पहला प्यार – डाॅ उर्मिला सिन्हा 

शाम हो चली थी।सामने लंबे वृक्षों की घनी छाया सीधे पहाड़ी से नीचे उतर रही थी। घने लंबे पेड़ों झाड़ियों से आच्छादित वह स्थान मंडप सा प्रतीत होता था। ऊंची पहाड़ी से निकलती जल की धारा उछाल मार रही थी।  गरिमा  को यह डूबते सूर्य की पीली रौशनी, पेड़-पौधों का झुरमुट उसपर चहचहाते चिड़ियों का … Read more

प्यार का एहसास – रश्मि वैभव गर्ग

प्रेम एक अनुपम एहसास है, जिसे लफ़्ज़ों में पिरोना संभव ही नहीं ।जीवन बगिया में प्रेम की नमी हो तो जीवन में वसंत लहलहाता रहता है । यूँ तो प्यार किसी दिन , महीने का मोहताज़ नहीं होता,लेकिन फिर भी फ़रवरी को माह ए इश्क़ कहा जाता है । इस महीने से जुड़ी मेरी भी … Read more

एक छत के नीचे दो दुनिया

*बुढ़ापे की लाठी वो नहीं जो घर के कोने में रखी हो, बल्कि वो है जो लड़खड़ाते वक्त हाथ थाम ले, चाहे वो हाथ सात समंदर पार से ही क्यों न बढ़ा हो।* — फ़ोन रखने के बाद, रघुनाथ जी ने कड़वाहट से कहा, “विमला, तू कब तक झूठ बोलेगी? जो बेटी पांच सौ किलोमीटर … Read more

मुखौटा और आईना – विभा गुप्ता

*दुनिया के लिए जिसकी जुबान पर शहद घुला रहता है, घर की चारदीवारी में वही जुबान अपनी जन्मदात्री के लिए खंजर कैसे बन जाती है? क्या एक रिश्ता दूसरे रिश्ते की हत्या करके ही पनप सकता है?* —  “समीर, मैं एक औरत हूँ। और मैं अपना भविष्य देख रही हूँ। आज तुम्हारे पास जवानी है, … Read more

डिग्रियां तो बहुत मिलीं, मगर संस्कार सिलेबस से बाहर थे – रश्मि प्रकाश

*जिस मां ने अपने गहने बेचकर बेटे को ‘जज’ बनाया, आज वही बेटा अपनी मां को ‘कटघरे’ में खड़ा करके पूछ रहा था—”तुम मेरे स्टेटस में कहां फिट होती हो?”* — “मुझे बस एक बात बता दे बेटा,” जानकी की आवाज़ भर्रा गई, “तेरी उन मोटी-मोटी किताबों में, तेरे उस संविधान में, या तेरे उस … Read more

रद्दी में फेंका हुआ वो पुराना ‘नोट’ – मीना गुप्ता

*सरकार तो सिर्फ कागज के नोटों का रंग बदलती है, लेकिन जब अपनी ही खून-पसीने से पाली हुई औलाद का रंग बदलता है, तो इंसान जीते जी मर जाता है।* — *तुम्हारी हवेली के पैसे तुम्हें मुबारक हों। हमने उसे तुम्हें ‘दान’ कर दिया। लेकिन अपना स्वाभिमान हम तुम्हें दान नहीं कर सकते। मैं और … Read more

रिश्तों का तराजू – गरिमा चौधरी

*जब समर्पण का मूल्य केवल एक तरफ से चुकाया जाए, तो वह रिश्ता नहीं, सौदा बन जाता है। क्या एक पत्नी का धर्म सिर्फ पति के माता-पिता की सेवा करना है, जबकि पति उसके माता-पिता का हाल तक न पूछे?* — “मैं तुलना नहीं कर रही समीर, मैं समानता मांग रही हूँ,” रागिनी ने कहा। … Read more

रिमोट कंट्रोल वाली गृहस्थी – डॉ पारुल अग्रवाल

*शादी के बाद बेटी ‘परायी’ नहीं होती, लेकिन अगर वह अपने ससुराल को ‘अपना’ नहीं मानती, तो वह पूरी जिंदगी एक ऐसे सराय में गुजार देती है जहाँ उसका बिस्तर तो होता है, पर सुकून नहीं।*  “मीरा, क्या हम कभी एक बार भी बिना तुम्हारे ‘मायके’ के रेफरेंस के बात नहीं कर सकते? यह हमारा … Read more

माँ के बाद… बाबूजी का ‘मायका’ – रमा शुक्ला

 “माँ के जाने के बाद बेटी को लगा कि अब मायके के दरवाजे उसके लिए बंद हो चुके हैं, वहां अब सिर्फ भाई-भाभी का राज होगा। लेकिन जब उसने ‘पराई’ होकर उस घर की देहरी लांघी, तो एक बूढ़े पिता ने अपनी कांपती हथेलियों में कुछ ऐसा थाम रखा था, जिसने ‘मायके’ की परिभाषा ही … Read more

 आशीर्वाद का मोल – कमलेश राणा 

 “एक बेटे को लगता था कि पिता के सामने झुकने से उसका ‘रुतबा’ कम हो जाएगा, लेकिन उसे क्या पता था कि जिस ऊंचाई पर वह आज खड़ा है, उसकी नींव में उसके पिता की झुकी हुई कमर का ही सहारा है। पढ़िए एक ऐसी कहानी जो आपकी रूह को झकझोर देगी।” — “पापा, अब … Read more

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