विनय की आवाज़ में खीझ साफ़ झलक रही थी। उसने हाथ में पकड़ी हुई कलाई घड़ी को झुंझलाहट के साथ टेबल पर पटका। “सृष्टि! अब हद हो रही है।
पिछले बीस मिनट से मैं मोज़े ढूंढ रहा हूँ और तुम हो कि उस ‘महारथी’ को दलिया खिलाने में व्यस्त हो। मेरी मीटिंग है आज, तुम्हें ज़रा भी अंदाज़ा है?”
रसोई से सटी डाइनिंग टेबल पर बैठी सृष्टि ने एक पल के लिए विनय की ओर देखा, फिर वापस अपने तेइस वर्षीय भाई, ‘गुड्डू’ की ओर मुड़ गई,
जो एक पाँच साल के बच्चे की तरह मुंह बनाकर दलिया खाने से मना कर रहा था। गुड्डू का शरीर तो एक वयस्क का था, लेकिन मानसिक विकास बचपन में ही ठहर गया था। सृष्टि के माता-पिता के गुज़रने के बाद, गुड्डू की पूरी दुनिया सृष्टि ही थी।
“विनय, मोज़े दूसरी दराज़ में धुले हुए रखे हैं। बस दो मिनट रुकिए, गुड्डू नाश्ता कर ले तो मैं आपका टिफिन पैक कर देती हूँ,” सृष्टि ने संयम बनाए रखते हुए कहा, हालांकि उसकी आवाज़ में थकान का कंपन था।
विनय बड़बड़ाते हुए बेडरूम की तरफ बढ़ा, “शादी मैंने तुमसे की थी सृष्टि, तुम्हारे पूरे खानदान का ठेका नहीं लिया था। सोचा था सुकून की ज़िंदगी होगी, हम दोनों होंगे, घूमना-फिरना होगा। यहाँ तो घर को ‘आश्रम’ बना रखा है। सुबह उठो तो गुड्डू, शाम को आओ तो गुड्डू। मेरी कोई जगह है भी या नहीं इस घर में?”
यह ताना सृष्टि के दिल पर किसी कोड़े की तरह लगा। उसने गुड्डू के मुंह से गिरा हुआ दलिया पोंछा। गुड्डू ने अपनी मासूम, अपलक आँखों से सृष्टि को देखा और टूटे-फूटे शब्दों में बोला, “दीदी… जीजू… गुस्सा?”
सृष्टि ने उसकी आँखों में आँसू छिपाते हुए मुस्कुराने की कोशिश की, “नहीं गुड्डू, जीजू को ऑफिस की जल्दी है। तुम खाओ।”
विनय और सृष्टि की शादी को तीन साल हो चुके थे। शादी से पहले विनय जानता था कि गुड्डू सृष्टि के साथ ही रहेगा, क्योंकि उसका और कोई नहीं था। उस वक्त विनय ने बड़े बड़प्पन से कहा था, “अरे, साला साहब तो हमारे भाई जैसे रहेंगे।” लेकिन कहना और निभाना दो अलग बातें थीं। वास्तविकता की खुरदरी ज़मीन पर विनय का धैर्य अब जवाब दे रहा था। उसे गुड्डू की हर हरकत से चिढ़ होने लगी थी—उसका ज़ोर से हंसना, चीजों को गिरा देना, या रात-बेरात डरकर सृष्टि के पास आ जाना।
उस शाम विनय ऑफिस से लौटा तो उसका मूड और भी खराब था। आज उसका प्रमोशन रुक गया था और बॉस ने उसे काफी सुनाया था। घर में घुसते ही उसने देखा कि गुड्डू ड्राइंग रूम में सोफे पर बैठा कार्टून देख रहा है और उसने मूंगफली के छिलके पूरे कालीन पर बिखेर रखे हैं।
विनय का सब्र का बांध टूट गया। उसने रिमोट उठाकर टीवी बंद किया और चिल्लाया, “सृष्टि! यह क्या तमाशा है? मैं दिन भर खटकर आऊं और यहाँ कूड़ाघर मिले? इसे तमीज़ नहीं सिखा सकती तुम?”
सृष्टि दौड़कर आई। “विनय, धीरे बोलिए, वो डर जाएगा। मैं अभी साफ़ कर देती हूँ।”
“साफ़ कर देती हूँ… साफ़ कर देती हूँ!” विनय ने अपना बैग सोफे पर फेंका। “कब तक साफ़ करती रहोगी? और मैं कब तक बर्दाश्त करूँगा? मेरी ज़िंदगी नर्क बन गई है। दोस्तों को घर बुलाने में शर्म आती है कि कहीं यह बीच में आकर कोई हरकत न कर दे। हम न कहीं बाहर जा पाते हैं, न कोई प्राइवेसी है।”
गुड्डू सहम कर सोफे के कोने में दुबक गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि जीजू क्यों चिल्ला रहे हैं, पर उसे इतना पता था कि उसने कुछ गलत किया है।
सृष्टि की आँखों से आँसू बह निकले। “विनय, वो बीमार है, जानबूझकर नहीं करता। कहाँ ले जाऊँ इसे? माँ-पापा होते तो मैं आपके ऊपर बोझ नहीं डालती। पर अब इसके सिवा मेरा कौन है दुनिया में?”
“तो मेरा क्या कसूर है?” विनय ने निर्दयता से कहा। “सृष्टि, मुझे एक फैसला लेना होगा। मैंने एक ‘स्पेशल केयर होम’ (Special Care Home) के बारे में पता किया है। शहर के बाहर है, बहुत अच्छी सुविधाएं हैं। गुड्डू को वहाँ भेज देते हैं। हम हर हफ़्ते मिलने जाया करेंगे।”
सृष्टि सन्न रह गई। “आप… आप उसे घर से निकालने की बात कर रहे हैं? विनय, वो वहाँ मर जाएगा। वो मेरे बिना खाना भी नहीं खाता। वो कोई फालतू सामान नहीं है जिसे कबाड़ में फेंक दिया जाए।”
“और मैं? मैं भी तो घुट-घुट कर मर रहा हूँ,” विनय ने दो टूक फैसला सुनाया। “तुम्हें चुनना होगा सृष्टि। या तो गुड्डू उस केयर होम में जाएगा, या फिर मैं इस घर में नहीं रहूँगा। मुझे अपनी ज़िंदगी वापस चाहिए।”
रात भर घर में मातम जैसा सन्नाटा रहा। सृष्टि गुड्डू के सिरहाने बैठकर रोती रही। गुड्डू गहरी नींद में था, इस बात से बेखबर कि उसकी बहन की दुनिया उजड़ने वाली है।
अगले दिन रविवार था। विनय सुबह से ही घर से गायब हो गया, शायद अपने दोस्तों के पास। सृष्टि की तबीयत ठीक नहीं थी। तनाव और रोने की वजह से उसे तेज बुखार और सिरदर्द हो रहा था। उसने गुड्डू को नाश्ता दिया और खुद दवा लेकर बेडरूम में लेट गई। उसने सोचा कि थोड़ी देर आराम कर लेगी तो ठीक हो जाएगी।
लेकिन दोपहर होते-होते उसकी तबीयत बिगड़ गई। उसे चक्कर आने लगे और वह बिस्तर से उठ भी नहीं पा रही थी। घर में सिर्फ़ वह और गुड्डू थे।
गुड्डू ड्राइंग रूम में अपने खिलौनों से खेल रहा था। जब बहुत देर तक दीदी बाहर नहीं आई, तो उसे भूख लगी। वह धीरे-धीरे बेडरूम में गया।
“दीदी… भूख…” उसने बोला।
लेकिन सृष्टि ने कोई जवाब नहीं दिया। वह बेहोश हो चुकी थी। गुड्डू ने दीदी को हिलाया, “दीदी… उठो।” जब सृष्टि नहीं उठी, तो गुड्डू घबरा गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या करे। उसे याद आया कि जब उसे बुखार होता था, तो दीदी क्या करती थीं। दीदी उसके माथे पर गीला कपड़ा रखती थीं और ‘जीजू’ को फोन करती थीं।
गुड्डू का दिमाग तेजी से चलने लगा। वह दौड़कर रसोई में गया। उसे पता नहीं था कि पट्टी कैसे बनाते हैं। उसने एक नैपकिन उठाया और उसे पानी के मटके में डुबो दिया। पानी पूरे फर्श पर फैल गया, लेकिन उसने परवाह नहीं की। वह गीला कपड़ा लेकर आया और टेढ़े-मेढ़े तरीके से सृष्टि के माथे पर रख दिया।
फिर उसने साइड टेबल पर रखा सृष्टि का फोन उठाया। उसे नंबर मिलाना नहीं आता था। लेकिन सृष्टि ने उसे सिखाया था कि अगर कभी डर लगे तो ‘हरे रंग’ का बटन दबाकर फोटो पर उंगली रखना। सौभाग्य से विनय का नंबर स्पीड डायल पर सबसे ऊपर था।
विनय अपने दोस्त के घर बैठा अपनी भड़ास निकाल रहा था, तभी उसका फोन बजा। स्क्रीन पर ‘Wife’ फ़्लैश हो रहा था। उसने गुस्से में सोचा कि फ़ोन नहीं उठाएगा, फिर सोचा शायद मान गई होगी।
“हलो! क्या फैसला किया तुमने?” विनय ने रूखेपन से पूछा।
उधर से सृष्टि की नहीं, गुड्डू की रोती हुई और घबराई हुई आवाज़ आई। “जीजू… दीदी… सो गई… उठ नहीं रही… गरम है… जीजू आ जाओ… डर लग रहा…”
विनय का दिल धक से रह गया। गुड्डू कभी फोन नहीं करता। ज़रूर कुछ गंभीर बात है। “गुड्डू? दीदी को क्या हुआ? मैं अभी आ रहा हूँ।”
विनय बाइक दौड़ाते हुए घर पहुँचा। पंद्रह मिनट का रास्ता उसने पांच मिनट में तय किया। घर का मुख्य दरवाज़ा खुला था (शायद गुड्डू ने खोल दिया था)। वह सीधा बेडरूम की तरफ भागा।
वहाँ का नज़ारा देखकर उसके कदम ठिठक गए।
सृष्टि बिस्तर पर बेसुध पड़ी थी। उसका शरीर बुखार से तप रहा था। लेकिन जो चीज़ विनय को स्तब्ध कर गई, वह थी गुड्डू की हरकत। गुड्डू फर्श पर घुटनों के बल बैठा था। उसके हाथ में एक गिलास पानी था जिसे वह चम्मच से सृष्टि के सूखे होंठों पर लगाने की कोशिश कर रहा था। उसके खुद के कपड़े पानी से भीगे हुए थे। उसने शायद कई बार गीला कपड़ा सृष्टि के माथे पर रखा था, जिससे तकिया भीग गया था।
जैसे ही गुड्डू ने विनय को देखा, वह दौड़कर उसके पास आया और लिपट गया। “जीजू… दीदी को बचा लो… गुड्डू को भूख नहीं है… दीदी को ठीक कर दो।”
विनय ने तुरंत डॉक्टर को फोन किया और फिर गीले तौलिये से सृष्टि के माथे की पट्टियां बदलनी शुरू कीं। डॉक्टर ने आकर इंजेक्शन दिया और बताया कि यह सिर्फ़ तेज़ वायरल और थकान की वजह से है, घबराने की बात नहीं है।
अगले दो-तीन घंटे विनय सृष्टि के पास बैठा रहा। शाम ढल रही थी। गुड्डू कमरे के कोने में एक स्टूल पर बैठा एकटक दीदी को देख रहा था। उसने दोपहर से कुछ नहीं खाया था, लेकिन उसने एक बार भी खाने की ज़िद्द नहीं की।
विनय ने देखा कि गुड्डू की आँखों में वही चिंता थी जो किसी समझदार इंसान में होती। वह बार-बार उठकर आता, सृष्टि के पैर छूता और फिर वापस बैठ जाता।
विनय के मन में एक अजीब सी उथल-पुथल चल रही थी। उसने हमेशा गुड्डू को एक ‘बोझ’, एक ‘मानसिक रोगी’ समझा था। लेकिन आज उसी ‘पागल’ लड़के ने वह किया जो शायद एक समझदार इंसान भी हड़बड़ाहट में न कर पाता। अगर गुड्डू ने फोन न किया होता, या पानी की पट्टी न रखी होती, तो सृष्टि की हालत और बिगड़ सकती थी।
“जीजू…” गुड्डू ने धीरे से पुकारा।
विनय ने उसकी ओर देखा।
“दीदी ठीक हो जाएगी ना? फिर गुड्डू को आश्रम भेज देना। दीदी रो रही थी रात को। गुड्डू गंदा है ना? जीजू को परेशान करता है।”
विनय को लगा जैसे किसी ने उसके गाल पर तमाचा मार दिया हो। इस मासूम दिमाग ने बीती रात की बातें सुन ली थीं और अपने तरीके से समझ भी ली थीं। उसे पता था कि वह ‘समस्या’ है।
विनय की आँखों में आँसू भर आए। वह उठा और गुड्डू के पास गया। उसने उस बड़े शरीर वाले बच्चे को गले लगा लिया। गुड्डू का शरीर डर से कड़ा हो गया, उसे लगा जीजू मारेंगे।
“नहीं गुड्डू,” विनय का गला भर आया। “तुम गंदे नहीं हो। तुम तो हीरो हो। तुमने दीदी को बचाया है। तुम कहीं नहीं जाओगे। यहीं रहोगे, दीदी और जीजू के पास।”
गुड्डू ने अविश्वास से विनय को देखा, फिर धीरे से उसके कंधे पर सिर रख दिया।
रात को जब सृष्टि को होश आया, तो उसने देखा कि विनय उसके सिरहाने बैठा है और गुड्डू उसके पैरों के पास सो गया है। विनय की आँखों में वह गुस्सा नदारद था जो कल रात था।
“विनय…” सृष्टि ने कमज़ोर आवाज़ में पुकारा।
विनय ने उसके होंठों पर उंगली रखकर उसे चुप कराया। “कुछ मत बोलो सृष्टि। मुझे माफ़ कर दो। मैं अपनी स्वार्थ और सुविधा की पट्टी आँखों पर बांधे हुए था। मैं भूल गया था कि रिश्तों की अहमियत दिमागी समझ से नहीं, दिल के अहसास से होती है। तुम्हारा भाई… वो मुझसे ज़्यादा समझदार है, क्योंकि उसे प्यार करना आता है, निस्वार्थ प्यार।”
सृष्टि की आँखों से आंसू बह निकले।
“मैंने वो केयर होम का ब्रोशर फाड़ दिया है,” विनय ने मुस्कुराते हुए कहा। “अब हमें थोड़ा एडजस्ट करना होगा। मैं कोशिश करूँगा कि गुड्डू के साथ दोस्त बन सकूं। आखिर, जब मेरा एक्सीडेंट होगा या मैं बूढ़ा हो जाऊंगा, तो मुझे भी तो किसी के सहारे की ज़रूरत पड़ेगी। आज इसने साबित कर दिया कि यह सिर्फ़ लेना नहीं, देना भी जानता है।”
सृष्टि ने पास सोए गुड्डू के बालों में हाथ फेरा। वह जानती थी कि राह अभी भी आसान नहीं होगी। गुड्डू की ज़िम्मेदारी बड़ी है और चुनौतियाँ रोज आएँगी। लेकिन आज उसे यकीन हो गया था कि अब वह अकेली नहीं है। विनय अब सिर्फ़ उसका पति नहीं, बल्कि गुड्डू का भी ‘जीजू’ बन गया था—सच्चे अर्थों में।
उस रात घर में कोई शोर-शराबा नहीं था, लेकिन एक सुकून था। विनय ने सीखा कि परिवार पैकेज में आता है—उसमें सिर्फ़ खुशियाँ ही नहीं, जिम्मेदारियाँ भी होती हैं। और कभी-कभी, जिसे हम पत्थर समझते हैं, वह मुसीबत के वक्त पारस पत्थर साबित होता है।
निष्कर्ष:
जीवन में हम अक्सर लोगों को उनकी उपयोगिता (utility) के तराजू में तोलते हैं। जो हमारे काम का नहीं, वह बोझ लगता है। लेकिन मानवीय संवेदनाएं गणित के सवालों से परे होती हैं। एक ‘विशेष’ (special) व्यक्ति शायद दुनिया की दौड़ में पीछे रह जाए, लेकिन भावनाओं की दौड़ में वह अक्सर हम ‘समझदार’ लोगों को पीछे छोड़ जाता है। विनय की कहानी हमें सिखाती है कि प्यार में धैर्य सबसे बड़ी पूंजी है।
लेखिका : गरिमा चौधरी