नर्स देखभाल कर सकती है बेटी नहीं बन सकती – संगीता अग्रवाल

शाम की धुंधलके में ड्राइंग रूम की खामोशी इतनी गहरी थी कि घड़ी की टिक-टिक भी हथौड़े की चोट जैसी महसूस हो रही थी।

सोफे पर बिखरे हुए कपड़ों और गत्ते के डिब्बों के बीच खड़ी मेघा अपनी सांसों को नियंत्रित करने की कोशिश कर रही थी। उसके सामने उसका पति, अनिरुद्ध, हाथ में एक लंबी लिस्ट थामे खड़ा था—दीवाली की गेस्ट लिस्ट।

“मेघा, तुम समझ क्यों नहीं रही हो? यह हमारे घर की पहली बड़ी दीवाली पार्टी है। मेरे बॉस, मेरे कलीग्स, और दूर के रिश्तेदार सब आ रहे हैं।

ऐसे में अगर हम रसोइए पर भरोसा करेंगे तो काम बिगड़ सकता है। माँ कहती हैं कि घर की लक्ष्मी के हाथ के बने खाने में जो स्वाद और बरकत होती है, वो कैटरिंग वालों में कहां?” अनिरुद्ध ने झुंझलाते हुए कहा।

मेघा ने एक फीकी हंसी हंसी। ऐसी हंसी जिसमें खुशी नहीं, बल्कि विडंबना थी। “बरकत? अनिरुद्ध, पिछले चार साल से मैं इसी बरकत को बनाए रखने के लिए मशीन की तरह खट रही हूं।

लेकिन आज बात खाने की नहीं है। बात उस दोहरे मापदंड की है जो इस घर की दीवारों में दीमक की तरह लग गया है।”

अनिरुद्ध ने लिस्ट मेज पर पटकी। “अब फिर वही पुराना राग मत छेड़ना। मैंने तुमसे कहा था न कि तुम्हारे मायके वालों के लिए मैंने गिफ्ट्स भिजवा दिए हैं। ड्राई फ्रूट्स का सबसे महंगा डब्बा और तुम्हारे पापा के लिए वो ब्रांडेड शॉल। और क्या चाहिए?”

मेघा की आंखों में अब पानी नहीं, आग थी। वह अनिरुद्ध के करीब आई। “गिफ्ट्स? तुम्हें लगता है कि रिश्तों की भरपाई कूरियर से भेजे गए डिब्बों से हो जाती है?

अनिरुद्ध, पिछले हफ्ते मेरे पापा सीढ़ियों से गिर गए थे। उन्हें बेड रेस्ट बोला गया है। माँ अकेली हैं, उन्हें संभालने में उन्हें दिक्कत हो रही है। मैंने तुमसे कहा था कि इस दीवाली हम वहां जाकर मनाते हैं, या कम से कम उन्हें यहाँ बुला लेते हैं। लेकिन नहीं… तुम्हें तो अपनी ‘पार्टी’ और अपनी ‘नाक’ की चिंता है।”

अनिरुद्ध ने बचाव की मुद्रा अपनाई। “मेघा, व्यावहारिक बनो। पापाजी को यहाँ लाएंगे तो वो भीड़भाड़ में असहज हो जाएंगे। और हम वहां जा नहीं सकते क्योंकि यहाँ मेरे बुआ-फूफाजी आ रहे हैं।

वो पहली बार हमारे नए घर आ रहे हैं। अगर हम ही नहीं होंगे तो माँ-बापाजी क्या सोचेंगे? उनकी इज्जत का सवाल है।”

“इज्जत!” मेघा चिल्लाई, उसकी आवाज़ थोड़ी कांप गई। “सारी इज्जत, सारा मान-सम्मान सिर्फ तुम्हारे परिवार का है? मेरे माँ-बाप क्या सड़क पर रहते हैं? उनकी कोई उम्मीदें नहीं हैं? अनिरुद्ध, जब तुम्हारे पिताजी को पिछले महीने मोतियाबिंद का ऑपरेशन करवाना था, तो मैंने अपनी ऑफिस से पंद्रह दिन की छुट्टी ली थी। दिन-रात एक करके उनकी सेवा की, आंखों में आई ड्रॉप्स डालने से लेकर खिचड़ी बनाने तक। तब मैंने यह नहीं कहा कि मेरी ‘मीटिंग्स’ हैं या मेरा ‘करियर’ है। लेकिन आज जब मेरी माँ को मेरी ज़रूरत है, तो तुम मुझे ‘फर्ज़’ का पाठ पढ़ा रहे हो?”

अनिरुद्ध ने माथा पकड़ लिया। “तुम बातों को तूल दे रही हो। मैंने कब मना किया मदद करने से? मैंने कहा न, हम वहां एक नर्स का इंतज़ाम कर देते हैं। पैसे मैं दे रहा हूँ न!”

यह सुनते ही मेघा को लगा जैसे किसी ने उसके गाल पर तमाचा मार दिया हो। “पैसे? हर चीज़ का इलाज तुम्हारी नज़र में पैसा है? अनिरुद्ध, तुम भूल रहे हो कि जिस नर्स की तुम बात कर रहे हो, वो देखभाल कर सकती है, पर वो ‘बेटी’ नहीं बन सकती। जैसे तुम अपने माँ-बाप के लिए ‘बेटा’ बनकर खड़े रहते हो, मुझे भी अपने बूढ़े माँ-बाप के लिए ‘बेटी’ बनने का हक़ है।”

अनिरुद्ध अब गुस्से में था। “तो तुम क्या चाहती हो? मैं अपने रिश्तेदारों को मना कर दूँ? कह दूँ कि मेरी बीवी अपने मायके जा रही है इसलिए पार्टी कैंसिल? लोग क्या कहेंगे कि अनिरुद्ध की बीवी को ससुराल से ज्यादा मायके की पड़ी रहती है? दुनिया की हर औरत ससुराल को अपनाती है, पर तुम्हें आज भी अपना पीहर ही प्यारा है।”

मेघा ने एक गहरी सांस ली। उसने सोफे पर रखा अपना बैग उठाया। “गलत। बिल्कुल गलत। दुनिया की हर औरत ससुराल को अपनाती है, लेकिन तब जब ससुराल उसे ‘अपना’ समझे। पिछले चार सालों में, मैंने तुम्हारे हर रिश्ते को अपना खून-पसीने से सींचा है। तुम्हारी बुआ को शुगर है, उनके लिए अलग खाना बनता है। तुम्हारी मौसी को घुटनों में दर्द है, उन्हें ग्राउंड फ्लोर वाला कमरा दिया जाता है। लेकिन मेरी माँ? जब वो पिछली बार आई थीं, तो उन्हें गेस्ट रूम में ठहराया गया था और दो दिन में ही उन्हें यह अहसास दिला दिया गया कि वो ‘मेहमान’ हैं।”

अनिरुद्ध कुछ बोलने ही वाला था कि मेघा ने हाथ उठाकर उसे रोक दिया।

“तुम्हें साफ़-साफ़ सुनना है न? तो सुनो। मुझे तुम्हारे पैसों से, तुम्हारे आलीशान घर से या इन दिखावटी पार्टियों से कोई नफरत नहीं है। मुझे नफरत है इस सोच से कि बहू ‘समर्पित’ होनी चाहिए और बेटी ‘स्वार्थी’। तुम चाहते हो कि मैं इस दीवाली पर तुम्हारे पचास मेहमानों के लिए कचौड़ियाँ तलू और मुस्कुराते हुए मेज़बानी करूँ, जबकि मेरा बाप वहां दर्द में कराह रहा हो? माफ़ करना अनिरुद्ध, यह मुझसे नहीं होगा।”

“मतलब?” अनिरुद्ध की आवाज़ में घबराहट थी।

“मतलब यह कि यह पार्टी तुम संभालो, तुम्हारी माँ संभालें या तुम्हारी वो बुआ संभालें जिनके लिए तुम यह सब कर रहे हो। मैं जा रही हूँ। अपने घर। मेरे पिता को मेरी ज़रूरत है।”

“तुम मुझे ब्लैकमेल कर रही हो?” अनिरुद्ध ने दांत पीसते हुए कहा। “अगर तुम आज इस घर से गईं, तो यह मत सोचना कि वापस आना आसान होगा। मेरे माँ-बापा क्या सोचेंगे?”

मेघा दरवाज़े की ओर बढ़ी, फिर रुकी और मुड़कर बोली, “तुम्हारे माँ-बापा क्या सोचेंगे, इसकी चिंता तुम करो। मुझे चिंता इस बात की है कि जब मैं आईने में खुद को देखूँ, तो मुझे एक ऐसी बेटी न दिखाई दे जिसने ससुराल की झूठी शान के लिए अपने जन्मदाताओं को लावारिस छोड़ दिया। और रही बात वापस आने की… तो जिस घर में मेरी भावनाओं की कद्र नहीं, वो घर ईंट-पत्थरों का मकान हो सकता है, मेरा ‘घर’ नहीं।”

अनिरुद्ध सन्न रह गया। उसने मेघा को रोकने की कोशिश नहीं की। अहंकार आड़े आ गया था। उसे लगा कि मेघा सिर्फ धमकी दे रही है, शाम तक वापस आ जाएगी।

मेघा ने अपनी कार निकाली और सीधे अपने मायके, जो शहर के दूसरे छोर पर था, निकल गई। वहां पहुंचकर जो उसने देखा, उसका दिल बैठ गया। घर अस्त-व्यस्त था। पिताजी बिस्तर पर लेटे थे, उनके पैर पर पक्का प्लास्टर चढ़ा था। माँ, जो खुद गठिया की मरीज़ थीं, किचन में जूझ रही थीं।

मेघा को देखते ही माँ की आंखों में आंसू आ गए। “मेघा? तू? आज तो तेरे ससुराल में बड़ी पूजा थी न?”

मेघा ने अपने आंसू पिए और मुस्कुराते हुए बोली, “पूजा तो मन से होती है माँ। और मेरी पूजा यहाँ है।” उसने तुरंत मोर्चा संभाला। घर साफ किया, पिताजी को दवा दी और माँ को आराम करने भेजा।

दो दिन बीत गए। दीवाली की रात थी।

अनिरुद्ध के घर में मेहमानों का जमावड़ा था। रौशनी थी, सजावट थी, लेकिन अनिरुद्ध के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं। बुआ जी बार-बार पूछ रही थीं, “अरे बहू कहाँ है? दिख नहीं रही? तबीयत तो ठीक है?” अनिरुद्ध बहाने बनाते-बनाते थक चुका था—कभी माइग्रेन, कभी पार्लर। माँ और पिताजी भी कोने में चुपचाप बैठे थे। रसोइया आया था, लेकिन खाने में वो स्वाद नहीं था। अफरातफरी मची हुई थी।

तभी डोरबेल बजी।

अनिरुद्ध ने राहत की सांस ली। उसे लगा मेघा आ गई होगी। उसने सोचा था कि उसे डांटेगा, फिर माफ़ कर देगा। वह दौड़कर दरवाज़े पर गया।

लेकिन सामने मेघा नहीं थी। सामने एक डिलीवरी बॉय खड़ा था, हाथ में टिफिन के बड़े-बड़े डिब्बे लिए।

“सर, यह मेघा मैम ने भिजवाया है। उन्होंने कहा है कि बुआ जी के लिए बिना चीनी की खीर है और मौसी जी के लिए कम तेल की सब्ज़ी।”

अनिरुद्ध ने डिब्बे थाम लिए। उसके पीछे उसकी माँ, सुमित्रा जी, आ खड़ी हुईं। उन्होंने अनिरुद्ध के हाथ से डिब्बे लिए और डिलीवरी बॉय को विदा किया।

सुमित्रा जी ने उन डिब्बों को खोला। खुशबू पूरे कमरे में फैल गई। वही खुशबू, जो इस घर की पहचान थी। साथ में एक चिट्ठी थी। सुमित्रा जी ने उसे पढ़ा।

“माँजी, मुझे पता है बुआ जी को बाज़ार की मिठाई से परहेज है। इसलिए सुबह उठकर यह खीर बनाई है। और अनिरुद्ध से कहियेगा कि मौसी जी को रात में गर्म पानी ज़रूर दें। मैं शरीर से वहां नहीं हूँ, पर मेरा फ़र्ज़ जानता है कि उस घर की ज़रूरतें क्या हैं। बस अफ़सोस, उस घर ने कभी मेरी ज़रूरत नहीं समझी।”

सुमित्रा जी की आंखों से आंसू टपक कर चिट्ठी पर गिर गए। उन्होंने अनिरुद्ध की ओर देखा, जो सिर झुकाए खड़ा था।

“तूने बहुत बड़ी गलती कर दी, अनु,” सुमित्रा जी ने भारी आवाज़ में कहा।

“माँ, मैंने क्या किया? वो ही ज़िद करके गई है,” अनिरुद्ध ने अब भी अपनी गलती नहीं मानी।

“ज़िद?” सुमित्रा जी ने कड़वाहट से कहा। “उसने अपने बीमार बाप की सेवा चुनी, इसे तू ज़िद कहता है? और देख, वहां रहकर भी, अपनी बीमार माँ और पिता को संभालते हुए भी, उसने हमारे घर की इज़्ज़त रख ली। उसने खाना भिजवा दिया ताकि हमारे मेहमान भूखे न रहें या बाज़ार का खाना खाकर बीमार न पड़ें। इसे संस्कार कहते हैं बेटा। और हम? हमने क्या किया? हमने उसे एक फोन तक नहीं किया यह पूछने के लिए कि उसके पिता कैसे हैं।”

अनिरुद्ध के पिता, जो अब तक चुप थे, अपनी लाठी टेकते हुए आए। “गाड़ी निकाल अनिरुद्ध।”

“कहाँ जाना है पापा? मेहमान…”

“मेहमानों को मैं संभाल लूंगा,” पिताजी ने कड़क कर कहा। “लेकिन अगर आज मेरी बहू की आंखों में यह बात घर कर गई कि हम उसके नहीं हैं, तो यह घर हमेशा के लिए खाली हो जाएगा। हमें अभी मेघा के घर जाना है। दिवाली लक्ष्मी के बिना नहीं मनाई जाती, और तूने लक्ष्मी को ही घर से निकाल दिया।”

अनिरुद्ध को अपनी गलती का अहसास हुआ। वो डिब्बे, वो चिट्ठी, और उसके पिता का दर्द… सबने मिलकर उसके अहंकार की दीवार तोड़ दी। उसे याद आया कि जब वह बीमार था, तो मेघा कैसे रात भर जागी थी। और आज जब उसे अपनी पत्नी का साथ देना चाहिए था, वह समाज का डर दिखा रहा था।

आधे घंटे बाद, अनिरुद्ध और उसके माता-पिता मेघा के छोटे से घर के बाहर थे।

मेघा अपने पिता को सूप पिला रही थी जब उसने अनिरुद्ध के पूरे परिवार को दरवाज़े पर देखा। वह हैरान रह गई।

अनिरुद्ध अंदर आया। उसने कुछ नहीं कहा, सीधे जाकर मेघा के पिता के पैरों में गिर गया। “माफ़ कर दीजिये पापाजी। मैं बेटा बनने का नाटक करता रहा, पर असल में व्यापारी बन गया था। मैंने रिश्तों का सौदा किया।”

मेघा की माँ और पिता ने उसे उठाया। सुमित्रा जी आगे बढ़ीं और उन्होंने मेघा को गले लगा लिया। “हमें माफ़ कर दे बेटी। हम भूल गए थे कि डोली में बैठकर जो आती है, वो मशीन नहीं, हाड़-मांस की इंसान होती है। तेरा दर्द हमारा दर्द होना चाहिए था।”

उस रात, अनिरुद्ध के आलीशान बंगले में ताला लगा रहा। कोई पार्टी नहीं हुई। लेकिन मेघा के छोटे से घर में असली दिवाली मनाई गई। अनिरुद्ध की बुआ और मौसी भी, जब उन्हें सच्चाई पता चली, तो वहां आ गईं। सबने मिलकर मेघा के पिता का हालचाल पूछा, सबने मिलकर हंसी-मज़ाक किया।

अनिरुद्ध ने देखा कि मेघा हंस रही है। वह हंसी, जो पिछले कई दिनों से गायब थी। उसे समझ आ गया कि उपहारों के ढेर से रिश्ते नहीं निभते, बल्कि वक्त और संवेदना के दो बोल ही काफी होते हैं।

खाना खाते वक्त अनिरुद्ध ने मेघा के कान में धीरे से कहा, “अगली बार लिस्ट मेहमानों की नहीं बनेगी।”

“तो किसकी बनेगी?” मेघा ने मुस्कुराते हुए पूछा।

“ज़रूरतों की,” अनिरुद्ध ने कहा। “जिसको जहाँ सबसे ज्यादा ज़रूरत होगी, हम दोनों वहीं होंगे। चाहे वो तेरा घर हो या मेरा… नहीं, हमारा घर।”

उस दीवाली के दीये तेल से नहीं, बल्कि एक नई समझ और प्रेम से जल रहे थे। मेघा को अब शिकायत नहीं थी, क्योंकि उसे उसका अधिकार मिल गया था—बराबरी का अधिकार, अपने माता-पिता को भी ‘अपना’ कहने का अधिकार।

मूल लेखिका : संगीता अग्रवाल

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