वह मकान बिकाऊ नहीं है – के कामेश्वरी 

दीनानाथ जी ने अपने चश्मे को कुर्ते के कोने से साफ किया और फिर से नाक पर टिका लिया। सामने गेट पर पेंटर ‘शांति-कुंज’ लिख रहा था। नीले रंग के गेट पर सुनहरे अक्षरों में लिखा जा रहा वह नाम दीनानाथ जी के लिए सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि चालीस साल की तपस्या का फल … Read more

पुराना कोट

 “सुधा! अभी तक बाबूजी नहीं आए?” समीर ने अपनी पत्नी से ऊँची आवाज़ में पूछा, जो रसोई में खाना गर्म कर रही थी। सुधा बाहर आई, उसके चेहरे पर भी चिंता थी। “नहीं, मैंने फोन भी किया था, पर वो उठा नहीं रहे। बारिश बहुत तेज़ है, शायद कहीं रुक गए होंगे। आप नाहक ही … Read more

अहंकार की राख

 सुमित्रा जी ने एक निवाला खाया और प्लेट सरका दी। “ये क्या बनाया है? इसमें न घी है न मेवा। हमारे यहाँ खाना शाही होता है। तुम्हें तो बस दाल-रोटी ही बनानी आती होगी। तुम्हारे बाप ने सिखाया ही क्या है?” शहर के पॉश इलाके में बने ‘विला नंबर 40’ के बाहर आज अलग ही … Read more

वक्त की बिसात

समीर रोता हुआ उठा था। उसे चोट शरीर पर नहीं, बल्कि रूह पर लगी थी। उस दिन उसके पिता रामदीन ने भी उसे डांटा था और समझाया था कि “बेटा, हम छोटे लोग हैं। हमें बड़े लोगों की बराबरी नहीं करनी चाहिए। वो सोने का चम्मच लेकर पैदा हुए हैं और हम लोहे की कुदाल।” … Read more

सूटकेस में बंद खुशियां

शिखा ने आगे कहा, “पापा, हम आपको यहाँ ‘बोझ’ समझकर नहीं लाए हैं। सच तो यह है कि हमें आपकी ज़रूरत थी। उस घर की चारदीवारी में हम सिर्फ़ ‘ज़िम्मेदारियाँ’ निभा रहे थे, ‘रिश्ते’ नहीं। रवि को अपना बचपन याद आ रहा था, जब आप उसे कंधे पर बिठाकर घुमाते थे। आज वो आपको घुमाना … Read more

खनकते सिक्के

रवि एक मेधावी छात्र था। उसके पिता, सोहनलाल, एक पुरानी कपड़ा मिल में दिहाड़ी मज़दूर थे, जहाँ काम मिलने का कोई पक्का भरोसा नहीं होता था। माँ, कौशल्या, घर पर ही बीड़ी बनाने का काम करती थीं, जिससे घर में नमक-तेल का खर्च निकल आता था। रवि ने बारहवीं की परीक्षा ज़िले में टॉप की … Read more

 ब्याज़ में मिली इज़्ज़त – लतिका श्रीवास्तव 

“अंजलि ने जैसे ही उस पुराने, काई लगे लोहे के गेट का ताला खोला, उसकी माँ, सावित्री का हाथ कांप गया। वह चाबी, जो अंजलि ने अभी-अभी उनकी हथेली पर रखी थी, उसका वज़न सावित्री को पहाड़ जैसा लग रहा था। यह सिर्फ़ एक मकान की चाबी नहीं थी, यह उस खोए हुए सम्मान की … Read more

अच्छा बेटा बनने के चक्कर में अपनी पत्नी के साथ गलत तो नहीं कर सकता – संजय सिंह

राजेश अपने माता-पिता का इकलौता बेटा था। माता-पिता ने उसे खूब पढ़ाकर, अच्छे संस्कार देकर इस समाज में रहना और जीवन यापन करना सिखाया ।अब राजेश बिजली विभाग में नौकरी भी करने लगा। रोजाना वे अपने दफ्तर बस से जाया करता। इस बस में मीरा नाम की लड़की कॉलेज जाया करती है। समय बीतता गया। … Read more

कभी तो बहू की भी प्रशंसा की जाए वरना – संध्या त्रिपाठी

वाह …आज क्या कटहल की सब्जी बनी है…  बहुत ही स्वादिष्ट बनी है… डाइनिंग टेबल पर बैठे सभी लोगों ने कटहल की सब्जी की बहुत प्रशंसा की..!  आराध्या मन ही मन खुश हो रही थी कि सब्जी के साथ उसकी भी तारीफ होगी…क्योंकि सब्जी तो वो ही बनाई है…!  पर कुछ ही देर में सासू … Read more

ममता की चौखट – हेमलता गुप्ता 

 गरिमा उस रात बहुत रोई। सुमित ने उसे समझाया, “गरिमा, माँ का स्वभाव ऐसा ही है। तुम दिल पर मत लो। मेरे लिए तुम ही इस घर की लक्ष्मी हो।” पर गरिमा के मन में एक सवाल घर कर गया था—क्या प्यार और सेवा का कोई मोल नहीं होता? क्या रिश्तों की बोली सिर्फ पैसों … Read more

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