लेती।”
“सुनिधि, मुझसे झूठ मत बोलो,” वंदना ने कड़ाई से पूछा। “महेश जी परेशान हैं, तुम खोई हुई हो। और अंदर प्रिया लाखों का सामान दिखा रही है। पैसा कहाँ से आया? जीजाजी की रिटायरमेंट फण्ड तो आर्यन की पढ़ाई में लग गया था न?”
सुनिधि की आँखों से आंसुओं का बांध टूट पड़ा। उसने रोते हुए कहा, “भाभी, सब बर्बाद हो गया। महेश जी ने अपना पुश्तैनी घर गिरवी रख दिया है।”
वंदना के हाथ से प्लेट छूटते-छूटते बची। “क्या? यह घर? जिस छत के नीचे तुम लोग रह रहे हो?”
“हाँ भाभी,” सुनिधि सिसकने लगी। “प्रिया की शादी जिस घर में तय हुई है, वो लोग बहुत अमीर हैं। उन्होंने दहेज नहीं माँगा, पर महेश जी को लगा कि अगर हम ‘स्टेटस’ मैच नहीं करेंगे, तो प्रिया को वहां इज़्ज़त नहीं मिलेगी। प्रिया को नहीं पता, पर उसके लहंगे और जेवरों के लिए हमने साहूकार से ऊँची ब्याज दर पर लोन लिया है। अगर एक साल में पैसे नहीं चुकाए, तो यह घर नीलाम हो जाएगा। हम सड़क पर आ जाएंगे भाभी।”
वंदना का दिमाग सुन्न हो गया। एक पिता अपनी बेटी की झूठी शान के लिए अपनी छत बेच रहा था? और बेटी, जिसे कुछ पता ही नहीं, वो दोस्तों को अपनी बर्बादी का सामान गर्व से दिखा रही है?
तभी बाहर ड्राइंग रूम से शोर आया। प्रिया के दोस्त आ चुके थे।
“वाह यार प्रिया! क्या टीवी है, 65 इंच का!”
“ओह माय गॉड! यह सोफा सेट तो इटालियन लेदर का लग रहा है। तेरे पापा तो बड़े दिलदार हैं!”
वंदना से रहा नहीं गया। वह किचन से बाहर आई। उसने देखा महेश जी एक कोने में खड़े होकर पसीना पोंछ रहे थे और चेहरे पर एक नकली हंसी चिपकाए हुए थे। वंदना को उन पर गुस्सा भी आ रहा था और तरस भी।
दोस्तों के जाने के बाद, वंदना ने महेश जी और सुनिधि को प्रिया के कमरे में बुलाया। आर्यन भी वहां था। प्रिया अभी भी अपने लहंगे को सहला रही थी।
“प्रिया, यह लहंगा पैक कर दो,” वंदना ने सख्त आवाज़ में कहा।
प्रिया हैरान रह गई। “क्यों मामी? क्या हुआ?”
“महेश जी,” वंदना ने जीजाजी की तरफ देखा, “अब आप बताएंगे या मैं बताऊँ?”
महेश जी ने नज़रे झुका लीं।
“बताइए पापा,” प्रिया घबरा गई। “क्या बात है?”
वंदना ने आगे बढ़कर कहा, “प्रिया, जिन चीज़ों पर तुम आज इतरा रही हो, वो तुम्हारे पिता के खून और तुम्हारी माँ के आंसुओं से खरीदी गई हैं। तुम्हारे पिता ने यह घर गिरवी रख दिया है, सिर्फ़ इसलिए ताकि वो तुम्हारे ससुराल वालों को दिखा सकें कि वो ‘कम’ नहीं हैं।”
प्रिया के हाथ से पानी का गिलास गिर गया। “क्या? घर… गिरवी?” वह अविश्वास से अपने पिता की ओर मुड़ी। “पापा, यह सच है?”
महेश जी की आँखों से आंसू बह निकले। “बेटा, मैं बस चाहता था कि तू वहां रानी बनकर रहे। कोई तुझे ताना न मारे कि तू खाली हाथ आई है।”
प्रिया का गला रुंध गया। वह दौड़कर अलमारी के पास गई और पागलों की तरह साड़ियां, जेवर और वह महंगा लहंगा बाहर निकालने लगी।
“नहीं चाहिए मुझे यह सब!” प्रिया चीखी। “पापा, आपको क्या लगा? मैं इतनी स्वार्थी हूँ? मैं उस लहंगे को पहनकर खुश रहूंगी जिसकी कीमत आपकी छत हो? आप चाहते हैं कि मैं विदा होकर जाऊं और आप लोग सड़क पर आ जाएं? क्या मेरी खुशी आपके लिए इतनी मायने रखती है और आपकी ज़िंदगी कुछ नहीं?”
सुनिधि ने बेटी को संभालने की कोशिश की, “बेटा, अब सामान आ चुका है। वापस नहीं होगा। और लोग क्या कहेंगे?”
“भाड़ में गए लोग और भाड़ में गया वो स्टेटस!” प्रिया ने आंसू पोंछते हुए कहा। “मामी, आप सही कहती थीं। यह प्यार नहीं, यह दिखावे का ज़हर है जो हम पी रहे थे।”
प्रिया ने अपना फ़ोन उठाया और सीधे अपने होने वाले पति, समीर, को वीडियो कॉल किया।
कमरे में सन्नाटा छा गया। महेश जी ने रोकने की कोशिश की, “प्रिया, क्या कर रही हो? रिश्ता टूट जाएगा!”
“टूटने दीजिये पापा। जो रिश्ता झूठ और दिखावे की नींव पर खड़ा हो, उसका टूट जाना ही बेहतर है,” प्रिया ने कहा।
उधर से समीर ने फ़ोन उठाया। “हाय प्रिया, क्या हुआ? सब ठीक है?”
प्रिया ने कोई भूमिका नहीं बांधी। उसने रोते हुए कहा, “समीर, मैं तुमसे झूठ नहीं बोलना चाहती। मेरे पापा ने मेरी शादी के तामझाम के लिए अपना घर गिरवी रख दिया है। वो मुझे डेढ़ लाख का लहंगा और तुम्हें महंगी घड़ी दे रहे हैं, लेकिन उनके पास खुद के भविष्य के लिए कुछ नहीं बचा। मैं यह शादी इस दिखावे के साथ नहीं कर सकती। मैं यह सब सामान वापस कर रही हूँ। मैं एक साधारण साड़ी में शादी करूँगी, बिना किसी दहेज या गिफ्ट के। अगर तुम्हें और तुम्हारे परिवार को यह मंजूर है, तो बारात लेकर आना। वरना, मुझे माफ़ कर देना।”
महेश जी और सुनिधि की सांसें थम गईं। वंदना गर्व से अपनी भांजी को देख रही थी। यह वो दूध का असर था जो उसने पिया था—स्वाभिमान और साहस।
समीर कुछ पल चुप रहा। फिर उसने गंभीर स्वर में कहा, “अंकल जी पास में हैं?”
प्रिया ने कैमरा महेश जी की तरफ घुमाया।
“अंकल जी,” समीर की आवाज़ आई, “मुझे आपसे यह उम्मीद नहीं थी। आपको लगा हम आपकी बेटी से शादी कर रहे हैं या आपके दिए हुए सामान से? अगर मुझे पता होता कि आप इतना बड़ा कदम उठा रहे हैं, तो मैं खुद आकर आपको रोकता। प्रिया मेरी ज़िम्मेदारी है, और उसका परिवार भी। आप वो लोन अभी कैंसिल कीजिये। हम शादी करेंगे, लेकिन वैसे जैसे प्रिया चाहती है। सादगी से।”
फोन कट गया। कमरे में एक भारी बोझ उतरने जैसा अहसास हुआ। महेश जी वहीँ ज़मीन पर बैठ गए और बच्चों की तरह रोने लगे। प्रिया ने उन्हें गले लगा लिया।
अगले दो दिन घर में एक अलग ही तरह की ‘सफाई’ चली। वंदना और प्रिया ने मिलकर वो तमाम बेफजूल चीज़ें वापस कर दीं जो अभी इस्तेमाल नहीं हुई थीं। डेढ़ लाख का लहंगा वापस कर, प्रिया ने बाज़ार से एक लाल रंग की सुंदर लेकिन साधारण बनारसी साड़ी खरीदी, जिसकी कीमत सिर्फ़ आठ हज़ार थी। 65 इंच का टीवी और इटालियन सोफा ऑर्डर कैंसिल कर दिया गया।
साहूकार के पैसे वापस कर दिए गए और घर के कागज़ छुड़ा लिए गए। हाँ, कुछ नुकसान ज़रूर हुआ बुकिंग कैंसिल करने में, लेकिन वो नुकसान घर खोने के नुकसान से बहुत छोटा था।
शादी का दिन आया।
मंडप सजा था, लेकिन उसमें फूलों की जगह रिश्तों की महक थी। प्रिया जब लाल बनारसी साड़ी में आई, तो वह किसी बॉलीवुड डीवा से कम नहीं लग रही थी। उसके चेहरे पर जो सुकून और आत्मविश्वास था, वो किसी भी मेकअप से नहीं आ सकता था।
मेहमान कानाफूसी कर रहे थे।
“अरे, लहंगा नहीं पहना?”
“सुना है लड़के वालों को कुछ नहीं दिया।”
लेकिन वंदना ने देखा कि समीर और उसका परिवार बहुत खुश था। समीर की माँ ने प्रिया को गले लगाकर कहा, “बेटा, तूने हमारा मान बढ़ा दिया। ऐसी समझदार बहू किस्मत वालों को मिलती है जो घर जोड़ने के लिए अपनी ज़िद छोड़ दे।”
विदाई के समय महेश जी रो नहीं रहे थे। उनकी छाती गर्व से चौड़ी थी। उन्होंने वंदना के हाथ पकड़कर कहा, “भाभी जी, अगर आप उस दिन नहीं आतीं, तो मैं अपनी झूठी शान में अपनी बेटी का भविष्य और अपना बुढ़ापा दोनों जला देता। आपने मेरी आँखें खोल दीं।”
वंदना ने प्रिया को गले लगाया। “मेरी शेरनी है तू,” वंदना ने उसके माथे को चूमा। “तूने साबित कर दिया कि असली श्रृंगार गहने नहीं, संस्कार होते हैं।”
प्रिया ने मुस्कुराते हुए कहा, “मामी, यह हिम्मत भी तो आपके दूध से ही मिली है।”
गाड़ी जब प्रिया को लेकर आगे बढ़ी, तो पीछे छूट गए धूल के गुबार में वो सारी पुरानी रूढ़ियाँ और दिखावे भी उड़ गए थे। वंदना जानती थी कि आज एक शादी नहीं हुई, बल्कि एक परिवार टूटने से बचा है। और यह जीत, उस हर बेटी की थी जो अपने पिता के स्वाभिमान को अपनी खुशियों से ऊपर रखती है।
मूल लेखिका
शुभ्रा बनर्जी