नासमझ प्यार – शुभ्रा बैनर्जी 

शादी तय हो गई थी मीना की।बस एक महीने और स्कूल में नौकरी करनी पड़ेगी,फिर तो छुट्टी हमेशा के लिए।पापा के जाने के बाद ही नौकरी ज्वाइन कर ली थी मीना ने। कॉलेज में कामर्स की फाइनल इयर में थी,तभी पापा गुजर गए।घर की बड़ी बेटी होने से जिम्मेदारी भी मीना के सर पर थी।पढ़ाई के साथ-साथ अब स्कूल में पढ़ाने भी लगी थी मीना।

देखते-देखते चार साल बीत गए।इस दौरान पोस्ट ग्रेजुएशन भी कर लिया उसने।भाई की नौकरी (प्राइवेट)लगते ही, बुआ ने शादी के लिए जोर देना शुरू कर दिया।टालते-टालते आखिर बुआ ने लड़का ढूंढ़ लिया।सरकारी नौकरी थी,तो परिवार वालों को कोई आपत्ति थी नहीं।

मां अक्सर पूछतीं”अगर तुझे कोई पसंद है तो अभी बता दें।परिवार(बुआ) के दवाब में हां नहीं बोलना।तुझे जो भी लड़का पसंद हो,मैं मान लूंगी।हमारे लिए तूने अपने बहुत सारे शौक मारे हैं बेटा,पर शादी किसी दवाब में मत करना।” मीना खिसिया जाती मां की बातें सुनकर।मैंने कब किसी को पसंद किया।

मौका ही नहीं मिला कभी।मुंह फुलाकर मां से पूछती”क्यों,तुम्हें वो लड़का पसंद नहीं क्या?क्यों हमेशा बुआ के निर्णय में मीन मेख निकालती रहती हो?पापा नहीं हैं अब।अभी दो बेटियां और हैं ब्याहने को।उनकी सहायता के बिना कर पाओगी क्या हम सभी की शादी?

मैंने तो कभी तुमसे नहीं कहा, कि मैं किसी और को प्यार करती हूं, फिर तुम क्यों ऐसा सोचती हो मां? प्यार करने का अधिकार नहीं है मुझे।मुझे अपने परिवार का संबल बने रहना है हमेशा।मेरी वजह से मेरी बहनों की जिंदगी बर्बाद नहीं कर सकती मैं।तुम निश्चिन्त रहो।मुझे इस शादी से कोई ऐतराज नहीं।” 

मां ने निराशा का दीर्घ स्वर भरकर कहा था” तुझे नंदी याद है?वो जो ए सी सी में नौकरी करता था।तुझे मैंने कभी बताया नहीं,वह तुझे बहुत पसंद करता है।शायद प्यार भी करता है।तेरे खड़ूस स्वभाव के कारण कभी तुझसे कह नहीं पाया।कंपनी की तरफ से दुबई गया है ।तुझे याद है,जाने के एक दिन पहले आया था मिलने।मुझसे कहकर गया है,

कि वहां से आकर तुझसे बात करेगा।मेरे पास पता भी दे गया है अपना।मैं बोल रही थी, एक बार पूछ लें ना उससे।अगर सच में वह तुझसे प्यार करता है, तो बुआ से मैं बात कर लूंगी।

देख बेटा, शादी उससे नहीं करना चाहिए, जिसे हम पसंद करते हैं।शादी उस पुरुष से करना चाहिए, जो हमें पसंद करता हो।बुआ के अहसानों की आड़ में अपनी खुशियों को ना मरने दे।”

मां की बात सुनकर मीना ने चौंकते हुए पूछा”क्या!!!!उसने तुमसे कहा ऐसा? उसकी हिम्मत कैसे हुई? मैंने तो कभी ज्यादा बात भी नहीं की उससे।

हां कभी -कभार इंग्लिश ग्रामर बता देता था वो।अपने मन में यह सब छिपाकर रखा था उसने!! और तुमने मुंह पर क्यों मना नहीं कर दिया?वो तो हमारी तरह ब्राह्मण भी नहीं है।उससे शादी करने का तो कोई सवाल ही नहीं पैदा होता मां।”

मां ने प्यार किया था शायद,पर बता नहीं पाई होगी।उनके समय में प्यार को स्वीकृति नहीं मिलती थी परिवार की।अपने अनकहे प्यार की टीस भुला नहीं पाई थीं शायद,तभी अपनी बेटी के जीवन में प्यार का बसंत देखना चाहतीं थीं।यह जानते हुए भी कि उनके लिए परिवार वालों से विद्रोह बहुत मंहगा पड़ेगा,बेटी को प्यार का महत्व बता रही थी एक मां।

मीना की तरफ से सकारात्मक जवाब ना पाकर मां चुप हो गई थीं।लड़के वाले देखकर जा चुके थे।मीना पसंद आ चुकी थी उन्हें।दो महीने बाद ही शादी की तारीख पक्की हुई।मीना ने अपने भावी पति के बारे में किसी तरह के सपने नहीं देखे थे।बस इसी बात का संतोष था कि भावी पति ने उसकी अपने परिवार के प्रति जिम्मेदारी को समझा था।

स्कूल की एक सहकर्मी ने शादी की खुशी में अपने घर खाने पर बुलाया था।सभी ने मीना की औपचारिक विदाई का समारोह यादगार बना दिया।लौटते समय रास्ते में साइकिल में एक चिर-परिचित चेहरा दिखा।उसने नहीं देखा था मीना को।घर आते ही मां का उतरा चेहरा देखकर चौंकते हुए पूछा था मीना ने”क्या हुआ तुम्हें मां? किसी ने कुछ कहा क्या?

बुआ ने कोई खबर भेजी है क्या?” मां ने उठकर एक बड़ा सा पैकेट और एक लिफ़ाफ़ा मीना के हांथ में दिया, और बोलीं”मैंने कहा था ना , जल्दबाजी मत कर।

पापा को खोने से क्या तुझे अपने मन की बात भी नहीं सुनाई देती।जबरन महान बनने की जिद में तूने एक निःस्वार्थ व्यक्ति की भावनाओं को दुखी किया है।मां होकर मुझे उसकी आंखों में तब भी प्यार दिखा था, और आज भी।ये तूने अच्छा नहीं किया मीना।” 

हाथों में पैकेट और लिफाफा लिए मीना समझ गई थी कि उसने रास्ते में जिसे देखा था,वह नंदी ही था।ऐसी ही खुशबू उस लिफाफे से भी आई थी,जिसमें उसने पहलाऔर आखिरी खत लिखा था मीना को।स्कूल के पते पर ही आया था कुछ महीने पहले।मां से बताया नहीं था उसने, पर जवाब भी नहीं दिया था।

पैकेट खोलकर देखा तो उसमें बहुत सारे उपहार थे मीना के लिए। लिफाफे में एक और ख़त था।मीना ने जल्दी से पढ़ना शुरू किया,तो पता ही नहीं चला कब आंसुओं से चेहरा भींग गया उसका।अपनी नाकामी पर उसे कोई पछतावा नहीं था, बस इतना जरूर लिखा था कि इंतजार करना था उसका।प्रमोशन पाकर कंपनी में मैनेजर बन गया था।

और इन सबका श्रेय उसने मीना को दिया था।उसी की खातिर वो कामयाब होना चाहता था , ताकि जब शादी की बात करे तो जाति आड़े ना आए।सदा सुखी रहने का आशीर्वाद देकर पांच हजार रुपए शादी के उपहार स्वरूप देकर गया था वह।मां से कुछ और पूछने की हिम्मत ही नहीं हुई।मीना को रोता देखकर मां ने बस इतना कहा”तीन घंटे तक बैठा था

वह।शादी तय होने की बात सुनकर बहुत रोया।तेरे आंसू पश्चाताप के हो सकतें हैं पर उसके आंसू निश्छल प्रेम के थे।तू उसका पहला प्यार थी, और तूने ही उसे समझा नहीं उसका प्यार।वो कल ही चला जाएगा कोलकाता।अब यहां से ट्रांसफर ले लेगा।अपनी मां और बहन को बताकर रखा था तेरे बारे में।अब शायद जाकर बता दे तेरी शादी के बारे में।” 

मीना ने अपनी शादी ईमानदारी से निभाई।कभी उससे फिर बात नहीं हुई।जब भी पहले प्यार की बात याद आती है,तो उसी का चेहरा घूम जाता है।वो भी शायद करती थी प्यार पर नासमझ थी इस रिश्ते से।मीना को वह भूला नहीं होगा आज भी,पहले प्यार की टीस जब-जब उसके मन में उठती होगी,

मीना को जरूर याद करता होगा।ईश्वर से यही प्रार्थना करती रही मीना कि अनजाने में उसके द्वारा की गई नासमझी को माफ कर दें।अपनी बेटी को नानी की तरह आत्मविश्वासी बनाया  है मीना ने, ताकि अपने मन की धरती को रेगिस्तान ना बना दे वह भी।

शुभ्रा बैनर्जी 

#पहला प्यार

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