रसोई में बर्तनों के पटकने की आवाज़ ने सुबह की शांति को भंग कर दिया था। “गजब है! आज घर में सत्संग है, पंडित जी आने वाले हैं, और बहु महारानी कुर्सी पर बैठकर पूड़ियाँ बेल रही हैं? हे भगवान! अब तो रसोई भी अपवित्र हो गई। हमारे ज़माने में तो पैर टूटने पर भी हम खड़े होकर चूल्हा फूँकते थे, और आज कल की बहुओं को ज़रा सी कमर में लचक क्या आ गई, नवाबों वाले ठाठ शुरू हो गए।”
सासु माँ, विमला देवी की यह तीखी आवाज़ ड्राइंग रूम तक साफ़ सुनाई दे रही थी। शेखर, जो अभी-अभी ऑफिस जाने के लिए तैयार होकर अपने कमरे से निकला था, यह सुनकर ठिठक गया। उसने देखा कि उसकी पत्नी, अवंतिका, रसोई के एक कोने में प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठी थी। उसका चेहरा पसीने से तर-बतर था और एक हाथ से अपनी कमर को बार-बार सहला रही थी, जबकि दूसरे हाथ से बेलन चला रही थी।
विमला देवी वहीं खड़ीं, अपनी नाक सिकोड़ते हुए कह रही थीं, “देख क्या रही है? खड़ी हो! पंडित जी के भोग का खाना है, बैठकर बनाने से वो ‘जूठा’ माना जाता है। और ये जो तुमने बाज़ार से मंगाए हुए गुलाब जामुन के डिब्बे रखे हैं न, इन्हें हटा देना। मेरे घर में भोग भगवान को लगता है, हलवाई को नहीं। अपने ये नाज़-नखरे अपने मायके में दिखाना।”
अवंतिका की आँखों में आंसू आ गए। उसने धीरे से उठने की कोशिश की, लेकिन रीढ़ की हड्डी में उठी एक तेज़ टीस ने उसे वापस कुर्सी पर गिरा दिया। “माँ जी, डॉक्टर ने मना किया है… अभी स्पॉन्डिलाइटिस का दर्द बहुत बढ़ा हुआ है,” उसने रूँआसे गले से कहा।
“अरे तो क्या हो गया? हम औरतों का जीवन ही तपने के लिए होता है। दर्द-वर्द् सब मन का वहम है,” विमला देवी ने निष्ठुरता से कहा।
तभी शेखर तेज़ कदमों से रसोई में दाखिल हुआ। उसने अवंतिका के हाथ से बेलन ले लिया और उसे कुर्सी पर वापस बिठाया। फिर अपनी माँ की ओर मुड़कर बेहद शांत लेकिन कड़े स्वर में बोला, “माँ, अगर भगवान को बैठकर बनाई गई पूड़ियों से दिक्कत है, तो वो भूखे रह लेंगे। लेकिन आज अवंतिका खड़ी नहीं होगी।”
“तू फिर आ गया जोरू का गुलाम बनकर?” विमला देवी चिल्लाईं। “तुझे पता है आज समाज के लोग आ रहे हैं? क्या कहेंगे कि विमला की बहु अपाहिजों की तरह बैठकर खाना बनाती है? और तू कह रहा है भगवान भूखे रह लेंगे? पाप लगेगा, शेखर! पाप!”
“पाप?” शेखर ने एक कड़वी हंसी हँसी। “पाप क्या होता है माँ, ये आप मुझे मत समझाइये। असली पाप तो उस दिन हुआ था, जिसकी गवाही इस घर की दीवारें आज भी देती हैं। आप भूल गई होंगी, लेकिन मैं नहीं भूला। और न ही अवंतिका भूली है।”
विमला देवी के चेहरे का रंग थोड़ा फीका पड़ गया। “क… क्या बकवास कर रहा है? पुरानी बातें गड़े मुर्दे उखाड़ने के लिए होती हैं?”
“नहीं माँ,” शेखर ने अवंतिका के कंधे पर हाथ रखा। “पुरानी बातें आईना होती हैं। याद है आपको, छह महीने पहले जब अवंतिका को डेंगू हुआ था? प्लेटलेट्स चालीस हज़ार रह गए थे। डॉक्टर ने कहा था इसे पूरा आराम चाहिए और लिक्विड डाइट चाहिए।”
शेखर की आवाज़ थोड़ी भारी हो गई, जैसे उस याद का बोझ उसके गले में अटक रहा हो।
“उस दिन मुझे कंपनी के काम से दो दिन के लिए बाहर जाना पड़ा था। मैंने जाते वक़्त आपसे हाथ जोड़कर कहा था कि ‘माँ, प्लीज अवंतिका का खयाल रखना, मेड नहीं आई है, आप बस इसे पानी और जूस देती रहना, बाकी काम मैं आकर कर लूँगा’। आपने क्या कहा था? ‘हाँ बेटा, तू चिंता मत कर, मैं हूँ न’।”
रसोई में सन्नाटा छा गया। गैस पर चढ़ी कढ़ाई में तेल गरम हो रहा था, लेकिन माहौल उससे कहीं ज़्यादा तप रहा था।
शेखर ने जारी रखा, “जब मैं दो दिन बाद लौटा, तो मैंने क्या देखा? अवंतिका बेहोश पड़ी थी, उसका शरीर तप रहा था। और आप? आप और पापा अपने कमरे में एसी चलाकर टीवी देख रहे थे। घर में पानी की एक बोतल तक उसके सिरहाने नहीं थी। जब मैंने पूछा तो आपने कहा—’अरे, हमने सोचा सो रही है, जगाना ठीक नहीं समझा’। और सबसे बड़ी बात… उस हालत में भी, जब उसे उल्टियाँ हो रही थीं, आपने उससे कहा था कि ‘बेटा, शाम की चाय तो बना दे, मेरा सिर दुख रहा है’।”
अवंतिका ने अपना चेहरा हथेलियों में छिपा लिया। वह मंज़र उसे आज भी डराता था। उस दिन उसे लगा था कि वह शायद बच नहीं पाएगी। वह प्यास से तड़प रही थी, लेकिन सास-ससुर ने एक बार भी झाँक कर नहीं देखा था। उसने रेंगते हुए रसोई तक जाकर पानी पिया था।
“उस दिन मुझे समझ आ गया था माँ,” शेखर की आँखों में अंगारे थे। “कि इस घर में इंसान की कीमत तभी तक है जब तक वो खट सकता है। जिस दिन वो बीमार पड़ा, वो आपके लिए बोझ बन जाता है। उस दिन अवंतिका को हॉस्पिटल ले जाते वक़्त डॉक्टर ने कहा था कि अगर दो घंटे और देर हो जाती, तो इंटरनल ब्लीडिंग शुरू हो सकती थी। मेरी पत्नी मर सकती थी माँ! सिर्फ आपकी लापरवाही और क्रूरता की वजह से।”
“तो अब क्या उस बात को लेकर बैठा रहेगा?” विमला देवी ने अपनी गलती मानने के बजाय आक्रामकता दिखाई। “जिंदा है न वो? और अब तो ठीक है। ये कमर दर्द तो बहाना है कामचोरी का।”
“बस!” शेखर चिल्लाया। उसने गैस का नॉब घुमाकर चूल्हा बंद कर दिया।
“आज सत्संग होगा, लेकिन खाना घर में नहीं बनेगा। मैंने अभी कैटरर को फोन कर दिया है। और ये बाज़ार की मिठाइयाँ ही चढ़ेंगी। अगर आपको लगता है कि आपकी बहु की जान से ज़्यादा ज़रूरी आपके नियम-धर्म और समाज का दिखावा है, तो सुन लीजिये… हम दोनों आज से अलग खाना खाएंगे। मैं नहीं चाहता कि मेरी पत्नी फिर से उस हॉस्पिटल के बिस्तर पर पहुँचे सिर्फ इसलिए कि आपको अपनी ‘नाक’ ऊंची रखनी है।”
विमला देवी सन्न रह गईं। “तू… तू अपनी माँ को धमकी दे रहा है? इस कलमुंही के लिए?”
“ये धमकी नहीं, चेतावनी है माँ। अवंतिका इस घर की बहु है, कोई खरीदी हुई मशीन नहीं जिसकी वारंटी ख़त्म होने पर उसे कबाड़ में फेंक दिया जाए। जब आप बीमार थीं, तो इसी अवंतिका ने अपनी नौकरी से पंद्रह दिन की छुट्टी लेकर आपके पैर दबाए थे। तब आपको ये ‘बैठकर सेवा करना’ बुरा नहीं लगा था? तब तो आपने नहीं कहा कि बहु खड़ी होकर सेवा कर?”
शेखर ने अवंतिका का हाथ पकड़ा और उसे धीरे से खड़ा किया। “चलो अवंतिका, तुम कमरे में जाकर लेटो। मैं तुम्हारे लिए गर्म पानी की थैली लाता हूँ।”
“लेकिन शेखर… मेहमान…” अवंतिका ने हिचकिचाते हुए कहा।
“मेहमानों को मैं संभाल लूँगा। जो लोग एक बीमार इंसान के हाथ का बना खाना न मिलने पर बुरा मानते हैं, उन्हें मेरे घर आने का कोई हक़ नहीं है,” शेखर ने दृढ़ता से कहा।
विमला देवी वहीं खड़ी रह गईं। उनका अहंकार आज उनके बेटे के सच के सामने बौना हो गया था। वे बड़बड़ाती रहीं, “कलयुग आ गया है… कलयुग…” लेकिन शेखर ने उनकी एक न सुनी।
उस शाम सत्संग हुआ। कैटरर का खाना आया। मोहल्ले की औरतों ने जब खाने की तारीफ की और पूछा कि “बहु दिखाई नहीं दे रही?”, तो विमला देवी कुछ बोल पातीं, उससे पहले ही शेखर ने सबके सामने माइक लेकर कहा, “मेरी पत्नी की तबीयत ठीक नहीं है। डॉक्टर ने उसे बेड रेस्ट बोला है। आप सब जानते हैं, घर की लक्ष्मी अगर स्वस्थ न हो, तो घर में बरकत नहीं होती। इसलिए आज सेवा का मौका मुझे और कैटरर को मिला है।”
वहाँ मौजूद सभी महिलाओं ने प्रशंसा में सिर हिलाया। किसी ने यह नहीं कहा कि बहु ने खाना क्यों नहीं बनाया। सबने शेखर की तारीफ की कि वह अपनी पत्नी का कितना खयाल रखता है।
विमला देवी कोने में बैठी यह सब देख रही थीं। उन्हें आज एक बहुत बड़ा सबक मिला था। समाज, जिसका डर दिखाकर वे अवंतिका को प्रताड़ित करती थीं, वही समाज आज उनके बेटे की समझदारी की तारीफ कर रहा था। उन्हें समझ आ गया कि इज़्ज़त ‘ज़ुल्म सहने’ से नहीं, बल्कि ‘रिश्तों का सम्मान’ करने से बनती है।
रात को जब सब चले गए, तो अवंतिका ने शेखर से कहा, “थैंक यू, शेखर। आज आपने जो किया…”
शेखर ने उसके होंठों पर उंगली रख दी। “थैंक यू मत बोलो। मुझे माफ़ कर दो कि मुझे स्टैंड लेने में इतना वक़्त लग गया। उस डेंगू वाली रात के बाद ही मुझे यह कर देना चाहिए था। लेकिन अब और नहीं। हम अपने बुढ़ापे के लिए ये नहीं सीखेंगे। हम अपने बच्चे को सिखाएंगे कि परिवार का मतलब ‘एक-दूसरे का साथ देना’ होता है, न कि ‘एक-दूसरे का इस्तेमाल करना’।”
उस रात अवंतिका को दर्द तो था, लेकिन मन में एक सुकून था। उसे पता था कि अब उसे अपनी बीमारी में अकेले नहीं तड़पना पड़ेगा। उस घर की ‘कच्ची रसोई’ अब ‘पक्के इरादों’ में बदल चुकी थी, जहाँ परंपरा से ऊपर ‘इंसानियत’ को जगह मिल गई थी। और विमला देवी? शायद वे भी समझ चुकी थीं कि अगर बुढ़ापे में उन्हें पानी का गिलास चाहिए, तो उन्हें आज बहु के दर्द को समझना ही पड़ेगा। क्योंकि रिश्तों का खाता ‘उधार’ पर नहीं, ‘लेन-देन’ और ‘प्रेम’ पर चलता है।
लेखिका : नंदिनी शर्मा