“मम्मी, ये भी कोई बात हुई? हर बार विवेक की तरफ़ से हम ही खड़े हों, तो वो कब जिम्मेदार बनेगा?”
सान्या ने रसोई के दरवाज़े पर खड़ी-खड़ी आवाज़ थोड़ी धीमी, लेकिन साफ़ रखी।
शांता देवी ने बर्तन में दाल चलाते हुए माथे पर पल्लू टिकाया,
“अरे बहू, तू हर वक्त हिसाब ही करती रहती है। छोटा भाई है तुम्हारे पति का, उसका भी तो हक़ है इस घर पर। दो महीने से उसकी कंपनी में सैलरी ही टाइम से नहीं आ रही, अब अगर तू लोग ही नहीं संभालोगे तो कौन संभालेगा?”
सान्या ने घड़ी की तरफ़ देखा, बैंक जाने के लिए आधा घंटा भी नहीं बचा था, फिर भी बात अंदर ही अंदर चुभ रही थी।
“मम्मी, संभालने से मुझे कोई दिक्कत नहीं, पर आप भी सोचिए ना… पिछले तीन महीने से बिजली का बिल, राशन, बच्चों की फ़ीस… सब कुछ हम ही भर रहे हैं। विवेक भैया की शादी को भी दो साल हो गए, कब तक हम पर ही सब छोड़ा जाएगा?”
तभी पीछे से राघव की आवाज़ आई,
“क्या हुआ? सुबह-सुबह फिर वही बात?”
“तुम ही बताओ इसे,” शांता देवी ने तुरंत मोर्चा उसके सामने खोल दिया, “तेरी कमाई अच्छी है तो क्या हुआ, तुम लोग हमेशा पैसों का रोना रोते रहते हो। देख मोना को, कितनी इज्ज़त करती है अपने पति की कम कमाई की, कभी मुँह नहीं खोलती।”
राघव ने हल्की-सी थकी मुस्कान के साथ पूछा,
“मम्मी, मैंने अभी कुछ बोला भी नहीं और आप मोना को बीच में ले आईं। बात ये है कि पिछले महीने से विवेक ने घर के खर्च में एक रुपया तक नहीं दिया। आपने कहा था कि उसकी सैलरी रुकी है, हमने पूछा भी नहीं। लेकिन कल शाम उसे नया फोन लेते हुए मैंने खुद देखा है। अगर फोन के लिए पैसे आ सकते हैं, तो महीने के पाँच हज़ार घर के लिए भी दे सकता है ना?”
शांता देवी थोड़ी चौंकी,
“नया फोन? कब लिया उसने?”
“कल ही,” सान्या बीच में बोली, “सब्ज़ी लेने मैं और वो साथ गए थे, वहीं से शोरूम में घुसकर ले आया। और मुझसे साफ-साफ बोल दिया कि ‘दीदी, अब तो सब काम ऑनलाइन ही होते हैं, पुराना फोन तो बार-बार हैंग होता था।'”
“तो हो गया गुनाह?” रसोई से ही मोना की धीमी-सी, लेकिन तिक्त आवाज़ आई, जो अब तक चुपचाप आटा गूँध रही थी,
“आप लोगों की लाइफ़ में तो सब ज़रूरी खर्चे हैं — बच्चों की कोचिंग, इंग्लिश मीडियम स्कूल, कार की किस्त… और अगर विवेक ने अपने लिए एक फोन ले लिया तो ऐसा लग रहा जैसे दुनिया लुट गई।”
सान्या ने पलटकर देखा, “मोना, बात फोन की नहीं है, बात ये है कि घर चलाना सिर्फ़ हम दोनों का काम नहीं है। तुम्हारे पति भी इस घर के बराबर जिम्मेदार हैं। मम्मी हर बार हमें ही आगे कर देती हैं, और विवेक ये समझता है कि चाहे कुछ भी हो जाए, जिम्मेदारी से बचा जा सकता है।”
मोना आँखें न फेर सकी, पर होंठ कसकर चुप हो गई।
शाम को दफ्तर से लौटकर हरिशंकर जी जब सोफ़े पर बैठे, तो चेहरों की तंगी उनके अनुभव से छिपी नहीं रह सकी।
“लगता है आज फिर गर्मी ज़्यादा थी… या घर के अन्दर ही तापमान बढ़ा है?” उन्होंने हँसते हुए कहा।
किसी ने कुछ जवाब नहीं दिया। टीवी की आवाज़ तेज़ कर दी गई।
रात को खाना खाकर सब अपने-अपने कमरों में चले गए। राघव अपने कमरे में आया तो देखा, सान्या लैपटॉप खोले बैठी है, सामने एक्सेल शीट खुली है।
“क्या कर रही हो?” उसने पूछा।
“हिसाब,” सान्या ने बिना ऊपर देखे जवाब दिया, “ये देखो… पिछले छह महीने का। हमारी तनख्वाह का पैंतालीस प्रतिशत घर के साझा खर्चे में जा रहा है — मम्मी-पापा, गैस, बिजली, किराना, बाकी सब। बच्चों की पढ़ाई और हमारी कार की ईएमआई अलग। बचत लगभग शून्य।”
राघव ने कुर्सी खींचकर उसके पास बैठते हुए कहा,
“सच कहूं, मैं खुद भी महसूस कर रहा हूँ कि बात हाथ से निकल रही है। मम्मी से जितना भी समझाता हूँ, उन्हें लगता है मैं छोटा भाई-भाभी से दुश्मनी निकाल रहा हूँ।”
सान्या ने पहली बार आँखों में भर आए पानी को नहीं छिपाया,
“राघव, मैं थक गई हूँ… सुबह स्कूल, फिर बैंक, घर आकर बच्चों की पढ़ाई, शाम को खाना, मम्मी का तंज, देवर जी की टेढी बातें… मैं कोई ईंट-पत्थर नहीं हूँ। मेरे भी सपने थे, कुछ अपने लिए, बच्चों के लिए। हर समय ये डर कि महीने के आख़िर में अकाउंट मिनिमम बैलेंस से नीचे न चला जाए। किसके लिए कर रहे हैं हम ये सब?”
राघव ने गहरी सांस ली,
“तो तुम्हारे हिसाब से अब क्या करना चाहिए?”
“साफ़-साफ़ कहूँ?” सान्या ने लैपटॉप बंद करते हुए कहा,
“हमें अलग हो जाना चाहिए। लड़ाई करके नहीं, पर सिस्टम बदलना होगा। जब तक सब को पता रहेगा कि ‘राघव है ना’, कोई अपनी ज़िम्मेदारी नहीं समझेगा। तुम वैसे ही ऑफिस से प्रेशर में रहते हो। यहाँ आकर भी वही दबाव… ये सही नहीं है।”
“तुम चाहती हो कि मैं यहाँ से ट्रांसफर ले लूँ?”
“शहर बदलना ज़रूरी नहीं,” सान्या ने धीरे से कहा, “पर घर अलग होना ज़रूरी है। चाहे पास में ही किराये का फ्लैट ले लो या कंपनी से क्वार्टर मिल जाए तो और अच्छा। मम्मी-पापा की देखभाल का मतलब ये नहीं कि पूरी उम्र हम उनके साथ ही दीवारें साझा करें। ये भी तो हो सकता है कि हम पास रहें, लेकिन खर्चे और जिम्मेदारी साफ बँटे रहें।”
राघव कुछ देर तक छत घूरता रहा।
“अगर मैं फ्लैट लेकर अलग हो गया तो मम्मी मुझे गुनहगार मान लेंगी। ‘देखो, बड़ा बेटा तो माँ को अकेला छोड़कर भाग गया’, ये डायलॉग सालों तक सुनना पड़ेगा।”
सान्या ने हल्का-सा मुस्कुरा कर कहा,
“भागने और सीमा खींचने में फर्क होता है, राघव। तू आज जो सहन कर रहा है न, तुम्हारे बच्चे कल यही सीखेंगे — कि जिम्मेदार इंसान का मतलब है सब कुछ अपने ऊपर ले लेना, दूसरों को बिगड़ने देना। मैं नहीं चाहती कि मेरा बेटा–बेटी कल ऐसे रिश्ते बनाए जहाँ वो खुद ही खो जाएँ।”
उस रात दोनों पति-पत्नी बहुत देर तक बातें करते रहे। आख़िरकार राघव ने तय कर लिया कि कॉर्पोरेट ऑफिस में ट्रांसफर की रिक्वेस्ट डाल देगा — शहर वही रहेगा, पर कंपनी के नए हाउसिंग प्रोजेक्ट में उसे क्वार्टर मिल सकता है।
दो हफ्ते बाद, ऑफिस से लेटर आ गया — छह महीने के लिए प्रोजेक्ट साइट पर पोस्टिंग और साथ में कंपनी की ओर से दिया जाने वाला फ्लैट।
राघव ने लेटर देखा, कई मिनट तक चुप बैठा रहा। शाम को सबके खाने के बाद उसने बैठक में आकर आवाज़ लगाई,
“मम्मी, पापा, एक बात करनी थी। सब बैठिए, मोना तुम भी आओ।”
शांता देवी को लगा शायद फिर पैसे का कोई रोना होगा, उन्होंने पहले से ही चेहरा कड़ा कर लिया,
“अब क्या हुआ?”
राघव ने कागज़ आगे बढ़ाया,
“मेरा कंपनी से ट्रांसफर हो गया है, उसी शहर के दूसरे प्रोजेक्ट पर। कंपनी ने फ्लैट भी दिया है। अगले महीने के अंत तक मुझे वहाँ शिफ्ट होना पड़ेगा।”
“क्या?!” शांता देवी लगभग फट पड़ीं,
“तूने दरखास्त ही क्यों दी? तुझे ज़रा भी हम बुज़ुर्गों की चिंता नहीं हुई? ये घर, ये मोहल्ला… सब छोड़कर चला जाएगा?”
“मम्मी, शहर तो यही रहेगा। बस जगह बदल जाएगी,” राघव ने शांत स्वर में कहा, “और आप लोग चाहें तो कभी भी हमारे पास आ सकती हैं। डॉक्टर, बाज़ार, सब नजदीक होंगे। राहुल और रिद्धि के स्कूल भी वहीं शिफ्ट हो जाएँगे, उनके लिए भी अच्छा रहेगा।”
“और हम?” शांता देवी की आँखों में आँसू भर आए, “तू सोचता है तेरे बिना इस घर में चूल्हा जलेगा? तेरा छोटा भाई क्या कमाता है, तुझे तो पता ही है।”
सन्नाटा फैल गया। सबकी नज़रें विवेक पर टिक गईं, जो अब तक मोबाइल में स्क्रॉल कर रहा था, अब थोड़ा असहज होकर सीधा बैठ गया।
हरिशंकर जी ने पहली बार धीमी लेकिन मज़बूत आवाज़ में कहा,
“शांता, बस भी करो। ये कब तक चलेगा? राघव की भी तो जिंदगी है। वह भी दो बच्चों का पिता है। तुमने ही हमेशा कहा है कि दोनों बेटों को बराबर मानती हो। तो फिर ज़िम्मेदारी भी बराबर बाँटो।”
“पर उसकी तनख्वाह…”
“तनख्वाह से ज़्यादा उसकी नीयत कम है,” हरिशंकर जी ने कठोरता से कहा, “मैं खुद देखता हूँ, शाम पाँच बजे ऑफिस से आता है तो आधी रात तक गली के नुक्कड़ पर दोस्तों के साथ बैठा रहता है। अब वक़्त आ गया है कि वह भी आदमी बनना सीखे।”
विवेक यह सुनकर तिलमिला गया,
“तो आपने पहले कभी बोला क्यों नहीं, पापा? अब भैया को बाहर निकालकर ही सबक सिखाएँगे?”
राघव ने शांत स्वर में कहा,
“कोई किसी को बाहर नहीं निकाल रहा। मैं कंपनी की पोस्टिंग के कारण जा रहा हूँ। अगर मैं यहाँ भी रहता, तब भी एक दिन तो आपको स्टैंड लेना ही पड़ता, विवेक। और हाँ, मैं भाग नहीं रहा। महीने का कुछ हिस्सा हमेशा की तरह मम्मी-पापा की दवा–इत्यादि के लिए भेजता रहूँगा। लेकिन घर की रोज़मर्रा की जिम्मेदारी अब तुम्हें उठानी होगी।”
मोना का चेहरा पीला पड़ गया था। उसे जैसे एक साथ हजार बातें समझ में आ रही थीं —
गीत गुनगुनाते हुए सुबह का नाश्ता बनाना आसान था, पर खाली जेब के साथ गैस भरवाने का फैसला लेना कठिन था।
अगले महीने राघव और सान्या ने शहर के ही दूसरी कॉलोनी में फ्लैट शिफ्ट कर लिया। शास्त्री नगर की पुरानी गली छोड़कर वे अब कंपनी के बनाए आधुनिक अपार्टमेंट में रहने लगे।
शुरुआती दिनों में बहुत अजीब लगा — न ऊपर से मम्मी की आवाज़,
“बहू, थोड़ा चाय बना दो,”
ना रात को अचानक कोई आती-जाती आवाज़।
लेकिन धीरे-धीरे, सब कुछ एक नई लय में ढलने लगा।
अगली तरफ़, पुराने घर में तूफान थमने का नाम नहीं ले रहा था। गैस खत्म हुई तो विवेक ने सोचा,
“भाभी होतीं तो कह देतीं अगले हफ्ते भरवा लेंगे, अभी तो थोड़ी बचत कर लें…”
अब किसी ने नहीं कहा। गैस एजेंसी में खुद फोन करना पड़ा, पैसे खुद देने पड़े।
किराने वाले ने उधार देने से मना किया,
“भाईसाहब, पहले तो आपकी भाभी आती थीं, हिसाब एकदम क्लियर रखती थीं। अब आप लोग बिल जमा नहीं कर रहे। मेरी भी दुकान है, मेला नहीं।”
रात को जब बच्चों की ट्यूशन के लिए मास्टर जी ने फ़ीस माँगी, तो विवेक के माथे पर पसीना आ गया। मोना ने चुपचाप आलमारी से अपने सोने की छोटी-सी चेन निकाली,
“इसे गिरवी रख देते हैं, बाद में छुड़ा लेंगे,” उसने झेंपते हुए कहा।
“तुझे नहीं लगता, ये काम मुझे करना चाहिए था?” विवेक ने पहली बार भारी आवाज़ में कहा।
“तुझे पहले भी लगता, तो आज ये दिन नहीं आता,” मोना का जवाब कड़वा था, पर सच्चा।
तीन महीने बाद, एक रविवार की शाम, पुराने घर की घंटी बजी। मोना दरवाज़ा खोलने गई तो सामने राघव, सान्या और दोनों बच्चे खड़े थे, हाथ में मिठाई का डिब्बा।
“अरे, भैया आप लोग! अंदर आइए ना,” मोना सचमुच खुश नज़र आ रही थी।
अंदर आकर सान्या ने देखा — घर वही था, पर माहौल बदल गया था। रसोई में सब्जियों की खुशबू थी, टेबल पर राशन की पर्चियाँ क्लिप से लगी थीं, कैलेंडर पर बिजली और पानी के बिल की तारीखें घिरी थीं।
शांता देवी ने आते ही राघव को पकड़ लिया,
“बेटा, तू ठीक है न? वहाँ सब संभाल लेता है?”
“हाँ मम्मी, सब ठीक है,” राघव ने मुस्कुरा कर कहा, “और आप लोग?”
इससे पहले कि शांता देवी कुछ कहतीं, हरिशंकर जी ने बात आगे बढ़ाई,
“राघव, तेरा छोटा भाई आज तुझसे कुछ कहना चाहता है।”
विवेक संकोच से आगे बढ़ा। उसके हाथ में मिठाई नहीं, बल्कि एक फाइल थी।
“भैया, ये देखो… मैंने इलेक्ट्रॉनिक रिपेयर की अपनी सर्विस सेंटर खोल ली है, उसी मोहल्ले में जहाँ पहले काम करता था। थोड़ा रिस्क लिया, पर अब ठीक-ठाक चलने लगी है।”
राघव की आँखें चमक उठीं,
“अरे वाह, ये तो बहुत अच्छी बात है!”
विवेक ने आँखें नीचे झुका लीं,
“भैया… सच कहूँ? अगर आप घर से अलग न होते, तो शायद मैं आज भी अपना आधा समय मोबाइल पर और आधा नुक्कड़ पर बैठकर काट रहा होता। जब पहली बार मम्मी ने सब्ज़ी के लिए मुझसे पैसे माँगे और मेरे पास जेब में सिर्फ़ सौ रुपये थे, तब समझ आया कि घर चलाना क्या होता है।”
शांता देवी ने आँसू पोंछते हुए कहा,
“बहू, मैं मानती हूँ मैंने तुझ पर और तेरे पति पर ज़्यादती की। हमेशा छोटे का पक्ष लिया, सोचती थी बड़ा है, सब उठा लेगा। पर अब समझ में आया — किसी एक पर सारा बोझ डाल देने से घर चलता नहीं, बिगड़ता है। तूने और राघव ने जो निर्णय लिया, वो उस समय मुझे गलत लगा, पर आज लगता है कि वही सही था।”
सान्या के मन में कहीं वर्षों का संताप नरम पड़ने लगा।
“मम्मी, हमने भी शायद थोड़ी सख़्ती जल्दी कर दी। पर सच कहूँ, अगर हम नहीं जाते, तो मैं खुद ही टूट जाती।”
“और तुम्हारे टूटने से पहले मेरा घर टूट जाता,” शांता देवी ने सीधा उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा,
“मैंने देखा है, बहू… अलग होने के बाद से तुम दोनों के चेहरों पर जो सुकून है, वो पहले कभी नहीं था। और यहाँ भी… मुश्किल आई, पर अब सब अपने पैरों पर खड़े हैं।”
राहुल और रिद्धि अपने छोटे कज़िन्स के साथ खेल रहे थे। बच्चों की हँसी की आवाज़ के बीच विवेक ने राघव से कहा,
“भैया, अगले महीने दुकान के आगे वाली शटर वाली जगह खाली हो रही है। सोच रहा हूँ, वहाँ कुछ और मशीनें लगा लूँ। पर उससे पहले… एक काम और करना है।”
“क्या?”
विवेक मुस्कुरा कर बोला,
“मम्मी–पापा के मेडिकल इन्श्योरेन्स का प्रीमियम इस बार मैं भरूँगा, तुम नहीं। शुरुआत यहीं से करता हूँ।”
राघव ने आगे बढ़कर उसे गले से लगा लिया।
सान्या ने मोना की तरफ़ देखा,
“और तुम? सिलाई का क्या चल रहा है?”
मोना गर्व से बोली,
“अब तो कॉलोनी की आधी औरतों के कपड़े मेरे पास ही आते हैं। बच्चे जब सो जाते हैं, तब रात को दो–तीन घंटे काम कर लेती हूँ। अपना खर्चा खुद निकाल लेती हूँ, और घर के लिए भी हाथ बँटाने लायक हो गया हूँ।”
सान्या ने मन ही मन सोचा — कभी-कभी ‘बुरा’ दिखने वाला फैसला ही सबसे अच्छा साबित होता है। बस हिम्मत चाहिए, और अपने आप से ईमानदारी।
उस दिन जब शाम को वे वापस अपने फ्लैट लौट रहे थे, तो रास्ते में राघव ने धीरे से पूछा,
“अब भी कभी लगता है कि हमने गलत किया था?”
सान्या ने आसमान की तरफ़ देखते हुए कहा,
“नहीं। हमने गलत नहीं किया। हमने बस समय से पहले सीमा खींच दी। और सीमा खींचने से रिश्ते खत्म नहीं होते, बस उनकी दिशा बदल जाती है। देख लिया ना आज?”
राघव ने हँसते हुए उसका हाथ थाम लिया।
दोनों के सामने शहर की पीली रोशनी वाली सड़कें फैली थीं, लेकिन उनके भीतर पहली बार… एक साफ़, उजली राह दिख रही थी —
जहाँ प्यार था, सम्मान था, और सबसे ज़रूरी —
सीख थी कि किसी को संभालने के लिए कभी-कभी उसे अपने पैरों पर खड़ा होने की मजबूरी देना भी ज़रूरी होता है।
लेखिका : सीमा श्रीवास्तव
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