पाप और पुण्य – गरिमा चौधरी

बनारस के घाटों से थोड़ी दूर, एक पुरानी लेकिन बेहद भव्य हवेली ‘संस्कार भवन’ में आज सुबह से ही गहमागहमी थी। हवेली के मुखिया, पंडित दीनानाथ शास्त्री, शहर के माने हुए विद्वान और धर्म-कर्म में विश्वास रखने वाले व्यक्ति थे। आज का दिन उनके लिए बहुत महत्वपूर्ण था। उनके दिवंगत पिता की 50वीं पुण्यतिथि थी और इस अवसर पर उन्होंने एक ‘महा-यज्ञ’ और ‘स्वर्ण-तुला दान’ का आयोजन रखा था।

पूरे शहर में इस आयोजन की चर्चा थी। दीनानाथ जी ने संकल्प लिया था कि वे अपने वजन के बराबर अनाज और ग्यारह तोले का सोने का मुकुट कुलदेवी के मंदिर में चढ़ाएंगे। उनका मानना था कि इस ‘महा-दान’ से उनके पूर्वजों को स्वर्ग में उत्तम स्थान मिलेगा और उनके परिवार के ‘पुण्य’ का घड़ा भर जाएगा।

हवेली के आंगन में हवन कुंड सज चुका था। 21 विद्वान पंडित मंत्रोच्चार की तैयारी कर रहे थे। दीनानाथ जी अपनी धोती ठीक करते हुए नौकरों पर चिल्ला रहे थे।

“अरे रामू! वो घी के पीपे अभी तक भंडार गृह से बाहर क्यों नहीं आए? और वो मखमली आसन कहाँ है? क्या तुम्हें पता नहीं कि आज शहर के विधायक जी और बड़े-बड़े सेठ आने वाले हैं? अगर रत्ती भर भी कमी रह गई तो मेरा सारा ‘पुण्य’ मिट्टी में मिल जाएगा।”

दीनानाथ जी के 25 वर्षीय पोते, ‘सार्थक’, ने ऊपर की बालकनी से यह सब देखा। सार्थक ने विदेश से एमबीए किया था और अभी कुछ दिन पहले ही लौटा था। उसे अपने दादाजी से बहुत प्यार था, लेकिन उनके ‘दिखावे वाले धर्म’ से उसे हमेशा चिढ़ होती थी।

सार्थक सीढ़ियों से नीचे उतर रहा था कि तभी उसकी नज़र पिछواड़े के दरवाज़े पर खड़े ‘काका’ पर पड़ी।

हरिया काका।

हरिया काका इस हवेली के सबसे पुराने वफ़ादार नौकर थे। उन्होंने दीनानाथ जी की जवानी से लेकर सार्थक के बचपन तक, इस घर की सेवा की थी। लेकिन पिछले साल लकवा मारने के बाद दीनानाथ जी ने उन्हें कुछ पैसे देकर काम से हटा दिया था, यह कहकर कि “अब तुम काम के लायक नहीं रहे।”

आज हरिया काका वहां खड़े थे, फटे हुए कपड़े, आँखों में बेबसी और हाथ जोड़े हुए। सार्थक तुरंत उनके पास गया।

“काका? आप यहाँ? और आप रो क्यों रहे हैं?” सार्थक ने उनका हाथ थाम लिया।

हरिया काका ने कांपते होठों से कहा, “छोटे मालिक… मेरी पोती… गुड़िया। उसे कल रात से बहुत तेज़ बुखार था, डॉक्टर ने कहा है कि उसके दिल में छेद है। उसका ऑपरेशन आज ही करना होगा वरना… वरना वो नहीं बचेगी। सरकारी अस्पताल में भी लाइन लंबी है, प्राइवेट वाले दो लाख मांग रहे हैं। मेरे पास कुछ नहीं है मालिक। बड़े मालिक (दीनानाथ) से मदद मांगने आया था, पर उन्होंने यह कहकर भगा दिया कि आज ‘शुभ कार्य’ में अपशकुन मत करो, बाद में आना।”

सार्थक का खून खौल उठा। “क्या? दादाजी ने मना कर दिया?”

“हाँ बेटा,” हरिया काका सिसक पड़े। “उन्होंने कहा कि सारा पैसा यज्ञ और स्वर्ण-मुकुट में लग गया है। अभी हाथ तंग है। पर मेरी गुड़िया मर जाएगी बेटा…”

सार्थक ने एक पल के लिए आंगन में चल रहे उस भव्य आयोजन को देखा। लाखों रुपये सिर्फ़ दिखावे के लिए फूंके जा रहे थे। घी की नदियां बह रही थीं, सोने का मुकुट मखमल पर सजा था, और यहाँ एक इंसान, जिसने पूरी ज़िंदगी इस घर को दी, उसकी पोती चंद रुपयों के लिए दम तोड़ रही थी।

सार्थक ने हरिया काका के आंसू पोंछे। “आप चलिए अस्पताल, मैं आता हूँ।”

“पर पैसे…”

“मैंने कहा न, मैं आ रहा हूँ। गुड़िया को कुछ नहीं होगा,” सार्थक ने दृढ़ता से कहा।

सार्थक सीधे दीनानाथ जी के पास गया, जो पंडित जी के साथ मुकुट की स्थापना पर चर्चा कर रहे थे।

“दादाजी,” सार्थक ने कहा। “मुझे दो लाख रुपये चाहिए। अभी।”

दीनानाथ जी चौंके। “पागल हो गया है क्या? अभी यज्ञ शुरू होने वाला है। और तुझे पैसे क्यों चाहिए?”

“हरिया काका की पोती मर रही है दादाजी। उसे ऑपरेशन की ज़रूरत है। आपने उन्हें भगा दिया?”

दीनानाथ जी का चेहरा सख्त हो गया। “सार्थक, यह समय इन सब बातों का नहीं है। मैंने हरिया को कहा था कि पूजा के बाद देखूंगा। अभी मेरा सारा ध्यान संकल्प पर है। और वो मुकुट मंदिर जाने वाला है, नकद घर में है नहीं। बैंक बंद है। अब शांत रह और जाकर कपड़े बदल, मेहमान आने वाले हैं।”

“लेकिन दादाजी, पूजा के बाद बहुत देर हो जाएगी। वो बच्ची मर सकती है,” सार्थक ने आवाज़ ऊंची की।

“तो यह उसकी किस्मत!” दीनानाथ जी चिल्लाए। “देखो सार्थक, धर्म-कर्म में विघ्न डालना सबसे बड़ा ‘पाप’ होता है। आज मेरे पूर्वजों की मुक्ति का दिन है। मैं एक नौकर की वजह से अपना अनुष्ठान ख़राब नहीं कर सकता। जाओ यहाँ से।”

सार्थक वहां खड़ा रहा। उसे लगा जैसे वह किसी अजनबी से बात कर रहा है। क्या यही धर्म है? क्या पत्थर की मूरत को सोना चढ़ाना उस मासूम की जान से ज़्यादा कीमती है?

सार्थक चुपचाप वहां से चला गया। वह सीधे अपनी माँ के कमरे में गया, लेकिन माँ के पास भी नकद नहीं था। उसके अपने कार्ड्स की लिमिट किसी वजह से फ्रीज़ थी। समय बीत रहा था।

उसने देखा कि दीनानाथ जी मेहमानों के स्वागत में व्यस्त हो गए। पंडित जी ने कहा, “यजमान, मुकुट को ‘शुद्धि’ के लिए अंदर वाले कमरे में रखवा दीजिये, एक घंटे बाद चढ़ाया जाएगा।”

दीनानाथ जी ने मुकुट को एक लाल कपड़े में लपेटा और अंदर के कमरे की तिजोरी के पास मेज़ पर रख दिया। कमरा लॉक नहीं था क्योंकि घर में हलचल थी।

सार्थक के दिमाग में तूफ़ान चल रहा था। एक तरफ उसके दादाजी का ‘धर्म’ और ‘इज्जत’ थी, दूसरी तरफ एक मरती हुई बच्ची की सांसें।

उसने एक गहरा फैसला लिया। ऐसा फैसला जो उसे इस घर में ‘पापी’ बना सकता था।

सार्थक दबे पांव उस कमरे में गया। उसने लाल कपड़े को हटाया। सोने का मुकुट चमक रहा था। उसने मुकुट उठाया और उसे अपने बैग में डाल दिया। फिर उसने वहां एक भारी पीतल का लोटा उस लाल कपड़े के नीचे रख दिया ताकि देखने में लगे कि मुकुट वहीं है।

वह पिछले दरवाज़े से निकला और सीधे अपने दोस्त ‘समीर’ की ज्वैलरी शॉप पर गया। समीर हैरान था, लेकिन सार्थक की घबराहट देखकर उसने सवाल नहीं किए। मुकुट को गिरवी रखकर (बेचा नहीं, गिरवी रखा) उसने तुरंत दो लाख रुपये नकद सार्थक को दे दिए।

सार्थक अस्पताल पहुंचा। ऑपरेशन शुरू हुआ। हरिया काका आईसीयू के बाहर ज़मीन पर बैठकर रो रहे थे।

दो घंटे बाद।

हवेली में कोहराम मच गया था।

“मुकुट चोरी हो गया! मुकुट चोरी हो गया!” दीनानाथ जी छाती पीट रहे थे। “किसने किया यह अनर्थ? मेरा यज्ञ अधूरा रह गया! मेरे पूर्वज मुझे कभी माफ़ नहीं करेंगे। ज़रूर उसी हरिया का काम होगा, वो सुबह आया था।”

पुलिस बुला ली गई थी। मेहमान कानाफूसी कर रहे थे। दीनानाथ जी का गुस्सा सातवें आसमान पर था। “पकड़ कर लाओ उस हरिया को, मैं उसे जेल में सड़ा दूंगा!”

तभी मुख्य द्वार पर एक कार रुकी। सार्थक उतरा। उसके चेहरे पर एक अजीब सा सुकून था।

“पुलिस को बुलाने की ज़रूरत नहीं है दादाजी,” सार्थक ने भीड़ को चीरते हुए कहा। “मुकुट हरिया काका ने नहीं, मैंने लिया था।”

पूरे आंगन में सन्नाटा छा गया। दीनानाथ जी को लगा जैसे उनके कानों ने धोखा दिया हो।

“तूने?” दीनानाथ जी कांपते हुए बोले। “तूने अपने ही घर में चोरी की? अपने दादा की इज़्ज़त का, कुलदेवी के मुकुट का भी लिहाज़ नहीं किया? क्यों? जुआ खेला? नशा किया? कहाँ है मुकुट?”

“मुकुट अब नहीं है दादाजी,” सार्थक ने शांत स्वर में कहा। “वो अब एक बच्ची की धड़कन बन चुका है।”

दीनानाथ जी गुस्से से आगे बढ़े और सार्थक के गाल पर एक ज़ोरदार तमाचा जड़ दिया। ‘चटाक’ की आवाज़ गूंज गई।

“नालायक! पापी!” दीनानाथ जी गरजे। “तुझे पता है तूने क्या किया है? तूने ‘देव-अपराध’ किया है। भगवान का गहना चुराकर तूने नरक का दरवाज़ा खोल लिया है। निकल जा मेरे घर से! मुझे तेरा मुंह नहीं देखना।”

सार्थक का गाल लाल पड़ गया था, लेकिन वह अपनी जगह से नहीं हिला। उसने अपनी जेब से अस्पताल की रसीद और डॉक्टर का पर्चा निकाला और दादाजी के पैरों के पास रख दिया।

“दादाजी,” सार्थक ने पहली बार उनकी आँखों में आँखें डालकर कहा। “आप सुबह से जिस ‘पाप’ और ‘पुण्य’ की रट लगाए हुए हैं, मुझे उसका शास्त्र नहीं पता। मैंने वेद नहीं पढ़े। लेकिन आज मैंने कुछ महसूस किया है।”

सार्थक ने चारों तरफ खड़े मेहमानों और पंडितों को देखा।

“ये जो सोने का मुकुट था, यह निर्जीव था। अगर मैं इसे कुलदेवी को चढ़ा भी देता, तो वो क्या करतीं? वो तो जगत-जननी हैं, उन्हें सोने की क्या चाह? लेकिन वो बच्ची… गुड़िया… वो ज़िंदा थी। उसकी सांसें रुक रही थीं।”

“तो तू चोरी करेगा?” दीनानाथ जी चिल्लाए।

“अगर चोरी से किसी की जान बचती है, तो मुझे ‘चोर’ कहलाना मंजूर है दादाजी,” सार्थक ने कहा। “आप कह रहे थे कि यज्ञ में विघ्न पड़ना पाप है। लेकिन क्या एक लाचार की मदद न करना पाप नहीं है? आपके शास्त्रों में लिखा होगा कि सोना दान करने से पुण्य मिलता है। लेकिन मुझे आज पता चला कि असली पुण्य क्या है।”

सार्थक की आवाज़ भारी हो गई।

“पाप और पुण्य क्या है? मुझे नहीं पता… मुझे तो बस यही पता है कि जिस कार्य से किसी का दिल दुखे, वो पाप… और किसी के चेहरे पर हँसी आये, वो पुण्य।”

उसने अपनी बात जारी रखी।

“जब डॉक्टर ने बाहर आकर कहा कि ‘ऑपरेशन सफल रहा, बच्ची बच गई’, और जब हरिया काका ने मेरे पैर पकड़कर रोते हुए आशीर्वाद दिया… दादाजी, उस वक़्त मुझे जो महसूस हुआ, वो इस हवन के धुएं से कहीं ज़्यादा पवित्र था। आपके यज्ञ से शायद पूर्वज खुश होते या नहीं, मुझे नहीं पता। लेकिन आज उस बच्ची की मुस्कान देखकर मुझे यकीन है कि भगवान ज़रूर मुस्कुराए होंगे।”

दीनानाथ जी स्तब्ध खड़े थे। उनका हाथ, जो दूसरा तमाचा मारने के लिए उठा था, हवा में ही रुक गया।

तभी गेट पर एक रिक्शा रुका। उसमें से हरिया काका, दौड़ते हुए अंदर आए। वे सीधे दीनानाथ जी के पैरों में गिर पड़े।

“मालिक! बड़े मालिक! छोटे मालिक ने मेरी गुड़िया को बचा लिया। वो भगवान हैं मालिक, भगवान! अगर आज पैसे नहीं मिलते तो मेरी बच्ची नहीं बचती। मुझे जेल भेज दो मालिक, पर छोटे मालिक को कुछ मत कहो।”

दीनानाथ जी ने नीचे देखा। हरिया, जो वर्षों तक उनके घर का वफ़ादार रहा, आज उनके पोते की वजह से अपनी पोती को ज़िंदा देख पा रहा था।

दीनानाथ जी की नज़र हवन कुंड की आग पर गई, फिर उस खाली मखमली आसन पर जहाँ मुकुट रखा जाना था, और अंत में अपने पोते सार्थक के सूजे हुए गाल पर।

उनके दिमाग में सार्थक के शब्द गूंज रहे थे—‘जिस कार्य से किसी के चेहरे पर हंसी आए, वो पुण्य…’

दीनानाथ जी का अहंकार, उनका शास्त्र-ज्ञान, उनका सामाजिक रूतबा—सब उस एक पल में पिघल गया। उन्हें अचानक वो सारा आयोजन, वो घी, वो सोना—सब व्यर्थ लगने लगा। उन्होंने महसूस किया कि वे जिस ‘मुक्ति’ को सोने के मुकुट में ढूंढ रहे थे, उनका पोता उसे ‘इंसानियत’ में पा चुका था।

दीनानाथ जी धीरे से नीचे झुके। उन्होंने हरिया को कंधों से पकड़कर उठाया। फिर वे सार्थक की ओर मुड़े। उनकी आँखों से आंसू बह रहे थे।

“पंडित जी,” दीनानाथ जी ने भारी आवाज़ में कहा।

“जी यजमान? पुलिस को बुलाएं?” पंडित जी ने पूछा।

“नहीं,” दीनानाथ जी ने अपने हाथ जोड़े। “यज्ञ संपन्न हो गया।”

“क्या? लेकिन पूर्णाहुति? मुकुट?” सब हैरान थे।

दीनानाथ जी ने सार्थक को गले लगा लिया।

“मेरा पोता सही कह रहा है। मैं पत्थर की मूरत को सजाने चला था, और इसने भगवान की बनाई मूरत को बचा लिया। आज मेरी ‘स्वर्ण-तुला’ फीकी पड़ गई और इसका ‘कर्म-तुला’ भारी हो गया।”

उन्होंने सार्थक का माथा चूमा।

“बेटा, मुझे माफ़ कर दे। मैं ‘धर्मी’ बनने के चक्कर में ‘आदमी’ बनना भूल गया था। तूने आज मेरी आँखें खोल दीं। तूने चोरी नहीं की, तूने तो मेरे कुल का मान बढ़ा दिया। तेरा यह ‘पाप’ मेरे सौ यज्ञों के ‘पुण्य’ से बड़ा है।”

दीनानाथ जी ने मेहमानों की तरफ देखा और मुस्कुराए।

“भोजन शुरू कीजिये। आज का भंडारा मेरे पूर्वजों के लिए नहीं, बल्कि उस गुड़िया के नए जीवन की खुशी में है।”

हवेली का वातावरण बदल गया। अब वहां मंत्रों की गूंज नहीं थी, लेकिन हवा में एक सुकून था। सार्थक ने देखा कि दादाजी हरिया काका से पूछ रहे थे, “बच्ची को कोई और दिक़्क़त तो नहीं? कुछ और चाहिए तो बता।”

सार्थक मुस्कुराया। उसे समझ आ गया था कि धर्म किताबों में नहीं, बल्कि किसी के आंसू पोंछने में बसता है। आज उसने सिर्फ़ एक जान नहीं बचाई थी, उसने अपने दादाजी को भी उस आडंबर के पिंजरे से आज़ाद कर दिया था। और शायद, यही सबसे बड़ा पुण्य था।

लेखिका : गरिमा चौधरी 

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