पति-पत्नी या दोस्त – डॉ उर्मिला सिन्हा 

कमरे की हवा में मोगरे और रजनीगंधा के फूलों की महक थी, लेकिन उस महक में एक अजीब सा भारीपन घुला हुआ था। यह वो रात थी जिसे दुनिया ‘सुहागरात’ कहती है, लेकिन काव्या के लिए यह एक ‘समझौते की रात’ से ज्यादा कुछ नहीं थी।

वह पलंग के एक किनारे पर बैठी थी। उसकी गोद में तीन साल का चिन्मय गहरी नींद में सोया हुआ था। चिन्मय… उसकी बड़ी बहन सुमन का बेटा, जो अब उसका बेटा था। काव्या ने धीरे से चिन्मय के सिर पर हाथ फेरा। उसकी मासूम सांसों की लय कमरे की खामोशी में गूंज रही थी।

दरवाज़ा खुला और शेखर अंदर आया। शेखर… जो कल तक उसका जीजा था, और आज पति बन गया था। शेखर के चेहरे पर वही थकान और बेबसी थी जो पिछले छह महीनों से काव्या देख रही थी। सुमन के जाने के बाद से शेखर जैसे जीना भूल गया था।

शेखर ने दरवाजा बंद किया और कुछ पल वहीं खड़ा रहा। काव्या का दिल ज़ोर से धड़क रहा था, डर से नहीं, बल्कि उस अजीबोगरीब स्थिति से जिसमें वे दोनों फंस गए थे।

“चिन्मय सो गया?” शेखर ने बहुत धीमी आवाज़ में पूछा, जैसे उसे डर हो कि तेज आवाज़ से इन दोनों के बीच की असहजता और गहरी हो जाएगी।

“जी,” काव्या ने संक्षिप्त उत्तर दिया।

शेखर धीरे-धीरे आगे बढ़ा और सोफे पर जाकर बैठ गया। उसने अपनी शेरवानी की ऊपर की बटन खोली और गहरी सांस ली। पलंग और सोफे के बीच की दूरी महज दस कदम थी, लेकिन उस रात वह दूरी मीलों लंबी लग रही थी।

“काव्या,” शेखर ने बिना उसकी तरफ देखे कहा, “मैं जानता हूँ कि घर वालों ने, समाज ने और परिस्थितियों ने हमें इस कमरे में एक साथ लाकर खड़ा कर दिया है। उन्होंने कहा कि चिन्मय को माँ चाहिए और मुझे जीवनसाथी। लेकिन…” शेखर रुका, उसने अपनी हथेलियों से चेहरा रगड़ा, “लेकिन सच तो यह है कि मेरे ज़हन में अभी भी सुमन है। मैं आज रात, या शायद आने वाले कुछ समय तक तुम्हें वो दर्जा नहीं दे पाऊँगा जो एक पति को अपनी पत्नी को देना चाहिए।”

काव्या ने एक पल के लिए अपनी नज़रें उठाईं और शेखर को देखा। उसे लगा था कि उसे शेखर को दूर रहने के लिए कहना पड़ेगा, लेकिन शेखर ने खुद ही उसके मन की बात कह दी थी। काव्या ने धीरे से चिन्मय को तकिए पर लिटाया और अपने भारी ब्राइडल लहंगे के दुपट्टे को थोड़ा ढीला किया।

“मैं समझती हूँ शेखर,” काव्या की आवाज़ में एक अनपेक्षित दृढ़ता थी। “और मैं चाहती हूँ कि हम इस रिश्ते को किसी झूठ या दिखावे से शुरू न करें। मैंने यह शादी चिन्मय के लिए की है, क्योंकि मैं नहीं चाहती थी कि मेरी बहन का बेटा किसी सौतेली माँ के रहमो-करम पर पले। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मैंने अपना आत्मसम्मान खो दिया है। मैं आपकी पत्नी बनी हूँ, पर मैं ‘सुमन’ नहीं हूँ। मैं काव्या हूँ और मैं चाहती हूँ कि मुझे काव्या ही समझा जाए।”

शेखर ने चौंककर काव्या की तरफ देखा। सुमन हमेशा शांत और मृदुभाषी थी, जबकि काव्या स्पष्टवादी और व्यावहारिक थी। आज उसे एहसास हुआ कि चेहरे एक जैसे होने के बावजूद, दोनों बहनें कितनी अलग थीं।

“तो हम क्या करेंगे?” शेखर ने पूछा।

“हम दोस्त बनकर रहेंगे,” काव्या ने कहा। “माता-पिता बनकर रहेंगे। चिन्मय हमारी प्राथमिकता है। बाकी रिश्ते… समय के साथ देखेंगे। अभी न मुझे पत्नी बनने की जल्दी है, और न आपको पति बनने की मजबूरी होनी चाहिए।”

उस रात, कमरे की बत्तियाँ बुझा दी गईं। काव्या पलंग पर चिन्मय के साथ सोई और शेखर सोफे पर। कोई मिलन नहीं हुआ, लेकिन एक मौन समझौता ज़रूर हो गया था।

अगली सुबह जब काव्या उठी, तो सूरज की किरणें कमरे में बिखरी हुई थीं। शेखर पहले ही उठकर जॉगिंग के लिए जा चुका था। काव्या ने चारों तरफ नज़र दौड़ाई। यह कमरा… यह पूरा घर सुमन की यादों का संग्रहालय था। दीवारों पर सुमन की तस्वीरें, अलमारी में सुमन की साड़ियां, ड्रेसिंग टेबल पर सुमन के इत्र। काव्या को एक पल के लिए घुटन महसूस हुई। उसे लगा जैसे वह किसी और की ज़िंदगी जी रही है, किसी और के किरदार में फिट होने की कोशिश कर रही है।

उसने खुद को समझाया, “धैर्य रख काव्या। बदलाव रातों-रात नहीं होते।”

उसने चिन्मय को तैयार किया और नाश्ते की मेज पर आई। सास-ससुर, यानी अब मम्मी-पापा, डाइनिंग टेबल पर बैठे थे। काव्या को देखते ही उनकी आँखों में एक चमक आ गई, ठीक वैसी ही जैसे वे सुमन को देखकर मुस्कुराते थे।

“आओ बहू, बैठो,” सासू माँ ने कहा। “आज नाश्ते में क्या बनाओगी? सुमन तो आलू के पराठे बहुत अच्छे बनाती थी। शेखर को बहुत पसंद थे।”

काव्या का हाथ कुर्सी खींचते वक्त रुक गया। तुलना शुरू हो चुकी थी।

“मम्मी जी,” काव्या ने सहजता से कहा, “मुझे आलू के पराठे बनाने नहीं आते। मैं पोहा अच्छा बनाती हूँ। आज पोहा बना दूँ?”

सासू माँ के चेहरे की मुस्कान थोड़ी फीकी पड़ गई। “अरे… पर शेखर तो…”

“मैं खा लूँगा माँ,” शेखर ने पीछे से आते हुए कहा। वह पसीने में तर-बतर था। उसने काव्या की तरफ एक नज़र डाली, जिसमें धन्यवाद का भाव था। “काव्या के हाथ का पोहा ट्राई करते हैं। बदलाव अच्छा होता है।”

दिन बीतते गए और काव्या ने महसूस किया कि यह लड़ाई बाहर वालों से नहीं, बल्कि घर के अंदर मौजूद यादों से थी। हर छोटी बात पर तुलना होती। अगर काव्या घर के परदे बदलना चाहती, तो ससुर जी कहते, “यह नीला रंग सुमन ने पसंद किया था, इसे रहने दो।” अगर वह चिन्मय को डांटती, तो सासू माँ कहतीं, “सुमन तो कभी बच्चे पर आवाज़ नहीं उठाती थी।”

काव्या एक आर्किटेक्ट थी। शादी से पहले वह एक बड़ी फर्म में काम करती थी। शादी के बाद उसने एक महीने की छुट्टी ली थी, लेकिन अब उसे लगने लगा था कि अगर वह घर में ही रही, तो वह ‘दूसरी सुमन’ बनकर रह जाएगी। उसका अपना वजूद इस घर की दीवारों में कहीं खो जाएगा।

एक महीने बाद, काव्या ने रात के खाने पर एक घोषणा की।

“पापा, मम्मी, शेखर… मैं अगले हफ्ते से अपनी नौकरी दोबारा शुरू करना चाहती हूँ।”

चम्मच और प्लेट के टकराने की आवाज़ें थम गईं। सासू माँ ने पानी का गिलास मेज पर रखा।

“नौकरी? लेकिन बेटा, अभी तो चिन्मय छोटा है। और सुमन तो…” सासू माँ ने आदत के अनुसार सुमन का नाम लिया, “सुमन ने तो चिन्मय के पैदा होते ही नौकरी छोड़ दी थी। उसने कहा था कि बच्चे की परवरिश से बढ़कर कुछ नहीं।”

काव्या ने गहरी सांस ली। वह जानती थी यह पल आएगा।

“मम्मी जी,” काव्या ने बहुत ही शालीनता से कहा, “सुमन दीदी का फैसला उनका था। यह मेरा फैसला है। मैं चिन्मय से बहुत प्यार करती हूँ, लेकिन मैं अपनी पहचान नहीं मिटा सकती। मैं एक आर्किटेक्ट हूँ, और मैं काम करना चाहती हूँ। चिन्मय अब स्कूल जाने लगा है। मैं अपना समय ऐसे मैनेज करूँगी कि उसे मेरी कमी महसूस न हो।”

“लेकिन घर कौन संभालेगा?” ससुर जी ने चिंता जताई।

“हम सब मिलकर,” काव्या ने शेखर की तरफ देखा। “शेखर और मैं। और आप दोनों भी तो हैं।”

शेखर चुपचाप खाना खाता रहा। उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। काव्या को बुरा लगा। उसे लगा था कि कम से कम शेखर, जो खुद आज के ज़माने का है, उसे समझेगा।

रात को कमरे में काव्या ने शेखर से पूछा, “आपने कुछ कहा नहीं? क्या आपको भी लगता है कि मुझे घर पर बैठकर सिर्फ ‘सुमन’ की परछाई बनना चाहिए?”

शेखर ने अपनी किताब बंद की। “काव्या, मुझे डर है। चिन्मय पहले ही अपनी माँ को खो चुका है। अगर तुम भी व्यस्त हो जाओगी, तो वह अकेला महसूस करेगा।”

“शेखर,” काव्या शेखर के पास जाकर खड़ी हो गई। “एक खुश माँ ही एक खुश बच्चे की परवरिश कर सकती है। अगर मैं घर में घुटती रही, अपनी इच्छाओं को मारती रही, तो मेरे अंदर कड़वाहट भर जाएगी। और वो कड़वाहट चिन्मय की परवरिश पर असर डालेगी। क्या आप चाहते हैं कि चिन्मय एक ऐसी माँ के साथ बड़ा हो जो अपने जीवन से नाखुश है?”

शेखर ने काव्या की आँखों में देखा। वहां एक आग थी, एक जुनून था जो सुमन की आँखों में कभी नहीं था। सुमन समर्पण की मूर्ति थी, लेकिन काव्या स्वाभिमान की मिसाल थी।

“ठीक है,” शेखर ने धीरे से कहा। “अगर तुम संभाल सकती हो, तो करो। मैं साथ हूँ।”

काव्या ने ऑफिस जाना शुरू किया। शुरुआत में मुश्किलें आईं। कभी चिन्मय स्कूल से आकर रोता, कभी घर का काम छूट जाता। सासू माँ के ताने भी सुनने पड़ते—”कहा था न, दो नावों में पैर रखोगी तो डूब जाओगी।”

लेकिन काव्या ने हार नहीं मानी। उसने शेखर को भी घर के कामों में शामिल करना शुरू किया। पहले शेखर घर आकर सोफे पर बैठ जाता था और चाय का इंतज़ार करता था। अब काव्या ने उसे चिन्मय का होमवर्क कराने और कभी-कभी सब्जी काटने की जिम्मेदारी सौंप दी।

एक दिन रविवार की दोपहर थी। काव्या सीढ़ी पर चढ़कर ड्राइंग रूम की दीवार से एक बड़ी तस्वीर उतार रही थी। यह सुमन की एक बहुत बड़ी पोर्ट्रेट थी जो घर के मुख्य हॉल में लगी थी।

अचानक सासू माँ वहां आ गईं और चीख पड़ीं। “यह क्या कर रही हो? सुमन की तस्वीर हटा रही हो? तुम्हें शर्म नहीं आती?”

शोर सुनकर शेखर और ससुर जी भी आ गए।

काव्या सीढ़ी से नीचे उतरी। उसके हाथों में तस्वीर थी।

“मम्मी जी, मैं तस्वीर हटा नहीं रही, बस जगह बदल रही हूँ,” काव्या ने शांत स्वर में कहा।

“जगह बदल रही हो? क्यों? यह जगह सुमन की है!” सासू माँ रोने लगीं। “तुम चाहती हो कि हम उसे भूल जाएं? तुम उसकी जगह लेना चाहती हो, इसलिए उसे हटा रही हो?”

“नहीं मम्मी जी,” काव्या की आवाज़ आज थोड़ी ऊंची थी। “मैं उसकी जगह नहीं ले रही, क्योंकि उसकी जगह कोई नहीं ले सकता। लेकिन मैं इस घर में ‘अपनी’ जगह बना रही हूँ। पिछले छह महीनों से मैं इस घर में हूँ, लेकिन यह घर मुझे आज भी पराया लगता है। जहाँ देखो, दीदी की यादें हैं। यादें दिलों में होनी चाहिए, दीवारों पर नहीं। अगर मुझे इस घर को अपना बनाना है, तो मुझे इसे अपने तरीके से सजाना होगा। मैं दीदी की तस्वीर को उनके कमरे में लगाऊँगी, पूरे सम्मान के साथ। लेकिन इस हॉल में… इस हॉल में अब हमारे ‘वर्तमान’ की तस्वीर होनी चाहिए, न कि ‘भूतकाल’ की।”

सासू माँ सन्न रह गईं। उन्होंने शेखर की तरफ देखा, उम्मीद करते हुए कि वह काव्या को डांटेगा।

शेखर आगे आया। उसने काव्या के हाथ से भारी तस्वीर ले ली।

“काव्या सही कह रही है माँ,” शेखर ने कहा। “हम सुमन को पकड़कर बैठे हैं और काव्या को अनदेखा कर रहे हैं। हम चाहते हैं कि काव्या सुमन बन जाए, जो कि नामुमकिन है। और यह काव्या के साथ नाइंसाफी भी है। हमें आगे बढ़ना होगा। चिन्मय को एक ऐसी माँ चाहिए जो उसके साथ हंसे-खेले, न कि वो जो एक मृत व्यक्ति के सांचे में ढलने की कोशिश करे।”

ससुर जी ने आगे बढ़कर अपनी पत्नी के कंधे पर हाथ रखा। “बहू ठीक कह रही है। घर जीवित लोगों के लिए होता है। सुमन हमारी बेटी थी, हमेशा रहेगी। लेकिन काव्या हमारी बहू है, उसकी भी अपनी इच्छाएं हैं।”

उस दिन के बाद घर का नक्शा बदलने लगा। काव्या ने दीवारों का रंग बदला। उसने गहरे उदास रंगों की जगह, खिले हुए चमकीले रंग करवाए। फर्नीचर की सेटिंग बदली। सुमन की चीजें सम्मानपूर्वक सहेज कर रख दी गईं, और घर में काव्या की पसंद की चीजें दिखने लगीं।

इस बदलाव का असर रिश्तों पर भी पड़ा। शेखर और काव्या के बीच की झिझक कम होने लगी। वे अब सिर्फ चिन्मय के माता-पिता नहीं, बल्कि दोस्त बन रहे थे। वे साथ में हंसते, ऑफिस की बातें शेयर करते, और कभी-कभी बहस भी करते। यह एक सामान्य पति-पत्नी का रिश्ता बन रहा था, जो ‘समर्पण’ या ‘एहसान’ पर नहीं, बल्कि ‘बराबरी’ और ‘सम्मान’ पर टिका था।

एक रात, बारिश हो रही थी। काव्या अपनी डेस्क पर काम कर रही थी। चिन्मय सो चुका था। शेखर दो कप कॉफी लेकर आया।

“थक गई हो?” शेखर ने कॉफी का कप मेज पर रखते हुए पूछा।

“थोड़ा सा। एक प्रोजेक्ट की डेडलाइन है,” काव्या ने मुस्कुराते हुए कहा।

शेखर पास की कुर्सी पर बैठ गया। “काव्या, मुझे तुमसे कुछ कहना है।”

काव्या ने लैपटॉप बंद कर दिया। “जी कहिए।”

“तुम्हें याद है शादी की पहली रात मैंने क्या कहा था? कि मैं तुम्हें पत्नी का दर्जा नहीं दे पाऊँगा?”

काव्या ने सिर हिलाया। “हाँ, याद है।”

“मैं गलत था,” शेखर ने काव्या के हाथ के ऊपर अपना हाथ रखा। “मैं दरअसल डरा हुआ था। मुझे लगा था कि अगर मैंने तुम्हें अपनी ज़िंदगी में जगह दी, तो यह सुमन के साथ धोखा होगा। लेकिन इन महीनों में तुमने मुझे सिखाया कि प्यार का मतलब किसी को ‘रिप्लेस’ करना नहीं होता। प्यार का मतलब होता है दिल को बड़ा करना ताकि उसमें नई जगह बन सके। तुमने सुमन की जगह लेने की कोशिश नहीं की, तुमने अपनी अलग जगह बनाई। और सच कहूँ तो… मुझे यह नई जगह बहुत पसंद है।”

काव्या की आँखों में नमी आ गई। यह वो पल था जिसका उसे इंतज़ार था – एक पति का प्रेम, न कि एक जीजा का अपराधबोध।

“शेखर,” काव्या ने धीरे से कहा, “मैं जानती थी कि यह आसान नहीं होगा। पर मुझे खुशी है कि हमने जल्दबाजी नहीं की। हमने इस रिश्ते को सांस लेने का मौका दिया।”

“काव्या, क्या हम एक नई शुरुआत कर सकते हैं? सिर्फ चिन्मय के लिए नहीं, बल्कि हमारे लिए?” शेखर की आँखों में एक नई चमक थी, उम्मीद की चमक।

काव्या ने मुस्कुराते हुए शेखर का हाथ थाम लिया। “हम शुरुआत तो कब की कर चुके हैं शेखर। बस आज आपने उसे स्वीकार किया है।”

अगले दिन रविवार था। काव्या, शेखर और चिन्मय पार्क में थे। चिन्मय झूला झूल रहा था और जोर-जोर से हंस रहा था।

पास की बेंच पर बैठी एक पुरानी पड़ोसन ने सासू माँ से कहा, “अरे, तुम्हारी नई बहू तो बिल्कुल अलग है। सुमन तो साड़ी में रहती थी, यह तो जींस-कुर्ता पहनती है। नौकरी भी करती है। घर कैसे संभालती होगी?”

सासू माँ ने गर्व से अपनी बहू की तरफ देखा जो शेखर के साथ आइसक्रीम खाते हुए हंस रही थी।

“हाँ, अलग है,” सासू माँ ने मुस्कुराकर कहा। “सुमन, सुमन थी। और काव्या, काव्या है। मेरी यह बहू घर संभालती नहीं है, बल्कि घर को ‘जीती’ है। इसने मेरे बेटे के चेहरे पर हंसी लौटाई है और मेरे पोते को एक दोस्त दिया है। मुझे अब कोई ‘त्याग की मूरत’ नहीं चाहिए, मुझे मेरी ‘अफसर बिटिया’ ही पसंद है।”

काव्या ने दूर से सासू माँ को देख लिया था। उसे उनकी बातें सुनाई नहीं दीं, लेकिन उनके चेहरे का संतोष सब कुछ कह रहा था।

उसने शेखर की तरफ देखा और महसूस किया कि ‘समर्पण’ का मतलब हमेशा अपनी इच्छाओं को मारना नहीं होता। कभी-कभी सच्चे समर्पण का मतलब होता है—खुद पर विश्वास रखना, तूफानों के बीच अपनी पहचान बनाए रखना और अपने धैर्य व प्रेम से टूटे हुए दिलों को फिर से जोड़ना।

काव्या ने सुमन की मौत से उपजे अंधेरे को अपने तरीके से मिटाया था—दीपक जलाकर नहीं, बल्कि खिड़कियां खोलकर, ताकि नई धूप अंदर आ सके। और उस धूप में, अब यह परिवार फिर से खिल उठा था।

मूल लेखिका : डॉ उर्मिला सिन्हा 

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