आज नील और मैं एक-दूसरे से ऐसे बात कर रहे थे जैसे सालों पुराने अजनबी हों।
सूखे से, औपचारिक, जैसे बस ज़रूरत भर की बात करनी हो।
मैंने बालकनी के शीशे में अपना चेहरा देखा तो मन ही कसक उठा—
कहाँ गया वो नील जो मेरी हँसी सुनते ही खुद हँसने लगता था?
कहाँ गई वो आर्या जो नील के सामने आते ही दुनिया भूल जाती थी?
कभी हम दोनों पर पूरी यूनिवर्सिटी फ़िदा थी।
नील, फाइनल ईयर का हैंडसम क्रिकेट कैप्टन, और मैं, डिबेट टीम की लीडर।
फ़्रेशर पार्टी की एंकरिंग हो या वार्षिक समारोह में सांस्कृतिक कार्यक्रम—
नाम हमेशा यही लिया जाता था–
“प्लीज़ वेलकम नील एंड आर्या!”
क्लास खत्म होते ही हम कैंटीन के कोने वाली टेबल पर बैठ जाते।
मैं कॉपी खोलकर बहस के पॉइंट्स लिखती,
नील सामने बैठकर कल्पना करता—
“देखना, तू प्रोफ़ेसर बनेगी, और मैं बड़ा अफ़सर। फिर हम दोनों की शादी होगी,
और हमारे बच्चे को लोग कहेंगे, ‘देखो, ड्रीम कपल का ड्रीम बच्चा!’”
मैं हँसकर कहती,
“तुम्हें तो बस बच्चा चाहिए, शादी और पढ़ाई तो बहाने हैं।”
समय उड़ा और हम दोनों ने अपनी-अपनी राह पकड़ ली।
मैंने नेट पास किया, कॉलेज में गेस्ट लेक्चरर की नौकरी मिल गई।
नील ने दिन-रात एक कर दिया—सिविल सर्विस की तैयारी, फिर उसके बाद आयकर विभाग में पोस्टिंग।
सब कुछ सपना जैसा था… बस एक जगह सपना टूटता-सा लगता था—नील का घर।
नील के पिता शिवनाथ जी रिटायर्ड इंजीनियर थे,
पर अब उन्हें अपना परिचय देने में ज़्यादा मज़ा आता था—
“अरे, मेरे बेटे नील को जानते हो? इनकम टैक्स अफ़सर है, बेटा, अफ़सर!”
मोहल्ले वाले लड़कों के पिता लड़कियों के फ़ोटो लेकर आते,
नील की माँ प्रतियोगिता में उतर आतीं—
“बेटी क्या करती है?
एम.ए. किया है?
सरकारी नौकरी है या नहीं?
बंगला है कि फ्लैट?
दहेज में क्या दे सकते हो?”
उधर मेरे पापा स्कूल के अध्यापक रहे थे।
रिटायरमेंट के बाद भी ट्यूशन पढ़ाकर घर का खर्चा चलाते थे।
दो कमरे का अपना छोटा-सा फ्लैट था जो लोन की किस्तें देकर किसी तरह पूरा हुआ था।
दादी-दादा की दवाइयाँ, छोटे भाई आरुष की कोचिंग की फ़ीस…
मैं जानती थी, मेरी शादी में दहेज देने का सवाल ही नहीं उठता।
मैंने नील से साफ कह दिया था,
“देखो, मैं तुम्हें प्यार करती हूँ, पर झूठ नहीं बोल सकती।
पापा के पास इतना पैसा नहीं है कि तुम्हारे घर की लिस्ट पूरी कर पाएँ।
ना कार, ना बड़ा बंगला, ना भारी गिफ़्ट्स… मैं बस खुद को लेकर आ सकती हूँ।”
नील ने मेरी आँखों में देखते हुए कहा था,
“मुझे हमेशा तू ही चाहिए थी, आर्या।
बाकी दुनिया बाद में देख लूँगा।”
नील की ट्रेनिंग खत्म होते ही शिवनाथ जी ने जिस दिन घर में कदम रखा,
उसी दिन से रिश्तों की परेड शुरू हो गई।
डिज़ाइनर साड़ियों में सजी लड़कियाँ,
दोनों हाथों में गिफ़्ट के बैग लिए माता-पिता,
और नील के माता-पिता की चमकती आँखें।
नील ने रात को ही माँ-बाप के सामने बम फोड़ा,
“मैंने आर्या से शादी का वादा किया है।
अगर आप लोग राज़ी हैं तो ठीक,
वरना मैं कोर्ट मैरिज कर लूँगा।”
घर जैसे फट पड़ा।
“मेरे ही पेट में इतना दर्द था क्या कि तुझे जन्म दिया?”
माँ ने सीना पीटते हुए कहा,
“इसी दिन के लिए तुझे पढ़ाया-लिखाया?
लड़कियाँ लाइन लगाकर खड़ी हैं,
और तू एक मामूली लेक्चरर के पीछे अपनी ज़िंदगी बर्बाद करेगा?”
शिवनाथ जी ने ज़ोर से मेज़ पर हाथ मारा,
“तुम्हें पता भी है, कितने ऑफ़र आए हैं?
लोग खुद बंगला लिखने को तैयार हैं,
और तुम… बिना दहेज, बिना स्टेटस की लड़की से शादी करना चाहते हो?
हमने सपने में भी ऐसा बेटा नहीं देखा था।”
नील ने गहरी साँस ली,
“आपने जो सपने देखे, वो आपके हैं।
मैंने जो जीवन जीना है, वो मेरा है।
आर्या गलत लड़की नहीं है। नौकरी करती है, खुद खड़ी है।
आप लोग मिल लीजिए, एक बार।”
उनके लिए जैसे ये बात सुनना भी गुनाह था।
आख़िर हुआ वही जो होना था।
मेरे पापा और चाचा नील के घर रिश्ता लेकर गए—
आदर-सम्मान से बात की, लड़की की नहीं, इंसान की बात की,
पर वापस लौटे तो चेहरों पर अपमान की लकीरें थीं।
माँ ने दरवाज़ा खोलते ही पापा का उतरा हुआ चेहरा देखा और समझ गईं।
“क्या बोले?” उन्होंने धीमे से पूछा।
पापा की आँखें भर आईं,
“उन्होंने… कहा, ‘आपकी बेटी ने लड़के को फँसा लिया है।’
बोले, ‘अफसर बेटे पर नज़र रखी है, वरना कभी सोचा भी न होता कि ऐसी लड़की हमारी बहू बने।’
हमसे दहेज की बात नहीं की, पर इतना ज़रूर कह दिया कि
अगर शादी की ज़िद की तो नील को घर से निकाल देंगे।”
हमारी आँखों के सामने सारी फिल्म घूम गई—
कैंटीन की हँसी, लाइब्रेरी के नोट्स,
सपनों में बनाया गया हमारा घर… सब।
पापा ने मेरा सिर सहलाते हुए कहा,
“बेटी, अगर तुम कहो तो हम और कोशिश करें?”
मैंने पहली बार पापा के चेहरे पर उम्र की थकान साफ देखी।
मैंने बस इतना कहा,
“अगर उन्हें दहेज चाहिए, तो मैं वहीं नहीं रहना चाहती पापा।
जिस घर में जाते ही बोझ लग जाऊं,
वैसी चौखट पार करने से अच्छा है, इस घर में बेटी बनकर ही रहूँ।”
पर जिद सिर्फ एक तरफ़ नहीं थी।
नील ने मेरे पापा को फोन कर के कहा,
“अंकल, मैं कल कोर्ट जा रहा हूँ।
अगर आप, आर्या और कोई गवाह आ जाएँ तो… हमारे लिए आसान होगा।”
दूसरे दिन पापा, चाचा, दो-तीन करीबी दोस्त,
और दो टूटते-बनते सपने—नील और आर्या—
कचहरी के कमरे में खड़े थे।
माँ ने आँचल से चेहरा ढँकते हुए मेरे माथे को चूमकर कहा,
“जियो बेटी… अब से तू सिर्फ अपनी नहीं रही,
नील की भी जिम्मेदारी है।
हमने जो दे सकते थे, वो दिया है—संस्कार।
बाकी जो नहीं दे सके, उसके लिए माफ़ कर देना।”
कोर्ट के उस छोटे से कमरे में जब साइन हुए,
मुझे लगा जैसे सारी दुनिया एक पल को शांत हो गई।
नील ने मेरे हाथ दबाकर फुसफुसाया,
“अब कुछ भी हो, तुझे कभी अकेला नहीं छोड़ूँगा।”
जो बनकर घर से निकला था ‘पराया’,
उसी दिन नील के लिए उसके घर का दरवाज़ा बंद हो गया।
माँ ने फोन पर कहा,
“तुम मर गए हमारे लिए।”
शादी के बाद के दो साल किसी फ़िल्म के खुशनुमा हिस्से जैसे थे।
नील की पोस्टिंग जिस शहर में थी, मेरा भी वहीं कॉलेज में गेस्ट लेक्चरर के पद पर ट्रांसफर हो गया।
हमने एक छोटा-सा किराए का फ्लैट लिया—
दो कमरों का, पर हमारे लिए पूरा ब्रह्मांड था।
छुट्टी मिलते ही कभी पहाड़, कभी समुद्र,
कभी बस शहर की पुरानी गलियों में घूमते।
नया फ्लैट बुक किया,
इएमआई की फ़ाइलें, किराने की लिस्ट, प्रेज़ेन्टेशन के स्लाइड्स,
इन सब के बीच में हमारा प्यार बैकग्राउंड म्यूज़िक की तरह चलता रहता।
मैं कई बार कहती,
“नील, एक बार तुम्हारे घर चलें?
कम से कम कोशिश तो करनी चाहिए उन्हें मनाने की।”
नील का चेहरा सख्त हो जाता,
“जब तक वो तुम्हें ‘फँसाने वाली लड़की’ कहेंगे,
मैं उस घर की दहलीज़ नहीं लाँघूँगा।”
मैं मान जाती, पर मन में खुद को ही दोष देती।
तीसरे साल हमारे नए फ्लैट की चाबियाँ हाथ में आईं।
गृहप्रवेश के लिए मैंने अपने माँ-पापा, भाई, कुछ दोस्तों को बुलाया।
मैंने नील से फिर कहा,
“एक बार फिर फोन करो, प्लीज़।
तुम्हारे माँ-पापा के बिना ये घर अधूरा लगेगा।”
नील ने माँ को फोन किया।
उधर से ठंडी आवाज़ आई—
“हमारे लिए तो तू उसी दिन घर छोड़ गया था।
अब किस मुंह से कह रहा है कि आओ?”
मैंने मन ही मन सोचा,
“शायद समय के पास अभी भी हमारे लिए जगह नहीं निकली।”
फिर भी हम दोनों ने ईश्वर के नाम पर दीपक जलाया और नए घर में कदम रखा।
हँसी के बीच एक खालीपन भी था,
पर हमने उसे ज़्यादा जगह नहीं दी।
धीरे-धीरे आस-पास के रिश्तेदारों को नील की शादी की खबर भी होने लगी।
किसी ने घर जाकर कह दिया,
“बहू तो बहुत समझदार है, कॉलेज में पढ़ाती है, अच्छी लड़की है।”
तो किसी ने चुभो दिया,
“खाली हाथ आई है, इसीलिए नील अब हमसे दूर है।”
समय अपनी गति से चलता रहा।
एक शाम नील ने अचानक कहा,
“आर्या, अब हमें अपना परिवार भी बड़ा करना चाहिए।
तीन साल हो गए शादी को।”
मैंने थोड़ा सकुचाकर कहा,
“नील… मैं चाहती हूँ, पहले तुम अपने माँ-पापा से एक बार और बात करो।
मैं सच कहूँ, मुझे लगता है, बच्चे को लेकर वो और भी ज़्यादा हमारे खिलाफ हो जाएँगे।
अगर सब साथ हों तो अच्छा लगता है न…”
नील उदास हो गया,
“मेरा मन मानता नहीं कि वो कभी बदलेंगे।
पर ठीक है, तेरी खुशी के लिए एक बार और कोशिश करूँगा।”
ऐसा कहना ही था कि कुछ दिनों में घटना घट गई।
एक रात अचानक फोन आया—
“नील, पापा को हार्ट अटैक आया है।”
नील का चेहरा सफेद पड़ गया।
हम दोनों बिना कुछ सोचे-समझे उसी रात कार से निकल पड़े।
शिवनाथ जी आईसीयू में थे।
हम दोनों ने पारी-पारी से देखभाल की—
कागज़, दवाइयाँ, डॉक्टरों से बात, सब।
माँ ने शुरू में मुझसे बात ही नहीं की,
जो भी कहना होता, नील से कहती।
पाँच दिन बाद जब रिपोर्ट ठीक आई और शिवनाथ जी को प्राइवेट रूम में शिफ्ट किया गया,
माँ पहली बार मेरे पास आईं।
“बहू, पानी दे दे…”
मैंने चौंककर उनकी तरफ देखा,
आवाज़ पहले जैसी तल्ख़ नहीं थी।
मैंने ग्लास पकड़ाया,
उन्होंने एक घूँट लेकर आँखें पोंछ लीं।
“तुम लोग आए, अच्छा किया।
वरना… अकेले कैसे संभालती मैं सब?”
उनकी आवाज़ में थकान थी, गुस्सा नहीं।
मैंने धीमे से कहा,
“माँ, आप ऐसा मत कहिए।
हम आपका ही हिस्सा हैं, आप जहाँ रहेंगी, हम वहीं रहेंगे।”
माँ ने कुछ जवाब नहीं दिया।
रात में नील पापा के पास रुका, मैं माँ के कमरे में।
सुबह जब मैं जूस लेकर निकली,
तो देखा माँ और नील कॉरिडोर के कोने में धीमे-धीमे बात कर रहे हैं।
मैंने सोचा, “माँ शायद उसे समझा रही होंगी, अब सब ठीक करेंगे।”
पर कमरे में लौटते ही नील का चेहरा बदला हुआ था।
खामोश, सूजा हुआ, जैसे बहुत देर रोया हो।
मैंने पूछा,
“क्या हुआ? डॉक्टर ने कुछ कहा क्या?”
नील ने सिर्फ इतना कहा,
“कुछ नहीं… रात में ढंग से सो नहीं पाया, थकान है।”
हॉस्पिटल से डिस्चार्ज के बाद हम तीनों—माँ, पापा, नील—घर लौट आए।
मैंने नील से कहा,
“तुम माँ-पापा के साथ रहो, मैं आज रात अपने मायके चली जाती हूँ।
कल सुबह आकर सब देख लूँगी।
आप लोग इतने साल बाद साथ हो, थोड़ी देर शांति से बातें कर लो।”
नील ने बिना बहस किए कहा,
“जैसा तुम ठीक समझो।”
अगले दिन जब मैं वापस ससुराल पहुँची,
तो घर का माहौल अजीब था।
माँ ने मुझे देखते ही नजरें फेर लीं।
नील ने भी केवल “आ गई?” कहकर नज़र दूसरी तरफ कर ली।
मैंने सोचा, शायद थके हुए हैं,
माहौल भी भावुक है, अभी समय दूँ।
पर दो-तीन दिनों में मैंने महसूस किया,
नील का व्यवहार बदल गया है।
अब वो ऑफिस से लौटकर सीधे कमरे में चला जाता,
मेरे बारे में पहले जैसे उत्साहित सवाल नहीं करता—
“आज कॉलेज में क्या हुआ?
स्टूडेंट्स ने कैसी प्रेज़ेन्टेशन दी?”
उसकी बातें छोटी, जवाब ठंडे,
जैसे किसी ने हमारे बीच एक अदृश्य दीवार खड़ी कर दी हो।
मैंने एक रात तय किया,
“अब और नहीं, आज बात साफ करनी ही होगी।”
रात को जब हम अपने फ्लैट पर लौटे,
तो नील ने बैग सोफे पर रखकर सीधे बालकनी की तरफ रुख किया।
मैंने पीछे से दरवाज़ा बंद किया और उसके सामने जाकर खड़ी हो गई।
“नील, ये क्या चल रहा है?
तुम मुझसे भाग क्यों रहे हो?
कोई परेशानी है तो कहो, हम मिलकर हल करेंगे।
लेकिन ये… ये अजनबी वाला बर्ताव? मैं बर्दाश्त नहीं कर पा रही।”
नील ने पहले तो चुप रहने की कोशिश की,
फिर अचानक फूट पड़ा—
“आर्या, तुमने मुझसे एक बात छुपाई थी?”
“कौन-सी बात?”
“कि… तुम माँ नहीं बन सकती।”
मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
“क्… क्या?”
“माँ ने कहा, हॉस्पिटल में तुमने उनसे अकेले में बात की थी।
तुमने स्वीकार किया कि तुम्हें कॉलेज के समय डॉक्टर ने कहा था कि तुम्हें प्रॉब्लम है।
इसलिए जब भी मैं बच्चा करने की बात करता, तुम टाल जातीं—
कभी कहतीं, ‘पहले तुम्हारे माँ-पापा को मनाएँगे’,
कभी कहतीं, ‘अभी करियर का समय है…’
तुमने मुझसे ये बात क्यों छुपाई?”
मेरी आँखों में आँसू आ गए,
पर उसमें दर्द से ज़्यादा हैरानी थी।
“नील, तुम्हारी माँ से मैंने ऐसी कोई बात नहीं की।
हाँ, हॉस्पिटल की कैंटीन में उन्होंने मुझसे कहा था—
‘तुम्हें कुछ दवाइयाँ चल रही हैं क्या?’
क्योंकि रात में मैंने खुद ही ब्लड प्रेशर का टैबलेट लिया था।
मैंने कहा था, कॉलेज के समय मुझे थोड़ी हार्मोन की समस्या थी,
डॉक्टर ने कुछ साल दवा दी थी, अब सब नॉर्मल है।
उन्होंने पूछा था, ‘बच्चा करने में दिक्कत तो नहीं होगी?’
तो मैंने कहा था, ‘डॉक्टर ने कहा है, टाइम पर प्लान करूँ तो कोई समस्या नहीं होगी।’
बस इतनी ही बात हुई थी।
बाकी… जो तुम्हें बताया गया, वो मैं पहली बार तुम्हारे मुँह से सुन रही हूँ।”
नील ने सिर पकड़ लिया,
“तो माँ झूठ बोलेंगी? वो ऐसा क्यों करेंगी?”
मैंने गहरी साँस ली,
“शायद वो आज भी यही सोचती हैं कि मैं तुम्हारे लिए कोई अहमियत नहीं रखती हूँ।
उनकी नजरों में बहू वही परफेक्ट है जो ढेर सारा दहेज लाए,
घर भी संभाले और बच्चा भी तुरंत दे दे।
मैंने न दहेज दिया, न उनके मन का ‘समय पर पोता’।
उन्होंने जो देखा, उससे ज़्यादा जो सोचा, वो तुम्हें कह दिया।”
नील चुप रहा।
मैंने उसके हाथ पर हाथ रखा,
“नील, अगर सच में मुझे कभी ऐसा लगता कि मैं माँ नहीं बन सकती,
तो सबसे पहले तुमसे कहती।
और शायद तुमसे पहले अपने आप से लड़ती।
हम ये भी सोच सकते थे कि बच्चा गोद ले लें,
पर ये सब तभी होता जब हम पहले एक-दूसरे पर भरोसा करते।”
नील की आँखों में पछतावा साफ झलक रहा था।
“मैं… माँ की कसम में बंध गया था, आर्या।
उन्होंने कहा, ‘अगर तू इस सच को जानते हुए भी आर्या के साथ बच्चा करेगा, तो हमारा खून माफ़ नहीं करेगा।’
मैंने सोचा, तुमने सच छुपाया है, इसलिए… तुमसे दूर रहना ही बेहतर है।
पर एक बार… एक बार भी दिमाग में नहीं आया कि सीधे तुमसे ही पूछ लूँ!”
मैंने आँसू पोंछते हुए कहा,
“प्यार पर भरोसे की मुहर रोज लगानी पड़ती है, नील।
सिर्फ कोर्ट के पेपर पर साइन कर देने से बात खत्म नहीं होती।
आओ, डॉक्टर के पास चलते हैं।
तुम्हारी भी जाँच, मेरी भी जाँच…
जो सच होगा, हम दोनों साथ मिलकर उसका सामना करेंगे।
पर अब आगे से किसी को हमारे बीच दीवार नहीं बनने देंगे—
चाहे वो अपने हों या पराए।”
नील ने मेरे दोनों हाथ पकड़ लिए,
“क्या तुम… मुझे एक मौका और दोगी?”
मैं हल्का-सा मुस्कुराई,
“शर्त है, इस बार सवाल पहले मुझसे पूछोगे,
बाकी दुनिया से बाद में।”
अगले हफ्ते हम दोनों अस्पताल पहुँचे।
कई तरह की जाँच, रिपोर्ट्स, रिपोर्ट्स पर डॉक्टर की उँगलियाँ।
आख़िर डॉक्टर ने साफ कहा,
“आप दोनों में कोई बड़ी समस्या नहीं है।
हाँ, थोड़ा स्ट्रेस, अनियमित लाइफस्टाइल,
और शायद कुछ पुराने हार्मोन इश्यूज़—
पर ये सब दवाइयों और टाइमिंग से ठीक हो सकता है।
फर्टिलिटी ईशू कोई एक का नहीं, दोनों का मामला होता है।
इसे हथियार बनाकर एक-दूसरे पर चलाना सबसे बड़ा अन्याय है।”
डॉक्टर के केबिन से बाहर निकलते ही नील ने गहरी साँस ली,
“सच कहूँ, डर लग रहा था—अगर सच में कोई बड़ी दिक्कत निकल आती तो?”
मैंने हल्के से उसका हाथ दबाया,
“हम दोनों साथ होते न, फिर कुछ भी बड़ा नहीं लगता।”
घर पहुँचते-पहुँचते नील ने कहा,
“आर्या, मैंने माँ-पापा की कल की बुकिंग कैंसल कर दी है।
जो झूठ किसी और के सम्मान को तोड़ दे,
उसके साथ यात्रा शुरू करने में मुझे शर्म आती है।
अब अगर हम कभी उन्हें बुलाएँगे,
तो सच बताकर, बराबरी पर खड़े होकर।”
मैंने उसकी तरफ देखा,
“नील, मैं तुम्हें तुम्हारे माँ-बाप से अलग नहीं करूँगी।
पर अब से, जो भी रिश्ता होगा, वो सच और सम्मान पर होगा।
जब तक वो मुझे ‘फँसाने वाली लड़की’ समझेंगे,
मैं बहू नहीं, सिर्फ तुम्हारी पत्नी ही रहूँगी।”
नील ने जैसे खुद से वादा किया,
“मैं कोशिश करूँगा, उन्हें भी बदलूँगा।
लेकिन अगर वो न बदले,
तो भी अब मैं उन बातों को हमारे कमरे तक नहीं लाऊँगा।
ये घर, ये रिश्ता… हमारा है,
इसका फैसला सिर्फ हम करेंगे।
और हाँ,”
वो मुस्कुराया,
“आज से मैं माँ की कसम नहीं,
तुम्हारे विश्वास की कसम खाता हूँ।”
मैंने हँसते-रोते हुए कान पकड़ने का इशारा किया,
“कसम-वसम छोड़ो, बस चुपचाप मेरे साथ प्रीकॉन्सेप्शन काउंसलिंग में चलो।
और अगर कल को भगवान बच्चा दे या न दे,
हम पहले खुद को संभालेंगे, फिर दुनिया को।”
नील ने मुझे बाहों में भरकर मेरे माथे पर हल्का-सा चुंबन दिया,
“तू मेरे साथ हो न,
तो किसी भी रिपोर्ट, किसी भी रिश्ते, किसी भी ताने से डर नहीं लगता।”
बालकनी के शीशे में अब मेरा अकेला चेहरा नहीं था—
उसके पीछे नील का चेहरा भी साफ दिख रहा था।बाहर आसमान में बादल अब भी थे,
पर कहीं-कहीं से धूप की पतली-सी किरण झाँक रही थी।
जैसे हमारे रिश्ते में—
गलतफहमियों के बादल थे,
पर भरोसे की रोशनी उन्हें चीरकर निकलने लगी थी।
मूल लेखिका
वीणा सिंह