“क्या एक बेटी की डोली उठने के बाद, उसके घर लौटने का रास्ता हमेशा के लिए बंद हो जाता है? या फिर स्वाभिमान की लड़ाई में मायके की दहलीज़ लांघना कोई गुनाह नहीं?”
“माँ-पापा, मुझे माफ़ कर दीजियेगा। मैं आपकी ‘अच्छी बेटी’ नहीं बन पाई जो चुपचाप जुल्म सह ले। लेकिन मैं एक ‘आत्मनिर्भर औरत’ बनकर दिखाउंगी। आज आप लोग समाज के डर से मेरा साथ नहीं दे रहे, लेकिन एक दिन आपको मुझ पर गर्व होगा।”
दरवाजे की घंटी बजी तो सुमित्रा जी के हाथ से चाय का कप लगभग छूटते-छूटते बचा। शाम के सात बज रहे थे। इस समय कौन हो सकता है? पति रमेश बाबू अपनी आराम कुर्सी पर अखबार पढ़ रहे थे। उन्होंने चश्मे के ऊपर से झांकते हुए पत्नी को इशारा किया कि देखो कौन है।
सुमित्रा जी ने दरवाजा खोला तो सामने अपनी बेटी वंदना को खड़ा पाया। वंदना की आँखों में एक अजीब सा खालीपन था और हाथ में एक छोटा सा बैग। उसके पीछे न तो कोई गाड़ी थी और न ही उसका पति विक्रम।
“वंदना? तुम? इस वक़्त? सब ठीक तो है न बेटा?” सुमित्रा जी ने घबराहट में एक ही सांस में कई सवाल पूछ लिए। रमेश बाबू भी अखबार छोड़कर दरवाजे की तरफ लपके।
वंदना ने बिना कोई जवाब दिए अंदर कदम रखा। उसने माँ के पैर नहीं छुए, न पिता को नमस्ते किया। वह सीधे सोफे पर जाकर बैठ गई और मेज़ पर रखे पानी के जग से खुद पानी लेकर पीने लगी। उसके हाथ कांप रहे थे।
रमेश बाबू ने कड़क आवाज़ में पूछा, “विक्रम कहाँ है? तुम अकेली कैसे आई हो? और फ़ोन क्यों नहीं किया?”
वंदना ने पानी का गिलास मेज़ पर रखा और अपनी लाल हो चुकीं आँखों को ऊपर उठाया। “पापा, मैं अब उस घर में वापस नहीं जाऊंगी।”
कमरे में सन्नाटा पसर गया। घड़ी की टिक-टिक की आवाज़ हथौड़े की तरह लगने लगी। सुमित्रा जी ने अपना माथा पीट लिया। “हे भगवान! अब क्या हो गया? अभी तो छह महीने हुए हैं शादी को। इतनी जल्दी क्या आफत आ गई? जरूर तूने ही कुछ किया होगा। विक्रम तो इतना सीधा लड़का है।”
वंदना ने एक फीकी मुस्कान दी। “हाँ माँ, विक्रम बहुत सीधा है। इतना सीधा कि उसे पता ही नहीं चलता कि उसकी माँ और बहन मिलकर मुझे इंसान नहीं, एक मशीन समझती हैं। और वह अपनी आँखों पर पट्टी बांधे सिर्फ ‘हाँ में हाँ’ मिलाता रहता है।”
रमेश बाबू ने गुस्से में कहा, “अरे, तो घर-घर की कहानी है। सास-ननद की बातें तो हर लड़की को सुननी पड़ती हैं। इसमें घर छोड़ने वाली क्या बात है? तुझे पता है समाज क्या कहेगा? हमारी नाक कटवाओगी तुम।”
वंदना खड़ी हो गई। “नाक? पापा, मेरी साँस घुट रही है वहां और आपको अपनी नाक की पड़ी है? आपको पता है पिछले एक महीने से मैंने ठीक से खाना नहीं खाया है? मेरी नौकरी… जिसके लिए मैंने इतनी मेहनत की थी, वह छुड़वा दी गई है।”
सुमित्रा जी ने उसे समझाया, “बेटी, नौकरी का क्या है? विक्रम अच्छा कमाता तो है। घर की इज़्ज़त घर में रहे, यही अच्छा है। औरत को थोड़ा झुककर रहना पड़ता है। एडजस्ट करना पड़ता है।”
“एडजस्ट?” वंदना की आवाज़ ऊँची हो गई। “माँ, एडजस्टमेंट का मतलब यह तो नहीं कि मेरा वजूद ही मिट जाए? मेरी सासू माँ ने मेरी सारी सैलरी अपने अकाउंट में ट्रान्सफर करवा ली यह कहकर कि ‘घर हम चलाते हैं’। विक्रम से कहा तो उसने बोला, ‘माँ जो करती है सही करती है’। कल मुझे तेज़ बुखार था, पर ननद जी के दोस्तों के लिए मुझे पचास लोगों का खाना बनाने को कहा गया। जब मैंने मना किया, तो विक्रम ने सबके सामने मुझे थप्पड़ मारा… नहीं, गाल पर नहीं, मेरी आत्मा पर।”
रमेश बाबू और सुमित्रा जी चुप हो गए। थप्पड़ की बात सुनकर उन्हें धक्का लगा, लेकिन उनकी पुरानी सोच उन पर हावी थी। रमेश बाबू ने कहा, “देख वंदना, पति-पत्नी में झगड़े होते रहते हैं। मैं विक्रम से बात करूँगा। उसे समझाऊंगा। लेकिन तू ऐसे घर छोड़कर नहीं बैठ सकती। कल सुबह ही तुझे वापस जाना होगा।”
वंदना अपने कमरे में चली गई। वह रात उसने करवटें बदलते हुए गुज़ारी। उसे उम्मीद थी कि माता-पिता उसका दर्द समझेंगे, लेकिन उन्हें तो ‘लोग क्या कहेंगे’ का डर ज्यादा था।
अगले दो दिन घर में मातम जैसा माहौल रहा। पड़ोसियों को भनक न लगे, इसलिए वंदना को घर से बाहर निकलने की मनाही कर दी गई। सुमित्रा जी उसे दिन-रात यही समझातीं कि “औरत का असली घर ससुराल ही होता है”, “डोली उठी है तो अर्थी भी वहीं से उठनी चाहिए”।
तीसरे दिन विक्रम अपनी माँ के साथ वंदना के घर आ धमका। उसके चेहरे पर कोई पछतावा नहीं था, बल्कि एक अजीब सी हेकड़ी थी। आते ही उसने रमेश बाबू के पैर छुए और सोफे पर जम गया। उसकी माँ, शकुंतला देवी ने आते ही ताानों की झड़ी लगा दी।
“समधी जी, हमने तो सुना था कि आपकी बेटी बड़ी संस्कारी है। पर यह तो जरा सी बात पर घर छोड़कर आ गई। हमारे खानदान में आज तक ऐसा नहीं हुआ। अब आप ही समझाइये इसे, वरना हमारे लिए तो रिश्तों की कमी नहीं है।”
रमेश बाबू हाथ जोड़कर खड़े हो गए। “नहीं-नहीं, समधिन जी। बच्ची है, नादान है। माफ़ कर दीजिये। मैं अभी उसे बुलाता हूँ। वह आपके साथ ही जाएगी।”
सुमित्रा जी वंदना के कमरे में गईं। वंदना खिड़की से बाहर देख रही थी। “चल वंदना, विक्रम तुझे लेने आया है। देख, माफ़ी माँग ले और चली जा। बात को और मत बढ़ा।”
वंदना ने माँ की ओर देखा। “माँ, अगर आज मैं वहां वापस गई, तो मैं ज़िंदा लाश बन जाऊंगी। क्या आप अपनी बेटी को मरते हुए देखना चाहती हैं?”
सुमित्रा जी की आँखों में आंसू आ गए, पर उन्होंने आँचल से आंसू पोंछते हुए कहा, “बेटा, हम माँ-बाप हैं। तेरा भला ही चाहते हैं। दुनिया जीने नहीं देगी अगर तू तलाकशुदा होकर यहाँ बैठी रही। हमारे बाद तेरा कौन होगा? जा, तैयार हो जा।”
वंदना समझ गई कि अब उसे अपनी लड़ाई खुद लड़नी होगी। उसने अपनी अलमारी खोली, लेकिन साड़ी निकालने के लिए नहीं। उसने एक पुरानी फ़ाइल निकाली और एक छोटा सा बैग तैयार किया। वह बाहर ड्राइंग रूम में आई।
विक्रम उसे देखकर मुस्कुराया, एक क्रूर मुस्कान। “चलो वंदना, बहुत हो गया नाटक। घर चलो, माँ इंतज़ार कर रही है।”
वंदना ने अपनी नज़रे उठाईं और सबकी तरफ देखा। रमेश बाबू और सुमित्रा जी सिर झुकाए खड़े थे।
“मैं जा रही हूँ विक्रम,” वंदना ने कहा।
रमेश बाबू ने राहत की सांस ली। शकुंतला देवी के चेहरे पर जीत की चमक आ गई।
“लेकिन तुम्हारे साथ नहीं,” वंदना ने अपनी बात पूरी की।
कमरे में सन्नाटा छा गया। विक्रम का चेहरा लाल हो गया। “क्या मतलब? दिमाग ख़राब है तुम्हारा? मेरे साथ नहीं तो कहाँ जाओगी?”
वंदना ने अपनी फ़ाइल मेज़ पर पटकी। “यह मेरा अपॉइंटमेंट लेटर है। बेंगलुरु की एक कंपनी में। मैंने शादी से पहले अप्लाई किया था, पर तुम लोगों के डर से ज्वाइन नहीं किया था। कल मैंने उनसे बात कर ली है। वे मुझे नौकरी देने को तैयार हैं। हॉस्टल भी मिल गया है।”
शकुंतला देवी चिल्लाईं, “अरे राम! यह लड़की तो हाथ से निकल गई। समधी जी, देख रहे हैं आप? यह हमारे घर की बहु होकर नौकरी करेगी? वह भी दूसरे शहर में अकेली?”
रमेश बाबू ने वंदना को डांटा, “पागल हो गई है क्या? यह घर-गृहस्थी छोड़कर नौकरी करेगी? मैं तुझे इसकी इजाज़त नहीं दूंगा।”
वंदना ने पहली बार पिता की आँखों में आँखें डालकर बात की। “पापा, इजाज़त मैं मांग नहीं रही, बस बता रही हूँ। आपने मुझे पढ़ाया-लिखाया, काबिल बनाया, उसका क्या फायदा अगर मैं घुट-घुट कर मर जाऊं? जब आपने मुझे विदा किया था, तो कहा था कि मैं पराई हो गई हूँ। तो अब जब मैं पराई हूँ, तो अपने फैसले खुद ले सकती हूँ न?”
विक्रम आगे बढ़ा और वंदना का हाथ पकड़ने की कोशिश की। “बहुत जुबान चलने लगी है तुम्हारी। चलो चुपचाप।”
वंदना ने झटके से हाथ छुड़ाया। “खबरदार जो मुझे हाथ लगाया। वह वंदना मर गई जो थप्पड़ खाकर चुप रहती थी। यह मेरा जीवन है, और इसका रिमोट कंट्रोल अब मेरे हाथ में है। मुझे न तुम्हारे पैसों की ज़रुरत है, न तुम्हारे झूठे सम्मान की।”
उसने अपने माता-पिता की ओर देखा। “माँ-पापा, मुझे माफ़ कर दीजियेगा। मैं आपकी ‘अच्छी बेटी’ नहीं बन पाई जो चुपचाप जुल्म सह ले। लेकिन मैं एक ‘आत्मनिर्भर औरत’ बनकर दिखाउंगी। आज आप लोग समाज के डर से मेरा साथ नहीं दे रहे, लेकिन एक दिन आपको मुझ पर गर्व होगा।”
वंदना ने अपना बैग उठाया और मुख्य दरवाज़े की तरफ बढ़ी। पीछे से शकुंतला देवी और विक्रम बड़बड़ा रहे थे, गालियां दे रहे थे। रमेश बाबू बुत बनकर खड़े थे। लेकिन सुमित्रा जी… सुमित्रा जी की आँखों में एक अजीब सी चमक आ गई थी। शायद उन्हें अपनी जवानी याद आ गई थी, जब वे भी उड़ना चाहती थीं पर ‘लोग क्या कहेंगे’ की बेड़ियों ने उन्हें जकड़ लिया था। आज उनकी बेटी उन बेड़ियों को तोड़ रही थी।
वंदना ने दरवाज़ा खोला। बाहर शाम ढल रही थी, लेकिन उसके लिए यह एक नई सुबह थी। उसने एक टैक्सी रोकी जो उसने पहले ही बुक कर ली थी।
जैसे ही वह टैक्सी में बैठने लगी, पीछे से आवाज़ आई, “वंदना!”
वंदना ने मुड़कर देखा। सुमित्रा जी दौड़ते हुए आ रही थीं। उनके हाथ में एक टिफिन था। वे हाफ रही थीं।
“माँ?”
सुमित्रा जी ने वंदना के हाथ में टिफिन थमाया और उसके माथे को चूमा। “जा बेटा। जी ले अपनी ज़िंदगी। मैं तो नहीं कर पाई, पर तू हार मत मानना। यह तेरे पसंद के बेसन के लड्डू हैं। जब भी डर लगे, तो याद रखना कि तेरी माँ की दुआएं हमेशा तेरे साथ हैं, चाहे दुनिया कुछ भी कहे।”
वंदना की आँखों से आंसू बह निकले। उसने माँ को गले लगा लिया। “शुक्रिया माँ। मुझे बस इसी आशीर्वाद की ज़रुरत थी।”
टैक्सी चल पड़ी। वंदना ने पीछे मुड़कर देखा। उसकी माँ दरवाज़े पर खड़ी थी, और उनके पीछे पिता रमेश बाबू भी अब बाहर आ गए थे। वे हाथ नहीं हिला रहे थे, लेकिन उनकी नज़रों में अब गुस्सा नहीं, बल्कि एक लाचारी मिश्रित सम्मान था। विक्रम और उसकी माँ अभी भी घर के अंदर ही थे, अपनी संकीर्ण सोच के साथ।
वंदना ने ठंडी हवा में सांस ली। यह आज़ादी की खुशबू थी। उसे पता था कि आगे का रास्ता आसान नहीं होगा। अकेलापन होगा, संघर्ष होगा, समाज के ताने होंगे। लेकिन कम से कम वह घुटन नहीं होगी जो उसकी रूह को मार रही थी।
उसने अपने पर्स से फोन निकाला और अपनी सहेली को मैसेज किया, “मैं आ रही हूँ। अपनी शर्तों पर जीने के लिए।”
रेडियो पर गाना बज रहा था, “रुक जाना नहीं तू कहीं हार के…”
वंदना मुस्कुराई। यह अंत नहीं, एक नई कहानी की शुरुआत थी। एक ऐसी कहानी जहाँ नायिका को बचाने कोई राजकुमार नहीं आता, बल्कि वह अपनी तलवार खुद उठाती है।
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मूल लेखिका : माधुरी शर्मा