नखरे

“माँ, देख लिया भाभी को? फिर घर पर ही खाना बना लिया। यह भी नहीं सोचा कि ननद कौन-सा रोज़-रोज़ आती है, तो आज खाना किसी होटल में ही खा लेते। त्यौहार कौन-सा रोज़ आते हैं, लेकिन इन्हें तो मेरे आने की खुशी ही नहीं होती।”

श्रद्धा रक्षा बंधन पर मायके आई थी। राखी बाँधने के बाद खाने का समय हुआ तो घर का बना खाना देखकर वह बड़बड़ाने लगी।

“तो क्या हुआ बेटी, घर का खाना तो कितना अच्छा होता है। सिया सुबह से लगी हुई थी। कितना कुछ बनाया है उसने तेरे लिए—सब चीज़ तेरी पसंद की बनी है, दही बड़े, दाल मखनी, शाही पनीर और सफेद रसगुल्ले। मैंने तो कहा भी था कि इतना सब मत बना, तू थक जाएगी। तो उसने यही कहा कि कौन-सा दीदी रोज़-रोज़ आती है, उनके लिए इतना तो मैं कर ही सकती हूँ।”
सुनीता जी ने बेटी को समझाया।

“आपको कुछ नहीं पता माँ, अब मुझे भी भाभी के साथ रसोई में काम करना पड़ेगा।” श्रद्धा ने नाक-भौं सिकोड़ी।

“तो क्या हुआ श्रद्धा, यह घर तुम्हारा भी है। भाभी के साथ रसोई में थोड़ी मदद कर लेगी तो क्या बिगड़ जाएगा। वैसे भी तुम्हें बहन होने के नाते समझना चाहिए कि तुम्हारा भाई थोड़ा हल्का है, फिर भी वो दोनों तुम्हारे मान-सम्मान में कोई कमी नहीं रखते। तुम जब भी मायके आती हो, सिया को बात-बात में सुनाने से नहीं चूकती कि यह घर तुम्हारा भी है। तो फिर अपने घर में काम करने में कैसी परेशानी? और अपने घर की हालत भी तुम्हें पता होनी चाहिए।

श्रद्धा, हमारे ज़माने में तो होटल में खाने का कोई रिवाज ही नहीं था। यहाँ तक कि हमारी ननदें बिना बताए आ जाती थीं क्योंकि उन दिनों मोबाइल होते नहीं थे। और चाहे जो भी समय हो, हम खाना घर पर ही बनाते थे। होटल से मँगाने का भी कोई रिवाज नहीं था। तुम्हारी बुआ भी आते ही आते रसोई में हमारे साथ लग जाती थीं। सब मिलकर हँसी-मज़ाक करते, त्यौहार मानते और खाना खा-पीकर मस्ती करते। हमारी ननदों ने तो हमें इस तरह नखरे नहीं दिखाए।

यहाँ तक कि कभी-कभी घर में सब्ज़ी भी नहीं होती थी, तो उस समय जो होता वही बन जाता और सब प्रेम से खाते।
देख बेटा, घर अपना मानने से अपना होता है, केवल कहने से नहीं। यह घर जितना तुम्हारे भाई का है उतना तुम्हारा भी है। लेकिन उसके लिए तुम्हें भी अपने भाई-भाभी के सम्मान को समझना होगा।”

तभी सिया, श्रद्धा और सुनीता को खाने के लिए बुलाने आ गई। भाभी का मुस्कुराता चेहरा देखकर श्रद्धा के मन का सारा मैल निकल गया।

“भाभी, पहले माँ, पापा, भैया और बच्चों को खिला दीजिए, फिर हम दोनों एक साथ मिलकर खाएँगे। बहुत दिन हो गए आपके साथ खाना खाए।”
कहकर श्रद्धा, सिया को खींचते हुए ले गई।

सिया भी तब सोच रही थी—आज ननद रानी को क्या हुआ?
सच है, राखी ने उनके रिश्ते में नई मजबूती ला दी थी। इस रक्षाबंधन पर इतना खूबसूरत सरप्राइज मिलेगा, उसने सोचा भी नहीं था।

सिया की आँखें नम हो गईं। उसने सुनीता जी की तरफ देखा, तो उन्होंने मुस्कुराकर सिर हिला दिया।

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