नियति का रंग – बालेश्वर गुप्ता

देखो मनीष, कुसुम मेरी बहू है, पर जब वह वंश बढ़ाने में सक्षम नही है, मुझे पोता नही दे सकती, मां ही नही बन सकती तो कुछ तो सोचना पड़ेगा ना। वह घर मे रहे मुझे आपत्ति नही, पर तुझे दूसरा ब्याह करना ही पड़ेगा। समझ रहा है ना तू?

मनीष की आँखों में दर्द उतर आया। माँ की बात में स्वार्थ की सच्चाई थी, पर वह स्वार्थ उसे किसी तीर की तरह चुभ रहा था। उसने खुद को संभालते हुए, पर दृढ़ स्वर में कहा—

मैं सब समझ रहा हूँ माँ, तुम्हारा आशय यह है कि जिस कुसुम को तुम इस घर की मालकिन बना कर लायी थी, वह भी हमारी कृपा से पड़ी रहेगी एक कोने में?

माँ क्या हम इतने निर्दयी हैं जो घर की मालकिन का तिरस्कार कर दे। बताओ माँ उसका कसूर क्या है, एक्सीडेंट में यदि उसका मात्रत्व भेंट चढ गया तो हम उसे गाजर मूली की तरह अलग थलग कर दे, ये कहाँ का न्याय है माँ? मैं तो दूसरी शादी की कल्पना भी नही कर सकता।

कमरे में सन्नाटा छा गया। माँ की आँखों में गुस्सा भी था, और अपने भीतर उठते अपराधबोध का डर भी। बाहर बरामदे में कुसुम चुपचाप खड़ी थी, उसने पूरी बात नहीं सुनी थी—पर आवाजों की कठोरता और घर की हवा में पसरे तनाव को वह बहुत अच्छे से महसूस कर रही थी।

दरअसल, मनीष और कुसुम की शादी अभी दो वर्ष पूर्व ही हुई थी—और वह भी एक भव्य समारोह में। मनीष का परिवार अच्छा सम्पन्न था। घर में रीतिरिवाज, मेहमान, रिश्तेदार, सबकुछ बहुत बड़े स्तर पर हुआ था।

कुसुम भी माँ की ही पसंद थी—उनकी सहेली कृष्णा की छोटी बेटी। कृष्णा की बड़ी बेटी रेखा की शादी पहले ही हो चुकी थी। कुसुम सुंदर, सलोनी, सादगी से भरी और संस्कारी थी। माँ उसे अपनी बहू के रूप में देखना चाहती थी। मनीष ने हमेशा माँ का मान रखा था, इसलिए इस विषय में भी उसने कोई ना-नुकर नहीं की।

कुसुम जब इस घर में आई, तो घर में जैसे नई रौशनी आ गई। उसकी मुस्कान, उसकी सौम्यता, और घर संभालने का तरीका हर किसी को भा गया। माँ उसे “घर की मालकिन” कहकर बुलातीं और रिश्तेदारों के सामने गर्व से कहतीं—“मेरी बहू बहुत सुघड़ है।”

कुछ ही महीनों में कुसुम गर्भवती हो गयी। माँ के पाँव तो धरती पर ही नहीं पड़ रहे थे। उन्हें लगता जैसे उनकी सारी प्रार्थनाएँ फल गईं। “पोता आएगा”—बस इसी धुन में माँ मगन रहने लगी।

मनीष के पिता के गोलोकवासी हो जाने के बाद और मनीष के अपने पैतृक कारोबार में लिप्त हो जाने पर माँ अपने को अकेली पाने लगी थीं। बहू थी, पर उनकी इच्छा थी कि घर में किलकारियाँ गूंजें, कोई उनके सूनेपन को भर दे, कोई उन्हें “दादी” कहकर पुकारे।

कुसुम के गर्भवती हो जाने पर माँ को लगने लगा था कि अपना वंश तो बढ़ेगा ही, साथ ही उनका अकेलापन भी दूर हो जायेगा। वे कुसुम का खूब ख्याल रखतीं। कभी फल काटकर देतीं, कभी समय से दवा, कभी आराम का ध्यान, कभी मंदिर में मन्नत—माँ का मन हर पल उसी आने वाले बच्चे में लगा रहता।

कुसुम भी खुश थी। मनीष भी। दोनों की आँखों में भविष्य के सपने थे—एक छोटा-सा बच्चा, घर में हँसी, और माँ के चेहरे पर संतोष।

कुसुम के गर्भकाल का पाँचवाँ महीना चल रहा था। मनीष उसे डॉक्टर को दिखाने ले गया था। सब कुछ ठीक था, सब रिपोर्ट सही थी। डॉक्टर ने कहा था—“सब नॉर्मल है, बस आराम कीजिए।” मनीष और कुसुम दोनों बहुत खुश थे।

पर नियती ने तो कुछ और ही ठान रखा था।

वापसी में सड़क पर ट्रैफिक थोड़ा कम था। मनीष धीमे-धीमे गाड़ी चला रहा था। कुसुम ने सीट बेल्ट लगी हुई थी, लेकिन गर्भवती होने के कारण वह थोड़ी असहज थी। तभी अचानक एक ट्रक गलत साइड से बिना हॉर्न दिये उनकी कार को ओवरटेक करने लगा।

मनीष ने गाड़ी संभालने का भरपूर प्रयास किया। कार की स्पीड काफी कम करने में वह सफल भी हो गया, पर तब तक ट्रक का पिछला हिस्सा कार से जोर से टकरा गया। झटका इतना तेज था कि कार हिल गई।

और फिर वह भयावह क्षण…
कुसुम की ओर का कार का दरवाजा टूट कर सड़क पर गिर गया। बिना सपोर्ट के, और ट्रक की जोरदार टक्कर के कारण कुसुम भी सड़क पर जा गिरी।

मनीष एकदम कार को रोक कर कुसुम की ओर लपका।
सड़क पर खून फैला था। गर्भपात हो चुका था।
होने वाले बच्चे के बारे में देखे सपने—एक पल में ध्वस्त हो चुके थे।

मनीष के हाथ काँप रहे थे। उसका गला सूख गया था। उसने इधर-उधर देखा, किसी से मदद मांगी। एक टैक्सी रोकी, और किसी तरह कुसुम को लेकर अस्पताल पहुँचा।

डॉक्टरों ने तुरंत इलाज शुरू किया।
चोट तो कोई खास नहीं थी, पर पेट पर प्रहार ऐसा था कि गर्भपात तो हुआ ही… लेकिन अधिक वज्रपात तो तब हुआ जब डॉक्टर्स को कुसुम की जान बचाने के लिये उसकी बच्चेदानी ही निकाल देनी पड़ी।

बच्चेदानी निकल जाने का मतलब था—कभी दुबारा गर्भ ग्रहण न कर पाना।

कुसुम के लिए यह सदमा एक्सीडेंट से भी अधिक था।
उसका शरीर तो बच गया, पर उसके सपने, उसकी उम्मीदें, उसका “माँ बनने का अधिकार”—सब जैसे छिन गया।

उधर माँ का धैर्य भी साथ छोड़ रहा था। वह बाहर बैठी रो रही थीं, माथा पकड़कर। अस्पताल के गलियारे में उनकी आँखों के सामने बस एक ही शब्द घूम रहा था—“पोता… पोता…”

कुसुम जब ऑपरेशन के बाद होश में आई, तो उसने अपनी आँखें खोलीं और सबसे पहला प्रश्न यही था—“बच्चा…?”
कोई जवाब नहीं दे पाया।

मनीष ने उसका हाथ थामा, आँखों में आँसू थे।
कुसुम समझ गई।
फिर उसने धीमे से पूछा—“और… मैं…?”
डॉक्टरों की बात उसे बता दी गई।

उस रात कुसुम के आँसू रुके नहीं।
वह चुपचाप छत को देखती रही, जैसे किसी भगवान से पूछ रही हो—“मैंने क्या किया था?”

और माँ… माँ का मन स्वार्थ और दुख के बीच झूल रहा था।
इसी कारण माँ की पेशकश थी कि मनीष दूसरी शादी कर ले।

मनीष किसी भी कीमत पर तैयार नहीं था।

घर में एक अजीब-सा तनाव छा गया था, जिसका हल किसी के पास नहीं था।
हालांकि मनीष ने माँ क्या चाहती है—यह बात कुसुम को नहीं बताई थी, पर घर की खामोशी सबकुछ बयान कर रही थी।

कुसुम की आँखें अक्सर भीग जातीं।
वह सोचती—“अब मैं यहाँ किस रूप में हूँ?”
बहू? पत्नी? या बस… एक बोझ?

घर में लोग कभी खुलकर कुछ नहीं कहते थे, पर उनकी नजरें बहुत कुछ कह देती थीं।
कुसुम के मन में यह विचार बार-बार उठता—
सड़ी गली सब्जी को भी कौन घर मे रखता है, फेक देते हैं कूड़े में। वह भी तो निष्प्रयोज्य ही हो गयी है।

सोच सोचकर कुसुम कहती तो कुछ नहीं, पर आँखों से आँसू बहाती रहती।

एक बार मन कड़ा कर कुसुम ने मनीष से कहा—
“मैं अपने मायके चली जाऊँगी… तुम दूसरी शादी कर लो।”

सुनकर मनीष ने कुसुम को अपने से चिपटाकर कहा—
खबरदार जो ऐसी बात मुँह से निकाली। जीते जी मैं तुम्हे नहीं छोड़ सकता कुसुम।

उस वाक्य ने कुसुम के भीतर थोड़ी-सी सांस लौटाई।
लेकिन माँ का दबाव अभी बाकी था।

सब सुन माँ भी उनके पास कमरे में ही आ गयी।
माँ ने कुसुम को अपनी बाहों में भर कर कहा—
मुझे माफ़ कर दे मेरी बच्ची, मैं ही स्वार्थी हो गयी थी, मैं ही तुम दोनो के प्यार को ना समझ सकी। मेरी बच्ची मुझे बस तुम दोनो का हंसता खेलता चेहरा चाहिये। मुझे मनीष पर गर्व है, वह डिगा नही।

कुसुम माँ की गोद में फूट-फूटकर रो पड़ी।
मनीष ने दोनों को थाम लिया।
उस दिन पहली बार घर की दीवारों में फिर से थोड़ी गर्माहट लौटी।

एक माह बाद ही कुसुम की बड़ी बहन रेखा मिलने आई।
उसने आते ही कुसुम को अपने गले से लगा लिया।

रेखा बोली—
छोटी दिल छोटा मत करियो, तेरी बड़ी बहना मरी ना है। देख मेरा कुट्टू तीन बरस का हो गया है, अब यह चार महीने पहले मेरी गोद मे भगवान ने एक और मुन्ना डाल दिया है। रात में सपने में भगवान ने पता है क्या कहा मुझसे?

कुसुम ने नम आँखों से रेखा को देखा।
रेखा ने आगे कहा—
भगवान कहे रहे रेखा तू भी स्वार्थी हो गयी, मोह में पड़ गयी। अरे छोटी मैं पहले तो कुछ समझ ही ना पायी। फिर सब समझ आ गया। सुन छोटी आज से अभी से ये मुन्ना तेरा। मेरी लाड़ो कौन कह सकता है मेरी बहन के कोई बच्चा नही, है तो ये मुन्ना।

रेखा ने अपनी गोद से मुन्ना को उतारकर कुसुम की गोद में डाल दिया।

कुसुम की गोद में बच्चा आया तो उसके शरीर में जैसे बिजली-सी दौड़ गई।
उसने बच्चे को देखा, उसकी साँसें सुनीं, उसकी छोटी-सी उंगलियाँ पकड़ लीं।
आँसू बहते रहे, पर इस बार वे दर्द के नहीं—एक अजीब-सी राहत के थे।

उसे लगा जैसे भगवान ने उसकी कोख नहीं, पर उसकी गोद जरूर भर दी है।

मनीष भी वहीं खड़ा था।
उसकी आँखों में गर्व था—अपनी पत्नी पर, अपनी सास-बहू के रिश्ते पर, और उस प्रेम पर जो परिस्थितियों से बड़ा था।

माँ ने बच्चे के माथे पर हाथ फेरा और बोली—
“आज समझ आया… वंश सिर्फ खून से नहीं चलता… प्रेम से भी चलता है।”

घर में धीरे-धीरे फिर से जीवन लौटने लगा।
कुसुम अब भी “माँ” नहीं बन सकती थी—पर “माँ जैसा” प्रेम करना उसने सीख लिया था।
और यही प्रेम कभी-कभी संसार की सबसे बड़ी माँ बनाता है।

— बालेश्वर गुप्ता, नोयडा
मौलिक एवम अप्रकाशित


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