“पापाजी अब घर में रह रहे हैं.. तो कुछ तो काम करना ही होगा।” – डॉ अनुपमा श्रीवास्तव 

खिड़की से आती धूप अब कमरे के फर्श से हटकर दीवार पर चढ़ चुकी थी। दोपहर के दो बज रहे थे, लेकिन दीनानाथ जी अभी तक अपनी उसी पुरानी आराम कुर्सी पर लेटे हुए थे। उनकी आँखों पर चश्मा टिका था, और हाथ में एक किताब थी जिसका पन्ना पिछले एक घंटे से नहीं पलटा था।

घर में एक अजीब सी शांति थी—वह शांति जो सुकून नहीं, बल्कि बेचैनी देती है। रिटायरमेंट के छह महीने हो चुके थे। चालीस साल तक रेलवे में हेड क्लर्क की नौकरी करने वाले दीनानाथ जी, जिनके दिन की शुरुआत मिनटों के हिसाब से होती थी, अब वक्त काटने के लिए घड़ी की सुईयों को घूरते रहते थे। पत्नी के देहांत के बाद वह बेटे सुमित और बहू अंकिता के पास रहने आ गए थे।

सब कुछ ठीक था। सुमित और अंकिता उनका बहुत ख्याल रखते थे। सुबह की चाय बिस्तर पर मिलती, समय पर नाश्ता, धुले हुए कपड़े, और शाम को पूछने के लिए कि “पापा, दिन कैसा रहा?”

पर दीनानाथ जी के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं होता था। दिन कैसा था? वैसा ही जैसा कल था, और वैसा ही जैसा कल होगा। खाली। निरुद्देश्य। उन्हें लगता था जैसे वे इस घर में एक पुराना फर्नीचर बन गए हैं, जिसे सजाकर रखा गया है लेकिन जिसका अब कोई उपयोग नहीं है।

रसोई में बर्तनों की खनक के बीच एक धीमी बातचीत चल रही थी। दीनानाथ जी के कान अनचाहे ही उस तरफ लग गए।

“सुमित, तुम्हें मेरी बात समझनी होगी,” अंकिता की आवाज़ थी। “पापाजी की हालत देखी है तुमने? वह डिप्रेशन में जा रहे हैं। उनका वजन कम हो रहा है, वे किसी से बात नहीं करते। बस उस कुर्सी पर पड़े रहते हैं।”

“तो क्या करूँ अंकिता?” सुमित की आवाज़ में झुंझलाहट थी। “मैं उन्हें घुमाने ले जाता हूँ, उनकी हर ज़रूरत पूरी करता हूँ। अब इस उम्र में उन्हें मैराथन तो नहीं दौड़वा सकता।”

“ज़रूरतें पूरी करना काफी नहीं है सुमित,” अंकिता ने थोड़ा जोर देकर कहा। “इंसान को सिर्फ रोटी और दवा नहीं चाहिए होती, उसे ‘मकसद’ चाहिए होता है। उन्हें यह महसूस होना चाहिए कि उनकी अभी भी ज़रूरत है।”

थोड़ी देर सन्नाटा रहा। फिर अंकिता ने वह वाक्य कहा जिसने दीनानाथ जी के दिल की धड़कन बढ़ा दी।

“पापाजी अब घर में रह रहे हैं.. तो कुछ तो काम करना ही होगा।”

दीनानाथ जी का हाथ कांप गया। किताब गोद में गिर पड़ी। उन्हें अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ। क्या अंकिता, जिसे वह अपनी बेटी जैसा मानते थे, उन्हें बोझ समझ रही थी? क्या अब इस उम्र में उन्हें घर में रहने का किराया मेहनत-मजदूरी करके चुकाना होगा? एक गहरा अपमान और दुख उनके गले में अटक गया। उन्हें लगा कि सुमित अभी अंकिता को डांटेगा।

लेकिन सुमित चुप रहा। शायद वह भी मान रहा था कि पिता बोझ हैं।

दीनानाथ जी ने आँखें बंद कर लीं। उनकी आँखों के कोर गीले हो गए। उन्होंने तय कर लिया कि कल ही वे अपने गांव वाले पुराने घर लौट जाएंगे। अकेले रहेंगे, पर किसी के टुकड़ों पर नहीं पलेंगे।

शाम को माहौल थोड़ा तनावपूर्ण था—कम से कम दीनानाथ जी के लिए। वे चुपचाप खाना खा रहे थे। तभी अंकिता एक बड़ी सी फाइल और लैपटॉप लेकर डायनिंग टेबल पर आ गई। वह परेशान लग रही थी।

“उफ्फ! यह जीएसटी वाले भी न, पागल कर देंगे,” अंकिता बड़बड़ाई। उसने फाइल मेज पर पटकी।

सुमित ने पूछा, “क्या हुआ?”

“अरे वही, मेरा जो बुटीक का नया स्टॉक आया है, उसका हिसाब ही नहीं मिल रहा। सीए ने कहा है कि अगर कल तक पूरा इन्वेंटरी ऑडिट नहीं भेजा, तो फाइलिंग में दिक्कत हो जाएगी। और मेरे पास बिलों का पहाड़ है। समझ नहीं आ रहा रात भर में कैसे करूँगी। मुझे तो एक्सेल में फॉर्मूला लगाना भी ठीक से नहीं आता।”

अंकिता ने सिर पकड़ लिया। “लगता है इस बार फाइन भरना ही पड़ेगा।”

दीनानाथ जी चुपचाप अपनी दाल-रोटी खा रहे थे, लेकिन उनका क्लर्क वाला दिमाग ‘हिसाब-किताब’ और ‘ऑडिट’ शब्द सुनकर सतर्क हो गया था।

“सुमित, तुम कर दोगे?” अंकिता ने उम्मीद से पूछा।

“यार, मुझे ऑफिस का प्रेजेंटेशन तैयार करना है। आज रात तो बिल्कुल टाइम नहीं है,” सुमित ने हाथ खड़े कर दिए।

अंकिता की आंखों में आंसू आने को थे। “अब क्या होगा? इतनी मेहनत से बिजनेस जमाया था।”

दीनानाथ जी से रहा नहीं गया। वह अपमान, वह दोपहर वाली कड़वी बात एक पल के लिए पीछे छूट गई। उनके अंदर का अनुभवी हेड क्लर्क जाग गया।

“लाओ, इधर दिखाओ,” दीनानाथ जी ने भारी आवाज़ में कहा।

अंकिता और सुमित ने एक-दूसरे को देखा।

“अरे नहीं पापाजी, आप रहने दीजिए। बहुत पेचीदा है। आंखों पर जोर पड़ेगा,” अंकिता ने संकोच करते हुए कहा।

“मैंने चालीस साल रेलवे के खाते संभाले हैं, बहू,” दीनानाथ जी ने चश्मा ठीक करते हुए कहा, उनकी आवाज़ में एक अधिकार था जो पिछले छह महीनों से गायब था। “यह जीएसटी-वीएसटी तो कल के आए छोकरे हैं। बिल कहां हैं?”

अंकिता ने डरते-डरते फाइल आगे बढ़ाई।

दीनानाथ जी ने फाइल खोली। बिल बेतरतीब रखे थे। उन्होंने एक गहरी सांस ली। “पेन है?”

अगले तीन घंटे तक डायनिंग टेबल एक युद्ध क्षेत्र बना रहा। दीनानाथ जी ने सुमित को पानी लाने का आदेश दिया, अंकिता को लैपटॉप खोलने को कहा और खुद आंकड़ों के समुद्र में गोता लगा गए।

“यह बिल दो बार चढ़ाया है तुमने,” उन्होंने अंकिता को डांटा। “और यह वाला? इसका टोटल गलत है। कैलकुलेटर कहां है?”

उनकी उंगलियां कैलकुलेटर पर इतनी तेज़ी से चल रही थीं जैसे कोई पियानो बजा रहा हो। उनके चेहरे से वह उदासी, वह खालीपन गायब था। उसकी जगह माथे पर शिकन और आंखों में एक चमक थी—समस्या सुलझाने की चमक।

रात के बारह बजे दीनानाथ जी ने फाइल बंद की। “हो गया। एक्सेल शीट मैच कर लो।”

अंकिता ने लैपटॉप चेक किया। “परफेक्ट! पापाजी, एक रुपए का भी फर्क नहीं है। आपने तो कमाल कर दिया!”

दीनानाथ जी ने कुर्सी से उठते हुए कमर सीधी की। थकान थी, लेकिन वह मीठी थकान थी। “हम्म। अगली बार बिलों को तारीख के हिसाब से फाइल करना। ऐसे रखोगी तो कभी हिसाब नहीं मिलेगा।”

“जी, बॉस,” अंकिता ने मुस्कुराते हुए सैल्यूट किया।

उस रात दीनानाथ जी को बिना करवट बदले गहरी नींद आई।

अगली सुबह, दीनानाथ जी जल्दी उठ गए। नहा-धोकर उन्होंने अपना पुराना वाला सफेद कुर्ता-पाजामा पहना। जब सुमित और अंकिता नाश्ते की मेज पर आए, तो दीनानाथ जी डायरी लेकर कुछ नोट कर रहे थे।

“सुमित,” उन्होंने कड़क आवाज़ में कहा, “बिजली का बिल भरने की आखिरी तारीख परसों है। मैंने चेक काट दिया है, ड्रॉप बॉक्स में डाल देना। और अंकिता, तुम्हारे बुटीक के जो सप्लायर हैं, उन्हें फोन करके कहो कि कच्चा बिल नहीं चलेगा। पक्का बिल भेजें, वरना मैं पेमेंट पास नहीं करूँगा।”

सुमित और अंकिता हैरान रह गए।

“और हाँ,” दीनानाथ जी ने चाय की चुस्की ली, “मैं सोच रहा था कि घर के राशन का जिम्मा मैं ले लूँ। तुम लोग ऑनलाइन मंगाते हो, सड़ी-गली सब्जियां भेज देते हैं। मैं शाम को मंडी जाकर खुद लाऊंगा। चार पैसे भी बचेंगे और सेहत भी बनेगी।”

अंकिता मुस्कुराई, लेकिन उसने अपना चेहरा कॉफी मग के पीछे छिपा लिया।

दिन बीतते गए। घर का माहौल पूरी तरह बदल गया। दीनानाथ जी अब ‘फर्नीचर’ नहीं, घर के ‘सीईओ’ बन गए थे। सुबह दूध वाले से हिसाब करने से लेकर, प्लंबर को डांटने तक—हर मोर्चा उन्होंने संभाल लिया था। दोपहर में अब वे सोते नहीं थे, बल्कि अंकिता के बुटीक के खातों का ऑडिट करते थे। उन्होंने एक नया रजिस्टर बना लिया था जिसमें हर खर्चे का ब्यौरा था।

एक महीने बाद, रविवार की शाम थी। सुमित और अंकिता बालकनी में बैठे थे। दीनानाथ जी अंदर किसी सप्लायर को फोन पर हड़का रहे थे—”अरे भाई साहब, माल भेजा नहीं और पेमेंट पहले चाहिए? दीनानाथ नाम है मेरा, कच्ची गोलियां नहीं खेली हैं मैंने।”

सुमित ने अंकिता की तरफ देखा और धीरे से कहा, “तुम सही थी।”

“किस बारे में?” अंकिता ने पूछा।

“उस दिन, जब तुमने कहा था कि पापाजी को काम करना होगा। मुझे बहुत गुस्सा आया था। मुझे लगा तुम उनसे नौकरों जैसा काम करवाना चाहती हो। लेकिन आज समझ आया कि तुम्हारा मतलब क्या था।”

अंकिता ने अंदर देखा, जहाँ दीनानाथ जी अब फोन रखकर अपनी डायरी में कुछ लिख रहे थे और खुद ही मुस्कुरा रहे थे।

“सुमित, मर्दों की, खासकर उस पीढ़ी के मर्दों की पूरी पहचान उनके ‘काम’ से जुड़ी होती है,” अंकिता ने समझाया। “जब उनसे काम छिन जाता है, तो उन्हें लगता है उनका वजूद छिन गया। मैंने उन्हें काम नहीं दिया, मैंने उन्हें उनका ‘रुतबा’ वापस दिया है। अब वे यह नहीं सोचते कि वे हम पर आश्रित हैं। अब वे सोचते हैं कि यह घर उनके बिना नहीं चल सकता।”

तभी दीनानाथ जी बालकनी में आए। उनके हाथ में तीन लिफाफे थे।

“ये लो,” उन्होंने दो लिफाफे सुमित और अंकिता को थमाए।

“यह क्या है पापाजी?” सुमित ने पूछा।

“मेरा मेहनताना,” दीनानाथ जी ने गर्व से कहा। “अंकिता के बुटीक में मैंने जो टैक्स बचाया है और घर के खर्च में जो कटौती की है, यह उसका कमीशन है। मैंने अपने लिए रख लिया है, और यह तुम दोनों का हिस्सा। आइसक्रीम खा लेना।”

सुमित की आंखों में आंसू आ गए। उसने लिफाफा खोला। उसमें 500 रुपये का एक नोट था। यह नोट सुमित की लाखों की सैलरी से कहीं ज्यादा भारी था।

“लेकिन पापाजी…” सुमित कुछ कहना चाहता था।

“चुप रहो,” दीनानाथ जी ने हाथ दिखाया। “हिसाब पक्का होना चाहिए। और सुनो अंकिता, कल मुझे मार्केट ले चलना। मुझे अपने लिए एक नई फाइल और कुछ पेन खरीदने हैं। काम बढ़ रहा है।”

दीनानाथ जी मुड़कर वापस अंदर चले गए। उनकी चाल में अब वह बुजुर्गी वाली लचक नहीं, बल्कि एक आत्मविश्वास था।

अंकिता ने सुमित के कंधे पर सिर रखा। “देखा? मैंने कहा था न, पापाजी घर में रह रहे हैं, तो काम तो करना ही होगा। वरना… वे जीएंगे कैसे?”

उस वाक्य का अर्थ अब पूरी तरह बदल चुका था। वह मजबूरी का नहीं, बल्कि ‘संजीवनी’ का वाक्य था।

अंदर से आवाज़ आई, “अरे बहू! चाय मिलेगी या मैं खुद बना लूँ? अभी मुझे स्टॉक रजिस्टर भी चेक करना है!”

पूरा घर हंसी से गूंज उठा। वह सन्नाटा, जो दीवारों पर फफूंद की तरह जम रहा था, हमेशा के लिए गायब हो गया था। दीनानाथ जी रिटायर हुए थे, पर अब वे ‘रि-हायर’ हो चुके थे—ज़िंदगी की नौकरी पर।

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क्या बुजुर्गों को घर में काम देकर उनका आत्मसम्मान लौटाया जा सकता है?

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❤️ “बुजुर्ग बोझ नहीं, आशीर्वाद हैं”

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आपके घर में दादा-दादी या माता-पिता क्या सबसे अच्छा काम संभालते हैं?

मूल लेखिका : डॉ अनुपमा श्रीवास्तव

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