खिड़की के बाहर होती मूसलाधार बारिश ने ‘शांति निकेतन’ वृद्धाश्रम के उस छोटे से कमरे में सन्नाटे को और गहरा कर दिया था। 70 वर्षीय वंदना देवी अपनी व्हीलचेयर पर बैठी, कांच पर फिसलती पानी की बूंदों को एकटक निहार रही थीं। उनकी गोद में एक पुराना, मखमली फोटो एल्बम रखा था, जिसके पन्ने अब पीले पड़ चुके थे और कोने मुड़ गए थे।
कमरे में एसी की हल्की गड़गड़ाहट थी, लेकिन वंदना के मन में जो शोर था, वह किसी तूफ़ान से कम नहीं था। आज उनका जन्मदिन था। सुबह से वह अपने फोन की काली स्क्रीन को बार-बार छूकर देख रही थीं कि शायद वह जगमगा उठे। शायद कोई एक कॉल आ जाए। शायद कोई मैसेज… “हैप्पी बर्थडे माँ”।
लेकिन शाम के पांच बज चुके थे। फोन खामोश था। बिल्कुल वैसे ही, जैसे पिछले तीन सालों से उनकी जिंदगी खामोश थी।
वंदना ने कांपते हाथों से एल्बम खोला। पहली ही तस्वीर उनकी शादी की थी। लाल जोड़े में सजी वह कितनी सुंदर लग रही थीं। और उनके बगल में खड़ी थीं उनकी सासु माँ—कौशल्या देवी। चेहरे पर एक सौम्य मुस्कान, आँखों में वात्सल्य और हाथों में शगुन की थाली।
वंदना की उंगलियां उस तस्वीर पर ठहर गईं। एक अजीब सी सिहरन उनके शरीर में दौड़ गई। अतीत का एक दरवाजा, जिसे उन्होंने बरसों से बंद कर रखा था, आज इस बारिश की आवाज़ के साथ चरमराकर खुल गया।
उन्हें याद आया वो दिन, जब वह ब्याह कर ‘हवेली’ में गई थीं। बनारस के उस पुराने रईस खानदान में कौशल्या देवी का रूतबा था, लेकिन स्वभाव से वह इतनी सरल थीं कि वंदना को कभी सास वाली सख्ती महसूस ही नहीं हुई।
“अरे वंदना बिटिया, तू क्यों रसोई में आई? अभी तो तेरे हाथों की मेहंदी भी नहीं छूटी है। जा, आराम कर। मैं हूँ न,” कौशल्या जी अक्सर यही कहती थीं।
वंदना एमबीए पास थी, शहर की पढ़ी-लिखी और महत्वकांक्षी। उसे बनारस की वो पुरानी गलियां और संयुक्त परिवार का वो ताना-बाना रास नहीं आता था। उसे लगता था कि सास का प्यार दरअसल एक ‘जाल’ है, जो उसे उस पुराने घर में बांधे रखने के लिए बुना गया है। कौशल्या जी जब भी उसे कोई भारी बनारसी साड़ी या पुराने ज़माने का भारी-भरकम हार देतीं, तो वंदना मुस्कुरा कर ले तो लेती, लेकिन कमरे में जाकर पति, आलोक से कहती—
“आलोक, ये सब क्या है? मैं ये पुराने गहने पहनकर पार्टी में जाऊंगी? लोग क्या कहेंगे? तुम्हारी माँ को समझ नहीं आता कि जमाना बदल गया है। मुझे मॉडर्न डायमंड ज्वैलरी चाहिए, ये पीला सोना नहीं।”
आलोक समझाता, “वंदना, ये माँ का प्यार है। ये खानदानी निशानी है।”
“प्यार नहीं, कंट्रोल करने का तरीका है,” वंदना चिढ़कर कहती। “वो चाहती हैं मैं उनकी तरह पुरानी बनकर रहूँ। मुझे घुटन होती है इस घर में आलोक। हमें मुंबई शिफ्ट होना चाहिए। वहाँ तुम्हारे करियर के लिए भी अच्छा है और मेरी आज़ादी के लिए भी।”
धीरे-धीरे वंदना ने आलोक के कान भरने शुरू किए। शुरुआत में आलोक नहीं माना, लेकिन वंदना की ज़िद और रोज़-रोज़ के क्लेश ने उसे झुका दिया।
वह दिन वंदना की यादों में आज भी कांटे की तरह चुभता है।
दीवाली की रात थी। पूरा घर दीयों से रोशन था। कौशल्या जी ने बड़े चाव से गाजर का हलवा बनाया था। वंदना ने उसी रात अपना ‘बम’ फोड़ा।
“माँजी, आलोक का ट्रांसफर मुंबई हो गया है,” वंदना ने झूठ बोला था, जबकि ट्रांसफर आलोक ने खुद माँगा था। “हमें अगले हफ्ते निकलना होगा।”
कौशल्या जी का चेहरा उतर गया था, लेकिन उन्होंने खुद को संभाला। “कोई बात नहीं बिटिया, तरक्की के लिए जाना तो पड़ता ही है। तुम लोग जाओ, बस त्यौहारों पर आते रहना।”
लेकिन वंदना का प्लान सिर्फ जाने का नहीं था। उसका प्लान था इस ‘बोझ’ को हमेशा के लिए पीछे छोड़ने का।
“माँजी,” वंदना ने अपनी अगली चाल चली थी, “मुंबई में फ्लैट बहुत छोटे होते हैं। और हम दोनों नौकरी करेंगे। आप वहाँ अकेले कमरे में बंद होकर रह जाएंगी। यहाँ आपकी सहेलियाँ हैं, मंदिर है, पुरानी नौकरानी बिमला है। आप यहीं ठीक रहेंगी। हम हर महीने पैसे भेज देंगे।”
कौशल्या जी की आँखों में एक पल के लिए पानी आया था, पर उन्होंने उसे गिरने नहीं दिया। उन्होंने अपने बेटे की तरफ देखा, जो नज़रें चुराकर ज़मीन देख रहा था। एक माँ सब समझ गई थी। बेटा अब उसका नहीं रहा, वह अब अपनी पत्नी की परछाई बन चुका था।
“ठीक है बहू,” कौशल्या जी ने भारी आवाज़ में कहा था। “तुम लोग खुश रहो। मुझे मेरी चिंता नहीं है।”
जाते वक्त वंदना ने एक और खेल खेला। उसने कौशल्या जी से कहा, “माँजी, घर में अकेले आप रहेंगी, ज़माना खराब है। चोरी-चकारी का डर है। आप अपने सारे भारी गहने और हवेली के कागज़ात मुझे दे दीजिये। मैं उन्हें मुंबई के बैंक लॉकर में सुरक्षित रख दूंगी।”
भोली कौशल्या जी ने बिना एक सवाल किए अपनी पूरी जिंदगी की जमा-पूंजी, अपनी सास की दी हुई निशानियां, सब कुछ वंदना के हवाले कर दिया। वंदना को आज भी याद है वो जीत की मुस्कान जो उसके चेहरे पर आई थी जब वह गहनों की पोटली लेकर कार में बैठी थी। पीछे मुड़कर उसने देखा था—कौशल्या जी मुख्य द्वार पर खड़ी थीं, अकेली, निहत्थी और खाली हाथ।
मुंबई जाकर वंदना ने कभी पलटकर नहीं देखा। फोन भी आलोक ही करता था, वंदना हमेशा “बिजी हूँ” का बहाना बना देती। दो साल बाद कौशल्या जी की नींद में ही मृत्यु हो गई। वंदना को खबर मिली तो उसे दुख नहीं, बल्कि एक अजीब सी ‘राहत’ महसूस हुई। हवेली अब उनकी थी, गहने उनके थे, और कोई रॉक-टोक करने वाला नहीं था।
वंदना ने हवेली बेच दी। उस पैसे से मुंबई में एक आलीशान पेंटहाउस लिया। आलोक अक्सर माँ को याद करके उदास रहता, लेकिन वंदना उसे अपनी ‘प्रैक्टिकल’ बातों से चुप करा देती।
समय का पहिया घूमा। वंदना का बेटा, कबीर, बड़ा हुआ। कबीर बिल्कुल वंदना पर गया था—स्मार्ट, प्रैक्टिकल और महत्वकांक्षी। वंदना ने उसे लाड़-प्यार से पाला, उसे विदेश भेजा, उसकी हर ज़िद पूरी की। आलोक के गुज़रने के बाद वंदना की पूरी दुनिया कबीर ही था।
फिर कबीर की ज़िंदगी में आई—श्रेया।
श्रेया एक कॉर्पोरेट लॉयर थी। तेज-तर्रार और बेहद खूबसूरत। वंदना को लगा था कि श्रेया उसकी परछाई है, उसे समझने वाली बहू मिलेगी। लेकिन वह भूल गई थी कि परछाई कभी किसी की सगी नहीं होती, वह अंधेरा होते ही साथ छोड़ देती है।
शादी के बाद कबीर और श्रेया वंदना के साथ उसी पेंटहाउस में रहने लगे। शुरुआत के कुछ महीने ठीक बीते। लेकिन फिर इतिहास खुद को दोहराने लगा।
श्रेया को वंदना का हर काम में दखल देना बुरा लगने लगा। अगर वंदना किचन में जाकर कहतीं, “श्रेया, कबीर को खाने में कम तेल पसंद है,” तो श्रेया रूखेपन से जवाब देती, “मॉम, कबीर अब बच्चा नहीं है, और हम डाइट कॉन्शियस हैं। आप प्लीज़ हमें स्पेस दीजिये।”
वंदना को झटका लगता। उसने तो हमेशा सोचा था कि वह इस घर की मालकिन है।
धीरे-धीरे श्रेया ने कबीर को पट्टी पढ़ानी शुरू की।
“कबीर, मॉम को भूलने की बीमारी हो रही है। कल उन्होंने गैस खुली छोड़ दी थी। अगर कोई हादसा हो जाता तो?” (जबकि गैस श्रेया ने ही जल्दी में खुली छोड़ी थी)।
“कबीर, हमारे फ्रेंड्स घर आते हैं तो मॉम का ड्राइंग रूम में बैठे रहना ऑकवर्ड लगता है। हमारी कोई प्राइवेसी नहीं है।”
वंदना को अपनी ही जवानी के शब्द, अपनी बहू के मुंह से, किसी श्राप की तरह सुनाई देने लगे।
और फिर आया वह काला दिन। ठीक वैसा ही दिन, जैसा वंदना ने कौशल्या जी को दिखाया था।
कबीर वंदना के पास आया। उसके हाथ में कुछ कागज़ात थे।
“मॉम,” कबीर ने कहा, “मेरा बिजनेस एक्सपैंड हो रहा है। मुझे लंदन शिफ्ट होना पड़ेगा। श्रेया भी वहां अपनी फर्म ज्वाइन कर रही है।”
वंदना खुश हो गई। “अरे वाह! तो चलो, मैं भी पैकिंग शुरू करती हूँ। लंदन तो मैंने कभी देखा नहीं।”
कबीर और श्रेया ने एक-दूसरे को देखा। श्रेया ने बात आगे बढ़ाई।
“मॉम, वीज़ा और इमिग्रेशन के रूल्स बहुत सख्त हैं। और वहां का मौसम आपके आर्थराइटिस (गठिया) के लिए बिल्कुल ठीक नहीं है। वहां मेडिकल हेल्प भी बहुत महंगी है। आप वहां एडजस्ट नहीं कर पाएंगी।”
वंदना का दिल धक से रह गया। “तो? तो क्या तुम मुझे यहाँ अकेला छोड़ जाओगे?”
“अकेला नहीं मॉम,” कबीर ने जल्दी से कहा। “हमने आपके लिए ‘शांति निकेतन’ में बात की है। वह शहर का बेस्ट असिस्टेड लिविंग होम है। वहां आपके उम्र के लोग हैं, डॉक्टर्स हैं, योगा क्लास है। आप वहां बोर नहीं होंगी। और यह पेंटहाउस… इसे हमें बेचना होगा ताकि हम लंदन में सेटल हो सकें।”
वंदना को लगा जैसे किसी ने उसे जोरदार तमाचा मारा हो।
“तुम… तुम मुझे घर से निकाल रहे हो? इस घर से जिसे मैंने तुम्हारे पापा के साथ मिलकर बनाया था?” वंदना चीख पड़ी। “और कबीर, मैंने तेरे लिए क्या नहीं किया? अपनी जवानी, अपना पैसा, अपना समय सब तुझ पर वार दिया। और आज तू…”
“मॉम, प्लीज़ इमोशनल ड्रामा मत कीजिये,” श्रेया ने सख्त आवाज़ में कहा। “हम प्रैक्टिकल बात कर रहे हैं। आप यहाँ इस बड़े घर में अकेली कैसे रहेंगी? और प्रॉपर्टी के पेपर्स पर आपके साइन चाहिए। कबीर आपका लीगल गार्जियन बनेगा ताकि आपके फाइनेंस मैनेज कर सके।”
वंदना ने कबीर की आँखों में देखा। उसे उम्मीद थी कि उसका बेटा उसे रोकेगा, कहेगा कि ‘मॉम, मैं तुम्हें नहीं छोड़ सकता’। लेकिन कबीर की आँखों में सिर्फ बेबसी और पत्नी का डर था।
“साइन कर दीजिये मॉम,” कबीर ने बस इतना कहा। “यह हम सबके भले के लिए है।”
उस रात वंदना ने साइन कर दिए। ठीक वैसे ही जैसे कौशल्या जी ने गहनों की पोटली उसे थमाई थी। नियति ने अपना हिसाब बराबर कर लिया था। जिस बेटे को पाने के लिए उसने अपनी सास को घर से निकाला था, आज उसी बेटे ने पत्नी के कहने पर उसे बेघर कर दिया था।
वृद्धाश्रम के इस कमरे में आज तीन साल हो गए थे।
एल्बम के पन्ने पलटते हुए वंदना की नज़र आखिरी तस्वीर पर गई। यह तस्वीर उसने यहाँ आने से एक दिन पहले ली थी। खाली घर, पैक किए हुए बॉक्स, और दीवार पर टंगी आलोक की तस्वीर।
तभी दरवाजे पर आहट हुई। वंदना का दिल ज़ोर से धड़का। क्या कबीर आया है? क्या उसे याद आया कि आज माँ का जन्मदिन है?
उसने जल्दी से व्हीलचेयर घुमाई।
दरवाजे पर आश्रम की वार्डन, मिसेज डिसूजा खड़ी थीं। उनके हाथ में एक छोटा सा कप केक था जिस पर एक मोमबत्ती जली थी।
“हैप्पी बर्थडे वंदना जी,” मिसेज डिसूजा ने मुस्कुराते हुए कहा। “आपका बेटा तो नहीं आया, पर हम तो हैं।”
वंदना की आँखों से आंसुओं का सैलाब फूट पड़ा। वह आठ-आठ आंसू रोने लगीं। यह आंसू दुख के नहीं, पश्चाताप के थे।
मिसेज डिसूजा ने घबराकर केक मेज पर रखा और वंदना का हाथ थाम लिया। “क्या हुआ वंदना जी? आप इतना क्यों रो रही हैं?”
वंदना ने सिसकते हुए अपनी साड़ी के पल्लू से एक पुरानी, छोटी सी चांदी की डिब्बी निकाली जो वह हमेशा अपने पास रखती थीं।
“यह देख रही हो डिसूजा?” वंदना ने डिब्बी खोली। उसमें एक सोने का कंगन था। वही कंगन जो कौशल्या जी ने उसे पहली बार दिया था।
“मैंने पूरी जायदाद हड़प ली, गहने ले लिए, हवेली बेच दी। लेकिन जब कबीर ने मुझे घर से निकाला, तो मैं अपने साथ सिर्फ यही एक कंगन छिपाकर ला पाई। यह मेरी सास का है।”
वंदना ने वह कंगन अपनी छाती से लगा लिया।
“मैं आज अपने बेटे के लिए नहीं रो रही डिसूजा। मैं अपनी सास के लिए रो रही हूँ। आज मुझे समझ आ रहा है कि उस रात दीवाली पर उन्हें कैसा लगा होगा। आज मुझे उस ‘सन्नाटे’ की आवाज़ सुनाई दे रही है जो मैंने उनकी ज़िंदगी में भर दिया था। यह कबीर… यह कबीर तो बस एक जरिया है। यह मेरे कर्म हैं जो लौटकर आए हैं। मैंने जो बोया, वही तो काट रही हूँ।”
वंदना ने खिड़की की तरफ देखा। बारिश अब थम चुकी थी।
“मैं उन्हें गांव भेजकर खुश थी कि ‘बुढ़िया से जान छूटी’। और आज मेरी बहू ने मुझे यहाँ भेज दिया कि ‘बुढ़िया से जान छूटी’। फर्क बस इतना है कि मेरी सास ने मुझे कभी बद्दुआ नहीं दी थी। उन्होंने जाते-जाते भी मुझे आशीर्वाद दिया था। और मैं… मैं चाहकर भी अपने बेटे को बद्दुआ नहीं दे पा रही। शायद यही एक माँ की सजा है और यही उसकी ताकत।”
मिसेज डिसूजा ने वंदना के आंसू पोंछे। “वंदना जी, ईश्वर न्याय करता है, लेकिन वह माफ़ भी करता है। अगर आप सच्चे दिल से पछता रही हैं, तो शायद आपकी सास ने आपको माफ़ कर दिया होगा।”
वंदना ने कांपते हाथों से वह कंगन अपनी कलाई में पहनने की कोशिश की। कलाई अब पतली हो चुकी थी, कंगन ढीला था।
“जानती हो डिसूजा,” वंदना ने फीकी मुस्कान के साथ कहा, “जायदाद के कागज़, बैंक बैलेंस, आलीशान घर… सब यहीं रह गए। कबीर ने सब ले लिया। लेकिन यह कंगन, जो प्रेम की निशानी था, जिसे मैंने कभी अहमियत नहीं दी, अंत में यही मेरे साथ है। इंसान पूरी ज़िंदगी ईंट-पत्थर जोड़ने में लगा देता है, और भूल जाता है कि जिस नींव पर (बुजुर्गों पर) वह खड़ा है, अगर उसे ही खोखला कर दिया, तो छत तो गिरेगी ही।”
उस रात वंदना ने केक काटा। अकेले। लेकिन उसे आज अकेलापन नहीं लग रहा था। उसे महसूस हो रहा था कि कोने वाली कुर्सी पर कौशल्या जी बैठी हैं, मुस्कुरा रही हैं और कह रही हैं, “कोई बात नहीं बहू, सब ठीक हो जाएगा।”
वंदना ने आँखें बंद कीं और मन ही मन कहा, “माफ़ कर दीजियेगा माँजी। आपकी बहू हार गई, लेकिन आपकी ममता जीत गई।”
बाहर आसमान साफ़ हो चुका था। एक तारा खिड़की से झांक रहा था, बिल्कुल वैसा ही जैसा कौशल्या जी की आँखों में चमकता आशीर्वाद था। वंदना को आज पहली बार, इस वृद्धाश्रम के छोटे से कमरे में, अपने आलीशान पेंटहाउस से ज़्यादा सुकून महसूस हो रहा था। क्योंकि आज, पश्चाताप के आंसुओं ने उनकी आत्मा को धोकर साफ़ कर दिया था।
मूल लेखिका : करुणा मलिक