जब अपनी औलाद ही नालायक निकल जाए तो पराए घर से आई बहु का क्या कसूर..
दिवाकर बाबू अपनी पुरानी आरामकुर्सी पर बैठे थे, लेकिन आराम उनके नसीब में कहाँ था? उनकी नज़रें बार-बार दीवार पर लटकी उस घड़ी पर जा रही थीं, जिसकी टिकटिक घर के सन्नाटे को और गहरा बना रही थी। रसोई से बर्तनों के खटकने की आवाज़ आ रही थी, जहाँ उनकी बहू, वंदना, रात के खाने की तैयारी कर रही थी। और दूसरे कमरे से, उनकी पत्नी सुभाषिनी की बड़बड़ाहट साफ़ सुनाई दे रही थी।
“अरे, अब तक चाय नहीं बनी? पता नहीं कौन से ग्रह-नक्षत्र में इस लड़की ने इस घर में कदम रखा था। जब से आई है, घर की बरकत ही चली गई। मेरा बेटा… मेरा हीरा जैसा बेटा, आज कौड़ी का नहीं रहा। सब इस कलमुंही के भाग्य का दोष है।”
दिवाकर बाबू ने एक गहरी आह भरी। यह रोज़ का किस्सा था। उनका बेटा, रोहन, पिछले चार सालों से ‘बिज़नेस’ करने के नाम पर घर की जमा-पूंजी उड़ा रहा था। कभी शेयर बाज़ार, कभी क्रिप्टो करेंसी, तो कभी दोस्तों के साथ मिलकर कोई नई स्कीम—हर छह महीने में उसका प्लान बदलता और हर बार नतीजा वही होता—
घाटा। लेकिन सुभाषिनी के लिए उनका बेटा कभी गलत नहीं था। उनकी नज़रों में रोहन एक ‘भोला बच्चा’ था जिसे दुनिया ठग लेती थी, या फिर उसकी असफलता का कारण वंदना का ‘मनहूस’ होना था।
वंदना चाय लेकर दिवाकर बाबू के पास आई। उसके चेहरे पर थकान थी, लेकिन उसने मुस्कुराने की कोशिश की।
“बाबूजी, चाय,” उसने धीमे स्वर में कहा।
दिवाकर बाबू ने कांपते हाथों से प्याला थामा। “बेटा, तूने ली?”
“मैं बाद में पी लूँगी, अभी रोटियाँ डालनी हैं,” वंदना ने कहा और मुड़ने लगी।
“सुनो,” दिवाकर बाबू ने उसे रोका। “आज रोहन फिर पैसों के लिए चिल्ला रहा था क्या?”
वंदना की आँखें झुक गईं। वह झूठ नहीं बोलना चाहती थी और सच बोलने की हिम्मत नहीं थी। उसने बस इतना कहा, “वो… उन्हें किसी नई डील के लिए पचास हज़ार चाहिए थे। मैंने मना कर दिया तो…”
“तो उसने हाथ उठाया?” दिवाकर बाबू की आवाज़ सख्त हो गई।
वंदना ने अपनी कलाई को अपनी साड़ी के पल्लू में छिपा लिया, जिस पर शायद रोहन की पकड़ के निशान थे। वह कुछ बोले बिना रसोई में चली गई।
दिवाकर बाबू का खून खौल उठा। वे जानते थे कि रोहन ने उनकी पीएफ (PF) की रकम भी धीरे-धीरे करके निकलवा ली थी। भावनात्मक अत्याचार करके—”पापा, बस यह आखिरी बार, इस बार पक्का मुनाफा होगा”—कहकर उसने सब कुछ ले लिया था। और जब भी पैसे डूबते, सुभाषिनी कहती, “हाय राम! ज़रूर उस वंदना ने टोक दिया होगा, तभी काम बिगड़ गया।”
रात के खाने पर माहौल तनावपूर्ण था। रोहन कुर्सी पर पैर फैलाकर बैठा था। उसके चेहरे पर एक अजीब सी ढिठाई थी।
“माँ, खाना लाओ, भूख लगी है,” उसने हुक्म दिया।
सुभाषिनी ने तुरंत थाली परोसी। “खा ले मेरे लाल, दिन भर बाहर धक्के खाता है। कमज़ोर हो गया है तू।”
दिवाकर बाबू ने अपना निवाला तोड़ा ही था कि रोहन बोला, “पापा, मुझे वंदना के जेवर चाहिए।”
दिवाकर बाबू का हाथ हवा में रुक गया। वंदना, जो पानी का जग रख रही थी, सन्न रह गई।
“क्यों?” दिवाकर बाबू ने पूछा।
“एक बहुत बड़ी ऑपच्यूनिटी (opportunity) है। मेरा दोस्त दुबई जा रहा है, वो वहां से इलेक्ट्रॉनिक सामान भेजेगा। बस शुरू में दो लाख लगाने हैं। गारंटीड प्रॉफिट है। अब आपके पास तो पैसे बचे नहीं हैं, तो यही रास्ता है,” रोहन ने ऐसे कहा जैसे वह कोई बहुत समझदारी की बात कर रहा हो।
“खबरदार!” दिवाकर बाबू गरजे। “वंदना के जेवर उसके स्त्री-धन हैं। उसके पिता ने दिए थे। उन पर तुम्हारा कोई हक नहीं है।”
“हक कैसे नहीं है?” सुभाषिनी बीच में कूद पड़ीं। “पति का हक होता है पत्नी की हर चीज़ पर। और फिर, यह जेवर अलमारी में रखे-रखे क्या अंडे देंगे? अगर आज ये जेवर मेरे बेटे के भविष्य बनाने के काम आ गए, तो कल रोहन इसे रानी बनाकर रखेगा। दे दे वंदना, नाटक मत कर।”
वंदना की आँखों में आंसू आ गए। “माँजी, यह मेरे बाबूजी की आखिरी निशानी है। पिछली बार मेरी चेन और अंगूठी भी यह कहकर ले ली गई थी कि छुड़ा लेंगे, पर वो आज तक नहीं आए।”
“ओहो! बड़ा हिसाब रख रही है तू?” रोहन चिल्लाया और उसने खाने की थाली ज़मीन पर पटक दी। दाल और सब्ज़ी कालीन पर बिखर गई। “दो टके के गहनों के लिए तू मेरे भविष्य में रोड़ा बन रही है? पनौती कहीं की!”
रोहन गुस्से में घर से निकल गया। सुभाषिनी छाती पीटने लगीं।
“देख लिया? देख लिया तूने? भूखा चला गया मेरा बच्चा। तेरे कलेजे को ठंडक मिल गई? अरे, मैं तो कहती हूँ, तू ही मेरे घर के लिए अपशकुन है। जब से आई है, मेरा बेटा दर-दर की ठोकरें खा रहा है।”
दिवाकर बाबू चुपचाप उठे। वे वंदना के पास गए, जो ज़मीन पर बिखरा खाना समेट रही थी। उन्होंने उसे उठाया।
“छोड़ दो इसे। अपने कमरे में जाओ,” उन्होंने कहा।
उस रात घर में किसी ने खाना नहीं खाया।
अगले दो दिन तक रोहन घर नहीं आया। सुभाषिनी का रो-रोकर बुरा हाल था। वे बार-बार वंदना को कोसतीं। तीसरे दिन शाम को रोहन आया, लेकिन अकेला नहीं था। उसके साथ दो अजनबी लोग थे। वे देखने में ही गुंडे लग रहे थे।
“आइए भाई साहब, यही है वो मकान,” रोहन ने लड़खड़ाती आवाज़ में कहा। उसने शराब पी रखी थी।
दिवाकर बाबू बरामदे में आए। “कौन हैं ये लोग?”
उनमें से एक आदमी ने पान थूकते हुए कहा, “चाचा, तुम्हारे बेटे ने हमसे पांच लाख उधार लिए थे। जुए में हार गया। अब या तो पैसे दो, या फिर यह मकान खाली करो। इसने मकान के कागज़ गिरवी रखे हैं।”
दिवाकर बाबू के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। “मकान? लेकिन कागज़ तो मेरे पास हैं।”
“अरे चाचा, असली कागज़ तो इसने तीन महीने पहले ही चुरा लिए थे। जो तुम्हारे पास हैं, वो फोटोकॉपी हैं,” गुंडे ने हंसते हुए कहा। “क्यों बे रोहन?”
रोहन नज़रे नहीं मिला पा रहा था। सुभाषिनी, जो यह सब सुन रही थीं, दौड़कर बाहर आईं। “नहीं! मेरा बेटा ऐसा नहीं कर सकता! यह तुम लोग झूठ बोल रहे हो। यह वंदना की चाल होगी।”
गुंडे ने एक कागज़ सुभाषिनी के मुंह पर फेंका। “यह लो, तुम्हारे लाडले के दस्तखत। और यह एग्रीमेंट। कल सुबह तक का वक़्त है। या तो पैसा, या मकान।”
गुंडे चले गए। घर में मातम छा गया।
दिवाकर बाबू सोफे पर गिर पड़े। जिस घर को उन्होंने एक-एक ईंट जोड़कर बनाया था, वह उनका नालायक बेटा जुए में हार चुका था। सुभाषिनी अब भी मानने को तैयार नहीं थीं। वे रोहन के पैरों में गिर गईं।
“बोल दे बेटा, यह झूठ है न? तूने ऐसा नहीं किया न?”
रोहन ने अपनी माँ को झटक दिया। “हाँ किया है! क्या करता? मुझे पैसों की ज़रूरत थी। मुझे लगा था मैं जीत जाऊंगा और कागज़ वापस रख दूँगा। पर मैं हार गया। अब रोने से क्या होगा? पापा, आपके पास कोई एफडी (FD) बची है क्या? या कोई दोस्त जो मदद कर दे?”
इस बेशर्मी को देखकर दिवाकर बाबू को दिल का दौरा सा महसूस हुआ। उन्होंने अपना सीना पकड़ लिया।
तभी वंदना अपने कमरे से बाहर आई। उसके हाथ में एक छोटा सा सूटकेस था।
सुभाषिनी उसे देखते ही चीखीं, “वाह! घर में आग लगी है और यह महारानी भागने की तैयारी कर रही हैं। यही तो असलियत है इन पराये घर की लड़कियों की। सुख में साथ, दुख में रफूचक्कर!”
रोहन भी हंसा, “जाने दो माँ। वैसे भी इसके पास है ही क्या जो हमारे काम आएगा।”
वंदना ने सूटकेस मेज़ पर रखा और उसे खोला। उसमें कपड़े नहीं थे। उसमें नकद नोटों की गड्डियाँ थीं।
सबकी आँखें फटी की फटी रह गईं।
“यह… यह पाँच लाख रुपए हैं,” वंदना ने शांत स्वर में कहा।
“पाँच लाख?” रोहन झपटा। “कहाँ से आए तेरे पास? तूने कहाँ से चुराए?”
वंदना ने रोहन का हाथ झटक दिया। उसकी आँखों में अब वो डर नहीं था जो रोज़ रहता था। आज वहां एक स्वाभिमान की आग थी।
“यह चोरी के नहीं हैं। यह मेरी मेहनत की कमाई है। पिछले तीन साल से मैं घर में सिलाई और ट्यूशन का काम कर रही थी। और मेरे मायके से जो थोड़ा बहुत पैसा मिलता था, उसे मैं जोड़ती रही। मुझे पता था कि एक दिन यह नौबत आएगी। आपके लच्छन मुझे पहले दिन से दिख रहे थे।”
सुभाषिनी सन्न रह गईं। जिस बहू को वे दिन-रात ‘पनौती’ और ‘निकम्मी’ कहती थीं, वह घर के अंदर ही अंदर, सबकी नज़रों से बचकर, घर की ढाल बन रही थी।
वंदना ने दिवाकर बाबू की तरफ देखा। “बाबूजी, आप यह पैसे लीजिए और उन लोगों को देकर अपना घर बचाइए।”
दिवाकर बाबू की आँखों से आंसू बह निकले। वे उठकर वंदना के सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गए। “बेटी, मैं शर्मिंदा हूँ। मैं तुझे पहचान नहीं पाया।”
रोहन ने नोटों की गड्डी उठाने की कोशिश की। “ला, मुझे दे। मैं जाकर दे आता हूँ।”
“खबरदार!” वंदना की आवाज़ ने सबको चौंका दिया। “इन पैसों को हाथ भी मत लगाना। यह पैसे मैं बाबूजी को दूँगी, आपको नहीं। और एक शर्त पर।”
“शर्त?” सुभाषिनी ने पूछा।
“हाँ,” वंदना ने कहा। “बाबूजी, आज ही इस घर के कागज़ात आपके नाम से मेरे नाम पर ट्रांसफर होंगे। या फिर किसी ट्रस्ट के नाम। लेकिन रोहन के नाम पर यह घर कभी नहीं होगा। मुझे भरोसा नहीं है कि कल को यह फिर से इसे गिरवी नहीं रख देंगे।”
“तू होती कौन है यह फैसला करने वाली?” रोहन चिल्लाया। “मैं इस घर का वारिस हूँ।”
तभी एक ज़ोरदार तमाचा रोहन के गाल पर पड़ा। यह तमाचा दिवाकर बाबू का नहीं, सुभाषिनी का था।
पूरा कमरा सन्न रह गया। रोहन गाल पर हाथ रखकर अविश्वास से अपनी माँ को देख रहा था।
“वारिस?” सुभाषिनी की आवाज़ कांप रही थी, लेकिन उसमें अब अंधभक्ति नहीं थी। “वारिस वो होता है जो विरासत को संभालता है, वो नहीं जो उसे नीलाम करता है। तू वारिस नहीं, तू इस घर का कलंक है।”
सुभाषिनी वंदना के पास गईं। वे वंदना के पैरों में झुकने लगीं, लेकिन वंदना ने उन्हें पकड़ लिया।
“माँजी, यह क्या कर रही हैं?”
“माफ़ी मांग रही हूँ बहू,” सुभाषिनी ने सिसकते हुए कहा। “मैं अंधी हो गई थी। मुझे अपना खोटा सिक्का भी सोना लगता था, और तू जो असली कुंदन थी, उसे मैं पत्थर समझती रही। मैं रोज़ तुझे कोसती थी, तुझे मनहूस कहती थी। पर आज जब मेरा अपना खून, मेरा बेटा मुझे सड़क पर ले आया, तो तूने… तूने पराए घर से आकर मेरी छत बचाई। कसूर तेरा नहीं था बहू, कसूर मेरी परवरिश का था, मेरी ममता का था जिसने इसे नालायक बना दिया।”
दिवाकर बाबू ने वंदना के सिर पर हाथ रखा। “आज से यह घर वंदना का है। रोहन, अगर तुझे यहाँ रहना है, तो वंदना की शर्तों पर रहना होगा। कमाकर लाना होगा, और एक-एक पैसे का हिसाब देना होगा। वरना यह दरवाज़ा खुला है।”
रोहन सिर झुकाए खड़ा था। उसकी सारी हेकड़ी निकल चुकी थी। उसे एहसास हो गया था कि आज उसने सिर्फ पैसे नहीं हारे, बल्कि अपने माता-पिता का विश्वास भी खो दिया है।
अगले दिन, दिवाकर बाबू और वंदना ने जाकर कर्ज चुकाया और घर के कागज़ छुड़ाए।
शाम को वंदना रसोई में थी। सुभाषिनी अंदर आईं। उन्होंने वंदना के हाथ से बेलन ले लिया।
“तू रहने दे। आज चाय और खाना मैं बनाऊँगी। तू जाकर आराम कर, या अपनी ट्यूशन क्लास की तैयारी कर। अब से घर का काम हम मिलकर करेंगे।”
वंदना की आँखों में खुशी के आंसू आ गए।
दिवाकर बाबू बरामदे में बैठे थे। आज घड़ी की टिकटिक उन्हें परेशान नहीं कर रही थी। उन्हें एक सुकून था। उन्होंने मन ही मन सोचा—
“लोग कहते हैं बेटा कुल का दीपक होता है। पर जब दीपक ही घर को जलाने लगे, तो कुल की मर्यादा वो बेटी बचाती है जो दूसरे घर से आई होती है। खून के रिश्तों से बड़ा, ‘एहसास’ और ‘फ़र्ज़’ का रिश्ता होता है।”
उस दिन के बाद, उस घर की परिभाषा बदल गई। वहाँ अब एक ‘सास’ नहीं, बल्कि एक ‘माँ’ रहती थी, और एक ‘बहू’ नहीं, बल्कि एक ‘बेटी’ रहती थी जिसने साबित कर दिया था कि घर दीवारों से नहीं, बल्कि संस्कारों और समर्पण से बचते हैं।
मूल लेखिका : करुणा मलिक