पहला प्यार – मधु वशिष्ठ

गांव में राम प्रसाद जी की तबियत दिनों दिन बिगड़ती ही जा रही थी। उनके घर में उनके और उनकी बेटी के सिवाय कोई भी नहीं रहता था। डाक्टर मोहन उनका इलाज किया करता था। एमबीबीएस करने के बाद में कुछ समय डॉ मोहन को गांव में ट्रेनिंग के तौर पर कुछ समय के लिए सेवा करना अनिवार्य था इसलिए वह रामप्रसाद जी के गांव में आ गया था। 

रामप्रसाद जी के बड़े से घर में वह और उनकी बेटी के सिवाय कोई नहीं था तो उन्होंने बाहर की तरफ से दो कमरे मोहन को किराए पर दे दिए थे। सुनने में आता है कि रामप्रसाद जी के पास जमीन  तो बहुत थी लेकिन कुछ तो उनकी पत्नी के इलाज में और कुछ उनकी बेटी प्रभा के विवाह में खर्च हो गए थे।

उनका दामाद भी कोई असाध्य रोग से पीड़ित था इसलिए रामप्रसाद जी ने अपनी जमीन बेच कर भी दामाद का इलाज करवाया लेकिन वह असफल रहे और दामाद की मृत्यु के पश्चात अपनी विधवा बेटी को अपने घर ले आए। एक तो असीम दुख और दूसरा बिना मां की विधवा बेटी की चिंता

ने उन्हें भी तोड़ कर रख दिया था।  डाक्टर मोहन रामप्रसाद जी कि बहुत ख्याल  रख रहा था। इसी बीच में जाने कब-कब में उसे रामप्रसाद जी की बेटी से प्यार हो गया था शायद इसलिए ही ट्रेनिंग के बाद भी उन्होंने शहर जाने का विचार त्याग दिया था। 

डॉ मोहन के पिता ने उनकी माता की मृत्यु के बाद दूसरा विवाह किया था। दूसरी मां के तीन बच्चे थे और डॉक्टर मोहन को दसवीं के बाद से ही हॉस्टल में भेज दिया था। हालांकि उनके पिता ने पढ़ाई लिखाई का हर चीज का ख्याल रखा है लेकिन फिर भी वह उन्हें  उनके अपने ही घर मे बेटे सा प्यार और सम्मान नहीं दिला सके।

      गांव में मोहन को राम प्रसाद जी और उनकी बेटी से मिलकर बेहद अपनापन लगा। ऐसे ही शायद भावनात्मक रूप से उन्हें प्रभा भी अपने जैसी ही अकेली और उपेक्षित लगी शायद इसी कारण उन्हें प्रभाव से प्यार हो गया था। हालांकि वह प्यार जैसी भावना से बिल्कुल अनभिज्ञ थे। एक बार उन्होंने राम प्रसाद जी से प्रभाव से विवाह करने की इच्छा भी जताई।

लेकिन रामप्रसाद जी ने बिल्कुल मना कर दिया था। उन्होंने मोहन से अपनी बेटी के वैधव्य पर कलंक नहीं लगाने के लिए कहा। उन्होंने कहा कि ना तो मैं और ना ही मेरी बेटी चाहेगी कि उसका दूसरा विवाह हो। यूं भी तुम्हारी जाति भी अलग है। यदि मेरी  बेटी का नाम भी तुम्हारे मुंह पर आ गया तो वह पूरे गांव में कलंकित हो जाएंगी।

        प्रभा कुछ बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती थी और जब से  डाक्टर मोहन उनके घर पर ही क्लीनिक खोलकर रहने को आए तो वह डॉक्टर साहब का भी खाना बनाकर रख दिया करती थी। यथासंभव में डॉक्टर साहब की क्लीनिक को साफ करने और मरीज की जरूरत का भी ध्यान रखती थी।

         रामप्रसाद जी जब मृत्यु शैया पर पड़े थे तो उन्होंने मोहन से वचन लिया था कि वह उनकी विधवा बेटी के वैधव्य का सम्मान करेगा और यह बात किसी को जाहिर नहीं होने देगा कि उसने कभी प्रभा के साथ विवाह के बारे में सोचा भी था।

रामप्रसाद जी की मृत्यु के  बाद डाक्टर मोहन ने ही  रामप्रसाद जी का सारा क्रियाकर्म उनके बेटे की तरह ही किया। गांव में उनके काज वाले दिन उसने घोषणा कर दी थी कि रामप्रसाद जी ने मुझे अपना बेटा माना है और अब प्रभा की जिम्मेदारी मेरी है। 

          उसके बाद भी पूरा जीवन मोहन रामप्रसाद जी के घर ही  अपनी क्लिनिक बनाकर रहा । प्रभा ने अपना समय भजन, पूजन और बच्चियों की पढ़ाई का ध्यान करने में लगाया डाक्टर मोहन ने अपनी जिंदगी का लक्ष्य बीमारों की सेवा में बनाया। वह किसी से भी ज्यादा फीस नहीं लेते थे।

               गांव वाले उन दोनों की बहुत इज्जत करते थे और वहीं नजदीक ही सरपंच ने उन्हें स्कूल और अस्पताल बनाने की जगह दे दी थी। दोनों ही अपने-अपने कामों में व्यस्त रहते थे लेकिन फिर भी अपने अपने रास्ते चलते हुए दोनों ने एक दूसरे का ख्याल भी बहुत रखा। मोहन ने कभी भी प्रभा को यह जाहिर भी नहीं होने दिया कि उसने कभी रामप्रसाद जी से प्रभा का हाथ भी मांगा था।

         पाठकगण उनसे सच्चा प्रेम मैंने ना कभी देखा और ना ही सुना। अब तो वह दोनों ही इस दुनिया में नहीं  है लेकिन मुझे तो लगता है उन जैसा प्रेम में निभाव करने वाला भी इस दुनिया में कोई और नहीं है। उनके प्रेम में केवल सेवा समर्पण था।  डॉ मोहन का यह पहला प्यार  था जिसने कि उन्हें पूरे समाज को प्रेम करने के लिए प्रेरित किया। 

      उनकी मृत्यु के बाद भी आज भी स्कूल में प्रभा का और  स्थानीय अस्पताल में  डाक्टर मोहन का नाम लिखा हुआ है। आज भी गांव में उन दोनों का नाम बहुत सम्मान के साथ लिया जाता है।

मधु वशिष्ठ फरीदाबाद हरियाणा 

पहला प्यार के अंतर्गत लिखी गई कहानी

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