आंगन में खड़ी पुरानी नीम की छांव अब भी वही थी, लेकिन उसके नीचे खड़ी गाड़ियों ने घर की तस्वीर बदल दी थी। एक तरफ विनय की चमचमाती एस.यू.वी. खड़ी थी, और दूसरी तरफ समीर की पुरानी, जंग लगी स्कूटर। यह सिर्फ़ वाहनों का अंतर नहीं था; यह उस खाई का भौतिक रूप था जो पिछले पांच सालों में “शांति-कुंज” के भीतर खुद गई थी।
विनय और समीर। कभी मोहल्ले वाले इनकी मिसाल देते थे। राम-लक्ष्मण की जोड़ी। विनय बड़ा था, समीर छोटा। बचपन में अगर विनय को स्कूल में डांट पड़ती, तो समीर रोने लगता था। और अगर समीर को क्रिकेट खेलते हुए खरोंच आ जाती, तो विनय पूरा मोहल्ला सर पर उठा लेता था।
लेकिन वक्त ने करवट ली। विनय ने टेक्सटाइल का बिज़नेस शुरू किया और किस्मत ने ऐसा साथ दिया कि देखते ही देखते वह शहर का बड़ा नाम बन गया। समीर, अपनी सादगी और संतोषी स्वभाव के कारण, एक सरकारी स्कूल में क्लर्क बनकर ही खुश रहा।
शुरुआत में सब ठीक था। विनय की सफलता पूरे घर की सफलता थी। लेकिन पैसा अपने साथ सिर्फ़ सुविधाएं नहीं लाता, वह अपने साथ एक अदृश्य चश्मा भी लाता है, जिससे दुनिया और रिश्ते अलग दिखने लगते हैं।
रसोई में बर्तनों की खनक के बीच अब खामोशी ज्यादा रहती थी। पहले विनय की पत्नी, शालिनी, और समीर की पत्नी, आरती, सगी बहनों की तरह बातें करते नहीं थकती थीं। मिलकर खाना बनाना, मिलकर सास की बुराई करना, और मिलकर हंसी-ठिठोली करना—यह सब अब एक याद बनकर रह गया था।
आज रविवार था। घर में चहल-पहल थी। विनय ने घर के अपने हिस्से को रिनोवेट (renovate) करवाया था। इटालियन मार्बल, फॉल सीलिंग और महंगे झूमर। समीर का हिस्सा आज भी वैसा ही था—पुराना मोज़ेक का फर्श और चूने वाली दीवारें।
“आरती,” शालिनी की आवाज़ में अब वह अपनापन नहीं, बल्कि एक मालकिन वाला आदेश झलकने लगा था। “आज शाम को विनय के कुछ बिज़नेस पार्टनर्स डिनर पर आ रहे हैं। तुम प्लीज़ बच्चों को अपने कमरे में ही रखना। वे शोर मचाते हैं तो विनय को डिस्टर्ब होता है। और हाँ, खाना हम बाहर से मंगवा रहे हैं, तो तुम्हें रसोई में खटने की ज़रूरत नहीं है।”
आरती, जो चाय छान रही थी, का हाथ एक पल के लिए रुका। उसने पलटकर शालिनी को देखा। शालिनी अब साड़ी छोड़कर महंगे डिज़ाइनर सूट पहनने लगी थी। उसके हाथों में हीरे की अंगूठियां चमक रही थीं।
“दीदी,” आरती ने धीमे स्वर में कहा, “आज समीर जी का जन्मदिन है। मैंने सोचा था कि हम सब मिलकर खीर और पूड़ी बनाएंगे। जैसे हर साल बनाते हैं।”
शालिनी ने माथे पर बल डालते हुए अपनी स्मार्टवॉच देखी। “ओह! सॉरी आरती, दिमाग से निकल गया। लेकिन अब तो मेहमानों को बुलाया जा चुका है। तुम लोग ऐसा करो, केक काट लो अपने कमरे में। मैं विनय से कहूंगी कि समीर के लिए कोई अच्छा सा गिफ्ट आर्डर कर दें। आखिर भाई है उसका।”
‘आखिर भाई है उसका’—यह वाक्य आरती के दिल में चुभ गया। रिश्ता अब फर्ज़ बन गया था, और प्यार अब दान में बदल गया था।
शाम को समीर जब स्कूटर से लौटा, तो उसने देखा कि घर के बाहर महंगी गाड़ियों का जमावड़ा है। वह समझ गया कि आज फिर ‘बड़े भैया’ की कोई पार्टी है। वह चुपचाप पिछले दरवाज़े से अंदर आया।
अपने कमरे में घुसते ही उसने देखा कि आरती और बच्चे उदास बैठे हैं। मेज़ पर एक छोटा सा घर का बना केक रखा था।
“क्या हुआ?” समीर ने मुस्कुराने की कोशिश की। “आज मेरा जन्मदिन है और सबके चेहरों पर बारह क्यों बजे हैं?”
आरती की आँखों में आंसू आ गए। “भैया के मेहमान आए हैं। दीदी ने कहा है कि हम बाहर न निकलें। उन्हें शर्म आती है हमसे।”
समीर का दिल बैठ गया। उसने आरती के कंधे पर हाथ रखा। “अरे पगली, बड़े लोग हैं, बड़ी बातें। हमें अपनी छोटी खुशियों में खुश रहना चाहिए। लाओ, केक काटो।”
तभी दरवाज़ा खुला और विनय अंदर आया। उसके हाथ में व्हिस्की का गिलास था और वह थोड़ा लड़खड़ा रहा था। उसने एक महंगा ब्रांडेड घड़ी का डिब्बा समीर की ओर उछाला।
“हैप्पी बर्थडे छोटे!” विनय ने ज़ोर से कहा। “सॉरी यार, बाहर थोड़ा बिज़ी हूँ। ये ले, तेरे लिए लाया हूँ। बीस हज़ार की घड़ी है। तेरी पूरी महीने की सैलरी से भी महंगी। पहनना, लोग देखेंगे तो इज़्ज़त करेंगे।”
समीर ने वह डिब्बा नहीं उठाया। वह बस अपने बड़े भाई को देखता रहा। वह भाई, जो कभी अपनी पॉकेट मनी बचाकर समीर के लिए पाँच रुपये वाली चॉकलेट लाता था और उसे गले लगाता था। आज वह बीस हज़ार की घड़ी फेंककर अपनी अमीरी का प्रदर्शन कर रहा था।
“भैया,” समीर ने शांत आवाज़ में कहा, “बैठिए न। केक काटते हैं। माँ भी यहीं हैं।”
“अरे नहीं नहीं,” विनय ने हाथ हिलाया। “वहां मिस्टर खन्ना इंतज़ार कर रहे हैं। तुझे पता है, करोड़ों की डील है। तू ये केक-वेक काट, एन्जॉय कर। किसी चीज़ की ज़रूरत हो तो शालिनी से मांग लेना।”
विनय मुड़ा और चला गया। समीर ने वह घड़ी का डिब्बा उठाया और अलमारी के सबसे ऊपरी रैक पर रख दिया, बिना खोले।
वक्त बीतता गया। दीवारें और ऊंची होती गईं।
एक दिन, घर में एक बड़ा झगड़ा हुआ। बात छोटी सी थी। समीर के बेटे, चिंटू, ने गलती से विनय की नई कार पर अपनी साइकिल से एक खरोंच लगा दी थी।
शालिनी ने आसमान सिर पर उठा लिया।
“तुम्हें अकल नहीं है आरती?” शालिनी आंगन में चिल्लाई। “तुम्हारे बच्चे को तमीज़ नहीं है? दस लाख का नुकसान कर दिया! तुम लोगों की तो हैसियत भी नहीं है कि इसकी भरपाई कर सको। इसीलिए कहती हूँ कि अपनी हदों में रहा करो।”
समीर, जो अभी-अभी ऑफिस से आया था, यह सुनकर सन्न रह गया। उसकी पत्नी और बच्चे रो रहे थे, और शालिनी उंगली नचाकर उन्हें डांट रही थी। विनय पास ही सोफे पर बैठा मोबाइल में लगा था, जैसे कुछ हो ही न रहा हो।
“भैया!” समीर की आवाज़ में पहली बार एक दहाड़ थी। “आप चुप क्यों हैं? चिंटू बच्चा है, गलती हो गई। लेकिन भाभी जो कह रही हैं… ‘हैसियत’? क्या हम इस घर में किराएदार हैं?”
विनय ने नज़रें उठाईं। उसकी आँखों में ठंडक थी। “समीर, शालिनी गलत क्या कह रही है? नुकसान तो हुआ है। और सच तो कड़वा होता ही है। मैंने तुम लोगों को इस घर में रहने दिया, बिजली-पानी का खर्चा मैं उठाता हूँ, क्या इतना काफी नहीं है? अब क्या मेरी गाड़ियां भी तुड़वाओगे?”
समीर को लगा जैसे किसी ने उसके सीने में खंजर घोंप दिया हो। “रहने दिया? भैया, यह बाबूजी का घर है। इसमें मेरा भी उतना ही हक़ है जितना आपका।”
“हक़?” विनय हंसा, एक क्रूर हंसी। “हक़ मांगने के लिए जेब में पैसा होना चाहिए, समीर। घर की मरम्मत मैंने करवाई, टैक्स मैं भरता हूँ। तू क्या करता है? क्लर्क की नौकरी में तो घर की पुताई भी नहीं करवा सकता। शुक्र मना कि मैं तुझे अपने साथ रख रहा हूँ, वरना आज के ज़माने में सगे भाई भी लात मार देते हैं।”
उस रात ‘शांति-कुंज’ में शांति हमेशा के लिए मर गई।
समीर पूरी रात नहीं सो पाया। वह छत पर टहलता रहा। उसे बचपन का वह मंज़र याद आया जब मेले में उसका हाथ छूट गया था और विनय भैया पागलों की तरह उसे ढूंढ रहे थे। मिलने पर उन्होंने उसे थप्पड़ मारा था और फिर गले लगाकर बहुत रोए थे। *’खबरदार जो मेरा हाथ छोड़ा, मर जाऊंगा तेरे बिना,’* विनय ने कहा था।
आज उसी विनय ने उसे ‘लात मारने’ की बात कह दी थी। पैसे ने खून को पानी बना दिया था।
अगली सुबह, समीर ने एक फैसला लिया।
वह नाश्ते की मेज़ पर आया। वहां हमेशा की तरह दो अलग-अलग माहौल थे। एक तरफ विनय और शालिनी का ‘कॉन्टिनेंटल ब्रेकफास्ट’ और दूसरी तरफ आरती की सादी रोटी-सब्ज़ी।
“भैया,” समीर ने कहा। उसके हाथ में एक फाइल थी।
विनय ने जूस का घूंट भरते हुए पूछा, “क्या है? अब किस चीज़ के पैसे चाहिए? चिंटू की स्कूल फीस?”
समीर ने वह फाइल मेज़ पर रखी। “नहीं भैया। यह मेरे ट्रांसफर के कागज़ात हैं। मैंने पास के ही एक दूसरे ज़िले में ट्रांसफर ले लिया है। वहां सरकारी क्वार्टर मिल रहा है। हम अगले हफ्ते शिफ्ट हो रहे हैं।”
मेज़ पर सन्नाटा छा गया। शालिनी के चेहरे पर एक विजयी मुस्कान आई, लेकिन उसने उसे छुपा लिया। विनय का हाथ रुक गया।
“ट्रांसफर?” विनय ने घूरकर देखा। “पागल हो गया है? सरकारी क्वार्टर में रहेगा? वहां न एसी होगा, न इनवर्टर। साड़-गल जाओगे वहां। और लोग क्या कहेंगे? कि विनय खन्ना का भाई टूटे हुए क्वार्टर में रहता है?”
“लोगों की चिंता आप मत कीजिये भैया,” समीर ने दृढ़ता से कहा। “और रही बात सड़ने-गलने की, तो इस आलीशान घर में मेरी आत्मा रोज़ सड़ रही है। वहां कम से कम मैं अपनी सूखी रोटी इज़्ज़त से तो खा सकूंगा। वहां मेरी पत्नी को कोई ‘हैसियत’ का ताना तो नहीं मारेगा। वहां मेरा बेटा अगर दीवार पर लकीर भी खींच देगा, तो उसे अपराधी नहीं माना जाएगा।”
“तू जज़्बाती हो रहा है,” विनय ने टालने की कोशिश की। “तुझे पैसों की दिक्कत है तो बोल। मैं तेरी सैलरी डबल कर दूंगा, बस घर छोड़कर जाने की ड्रामेबाज़ी मत कर। मेरी साख ख़राब होती है।”
“यही तो दिक्कत है भैया,” समीर की आँखों में नमी थी, पर आवाज़ सख्त थी। “आपको मेरी जाने से नहीं, अपनी ‘साख’ ख़राब होने से डर लग रहा है। आप मुझे भाई नहीं, अपनी इज़्ज़त का एक शो-पीस समझते हैं जिसे आप जब चाहें झाड़-पोंछ कर रख दें और जब चाहें कोने में फेंक दें।”
समीर मुड़ा और अपने कमरे की ओर चला गया।
एक हफ्ते बाद, सामान पैक हो गया। टेम्पो बाहर खड़ा था।
जाते वक्त समीर अपनी माँ, सावित्री देवी, के पास गया। माँ अब बहुत बूढ़ी हो चुकी थीं और ज़्यादातर चुप रहती थीं। वह सब कुछ देखती थीं, सब समझती थीं, लेकिन लाचार थीं। एक बेटे की अमीरी और दूसरे की गरीबी ने उनके आंगन को बांट दिया था।
समीर ने माँ के पैर छुए। “जा रहा हूँ माँ। अपना ख्याल रखना।”
सावित्री देवी ने कांपते हाथों से अपनी तिजोरी की चाबी निकाली और समीर के हाथ में देने की कोशिश की। “लल्ला… यह रख ले। इसमें तेरे बाबूजी के कुछ पुराने जेवर हैं। तेरे काम आएंगे।”
समीर ने वह चाबी वापस माँ की मुट्ठी में बंद कर दी। “नहीं माँ। मुझे यह नहीं चाहिए। मुझे बस आपका आशीर्वाद चाहिए। बाबूजी कहते थे—*इंसान का सबसे बड़ा धन उसका स्वाभिमान होता है।* भैया के पास दौलत है, मेरे पास यह स्वाभिमान रहने दो।”
विनय ऊपर बालकनी में खड़ा सिगार पी रहा था। वह नीचे नहीं आया। उसे लगा था कि समीर आख़िरी पल में पिघल जाएगा, माफ़ी मांगेगा और रुक जाएगा। लेकिन जब उसने समीर को टेम्पो में बैठते देखा, तो उसके दिल में एक अजीब सी बेचैनी हुई।
टेम्पो स्टार्ट हुआ। धूल का एक गुबार उड़ा और ‘शांति-कुंज’ का छोटा बेटा हमेशा के लिए उस घर से निकल गया।
विनय वापस अपने आलीशान ड्राइंग रूम में आया। वहां सब कुछ बेशकीमती था। इटालियन सोफा, 85 इंच का टीवी, क्रिस्टल का झूमर।
“अच्छा हुआ चला गया,” शालिनी ने राहत की सांस ली। “अब हम उस कमरे को होम-थियेटर बना लेंगे। बहुत किचकिच थी।”
विनय ने कुछ नहीं कहा। वह सोफे पर बैठ गया। उसे प्यास लगी थी। उसने आवाज़ दी, “समीर! पानी…”
अगले ही पल उसे याद आया कि समीर अब नहीं है। और शायद वह पानी का गिलास लाने वाला वह प्यार भी अब कभी वापस नहीं आएगा।
उसने नौकर को घंटी बजाई। नौकर चांदी की ट्रे में पानी लेकर आया। विनय ने पानी पिया, लेकिन गले में एक गांठ अटकी रही।
उस शाम, शहर के सबसे बड़े रईस, विनय खन्ना, अपने करोड़ों के बंगले में बैठे थे। एसी चल रहा था, संगीत बज रहा था, लेकिन उन्हें एक अजीब सी ठंड लग रही थी। एक ऐसी ठंड जो रजाई से नहीं जाती।
उन्हें मेज़ पर रखा वह गिफ्ट का डिब्बा दिखाई दिया—वही बीस हज़ार वाली घड़ी जो उन्होंने समीर को जन्मदिन पर दी थी और समीर छोड़ गया था। विनय ने उसे खोला। उसके साथ एक पर्ची थी।
उस पर समीर की टेढ़ी-मेढ़ी लिखाई में लिखा था:
*”भैया, वक्त देखने के लिए घड़ी महंगी होनी ज़रूरी नहीं, बस वक्त ‘अपना’ होना चाहिए। आपका वक्त अब बहुत कीमती है, उसे मुझ जैसे गरीबों पर ज़ाया मत कीजियेगा। खुश रहिये।”*
विनय की आँखों से एक आंसू टपका और उस बेशकीमती घड़ी के डायल पर गिर गया। उसे आज समझ आया कि उसने क्या खो दिया था। उसने एक भाई खो दिया था, और बदले में सिर्फ़ ईंट-पत्थर और कागज़ के नोट कमाए थे।
दूर, एक छोटे से सरकारी क्वार्टर में, समीर और आरती ज़मीन पर दरी बिछाकर खाना खा रहे थे। खाने में सिर्फ़ दाल और चावल थे। लेकिन हवा में हंसी थी, सुकून था, और इज़्ज़त की खुशबू थी। वहां कोई किसी की हैसियत नहीं तौल रहा था।
रिश्ते जब पैसों के तराजू पर तौले जाने लगते हैं, तो वे अक्सर हल्के पड़ जाते हैं। समीर ने वह तराजू ही तोड़ दिया था, और अपनी दुनिया अलग बसा ली थी—जहाँ वह गरीब ज़रूर था, लेकिन लाचार नहीं।
लेखिका : डॉ उर्मिला सिन्हा