पवित्र रिश्ता – आरती शुक्ला

समीर को यह बात शुरू से चुभती थी कि नंदिता हर मुस्कान से पहले जैसे अपने अंदर किसी दरवाज़े की कुंडी लगा लेती है। सोसायटी में रहते हुए भी वह लोगों से मिलती कम थी,

ज़्यादातर अपने फ्लैट की बालकनी में बैठकर पौधों में पानी देती, या किताब लेकर खामोशी में खो जाती। पैर में पुराने एक्सीडेंट की वजह से हल्की लंगड़ाहट थी, इसलिए वह बिना ज़रूरत बाहर निकलना ही नहीं चाहती थी। पर समीर को यह “नहीं चाहती” से ज्यादा “डरती है” लगता था।

वह उसी बिल्डिंग में नया-नया शिफ्ट हुआ था। काम से लौटते वक्त कई बार लिफ्ट में नंदिता से सामना होता, तो वह बस हल्का-सा सिर हिला देती। समीर के “कैसे हैं आप?

” के जवाब में भी अक्सर एक छोटा सा “ठीक” ही मिलता। कभी-कभी उसे लगता, जैसे नंदिता अपने आसपास के शोर में नहीं, अपने भीतर के डर में जी रही है।

एक शाम क्लब हाउस की तरफ जाते हुए समीर ने देखा कि नंदिता अकेली बेंच पर बैठी है। उसके पास एक छोटे बैग में दवाइयों की स्ट्रिप और पानी की बोतल दिखी। समीर ने हिम्मत करके पूछा, “आप हमेशा अकेली क्यों बैठती हैं? अंदर आइए, सब लोग खेल रहे हैं।”

नंदिता ने बिना नजर उठाए कहा, “मुझे ये सब पसंद नहीं।”

समीर मुस्कुरा दिया, “पसंद की बात बाद में, पहले आइए। मैं आपको जबरदस्ती हारने का मौका देने वाला हूँ।”

नंदिता ने पहली बार उसकी तरफ देखा। उसकी आँखों में जिज्ञासा थी, पर साथ ही वह पुरानी सतर्कता भी—जैसे कोई हाथ बढ़ाए तो वह पहले उसकी नीयत तौलना चाहती हो। “मुझे खेलना नहीं आता,” उसने धीरे से कहा।

“तो क्या हुआ? मैं भी कौन सा जन्मजात चैंपियन हूँ। चलिए… आज सिर्फ दस मिनट।”

उस दिन नंदिता सिर्फ दस मिनट के लिए अंदर आई थी, लेकिन उन दस मिनटों में उसने पहली बार क्लब हाउस का कैरम बोर्ड छुआ। समीर ने उसे स्ट्राइकर पकड़ना, ऐंगल बनाना सिखाया। वह बार-बार चूक जाती तो समीर उछलकर हंस देता, “ये देखिए! आपका स्ट्राइकर भी डर के मारे किनारे भाग रहा है।”

नंदिता को पता नहीं था कि उसके चेहरे पर कब हल्की मुस्कान आ गई। उसे अपनी मुस्कान पर ही हैरानी हुई—वह बरसों बाद ऐसे हँसी थी, बिना सोचे कि कोई देख रहा है, बिना सोचे कि कोई ताना मारेगा।

धीरे-धीरे “दस मिनट” रोज़ की आदत बन गया। कभी कैरम, कभी लूडो, कभी क्लब हाउस की छत पर हल्की-सी टहल। समीर उसे कभी सहारा देने की कोशिश नहीं करता, बस साथ चलता। अगर नंदिता सीढ़ी पर रुक जाती तो वह आगे बढ़कर हाथ नहीं पकड़ता, बस धीमे से कहता, “आराम से… समय हमारा है।” यही बात नंदिता के लिए सबसे बड़ी राहत थी—समीर की उपस्थिति में उसे “कमज़ोर” साबित नहीं होना पड़ता था।

सोसायटी वाले इस दोस्ती पर भी अपनी राय रखने लगे। “देखो-देखो, समीर रोज़ उसे क्लब ले जाता है।” “अकेली औरत है, किसी का साथ तो चाहिए।” “समीर अच्छा लड़का है, पर पता नहीं क्यों फंस रहा है।”
नंदिता को ये बातें सुनाई देतीं, और वह फिर अपनी खोल में लौटने लगती। फिर समीर मजाक में कहता, “लोगों की जुबान का कोई स्विच होता तो मैं अभी ऑफ कर देता।”

एक दिन कैरम खेलते-खेलते नंदिता जीत गई। उसने खुशी में हाथ उठाया और फिर जैसे ही याद आया कि वह “ज्यादा खुश” नहीं दिखा सकती, तुरंत हाथ नीचे कर लिया। समीर ने उसका वह क्षण पकड़ लिया।
“आप खुश होना भी आधा कर देती हैं,” उसने कहा।
नंदिता ने नजरें चुरा लीं। “आदत है।”

“आदत नहीं… डर है,” समीर ने पहली बार गंभीर होकर कहा।
नंदिता के होंठ कांप गए। “कुछ चीजें पूछी नहीं जातीं, समीर।”

उस रात समीर बहुत देर तक बालकनी में खड़ा रहा। उसे महसूस हुआ कि नंदिता की मुस्कान के पीछे कोई भारी कहानी है—जिसे वह खुद भी रोज़ दबाकर जीती है।

कुछ दिनों बाद सोसायटी में एक छोटे कार्यक्रम के दौरान किसी ने मजाक में कह दिया, “अरे नंदिता जी, आप तो समीर के सहारे ही चलती होंगी?”
सब हंस पड़े। नंदिता का चेहरा पीला पड़ गया। उसने गिलास रखा और बिना कुछ कहे बाहर निकल गई।

समीर ने सबके सामने कुछ नहीं कहा, पर वह सीधे नंदिता के फ्लैट के दरवाजे तक गया। बाहर से ही बोला, “मैं जानता हूँ, ये बात आपको बहुत बुरी लगी। मुझे भी लगी। पर आप खुद को बंद मत करिए।”

अंदर से धीमी आवाज़ आई, “आप जाइए समीर। मैं ठीक हूँ।”

“आप ठीक नहीं हैं, और मैं भी अब ठीक नहीं रह पाऊँगा अगर आप फिर से यूँ गायब हो जाएँ,” वह बोल गया, और खुद ही चौंक गया कि उसके अंदर की बेचैनी शब्द बनकर बाहर कैसे आ गई।

कुछ पल सन्नाटा रहा। फिर दरवाजा थोड़ा खुला। नंदिता की आंखें लाल थीं, लेकिन चेहरे पर वही आत्मसंयम। “आप क्यों परेशान होते हैं मेरे लिए?” उसने पूछा, जैसे जवाब उसे पहले से पता हो, लेकिन सुनना फिर भी जरूरी हो।

समीर के दिल में बहुत दिनों से जमा बात उस पल बाहर निकल आई। उसने बस एक सांस ली और कहा, “क्योंकि मैं आपको चाहने लगा हूँ… और मैं आपके साथ जिंदगी बांटना चाहता हूँ। अभी नहीं, जब आप चाहें। मैं कोई जल्दबाजी नहीं कर रहा। बस… आप सोच लीजिए।”

कहकर वह तुरंत पलट गया, जैसे उसके अपने शब्दों से उसे डर लग गया हो। उसे लगा, अगर वह एक सेकंड भी रुका तो नंदिता की आंखों में कोई ऐसा भाव देख लेगा जो उसे तोड़ देगा।

रात भर उसके भीतर सवाल उफनते रहे—नंदिता क्या सोचेगी? क्या उसे गुस्सा आएगा? क्या वह फिर हमेशा के लिए दूर हो जाएगी? समीर को पहली बार एहसास हुआ कि प्रेम कहना जितना आसान लगता है, उतना होता नहीं। प्रेम कह देने से किसी का डर नहीं मिटता।

अगले दिन सुबह क्लब हाउस के सामने वह नंदिता का इंतजार कर रहा था। नंदिता आई—सादा सूट, बाल बंधे, चेहरे पर ठहरी हुई कठोरता। समीर आगे बढ़ा, पर नंदिता ने पहले ही कह दिया, “मुझे किसी की दया नहीं चाहिए, समीर।”

समीर का चेहरा उतर गया। “ये दया नहीं है, नंदिता। मैं सच में—”

नंदिता ने उसकी बात काट दी। “हो सकता है तुम सच कह रहे हो। पर ऐसा भी तो हो सकता है कि कल तुम्हें लगे—मैं तुम्हारे लिए बोझ हूँ।”

“कभी नहीं,” समीर ने दृढ़ता से कहा।

नंदिता की आवाज़ धीमी थी, पर उसमें वर्षों की चोटें बोल रही थीं। “हो सकता है तुम कभी ऐसा न सोचो… लेकिन मेरा मन… मेरा मन कभी भी सोच सकता है कि मैं तुम्हारे रास्ते में रुकावट हूँ। फिर मुझे ये जीवन ही कठिन लगेगा। एक बात बताओ, क्या हर रिश्ते को कागज़ और रस्मों में बांधना ज़रूरी होता है? क्या हम अच्छे दोस्त बनकर नहीं रह सकते? तुमने मुझे हंसना सिखाया। मैंने तुमसे फिर से जीना सीखा। अगर मैंने शादी की, तो लोग कहेंगे—देखो, बेचारा लड़का उस पर तरस खाकर… और मैं अपने आत्मसम्मान को हर रोज़ समझाती रहूँगी। मैं वो नहीं चाहती।”

समीर का गला भर आया। वह कुछ बोलना चाहता था—कि उसका प्रेम तरस नहीं, चुनाव है; कि नंदिता उसकी कमजोरी नहीं, उसकी सबसे मजबूत वजह है। लेकिन नंदिता मुड़ चुकी थी। जाते-जाते उसने बस इतना कहा, “ये रिश्ता यूँ ही रहने दो… पावन… निर्मल… बंधनों से मुक्त।”

और वह अपने घर के अंदर चली गई।

समीर देर तक वहीं खड़ा रहा। उसे लगा जैसे किसी ने उसके हाथ में रखे फूलों को उसके ही सामने मसल दिया हो। पर उसी पल उसने नंदिता के चेहरे पर एक चीज़ देखी थी—आत्मविश्वास। वह वही नंदिता नहीं थी जो पहले दिन बेंच पर डर के साथ बैठी थी। आज वह अपने डर को भी शब्द दे पा रही थी, अपने सम्मान को भी बचा पा रही थी। और समीर को एहसास हुआ कि अगर वह सच में प्रेम करता है, तो उसे नंदिता की शर्तें नहीं, नंदिता की आत्मा का सम्मान करना होगा।

उसने अगले कुछ दिनों तक नंदिता को परेशान नहीं किया। न कॉल, न मैसेज। बस रोज़ शाम को क्लब हाउस आता, कैरम बोर्ड लगाता, और अकेले खेलता। कभी-कभी उसकी नजर अनायास नंदिता की बालकनी पर चली जाती, जहाँ पौधे हिलते थे पर वह नहीं दिखती थी।

फिर एक रविवार, क्लब हाउस का दरवाजा खुला और नंदिता अंदर आई। वह सीधे कैरम बोर्ड के सामने आई, स्ट्राइकर उठाया और बोली, “आज मैं तुम्हें फिर से हराऊँगी।”

समीर ने चौंककर उसकी तरफ देखा। “आप…?”

“मैं दोस्ती छोड़कर नहीं जा सकती,” नंदिता ने पहली बार साफ कहा। “तुम्हारा प्रस्ताव मैंने नहीं ठुकराया… मैंने अपने डर को चुना था। और डर… हमेशा सही नहीं होता।”

समीर ने धीरे से पूछा, “तो फिर?”

नंदिता ने स्ट्राइकर बोर्ड पर रखा। “तो फिर हम वही रहेंगे जो हम थे—दो दोस्त। पर एक शर्त है। अब तुम मुझे ‘कमजोर’ समझकर नहीं, मेरे साथ हंसकर रहोगे। और मैं भी खुद को हर वक्त बोझ समझकर नहीं जीऊँगी।”

समीर की आंखों में नमी आ गई। “मैं तो हमेशा से यही चाहता था।”

कुछ महीनों में नंदिता ने अपने लिए काम ढूंढ लिया—ऑनलाइन ट्यूटरिंग। उसने अपने पैरों की फिजियोथेरेपी नियमित की। उसने खुद के लिए एक नई पहचान बनाई, जहाँ किसी के सहारे की जरूरत नहीं थी। सोसायटी में वही लोग जो कल तक कानाफूसी करते थे, अब कहते, “नंदिता मैडम तो कमाल हैं, बच्चों को इतना अच्छा पढ़ाती हैं।” और नंदिता बस मुस्कुरा देती—इस बार मुस्कान पूरी होती, आधी नहीं।

एक शाम कैरम खेलते-खेलते नंदिता ने अचानक कहा, “समीर, उस दिन मैंने जो कहा था… कि शादी से आत्मसम्मान को ठेस पहुंचेगी… वो पूरा सच नहीं था।”

समीर ने सांस रोक ली, “तो सच क्या था?”

नंदिता ने आंखें उठाईं। “सच ये था कि मैं अपने पिछले रिश्ते में ‘दया’ के नाम पर बहुत बार टूटी हूँ। एक्सीडेंट के बाद मेरे पति ने कहा था—‘मैं संभाल लूंगा’… पर हर वाक्य में मुझे एहसास कराया कि मैं उसके ऊपर भार हूँ। मैं उसी भार से भागी थी। तुम्हारे साथ मुझे पहली बार लगा कि मैं भार नहीं, इंसान हूँ।”

समीर ने शांत होकर कहा, “और मैं चाहता हूँ कि आप हमेशा यही महसूस करें।”

नंदिता ने स्ट्राइकर आगे बढ़ाया, जैसे कैरम का नियम तय कर रही हो। “तो सुनो… अगर कभी… सिर्फ कभी… मैं तुम्हारे साथ किसी बंधन में बंधूं, तो वो समाज की दया नहीं, मेरी पसंद होगी। मेरी शर्तों पर। मेरी गरिमा के साथ।”

समीर के चेहरे पर धीमी-सी मुस्कान फैल गई। “मैं इंतजार कर सकता हूँ… उम्र भर भी।”

नंदिता ने भी मुस्कुराकर कहा, “उम्र भर नहीं… बस इतना कि मैं खुद पर पूरा भरोसा कर लूं।”

और फिर, कई महीनों बाद, उसी क्लब हाउस में, जहां नंदिता पहली बार डरते हुए आई थी, उसी जगह उसने एक छोटा सा कार्ड समीर के हाथ में रखा। कार्ड पर लिखा था—
“तुम्हारी दया नहीं चाहिए थी… और आज भी नहीं चाहिए।
पर तुम्हारा साथ चाहिए… क्योंकि मैं तुम्हें चुन रही हूँ।”

समीर ने कांपते हाथों से कार्ड बंद किया, और बहुत धीरे से बोला, “तो क्या हम…?”

नंदिता ने सिर हिलाया। “हाँ। लेकिन कोई दिखावा नहीं। कोई साबित करना नहीं। सिर्फ हम… और हमारे अपने लोग। और हर साल, उसी दिन हम कैरम खेलेंगे—ताकि मुझे याद रहे कि मैंने जीतना भी सीखा, और चुनना भी।”

समीर हँस पड़ा, “और मैं हर बार हारने को तैयार हूँ।”

नंदिता ने उसकी तरफ देख कर कहा, “नहीं समीर… इस बार तुम भी जीतो। क्योंकि ये रिश्ता किसी एक की जीत नहीं… हम दोनों की बराबरी है।”

उस शाम सोसायटी की दीवारों के पीछे भी एक नई बात जन्म ले चुकी थी—कुछ रिश्ते शादी से नहीं, सम्मान से पवित्र होते हैं। और जब सम्मान के साथ प्रेम जुड़ जाए, तो बंधन भी बंधन नहीं लगता… वह एक साझी उड़ान बन जाता है।

लेखिका : आरती शुक्ला 

#एक रिश्ता ऐसा भी 

error: Content is protected !!