पहला प्यार – एम. पी. सिंह

बात बहुत पुरानी हैं लेकिन यादें एकदम ताज़ा. ये बात हैं जब में कॉलेज में था, मेरी क्लास में एक लड़की ने एडमिशन लिया, नाम था सरिता, उसे देखते ही मुझे प्यार हो गया. सरिता सुन्दर, सिंपल और कम बोलने वाली लड़की थीं और बस काम से काम रखती थीं. मैं मन ही मन उससे प्यार करने लगा,

पर कहने से डरता था. मेरी मिडिल क्लास की मानसिकता, और वो पैसे वालो की बेटी. उसने भी कभी इस बात का अहसास नहीं कराया की वो मुझ में रूचि रखती है. देखते ही देखते समय बीतता गया और मैं फाइनल ईयर मैं आ गया. 

एक दिन मैंने लाइब्रेरी से एक रेफरेंस बुक इशू करवाई, तभी सरिता मेरे पास आकर बोली, मुझे ये बुक चाहिए, ऐसाइनमेंट करना हैं, बोलते हुए उसके चेहरे पर कोई एक्सप्रेशन नहीं थे. असाइनमेंट मुझे भी करना था, पर शिस्टाचार और अपने प्यार कि खातिर बुक उसे देते हुए बोला, की कल हर हाल में बुक लेकर आना,

मुझे भी काम करना हैं. वो बुक लेकर बिना कुछ बोले चली गई. मेरे साथ खड़ा अशोक ये सब देख सुन रहा था, बोला, बड़ी घमंडी लड़की है, थैंक्यू तक नहीं बोला. मैंने बोला, जाने दे, तू जानता तो है, वो ऐसी ही है. अगले दिन हम लोग कैंटीन में चाय पी रहे थे कि सरिता वहाँ आ गई और मुझे किताब देते हुए बोली, थैंक्स. उसके मुँह से ये सुनकर मेरे साथ साथ सभी लोग

हैरान थे, मैंने स्माइल पास की और चाय के लिए पूछा. उसने हाँ में सिर हिला दिया. हम सब चाय पी रहे थे कि तभी सरिता की दोस्त शिखा भी चाय पीते हुए आ गई और सबके साथ पटर पटर करने लगी. शिखा ने मेरे हाथ में किताब देखी और मांगने लगी. मैंने बोला, आराम से चाय पीलो, बाद में ले लेना. चाय पीने कि बाद हम चलने लगे तो शिखा ने फिर किताब मांगी

तो में उसे किताब देने लगा तभी सरिता ने मेरे हाथ से किताब लगभग छीनतें हुए जोर से बोली, मैंने अपना असाइनमेंट अधूरा छोड़कर तुम्हारे लिए किताब वापस दीं और तुम इसे शिखा क़ो दे रहे हो. अगर तुम्हे किताब नहीं चाहिए तो मैं इसे वापस ले जाती हूँ और कल तुन्हे दे दूंगी. फिर तुम जिसे मर्ज़ी दे देना.

सरिता का ऐसा बर्ताव देख कर सब हैरान हो गए क्यूंकि इससे पहले किसी ने सरिता क़ो ऐसे बर्ताव करते हुए नहीं देखा था. मैंने बात सम्भालते हुऐ बोला, ओके, मैं किसी क़ो किताब नहीं दूंगा. घर जाते हुऐ मैं यही सोचता रहा कि आखिर सरिता क़ो क्या हुआ जो ऐसा बिहेव कर रही थीं.

रात क़ो जब पढ़ने के लिए किताब खोली तो उसमे एक लेटर था. लेटर क़ो खोलते हुए मेरे हाथ काँप रहे थे. वो खत सरिता कि ही राइटिंग मैं था, ज्यादा तो कुछ नहीं लिखा था, बस अपने प्यार का इजहार किया था. साथ मैं लिखा था कि अगर तुम्हे मेरा प्यार कबूल है तो कल कॉलेज मैं काली पैंट और पीली शर्ट पहन कर आ जाना और मुझे पता है कि तुम्हारे पास ये ड्रेस है. 

खत पढ़कर मेरा दिल जोर जोर से धडकने लगा, मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि जिस लड़की क़ो मैं दिल से चाहता था, वो भी मुझे प्यार करती है और इतनी आसानी से मेरी जिंदगी में आ जाएगी. ये सब मुझे किसी सपने जैसा लग रहा था. अगले दिन मैं कॉलेज मैं ब्लैक येल्लो कॉम्बिनेशन में गया तो सरिता भी उसी कलर कॉम्बिनेशन में आई थीं.

आज पिछले 25 साल से सरिता मेरी पत्नी के रूप मैं मेरे साथ है. आज भी ज़ब कभी मैं काली पैंट पहनता हूँ तो वो मुझे शरारत भरी नज़रो से देख कर मुस्कुरा देती है और मुझे अपना पहला प्यार  याद आ जाता है.

धन्यवाद 

एम. पी. सिंह-कोटा 

स्वरचित, अप्रकाशित 

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