मैं डिलीवरी पर मायके नहीं आऊंगी !! – स्वाती जैंन

काव्या , मैं इस बार भी तेरी डिलीवरी मायके में ही करवाऊंगी , मैंने तेरी सास से भी बात कर ली है उन्हें भी कोई एतराज नहीं हैं , मैं तो तुझे सातवे महीने में ही घर ले आती मगर तूने मना कर दिया खैर अब नौंवा महिना लग गया हैं दो दिन बाद ही … Read more

एक बार टूटा भरोसा फिर नही जुड़ता। – लक्ष्मी त्यागी

रवीना,बैठी हुई लेपटॉप पर अपना डिजाइनिंग का कार्य कर रही थी ,और अपने मेल देख रही थी। अचानक रवीना के हाथ काँप उठे, उसने अपना लैपटॉप बंद कर दिया,स्क्रीन पर जो आखिरी मेल खुला था, उसमें सिर्फ दो शब्द लिखे थे — “I’m sorry.” उन शब्दों को उसने पढ़ा ,किन्तु  रवीना जानती थी, अब कोई … Read more

कैसे यकीन करूं – विमला गुगलानी

रामनाथ की शहर की मेन बाजार में स्टेशनरी की दुकान थी ।कई साल पहले उसके पिताजी सुभाष जी ने शुरू की थी। उस समय वो स्कूलों की किताबें, कापियां व कुछ इसी प्रकार का स्टेशनरी का सामान रखते थे। दुकान भी छोटी थी।जब रामनाथ बड़ा हुआ और पढ़ लिख भी गया तो उसने दुकान पर … Read more

मैं असमर्थ नहीं हूं – मंजू ओमर 

अनीता आठ महीने के मासूम अथर्व को लेकर अंधेरी रात में घर से निकल गई।बाहर निकली तो हल्की बरसात हो रही थी।वो अथर्व को सीने से चिपकाए आंचल से ढककर तेज तेज कदमों से चली जा रही थी। तभी बरसात तेज हो गई और वो एक बिल्डिंग की गेट की ओट में खड़ी हो गई।उसे … Read more

और वह नहीं गई – शिव कुमारी शुक्ला 

उसके पत्रकी प्रतीक्षा में धन्नो ने   लम्बे -लम्बे एक,दो,तीन नहीं पूरे चार साल बिता दिए, किन्तु उसका पत्र नहीं आया।राह देखते -देखते उसकी आंखें पथरा गईं ना जग्गू आया ना उसका पत्र। जैसे वहां के वातावरण में जा देशप्रेम की धुन में वह अपने परिवार को ही भूल गया था। बूढ़ी मां और बूढ़ी हो … Read more

मेरे मायके वाले बार बार उपहार क्यों दे ?? – स्वाती जैंन

बहू , यह भड़कीले लाल रंग की साड़ी दी है तुम्हारी मां ने उपहार में मुझे , क्या तुमने उन्हें बताया नहीं कि मैं ऐसे भड़कीले रंग नहीं पहनती ! अरे मेरी पसंद ना सही समधी जी की पसंद का तो ख्याल रखते , तुम्हारे पापा ने आलोक जी को यह केसरी रंग का कुर्ता … Read more

बुढ़ापे का असली सहारा न बेटी न बेटा बल्कि बहू होती है। – सीमा सिंघी

(सखियों हम आम तौर पर देखते हैं हर घर में जब सास का अंत समय आता है तब उसे समझ आता है मगर तब तक उसकी बहू की जिंदगी तो बर्बाद हो चुकी होती है। जो गलती बहू ने की ही नहीं । उसे उसकी सजा मिल गई होती है। आप सब सोच रही होगी। … Read more

बूढा – परमा दत्त झा

सुख के सब साथी दुख में न कोई-रामाधार यह गीत गाते हुए काम कर रहा था।आज तबियत ढीली थी और सत्तर का यह था। आवाज बहुत सुन्दर,ऐसा लगता मानो मुकेश गा रहे हों।सो सब कार्यक्रम में बुलाते थे।अब तो मुंबई भी बुलाया जाता था। मगर घर में -घर में इसकी औकात दाल के बराबर भी … Read more

असमर्थ का संघर्ष –  पुष्पा पोरवाल 

     वक्त से पहले कंधों पर पड़े बोझ को सोना ने बखूबी संभाल लिया है छोटे-छोटे हाथ अब हर काम कुशलता और सरलता से निपटने लगे हैं प्रारंभ में तो खाना पकाते वह अक्सर जल जाया करती थी गले पर जलने का निशान उसकी नादानी की कहानी कहता रहता है।  खिलंदड़ी खिलाकर हंसने वाली सोना जाने … Read more

आत्मसम्मान की बलि – रोनिता कुंडू

मम्मी! आप दादी की इतनी बातें सुनती हो, पर फिर भी उनको कुछ बोलने में असमर्थ क्यों हो? जबकि आपकी कोई गलती भी नहीं होती है? कभी बुआ कभी चाचू और अब तो चाची भी आपको कुछ भी बोल जाती है, जबकि चाची को आए हुए अभी कुछ ही दिन हुए हैं, 13 साल की … Read more

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