*क्या एक औरत का हत्यारा होना जायज़ है अगर वो गुनाह उसने अपनी बेटी की आबरू और भविष्य को बचाने के लिए किया हो? पढ़िए एक ऐसी माँ की दास्तां जिसने अपनी बेटी के सपनों में रंग भरने के लिए अपनी आत्मा को हमेशा के लिए काला कर लिया। फैसला आपको करना है—वो माँ थी या मुजरिम?*
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बारिश की बूंदें खिड़की के शीशे पर लगातार दस्तक दे रही थीं, ठीक वैसे ही जैसे मीरा के दिल के दरवाज़े पर आज अतीत खटखटा रहा था। ड्राइंग रूम में गेंदे के फूलों की महक फैली हुई थी। पूरा मोहल्ला आज मीरा के घर के बाहर खड़ा था। ढोल-नगाड़े बज रहे थे। वजह ही इतनी बड़ी थी। मीरा की बेटी, ‘पलक’, आज अपने शहर की जिला कलेक्टर (DM) बनकर पहली बार घर लौट रही थी।
सफेद साड़ी में लिपटी मीरा कोने वाली कुर्सी पर बैठी थी। उसके चेहरे पर मुस्कान थी, लेकिन आँखों में एक गहरा समंदर था जिसमें डर और संतोष दोनों की लहरें उठ रही थीं। लोग कह रहे थे, “मीरा दीदी, आपकी तपस्या सफल हो गई। विधवा होकर भी आपने बच्ची को क्या खूब पाला है।”
‘विधवा’… यह शब्द सुनते ही मीरा का हाथ अपने आप अपने गले की तरफ चला गया, जहाँ कभी मंगलसूत्र हुआ करता था। पच्चीस साल… पूरे पच्चीस साल बीत गए उस काली रात को, लेकिन आज भी जब बिजली कड़कती है, तो मीरा की रूह कांप जाती है।
आज पलक की गाड़ी का सायरन गूंज रहा था, लेकिन मीरा के कानों में उस रात की चीखें गूंज रही थीं।
मीरा की शादी ‘सुरेश’ से हुई थी। सुरेश, दिखने में जितना handsome था, अंदर से उतना ही खोखला और हैवान। शादी के शुरुआती दो साल तो ठीक बीते, लेकिन जब सुरेश की कपड़े की दुकान में आग लगी और व्यापार ठप हुआ, तो वह इंसान से जानवर बन गया। शराब उसकी नस-नस में उतर गई। और उस शराब का नशा उतरता था मीरा के जिस्म पर—बेल्ट से, जूतों से, और गालियों से।
मीरा सब सहती रही। पुरानी मान्यताओं वाली औरत थी, पति को परमेश्वर मानती थी। सोचती थी कि शायद बच्चा होने के बाद सुरेश सुधर जाएगा। पलक का जन्म हुआ। फूल सी बच्ची। मीरा को लगा अब घर में खुशियां आएँगी। लेकिन सुरेश को बेटी का होना नागवार गुज़रा। “एक तो खाने को पैसे नहीं, ऊपर से यह बोझ,” वह अक्सर पलक को देखकर थूक देता था।
वक्त बीतता गया। पलक सात साल की हो गई थी। वह पढ़ने में बहुत होशियार थी। मीरा घरों में झाड़ू-पोछा करके और रात को मोमबत्तियां बनाकर जो पैसे जोड़ती, उससे पलक की फीस भरती। सुरेश को इससे कोई मतलब नहीं था, उसे बस शाम को अपनी बोतल चाहिए होती थी।
लेकिन वह रात… वह कयामत की रात थी।
दीवाली का दिन था। बाहर पटाखे फूट रहे थे। मीरा ने पिछले छः महीनों से पाई-पाई जोड़कर पाँच हज़ार रुपये जमा किए थे। यह पैसे उसने पलक के स्कूल की फीस और उसकी ठंड के कपड़ों के लिए चावल के डिब्बे में छिपाकर रखे थे। अगर कल फीस जमा नहीं होती, तो पलक का नाम स्कूल से काट दिया जाता।
रात के 10 बजे सुरेश लड़खड़ाता हुआ घर आया। उसकी आँखें लाल थीं, और वह नशे में धुत था। आते ही उसने मीरा के बाल पकड़े और दीवार पर दे मारा।
“पैसे निकाल! मुझे पता है तूने पैसे छिपा रखे हैं। आज जुए में सब हार गया हूँ, मुझे अभी और खेलना है। पैसे दे वरना इस लड़की को उठाकर ले जाऊंगा और बेच आऊंगा।”
मीरा कांप गई। उसने सुरेश के पैर पकड़ लिए। “नहीं… सुरेश, भगवान के लिए ऐसा मत करो। वो पलक की फीस के पैसे हैं। उसकी ज़िंदगी बर्बाद हो जाएगी।”
सुरेश ने मीरा के पेट पर लात मारी। मीरा दूर जा गिरी। सुरेश रसोई में गया और डिब्बे खंगालने लगा। उसे वो पोटली मिल गई।
“ये रहे पैसे!” वह शैतानी हंसी हंसा।
मीरा शेरनी की तरह झपटी। आज सवाल उसके पति का नहीं, उसकी बेटी के भविष्य का था। उसने सुरेश का हाथ पकड़ लिया। “मैं यह पैसे नहीं ले जाने दूंगी। मार डालो मुझे, पर मेरी बच्ची के नसीब के पैसे नहीं दूंगी।”
छीना-झपटी में सुरेश ने मीरा को धक्का दिया। मीरा का सिर मेज के कोने से टकराया, खून बहने लगा। सुरेश हंस रहा था। लेकिन तभी, अत्यधिक नशे और उत्तेजना के कारण सुरेश को ज़बरदस्त अस्थमा का अटैक आया। उसकी सांसें उखड़ने लगीं। वह अपनी छाती पकड़कर ज़मीन पर गिर पड़ा। उसका इनहेलर (सांस की पंप) अलमारी के ऊपर रखा था।
सुरेश तड़प रहा था। उसका हाथ अलमारी की तरफ उठ रहा था। “द… दवा… इन… इनहेलर…” उसके मुँह से झाग निकल रहा था।
मीरा अपना सिर पकड़े उठी। उसके सामने सुरेश तड़प रहा था। मीरा की नज़र सुरेश पर थी, फिर पास ही सहमी खड़ी सात साल की पलक पर गई, जो डर के मारे थर-थर कांप रही थी। और फिर उसकी नज़र उन पाँच हज़ार रुपयों पर गई जो सुरेश की मुट्ठी से गिर गए थे।
उस एक पल में मीरा के अंदर का ‘पतिव्रता धर्म’ और ‘ममता’ के बीच जंग छिड़ गई।
अगर वह इनहेलर दे देती है, तो सुरेश बच जाएगा। वह पैसे ले जाएगा, जुए में उड़ा देगा, और कल फिर वही मार-पीट, वही नर्क। शायद वह सच में पलक को बेच दे।
और अगर वह इनहेलर नहीं देती… तो वह आज़ाद हो जाएगी। पलक का स्कूल, उसका भविष्य बच जाएगा।
सुरेश की आँखें फटी जा रही थीं। वह मीरा की तरफ हाथ बढ़ा रहा था। मीरा वहीं खड़ी रही। पत्थर बनकर। उसने इनहेलर की तरफ देखा, लेकिन कदम नहीं बढ़ाए। बाहर पटाखों का शोर था, और अंदर मौत का सन्नाटा।
दो मिनट… बस दो मिनट लगे। सुरेश का हाथ नीचे गिर गया। उसकी पथराई आँखें छत को ताकती रह गईं।
मीरा ने एक गहरी सांस ली। उसने झुककर सुरेश की मुट्ठी से पैसे निकाले और वापस अपनी साड़ी के पल्लू में बांध लिए। फिर उसने इनहेलर उठाया, उसे साफ़ किया और सुरेश के बेजान हाथ में थमा दिया, ताकि दुनिया को लगे कि उसने कोशिश की थी पर वह खुद ले नहीं पाया।
अगली सुबह मीरा ने रोने-धोने का नाटक किया। दुनिया ने माना कि शराब और अस्थमा ने सुरेश की जान ले ली। किसी को शक नहीं हुआ।
उस दिन के बाद मीरा ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उसने उस पाप के बोझ को अपने सीने में दफ़न कर लिया और अपनी पूरी ज़िंदगी पलक को बनाने में लगा दी। वह दिन-रात काम करती, लोगों के ताने सुनती, लेकिन पलक की पढ़ाई में कोई कमी नहीं आने देती। वह पलक से हमेशा कहती, “तेरे पापा बहुत अच्छे थे बेटा, बीमारी ने उन्हें छीन लिया। उनका सपना था कि तू बड़ी अफसर बने।”
आज, पच्चीस साल बाद, वह सपना पूरा हो गया था।
तभी बाहर शोर बढ़ा। नीली बत्ती वाली गाड़ी गेट पर आकर रुकी। पलक गाड़ी से उतरी। वह खाकी साड़ी में थी, चेहरे पर गज़ब का आत्मविश्वास। मीरा दौड़कर बाहर आई।
पलक ने आते ही मीरा के पैर छुए और उसे गले लगा लिया। “माँ! देखो, मैं कलेक्टर बन गई। यह सब तुम्हारी मेहनत है।”
मीरा की आँखों से आंसू बह निकले। “नहीं बेटा, यह तेरी मेहनत है।”
शाम को घर के आंगन में एक छोटा सा समारोह रखा गया था। पलक माइक पर बोली, “मेरी ज़िंदगी में दो ही भगवान हैं। एक मेरी माँ, जिन्होंने विधवा होते हुए भी मुझे पिता की कमी महसूस नहीं होने दी। और दूसरे मेरे स्वर्गीय पिता जी… मुझे याद है बचपन में माँ बताती थीं कि पापा मुझसे कितना प्यार करते थे। अगर आज वो ज़िंदा होते, तो कितने खुश होते।”
मीरा एक कोने में खड़ी सुन रही थी। पलक के हर शब्द उसके दिल पर हथौड़े की तरह लग रहे थे। ‘अगर वो ज़िंदा होते…’ मीरा जानती थी कि अगर वो ज़िंदा होते, तो आज पलक कलेक्टर नहीं, बल्कि किसी कोठे की रौनक या किसी शराबी की पत्नी होती।
कार्यक्रम खत्म होने के बाद, रात को जब सब मेहमान चले गए, पलक मीरा के पास आई। उसने एक मखमली डिब्बा मीरा के हाथों में रखा।
“माँ, यह मेरी पहली सैलरी से तुम्हारे लिए सोने के कंगन। तुमने पापा के इलाज में अपने सारे गहने बेच दिए थे न? मुझे याद है। आज मैंने वो कंगन वापस बनवा दिए।”
मीरा के हाथ कांपने लगे। उसे वो रात याद आ गई। उसने गहने सुरेश के इलाज में नहीं बेचे थे, वो तो सुरेश ने जुए में हार दिए थे। और सुरेश का इलाज? उसने तो उसे मरने दिया था।
मीरा ने पलक का चेहरा देखा। उस चेहरे पर सुकून था, इज़्ज़त थी, और एक उज्जवल भविष्य था। मीरा ने मन ही मन ईश्वर से कहा, *”हे प्रभु! मैंने एक इंसान को मरने दिया, मैं हत्यारी हूँ। मुझे जो सज़ा देनी है दे देना। मुझे नर्क में डाल देना। लेकिन अगर उस एक ‘पाप’ की वजह से मेरी बेटी की ज़िंदगी ‘स्वर्ग’ बन गई, तो मैं यह पाप हर जन्म में करने को तैयार हूँ।”*
मीरा ने कंगन पहन लिए। उन कंगनों की खनक में उसे सुरेश की चीखें नहीं, बल्कि पलक की आज़ादी सुनाई दी। उसने खुद को माफ तो नहीं किया था, लेकिन उसने अपने फैसले को स्वीकार कर लिया था।
उसने पलक का माथा चूमा और कहा, “जा सो जा बेटा। कल तुझे बहुत काम करना है। तुझे एक ईमानदार अफसर बनना है, ताकि तेरी माँ का सिर कभी न झुके।”
पलक चली गई। मीरा खिड़की पर वापस आ गई। बारिश अब थम चुकी थी। आसमान साफ़ था। मीरा को लगा कि शायद उसके जीवन का तूफ़ान भी अब शांत हो गया है। पाप और पुण्य का हिसाब ऊपर वाला करेगा, लेकिन एक माँ के लिए उसकी संतान की सुरक्षा से बड़ा कोई धर्म नहीं होता।
उसने सुरेश की तस्वीर की तरफ देखा जो दीवार पर टंगी थी, और धीरे से बुदबुदाई, “तेरी मौत ने इसे ज़िंदगी दी है सुरेश। तेरा मरना ही इसके लिए वरदान था।”
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**कहानी का शीर्षक:**
**कफ़न के पैसे और बेटी की उड़ान**
**हूक लाइन:**
*दुनिया की नज़र में वह एक बेचारी विधवा थी जिसने सिलाई करके बेटी को कलेक्टर बनाया, लेकिन उस सफलता की नींव में एक ऐसी खौफनाक रात दफ़न थी, जिसका सच अगर बाहर आ जाता, तो वह माँ नहीं, डायन कहलाती।*
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**लेखक का संदेश:**
यह कहानी सही और गलत के बीच की उस धुंधली लकीर पर खड़ी है जहाँ फैसले आसान नहीं होते। मीरा ने जो किया, कानूनन वह अपराध था, लेकिन एक माँ की नज़र से देखें तो वह रक्षा थी। क्या परिस्थितियां इंसान को इतना मजबूर कर सकती हैं कि किसी की जान बचाने से ज्यादा ज़रूरी उसे मरने देना हो जाए?
**कहानी के अंत में एक सवाल:**
अगर आप मीरा की जगह होते, और आपके सामने चुनाव होता—एक हैवान पति की जान या आपकी मासूम बेटी का भविष्य—तो आप क्या चुनते? क्या मीरा ने सही किया? अपने जवाब कमेंट में बेझिझक लिखें।
**“अगर इस कहानी ने आपके रोंगटे खड़े कर दिए और दिल को झकझोर दिया, तो लाइक, कमेंट और शेयर ज़रूर करें। अगर आप इस पेज पर पहली बार आए हैं, तो इंसानियत और रिश्तों की परतों को खोलने वाली ऐसी ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें। धन्यवाद!”**
लेखिका : कविया गोयल