नीम की कड़वाहट – नेहा पटेल

** एक बेटे को अपनी पत्नी “राक्षस” लगती थी जो उसकी बूढ़ी माँ को घुटनों के दर्द में भी पैदल चलाती थी। लेकिन जब डॉक्टर ने उस पत्नी के ‘जुल्म’ की असली वजह बताई, तो बेटे के पैरों तले से ज़मीन क्यों खिसक गई?

विहान की आँखों में खून उतर आया। उसने अपनी माँ को देखा जो दर्द से कराह रही थीं और पसीने में लथपथ थीं। फिर उसने अपनी पत्नी सुमेधा को देखा जो एसी में खड़ी होकर हुक्म चला रही थी।

विहान से रहा नहीं गया। वह तेजी से आगे बढ़ा और सुमेधा का हाथ पकड़कर उसे कमरे के कोने में ले गया।

“यह क्या तमाशा है सुमेधा?” विहान गुर्राया।

मई की तपती दोपहरी थी। सूरज आग उगल रहा था और सड़क पर डामर पिघलने को तैयार था। ऐसे मौसम में जब लोग अपने घरों के एसी और कूलर में दुबके बैठे थे, 65 वर्षीय कावेरी देवी अपने हाथ में सब्जी का एक भारी थैला लिए, लंगड़ाते हुए घर की ओर बढ़ रही थीं। उनके चेहरे पर पसीने की धाराएं बह रही थीं और घुटनों का दर्द उनके हर कदम को एक चुनौती बना रहा था।

पड़ोस की मिश्रा आंटी ने अपनी बालकनी से झांकते हुए देखा और मुंह बिचका लिया। “हे भगवान! यह बहु है या कसाई? बेचारी कावेरी जी से इस उम्र में और इतनी धूप में बोझा ढुलवा रही है। कलयुग है भाई, कलयुग!”

कावेरी देवी किसी तरह घर के गेट तक पहुंचीं। साँस फूल रही थी। उन्होंने घंटी बजाई।

दरवाज़ा उनकी बहू, सुमेधा ने खोला। सुमेधा के हाथ में एक ठंडे पानी की बोतल थी और चेहरे पर एक सख्त भाव। उसने सास के हाथ से थैला नहीं लिया, बल्कि घड़ी की ओर देखा।

“माँ जी, आज आपने 20 मिनट ज्यादा लगा दिए। मैंने कहा था न कि तेज चला कीजिये। ऐसे धीरे-धीरे चलेंगी तो शरीर और जाम हो जाएगा,” सुमेधा की आवाज़ में एक अजीब सी रूखाई थी।

कावेरी देवी ने पल्लू से चेहरा पोंछा और हांफते हुए सोफे पर बैठ गईं। “बहू, आज घुटनों में बहुत टीस उठ रही थी। मुझसे चला नहीं जा रहा था।”

सुमेधा ने पानी की बोतल मेज पर रखी। “टीस तो उठेगी ही। अभी शाम को आपको गुड्डू को बस स्टॉप से लेने भी जाना है। और हाँ, लिफ्ट का इस्तेमाल मत कीजियेगा, सीढ़ियों से ही जाइयेगा।”

तभी बेडरूम का दरवाज़ा खुला। सुमेधा के पति और कावेरी देवी के बेटे, विहान की नींद अभी-अभी खुली थी। उसकी नाइट शिफ्ट थी, इसलिए वह दिन में सो रहा था। बाहर की आवाज़ें सुनकर वह बाहर आ गया था और पिछले दो मिनट से अपनी पत्नी और माँ के बीच की यह बातचीत सुन रहा था।

विहान की आँखों में खून उतर आया। उसने अपनी माँ को देखा जो दर्द से कराह रही थीं और पसीने में लथपथ थीं। फिर उसने अपनी पत्नी सुमेधा को देखा जो एसी में खड़ी होकर हुक्म चला रही थी।

विहान से रहा नहीं गया। वह तेजी से आगे बढ़ा और सुमेधा का हाथ पकड़कर उसे कमरे के कोने में ले गया।

“यह क्या तमाशा है सुमेधा?” विहान गुर्राया।

“क्या हुआ विहान? आप चिल्ला क्यों रहे हैं?” सुमेधा ने शांत रहने की कोशिश की।

“चिल्लाऊं नहीं तो क्या करूँ? तुम्हें दिखाई नहीं देता?” विहान ने माँ की तरफ इशारा किया। **”घुटनों के दर्द से यह इतनी तड़पती है, फिर भी बाजार जाना, गुड्डू को बस स्टॉप पर छोड़ना, इतना दौड़ाती हो तुम? तुम्हें शर्म नहीं आती? आखिर तुम्हें भी एक दिन बुढ़ी होना है, मुझे तुमसे यह उम्मीद नहीं थी।”**

सुमेधा ने विहान की आँखों में देखा। उसकी अपनी आँखों में एक पल के लिए नमी आई, लेकिन उसने उसे पी लिया। “विहान, यह घर के नियम हैं। माँ जी को एक्टिव रहना होगा।”

“भाड़ में गए तुम्हारे नियम!” विहान ने मेज पर रखा फूलदान झटक दिया। “मैंने शादी एक हमसफर से की थी, किसी जेलर से नहीं। मेरी माँ ने पूरी ज़िंदगी मेरे लिए मेहनत की है, अब उनके आराम के दिन हैं। और तुम… तुम उनसे नौकरों जैसा सुलूक कर रही हो? मेरे पास इतना पैसा है कि मैं दस नौकर रख सकता हूँ। आज के बाद माँ एक गिलास पानी भी खुद नहीं लेंगी। सब कुछ नौकर करेंगे या तुम करोगी। समझी?”

कावेरी देवी सोफे से उठीं। “बेटा, रहने दे। बहू तो बस…”

“आप चुप रहिये माँ!” विहान ने पहली बार माँ को ऊंची आवाज़ में रोका। “आपकी यही शराफत इसे सिर पर चढ़ा रही है। आज से आप सिर्फ आराम करेंगी। मैं देखता हूँ कौन आपको सीढ़ियां चढ़ने को कहता है।”

विहान ने उसी वक्त एक फुल टाइम मेड का इंतजाम कर दिया। शाम को गुड्डू को लेने विहान खुद गया। रात का खाना भी मेड ने बनाया और कावेरी देवी के बिस्तर तक पहुँचाया।

सुमेधा चुपचाप यह सब देखती रही। उसने एक शब्द नहीं कहा। बस अपनी डायरी में कुछ नोट किया और सो गई।

अगले एक महीने तक घर का नक्शा बदल गया। कावेरी देवी को ‘महारानी’ की तरह रखा जाने लगा। सुबह की चाय बिस्तर पर, नाश्ता बिस्तर पर। उन्हें बाज़ार तो क्या, बालकनी तक जाने की भी ज़रूरत नहीं थी। विहान अपनी माँ की सेवा करके बहुत खुश था। उसे लगता था कि उसने अपनी माँ को उनका खोया हुआ सम्मान और आराम लौटा दिया है।

लेकिन अजीब बात यह थी कि आराम मिलने के बावजूद कावेरी देवी खुश नहीं दिख रही थीं।

शुरुआत के दस दिन तो उन्हें अच्छा लगा। लेकिन पंद्रहवें दिन से उनकी शिकायतें बढ़ने लगीं। “विहान, मेरे पैरों में बहुत जकड़न हो रही है,” उन्होंने एक रात कहा।

“अरे माँ, बरसों की थकान है, निकलेगी धीरे-धीरे। आप मालिश वाली से मालिश करवाओ,” विहान ने लापरवाही से कहा।

बीसवें दिन, कावेरी देवी का स्वभाव चिड़चिड़ा होने लगा। जो कावेरी देवी पहले शाम को पार्क में दोस्तों के साथ हंसती-बोलती थीं, अब वे कमरे में बंद रहने लगीं। उनकी भूख कम हो गई।

और फिर एक महीने बाद वह काली रात आई।

रात के तीन बज रहे थे। विहान को माँ के कमरे से किसी चीज़ के गिरने की आवाज़ आई। वह दौड़कर गया। देखा तो कावेरी देवी बाथरूम के दरवाज़े पर गिरी पड़ी थीं। उनका शरीर लकवे की तरह सुन्न हो गया था। वे उठने की कोशिश कर रही थीं, लेकिन पैर हिल भी नहीं रहे थे।

“माँ!” विहान चीखा।

सुमेधा भी पीछे-पीछे भागी चली आई। उसने तुरंत स्थिति को संभाला। विहान के हाथ-पांव फूल गए थे, लेकिन सुमेधा ने तुरंत एंबुलेंस बुलाई और डॉक्टर को फोन किया।

अस्पताल में कावेरी देवी को आईसीयू में ले जाया गया। बाहर विहान सिर पकड़कर बैठा था। उसकी आँखों से आंसू नहीं रुक रहे थे। “यह कैसे हो गया? मैं तो उन्हें इतना आराम दे रहा था। फिर यह अटैक कैसे?”

तभी डॉ. मेहता बाहर आए। डॉ. मेहता परिवार के पुराने डॉक्टर थे और कावेरी देवी का इलाज पिछले पांच सालों से कर रहे थे।

डॉ. मेहता ने विहान को देखा और गुस्से से बोले, “विहान, मैंने तुम्हें और सुमेधा को सख्त हिदायत दी थी। क्या तुमने उसका पालन नहीं किया?”

“कैसी हिदायत डॉक्टर अंकल? मैं तो माँ को पूरा आराम दे रहा था,” विहान ने रोते हुए कहा।

“यही तो तुमने गलती कर दी मूर्ख!” डॉ. मेहता चिल्लाए। “तुम्हें पता भी है तुम्हारी माँ को ‘रुमेटाइड अर्थराइटिस’ और गंभीर ‘ऑस्टियोपोरोसिस’ है? उनकी हड्डियां जाम हो रही थीं। मैंने, हाँ मैंने सुमेधा को यह निर्देश दिया था कि कावेरी जी को किसी भी हाल में बिस्तर पकड़ने मत देना। उन्हें जबरदस्ती चलाना, उनसे छोटे-मोटे काम करवाना। अगर वे रुकेंगी, तो उनका शरीर पत्थर बन जाएगा। ‘Motion is Lotion’ (गति ही दवा है)—यह उनके लिए जीवन का मंत्र था।”

विहान सन्न रह गया। उसके कानों में सुमेधा की वो बातें गूंजने लगीं— *’विहान, यह घर के नियम हैं’, ‘माँ जी को एक्टिव रहना होगा’।*

डॉ. मेहता ने आगे कहा, “सुमेधा हर हफ्ते मुझे रिपोर्ट भेजती थी। वह बताती थी कि कैसे वह खुद को ‘बुरी बहू’ बनाकर भी कावेरी जी को चलाती है। उसे कितना बुरा लगता था जब कावेरी जी दर्द से कराहती थीं, लेकिन वह दिल पर पत्थर रखकर उन्हें बाज़ार भेजती थी। क्योंकि वह जानती थी कि वह दर्द उनकी जान बचा रहा है। लेकिन पिछले एक महीने से तुमने सुमेधा को रोक दिया। नतीजा सामने है—कावेरी जी के जोड़ों ने काम करना बंद कर दिया है और शुगर लेवल 400 पार कर गया है क्योंकि उनकी कैलोरी बर्न होना बंद हो गई।”

विहान को लगा जैसे किसी ने उसे हज़ार थप्पड़ मार दिए हों। वह वहीं ज़मीन पर ढह गया। वह जिसे ‘अत्याचार’ समझ रहा था, वह दरअसल एक ‘तपस्या’ थी। उसकी पत्नी अपनी सास की जान बचाने के लिए खुद की छवि खराब कर रही थी, पति की नफरत सह रही थी, समाज के ताने सुन रही थी—सिर्फ इसलिए ताकि उसकी सास चलती-फिरती रहे।

विहान आईसीयू के कांच से अंदर देख रहा था, लेकिन उसकी नज़र कोने में खड़ी सुमेधा पर थी। सुमेधा दीवार से टिककर चुपचाप रो रही थी।

विहान धीरे-धीरे चलकर सुमेधा के पास गया। उसके पास शब्द नहीं थे। उसने बस सुमेधा का हाथ अपने हाथ में लिया। सुमेधा ने विहान को देखा। उसकी आँखों में कोई शिकायत नहीं थी, बस एक थकावट थी।

“मुझे माफ़ कर दो सुमेधा,” विहान का गला भर आया। “मैंने तुम्हें क्या कुछ नहीं कहा। मैं अंधा था।”

सुमेधा ने आंसू पोंछे। “विहान, मुझे आपके ताने बुरे नहीं लगे। मुझे डर बस इस बात का था कि माँ जी बिस्तर न पकड़ लें। मेरी अपनी माँ इसी बीमारी से बिस्तर पर पड़ी-पड़ी चल बसी थीं। मैं माँ जी के साथ वैसा नहीं होने देना चाहती थी।”

“अब क्या होगा?” विहान ने बच्चों की तरह पूछा।

“अब हम फिर से वही करेंगे जो ज़रूरी है। लेकिन इस बार आप ‘विलेन’ नहीं, मेरे साथ ‘हीरो’ बनेंगे,” सुमेधा ने हल्की मुस्कान के साथ कहा।

तीन महीने बाद।

शाम का वक्त था। कावेरी देवी पार्क में वॉक कर रही थीं। उनके हाथ में छड़ी थी, लेकिन वे चल रही थीं। उनके एक तरफ सुमेधा थी और दूसरी तरफ विहान।

“बस माँ, बहुत हो गया। अब घर चलो, मेरे पैर दुख रहे हैं,” विहान ने नाटक करते हुए कहा।

“चुप कर!” कावेरी देवी ने हंसते हुए छड़ी हवा में लहराई। “जवान होकर थकता है? अभी तो एक राउंड और लगाना है। मेरी बहू ने कहा है कि आज टारगेट पूरा करना है।”

सुमेधा मुस्कुरा रही थी। कावेरी देवी को पता चल गया था कि पिछले महीने जो उन्हें ‘आराम’ मिला था, उसने उन्हें मौत के करीब पहुंचा दिया था। अब वे समझ गई थीं कि सुमेधा की कड़वाहट दरअसल नीम की तरह थी—स्वाद में कड़वी, लेकिन सेहत के लिए अमृत।

जब वे घर के गेट पर पहुंचे, तो पड़ोसी मिश्रा आंटी फिर से बालकनी में थीं।

“अरे देखो, बेचारी बूढ़ी सास को फिर से चलाने ले गए। यह बहू तो सुधरने से रही,” मिश्रा आंटी बड़बड़ाईं।

विहान ने ऊपर देखा और मुस्कुराया। उसने मन ही मन सोचा, “बोलने दो दुनिया को। दुनिया को मीठी चाशनी दिखती है जो ज़हर बन सकती है, लेकिन मुझे अब अपनी नीम जैसी कड़वी, लेकिन खरी पत्नी की कीमत पता है।”

घर के अंदर घुसते ही सुमेधा ने कहा, “माँ जी, कल से सुबह की वॉक का टाइम 10 मिनट बढ़ जाएगा।”

“हां बाबा, ठीक है,” कावेरी देवी ने सोफे पर बैठते हुए कहा, “लेकिन पहले एक कप अदरक वाली चाय तो पिला दे मेरी हिटलर बहू!”

पूरा कमरा हंसी से गूंज उठा। उस हंसी में स्वास्थ्य की खनक थी, और रिश्तों की वो गर्माहट जो समझदारी की आंच पर पकती है।

**समापन:**

दोस्तों, अक्सर हम जो देखते हैं, सच उससे कोसों दूर होता है। बड़ों का सम्मान सिर्फ उनके पैर छूने या उन्हें बिस्तर पर बिठाकर खिलाने में नहीं है, बल्कि उनकी सेहत का ख्याल रखने में है, चाहे उसके लिए हमें कठोर ही क्यों न बनना पड़े। सुमेधा ने साबित किया कि सच्चा प्यार वो नहीं जो मीठा बोले, बल्कि वो है जो आपकी भलाई के लिए कड़वा घूंट भी पी ले। कभी-कभी ‘बुरा’ दिखने वाला इंसान ही हमारा सबसे बड़ा शुभचिंतक होता है।

**एक सवाल आपके लिए:** क्या आपके घर में भी कोई ऐसा है जो सख्ती करता है, लेकिन वह सख्ती आपकी भलाई के लिए होती है? क्या हम अक्सर प्यार को लाड़-प्यार (pampering) समझने की भूल नहीं करते? अपने अनुभव कमेंट में जरूर लिखें।

**अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो लाइक, कमेंट और शेयर करें। अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक और जीवन की गहराइयों को छूने वाली कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें, धन्यवाद।**

लेखिका : नेहा पटेल

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