निर्मला, तेरी किस्मत खुल गई! – मीनू झा

“बेटा, बड़ी खुशी की बात है! तुम्हारा बेटा डॉक्टरी की परीक्षा पास कर गया। अब तो तुम्हारे मज़े ही मज़े हैं,”
निर्मला जी ने फोन पर अपनी बड़ी बेटी से कहा।

“मां, अभी तो आरिफ ने बस परीक्षा पास की है, डॉक्टर बनने में तो अभी बहुत समय लगेगा।”

“हाँ, सो तो है, पर चलो — सही रास्ते पर तो आ गया न? यही बहुत है,”
इतना कहकर निर्मला जी ने फोन रख दिया।

फोन रखने के बाद फिर उनका चेहरा उदासी से भर गया।
एक आशा की किरण जगी थी, पर वो भी बुझ गई।
पता नहीं इस जन्म में उनके अरमान पूरे होंगे भी या नहीं।
मां बनने की इच्छा तो पूरी हो गई थी, पर पोते का अरमान अभी अधूरा था — न जाने उसे पूरा करने के बाद भी उन्हें शांति मिलती या नहीं।

दरअसल, निर्मला जी की दो बेटियाँ और एक बेटा था। तीनों की शादी हो चुकी थी और सबके अपने-अपने बच्चे थे।
दो पोतियाँ थीं — इससे उन्हें ज़रा भी दुख नहीं था, पर उनकी पीड़ा का कारण कुछ और था।

उनके बेटे ने साफ़ कह दिया था कि वह अब तीसरा बच्चा नहीं करेगा।
जबकि निर्मला जी की इच्छा थी कि किसी तरह एक पोता हो जाए।
बेटा तो किसी भी कीमत पर नहीं माना, लेकिन बहू को उन्होंने बहुत समझाकर राज़ी कर लिया।
बहू की एक ही शर्त थी —
“मैं तीसरा बच्चा तभी करूंगी जब कोई डॉक्टर यह पक्का कह दे कि गर्भ में लड़का ही है।”

निर्मला जी ने हामी तो भर दी, लेकिन जल्द ही उन्हें एहसास हो गया कि ऐसा डॉक्टर ढूंढना मुश्किल है जो कानून की परवाह किए बिना सच-सच बता दे।

एक डॉक्टर ने तो उनकी बात सुनते ही उन्हें बाहर निकालते हुए कहा —
“मैडम, ये गैरकानूनी है! गेट आउट!”

उस दिन के बाद से उन्होंने किसी डॉक्टर से सीधे-सीधे यह सवाल पूछना बंद कर दिया।

अब उन्हें बस यही आस थी कि किसी परिचित के ज़रिए कोई ऐसा डॉक्टर मिल जाए जो बहू को आश्वस्त कर सके।
दिन बीतते जा रहे थे, लेकिन कुछ नहीं हो पा रहा था।

सुबह बड़ी बेटी की सास का फोन आया था। बातों-बातों में पता चला कि उनके नाती ने डॉक्टरी की परीक्षा पास कर ली है।
बस फिर क्या था — निर्मला जी ने तुरंत अपनी बेटी को फोन लगा दिया।
लेकिन बात करने के बाद उनके टूटे अरमान फिर से बिखर गए।

उनकी इस इच्छा से उनकी सभी सहेलियाँ भी परिचित थीं।
सब अपने-अपने स्तर पर ऐसे किसी डॉक्टर को ढूंढने में लगी थीं।

एक दिन आखिरकार खुशखबरी आई।
उनकी सहेली देवकी ने उत्साहित होकर फोन किया —
“निर्मला, तेरी किस्मत खुल गई! याद है, मैं अपनी बेटी के ससुराल शादी में गई थी? वहाँ उसके जेठ की लड़की की शादी थी — और पता है, उस लड़की की भाभी डॉक्टर निकली! और वो कोई साधारण डॉक्टर नहीं, रेडियोलॉजिस्ट है — मतलब अल्ट्रासाउंड करने वाली! यही तो तू ढूंढ रही थी!”

“क्या सच कह रही है देवकी? तूने बात की उनसे?”

“अरे, बात ही नहीं की, अपॉइंटमेंट भी ले ली! कल सुबह 11 बजे बुलाया है। तू साथ चल, मैं भी तेरे साथ रहूंगी — शायद कंफर्म करना चाहेंगी। आजकल कानून बहुत सख्त हैं, इसीलिए उन्होंने कहा कि सिर्फ़ भरोसेमंद लोग ही आएं।”

निर्मला जी खुशी से झूम उठीं।
उसी दिन छोटी पोती को स्कूल में कई पुरस्कार मिले थे।
वह खेल-कूद में बहुत अच्छी थी, जबकि बड़ी पोती पढ़ाई में अव्वल।
निर्मला जी ने खुशी में दोनों को खूब प्यार किया और पिज़्ज़ा पार्टी दी।
दोनों पोतियाँ दादी के पास सोईं — जिन्हें वह बहुत प्यार करती थीं, पर पोते की इच्छा तो एक अलग ही स्तर की थी।

अगले दिन सुबह दोनों सहेलियाँ समय पर डॉक्टर काजल की क्लिनिक पहुंच गईं।
भीड़ ज़्यादा थी, पर नर्स ने उनका परिचय सुनकर जल्दी बुलवा लिया।

डॉक्टर काजल ने दोनों को देख मुस्कुराते हुए कहा —
“आइए आंटी, कैसी हैं आप? यही आपकी सहेली हैं न जिनके बारे में आप बता रही थीं? कितने महीने की गर्भवती हैं आपकी बहू?”

निर्मला जी ने पूरी कहानी बता दी — बहू की शर्त, बेटे की जिद, और अपनी उम्मीदें।
“बेटा, मेरे लिए भगवान बन जाओ। बस एक बार पक्का बता दो,”
निर्मला जी गिड़गिड़ाने लगीं।

काजल बोलीं, “आंटी, मुझे तो कोई दिक्कत नहीं है बताने में, पर अगर पिछली बार की तरह लड़की हुई तो?”
फिर थोड़ा रुककर बोलीं, “आप क्या चाहेंगी? छुटकारा?”

निर्मला जी बोलीं, “बेटा, मेरी भी दो बेटियाँ हैं। तीसरी बार में विवेक हुआ था। मुझे पूरी उम्मीद है कि मेरी बहू को भी तीसरी बार में बेटा ही होगा।”

काजल मुस्कुराई, “ठीक है आंटी, मैं आपको आश्वस्त कर दूंगी। पर प्लीज़ ध्यान रहे, ये बात किसी को बताना नहीं। आजकल हर डॉक्टर पर नज़र रहती है।”

निर्मला जी ने खुश होकर कहा, “मैं पेटीएम से फीस भेज दूंगी।”

“ठीक है आंटी,” काजल बोलीं। “और दीदी को भी बता देना कि चिंता न करें।”

बाहर निकलते हुए निर्मला जी को एक बात खटक गई।
उन्होंने पूछा, “बेटा, तुम्हारी दो बेटियाँ हैं। तुम्हें कभी बेटे की इच्छा नहीं हुई?”

काजल मुस्कुरा दी, “आंटी, दूसरे बच्चे के पीछे यही सोच थी। पर जब दूसरी बार भी बेटी हुई, तो मुझे खुद दुख नहीं हुआ। मेरे घरवालों ने ही समझाया — ‘तू भी तो किसी की बेटी है। तेरे जैसी लायक बेटियाँ अगर सौ भी हों, तो क्या अफसोस?’”

नर्स बार-बार आ-जा रही थी, इसलिए दोनों सहेलियाँ उठ खड़ी हुईं।
काजल ने मुस्कुराते हुए कहा —
“आंटी, ज़रूरत हो तो याद कर लीजिएगा। आप मेरी आंटी की दोस्त हैं, तो इतना फर्ज तो बनता है मेरा।”

बाहर निकलते ही देवकी बोली, “देख निर्मला, कितनी अच्छी लड़की है काजल! बस एक बार कहा और तैयार हो गई। अब तो खुश है न तू?”

निर्मला जी हल्के से मुस्कुराईं —
“हाँ देवकी, खुश हूँ… पर काजल की हाँ से नहीं, उसकी बातों से। उसने मेरी आँखें खोल दीं। भगवान ने इतनी प्यारी पोतियाँ दी हैं, फिर भी मैं अंधी तृष्णा में पड़ी थी। कल रात अपनी पोतियों की उपलब्धियाँ देखकर मन में कहा था — ‘काश, तूने मेरा सिर ऊँचा कर दिया।’ आज समझ आया, गर्व तो बेटियों पर भी किया जा सकता है।”

निर्मला जी के चेहरे पर सच्ची खुशी झलक रही थी।
काजल ने सच कहा था — “आप अपनी दोस्त को खुश करके ही भेजना चाहती थीं — अब सच में भेज दिया।”

देवकी मन-ही-मन सोच रही थी — “काजल का कहना सच निकला।”


 मीनू झा

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