नया घर – संगीता अग्रवाल 

बारिश की बूंदें कार के शीशे पर लगातार टकरा रही थीं, मानो बाहर का मौसम गाड़ी के भीतर बैठे हरिशंकर बाबू के मन में चल रहे तूफ़ान को भांप गया हो। कार की पिछली सीट पर बैठे सत्तर वर्षीय हरिशंकर अपनी गोद में रखे पुराने ब्रीफकेस को कसकर पकड़े हुए थे। उस ब्रीफकेस में न तो पैसे थे और न ही कोई वसीयत, उसमें थीं तो बस उनकी दिवंगत पत्नी, सुमित्रा की कुछ पुरानी तस्वीरें और उनके हाथ की बुनी हुई एक शॉल।

आगे की सीट पर उनका बेटा विनय गाड़ी चला रहा था और बगल में बहू, नीलिमा, अपने मोबाइल में किसी से बात करने में मशगूल थी। एसी की ठंडक के बीच भी माहौल में एक अजीब सी तपिश थी।

“बाबूजी, आप बेकार में इतना पुराना सामान लादकर ले आए। मैंने कहा तो था कि नए फ्लैट में सब कुछ नया है, वहाँ इन कबाड़ जैसी चीज़ों की कोई जगह नहीं है,” नीलिमा ने फोन रखते ही पीछे मुड़कर तल्खी से कहा।

हरिशंकर ने एक पल के लिए अपनी बहू को देखा, फिर नज़रें झुका लीं। उनकी आवाज़ में एक अजीब सी नरमी थी, “बहू, यह कबाड़ नहीं है। यह शॉल सुमित्रा ने अपनी बीमारी के दिनों में बुनी थी। उसने कहा था कि जब हम बड़े घर में जाएंगे, तो यह मुझे ठंड से बचाएगी। आज हम उसी ‘ड्रीम होम’ में जा रहे हैं न, जिसका सपना विनय बचपन से देखता था?”

विनय ने रियर व्यू मिरर में पिता की झलक देखी, लेकिन तुरंत नज़रें चुरा लीं। उसने स्टेयरिंग पर अपनी पकड़ मज़बूत की और बोला, “हाँ बाबूजी, बस पहुँचने ही वाले हैं। शहर से थोड़ा दूर है, एकदम शांत वातावरण। आपको वहाँ की हरियाली बहुत पसंद आएगी। शहर के शोर-शराबे से दूर, बिल्कुल वैसा ही जैसा आप हमेशा चाहते थे।”

हरिशंकर के चेहरे पर एक फीकी मुस्कान तैर गई। पिछले छह महीनों से विनय और नीलिमा उन्हें यही समझा रहे थे। उनका पुश्तैनी मकान, जो शहर के बीचों-बीच था, अब एक कॉमर्शियल कॉम्प्लेक्स बनने जा रहा था। बिल्डर ने मुंहमांगी कीमत दी थी। विनय ने कहा था कि उस पैसे से वे शहर के बाहरी इलाके में एक आलीशान विला लेंगे, जहाँ हरिशंकर के लिए ग्राउंड फ्लोर पर एक बड़ा सा कमरा होगा और एक बगीचा भी, जहाँ वे अपनी आरामकुर्सी डालकर शाम की चाय पी सकेंगे।

“विनय, बेटा, क्या वहाँ मेरे लिए अमलतास का पेड़ लगाने की जगह होगी?” हरिशंकर ने उत्साह से पूछा, “तुम्हारी माँ को पीले फूल बहुत पसंद थे। मैं सोच रहा था कि नए घर के आंगन में एक अमलतास लगाऊँगा।”

नीलिमा ने नाक सिकोड़ी और धीमे स्वर में बड़बड़ाई, “अभी पहुँचे नहीं और शुरू हो गई इनकी बागवानी। वहाँ सोसाएटी के नियम होते हैं, अपनी मर्जी से जंगल नहीं खड़ा कर सकते।”

विनय ने पत्नी को शांत रहने का इशारा किया और ज़ोर से बोला, “हाँ बाबूजी, बहुत जगह है। आप जो चाहे लगाइएगा। बस अब आप थोड़ा आराम कर लीजिए, रास्ता थोड़ा लंबा है।”

हरिशंकर सीट से टेक लगाकर बैठ गए और आँखें मूंद लीं। अतीत की यादें उनके ज़हन में तैरने लगीं। कैसे उन्होंने और सुमित्रा ने पाई-पाई जोड़कर वह पुराना मकान बनाया था। विनय की पढ़ाई, उसकी नौकरी, फिर उसकी शादी। सुमित्रा के जाने के बाद वह मकान उन्हें काटने को दौड़ता था, लेकिन हर कोने में उसकी यादें थीं। जब विनय ने मकान बेचने का प्रस्ताव रखा, तो पहले वे हिचकिचाए थे। लेकिन फिर सोचा कि बुढ़ापे में अकेले उस बड़े मकान की देखभाल कैसे करेंगे? बेटे-बहू के साथ रहेंगे तो जीवन का अंतिम पड़ाव भी सुख से कट जाएगा।

यही सोचकर उन्होंने मकान बेचने के कागज़ात पर दस्तखत कर दिए थे। विनय ने वादा किया था कि नए घर की रजिस्ट्री में उनका नाम सबसे ऊपर होगा। हरिशंकर को नाम से क्या लेना-देना था? उन्हें तो बस अपनों का साथ चाहिए था।

गाड़ी शहर की चकाचौंध को पीछे छोड़ते हुए अब सुनसान हाईवे पर दौड़ रही थी। हरिशंकर ने खिड़की से बाहर देखा। पेड़-पौधे तेज़ी से पीछे छूट रहे थे, बिल्कुल वैसे ही जैसे उनकी ज़िंदगी के सुनहरे साल पीछे छूट गए थे।

“नीलिमा, तुमने मेरा चश्मे का केस रखा है न?” हरिशंकर ने अचानक याद आने पर पूछा, “और मेरी डायबिटीज की दवाइयां? शाम को लेनी हैं।”

नीलिमा ने झुंझलाकर पर्स टटोला, “हाँ बाबूजी, सब रख दिया है उस बैग में। कितनी बार पूछेंगे आप? हम कोई बच्चे नहीं हैं जो आपका सामान भूल जाएंगे।”

हरिशंकर चुप हो गए। उन्हें महसूस हो रहा था कि पिछले कुछ दिनों से नीलिमा का व्यवहार बदल गया है। जब तक मकान के कागज़ात पर साइन नहीं हुए थे, वह उनकी हर छोटी-बड़ी ज़रूरत का ख्याल रखती थी। सुबह की चाय से लेकर रात के दूध तक, सब समय पर मिलता था। वह प्यार से कहती थी, “बाबूजी, नए घर में आपको राजा की तरह रखेंगे।” लेकिन जैसे ही डील पक्की हुई और पैसे विनय के खाते में ट्रांसफर हुए, नीलिमा की बोली में कड़वाहट घुलने लगी थी। विनय भी अब उनसे नज़रें मिलाने से कतराता था। शायद काम का बोझ होगा, हरिशंकर ने अपने मन को समझाया।

अचानक गाड़ी एक कच्चे रास्ते पर मुड़ गई। झटके से हरिशंकर की आँखें खुल गईं।

“बेटा, यह हम कहाँ आ गए? यह तो कोई जंगल जैसा इलाका लग रहा है। क्या विला यहाँ बना है?”

विनय ने जवाब देने में कुछ सेकंड की देरी की। “बाबूजी, यह शॉर्टकट है। मेन रोड पर बहुत ट्रैफिक था। बस दो मिनट और।”

गाड़ी एक लोहे के बड़े गेट के सामने आकर रुकी। गेट पर जंग लगा था और उसके ऊपर एक धुंधला सा बोर्ड टंगा था – ‘शांति निकेतन – वृद्ध जन सेवा केंद्र’।

हरिशंकर ने बोर्ड पढ़ने की कोशिश की, लेकिन बारिश और धुंध के कारण साफ दिखाई नहीं दिया। गेट खुला और गाड़ी अंदर दाखिल हुई। सामने एक पुरानी, सीलन भरी इमारत थी। न कोई आलीशान विला, न कोई बड़ा बगीचा, और न ही कोई अमलतास लगाने की जगह। बस एक उदास सी इमारत जिसके बरामदे में कुछ बुजुर्ग कुर्सियों पर गुमसुम बैठे बारिश को ताक रहे थे।

हरिशंकर का दिल ज़ोर से धड़कने लगा। उन्होंने घबराकर पूछा, “विनय, यह… यह हम कहाँ आ गए? यह तो वह घर नहीं लगता जिसकी तस्वीरें तुमने मुझे दिखाई थीं।”

गाड़ी रुकी। विनय ने इंजन बंद किया, लेकिन वह पलटा नहीं। सन्नाटा इतना गहरा था कि बारिश की आवाज़ भी शोर लगने लगी।

नीलिमा ने अपनी सीट बेल्ट खोली और सपाट आवाज़ में बोली, “बाबूजी, उतरिए। हम पहुँच गए।”

“लेकिन यह… यह जगह क्या है?” हरिशंकर की आवाज़ कांप रही थी। उन्हें अनहोनी का आभास हो चुका था।

नीलिमा ने पीछे मुड़कर देखा। उसकी आँखों में अब कोई लिहाज़ नहीं था। “बाबूजी, यह आपके लिए सबसे अच्छी जगह है। वहाँ नए फ्लैट में हम दोनों नौकरी करेंगे, आपकी देखभाल कौन करता? यहाँ आपके जैसे बहुत से लोग हैं, आपका मन लगा रहेगा। डॉक्टर भी यहीं रहते हैं, खाना भी समय पर मिलेगा।”

हरिशंकर को लगा जैसे किसी ने उनके सीने पर हथौड़े से वार कर दिया हो। उन्होंने विनय की ओर देखा, “विनय? तू कुछ बोलता क्यों नहीं? क्या इसीलिए तूने मुझसे मकान बिकवाया था? क्या यही तेरा ‘ड्रीम होम’ है?”

विनय ने अब भी पिता की ओर नहीं देखा। वह खिड़की से बाहर देखते हुए बुदबुदाया, “पापा, प्रैक्टिकल बनिए। नीलिमा सही कह रही है। हमारी लाइफस्टाइल अलग है, हमारे दोस्त आएंगे, पार्टियाँ होंगी… आप वहाँ एडजस्ट नहीं कर पाते। और फिर, यहाँ की फीस मैंने पांच साल की एडवांस जमा कर दी है। आपको किसी चीज़ की कमी नहीं होगी।”

हरिशंकर का हाथ कांपते हुए दरवाज़े के हैंडल पर गया। जिस बेटे को उन्होंने उंगली पकड़कर चलना सिखाया, आज वह उन्हें अपनी ज़िंदगी से बाहर का रास्ता दिखा रहा था। वे धीरे से गाड़ी से बाहर निकले। बारिश ने तुरंत उनके कपड़ों को भिगो दिया।

एक वार्ड बॉय दौड़ता हुआ आया और छाता तान दिया। “आइए बाऊजी, आइए। मैनेजर साहब इंतज़ार कर रहे हैं।”

विनय गाड़ी से उतरा और डिग्गी खोलकर हरिशंकर का बड़ा सूटकेस नीचे उतार दिया। उसने नज़रे चुराते हुए सूटकेस को सीढ़ियों के पास रख दिया।

हरिशंकर ने अपनी गोद में रखे ब्रीफकेस को और कसकर भींच लिया। वे बारिश में भीगते हुए विनय के पास गए। विनय डर गया कि कहीं पिताजी उसे थप्पड़ न मार दें या चिल्लाने न लगें। लेकिन हरिशंकर शांत थे। उनकी आँखों में गुस्सा नहीं, बल्कि असीम करुणा और गहरा विषाद था।

“विनय,” हरिशंकर ने बेहद धीमी आवाज़ में कहा।

“जी… जी पापा,” विनय सकपकाया।

हरिशंकर ने अपने कुर्ते की भीगी हुई जेब में हाथ डाला और चाबियों का एक गुच्छा निकाला। यह उस पुराने मकान की चाबियाँ थीं जो अब बिक चुका था, लेकिन आदतवश हरिशंकर ने उन्हें अपने पास रखा था।

“यह ले,” उन्होंने चाबियाँ विनय की हथेली पर रख दीं।

“ये… ये क्या है पापा? मकान तो बिक गया, अब इन चाबियों का क्या काम?” विनय हैरान था।

हरिशंकर ने फीकी मुस्कान के साथ कहा, “यह उस मकान की चाबियाँ नहीं हैं बेटा। यह उस भरोसे की चाबियाँ हैं जो मैंने तुझ पर किया था। इन्हें संभाल कर रखना। मकान तो तूने बेच दिया, लेकिन याद रखना, एक दिन तेरा बेटा भी बड़ा होगा। दीवारें और छतें बेची जा सकती हैं विनय, लेकिन नींव को उखाड़ फेंकने पर इमारत खड़ी नहीं रहती, वह गिर जाती है।”

नीलिमा गाड़ी के अंदर से हॉर्न बजाने लगी। “विनय, जल्दी करो! हमें देर हो रही है, वापस शहर भी जाना है।”

विनय के हाथ में वह चाबियाँ जलते अंगारे जैसी लग रही थीं। वह कुछ कहना चाहता था, शायद माफ़ी मांगना चाहता था, लेकिन शब्द उसके गले में ही अटक गए।

हरिशंकर मुड़े और उस पुरानी इमारत की ओर चल पड़े। उन्होंने एक बार भी पीछे मुड़कर अपनी ‘ड्रीम कार’ या अपने बेटे को नहीं देखा। वार्ड बॉय उनके साथ चल रहा था।

“बाऊजी, सामान?” वार्ड बॉय ने पीछे छूट गए सूटकेस की ओर इशारा किया।

हरिशंकर रुके। उन्होंने अपने हाथ में पकड़े उस छोटे ब्रीफकेस को देखा जिसमें सुमित्रा की शॉल थी।

“नहीं बेटा,” हरिशंकर ने कहा, “वह सामान मेरा नहीं है। उसमें वो कपड़े हैं जो उस ‘पिता’ के लिए खरीदे गए थे जो एक आलीशान विला में रहने वाला था। मैं तो यहाँ सिर्फ़ अपनी यादें लेकर आया हूँ। वही काफी हैं।”

जैसे ही हरिशंकर आश्रम के दरवाज़े के भीतर गए, पीछे से कार के स्टार्ट होने और तेज़ी से दूर जाने की आवाज़ आई। पहियों ने कीचड़ उछाला, ठीक वैसे ही जैसे उन रिश्तों पर कीचड़ उछला था।

अंदर का माहौल उदास था, लेकिन वहाँ एक अजीब सा अपनापन भी था। हॉल में बैठे एक बुजुर्ग ने हरिशंकर को भीगा हुआ देखकर अपनी शॉल उनकी तरफ बढ़ा दी।

“नए हो?” बुजुर्ग ने मुस्कुराते हुए पूछा, “लगता है बेटा ‘विदेश’ सेटल हो गया?”

हरिशंकर ने अपने गीले बाल पोंछे और उस अनजान बुजुर्ग के बगल में बैठ गए। उन्होंने गहरी सांस ली, मानो बरसों का बोझ छाती से उतर गया हो। अब उन्हें किसी झूठे वादे का इंतज़ार नहीं करना था, किसी अभिनय का हिस्सा नहीं बनना था।

“नहीं भाई साहब,” हरिशंकर ने खिड़की से बाहर होती मूसलाधार बारिश को देखते हुए कहा, “बेटा विदेश नहीं गया, बेटा तो वहीं रह गया… मैं ‘घर’ आ गया हूँ। असल में, आज मुझे समझ आया कि चार दीवारों का नाम घर नहीं होता, जहाँ सम्मान मिले, छत वहीं होती है।”

बाहर बारिश अब थमने लगी थी। आसमान साफ हो रहा था। हरिशंकर ने अपना ब्रीफकेस खोला, सुमित्रा की शॉल निकाली और उसे ओढ़ लिया। उसमें अब भी वही पुरानी महक थी—सुरक्षा और प्रेम की। विनय उन्हें यहाँ छोड़ गया था, यह सोचकर कि उसने एक बोझ उतार दिया, लेकिन उसे क्या पता था कि उसने अपने पिता को वह आज़ादी दे दी थी जो वे उस आलीशान विला के पिंजरे में कभी नहीं पा सकते थे।

अकेलापन डरावना होता है, लेकिन स्वाभिमान के साथ जिया गया एकांत, अपमानजनक साथ से कहीं बेहतर होता है। हरिशंकर ने आँखें मूंद लीं। आज रात उन्हें नींद अच्छी आने वाली थी।

मूल लेखिका 

संगीता अग्रवाल

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