राघव एक प्रतिभाशाली मूर्तिकार था। उसकी उंगलियों में वो जादू था जो गीली मिट्टी में भी प्राण फूँक देता था। लेकिन कला की कद्र और पेट की भूख के बीच का फासला अक्सर बहुत लंबा होता है। उसके पिता, दीनानाथ जी, पुराने ज़माने के कारीगर थे जिन्होंने पूरी ज़िंदगी अभावों में गुजारी थी, लेकिन अपनी ईमानदारी और स्वाभिमान को कभी आंच नहीं आने दी थी।
समस्या यह थी कि दीनानाथ जी अब बिस्तर पर थे। उन्हें सांस की गंभीर बीमारी थी और डॉक्टर ने ऑपरेशन के लिए एक लाख रुपये का इंतज़ाम करने को कहा था। राघव की मूर्तियाँ बिकती तो थीं, लेकिन बिचौलिये (middlemen) सारा मुनाफ़ा खा जाते थे। राघव के पास जमा-पूंजी के नाम पर सिर्फ़ कुछ हजार रुपये और ढेर सारा हुनर था।
राघव की पत्नी, सुधा, ने उसे सलाह दी थी कि वो अपने बड़े भाई, किशन, से मदद मांगे। किशन शहर में एक बड़ा ठेकेदार बन चुका था। उसने सालों पहले परिवार से नाता तोड़ लिया था क्योंकि उसे लगता था कि मूर्ति बनाने का काम “पिछड़े” लोगों का है और इसमें कोई भविष्य नहीं है। किशन अब एक आलीशान कोठी में रहता था और शहर के रसूखदार लोगों में गिना जाता था।
राघव का मन नहीं था। उसे पता था कि किशन भैया अब वो पुराने भाई नहीं रहे। लेकिन पिता की उखड़ती सांसों को देखकर उसने अपना स्वाभिमान जेब में रखा और किशन के घर जाने का फैसला किया।
किशन की कोठी के बाहर खड़ा राघव अपनी पुरानी साइकिल और मैले कुर्ते में किसी अजनबी जैसा लग रहा था। गार्ड ने उसे दो बार रोका, फिर किशन का नाम लेने पर अंदर जाने दिया।
ड्राइंग रूम में एयर कंडीशनर की ठंडी हवा चल रही थी, जो राघव के पसीने को सुखा रही थी लेकिन उसके अंदर की घबराहट को बढ़ा रही थी। थोड़ी देर बाद किशन आया। उसने रेशमी कुर्ता-पाजामा पहन रखा था और हाथ में एक महंगा मोबाइल था।
“अरे राघव! तुम? इतने सालों बाद रास्ता कैसे भूल गए?” किशन की आवाज़ में अपनापन कम और व्यंग्य ज़्यादा था।
“भैया, वो… बाबूजी की तबीयत बहुत खराब है,” राघव ने हिचकिचाते हुए कहा। “सांस की नली में ब्लॉकेज है। डॉक्टर ने तुरंत ऑपरेशन को कहा है। एक लाख रुपये की ज़रूरत है।”
किशन ने सोफे पर बैठते हुए अपनी नौकरानी को पानी लाने का इशारा किया। उसने राघव को बैठने के लिए भी नहीं कहा। राघव खड़ा रहा।
“हम्म… बीमारी,” किशन ने लापरवाही से कहा। “मैंने तो पहले ही कहा था बाबूजी से कि उस धूल-मिट्टी वाले काम से बीमार ही पड़ेंगे। पर वो अपनी ज़िद के पक्के थे। और तुम भी तो उन्हीं के नक्शेकदम पर चले। क्या मिला? आज भी हाथ फैलाने पड़ रहे हैं न?”
राघव ने मुट्ठी भींच ली। “भैया, मैं भीख नहीं मांग रहा। उधार मांग रहा हूँ। मेरी दुर्गा पूजा की मूर्तियों के ऑर्डर आने वाले हैं। दो महीने में ब्याज समेत लौटा दूंगा।”
किशन ज़ोर से हंसा। उसकी हंसी कांच के गिलासों से टकराकर गूंज उठी।
“ब्याज? अरे राघव, तुम अपनी दो वक्त की रोटी का जुगाड़ तो कर नहीं पाते, एक लाख रुपये कैसे लौटाओगे? और वैसे भी, रिश्तेदारों को दिया पैसा कभी वापस नहीं आता, यह मैं जानता हूँ।”
किशन उठा और अंदर कमरे में गया। राघव की उम्मीद की डोर अभी भी बंधी थी। शायद भाई का दिल पसीज जाए।
थोड़ी देर बाद किशन वापस आया। उसके हाथ में नोटों की गड्डियां नहीं, बल्कि कुछ खुले हुए लिफाफे और कुछ रेजगारी (चिल्लर) थी। उसने वो सब सेंटर टेबल पर फेंक दिया।
“देखो राघव,” किशन ने उपदेश देने वाले अंदाज़ में कहा, “एक लाख तो बहुत बड़ी रकम है। अभी मेरा भी हाथ तंग है। मैंने नई ज़मीन खरीदी है। लेकिन हाँ, यह कुछ पंद्रह-बीस हज़ार रुपये हैं। यह रख लो। और इसे उधार मत समझना। समझ लो कि बड़े भाई ने छोटे भाई की गरीबी पर तरस खाकर दान दे दिया। लौटाने की ज़रूरत नहीं है। बाबूजी का इलाज सरकारी अस्पताल में करवा लेना, वहां सस्ता होता है। और ये पैसे… ले जाओ, ऐश करो।”
राघव ने मेज़ पर पड़े उन रुपयों को देखा। फिर उसने किशन की आंखों में देखा। वहां भाई का प्यार नहीं था, वहां एक अमीर आदमी का अहंकार था जो अपनी दौलत से एक गरीब रिश्तेदार का मुंह बंद करना चाहता था। किशन ने उन पैसों को ‘मदद’ नहीं, बल्कि ‘दान’ और ‘तरस’ का नाम दिया था।
राघव के कानों में बाबूजी की वो बात गूंज उठी जो वो बचपन में कहा करते थे—“बेटा, मेहनत की सूखी रोटी भी घी लगी चुपड़ी रोटी से बेहतर होती है, अगर वो इज़्ज़त से कमाई गई हो।”
राघव धीरे से आगे बढ़ा। किशन को लगा कि वो पैसे उठाने आ रहा है। किशन के चेहरे पर एक विजयी मुस्कान आ गई। उसे अच्छा लग रहा था अपने कलाकार भाई को अपने सामने झुकते हुए देख कर।
लेकिन राघव ने पैसे नहीं उठाए। उसने अपनी जेब से दस रुपये का एक नोट निकाला जो शायद उसकी वापसी के किराये के लिए था। उसने वो नोट उन पंद्रह हज़ार रुपयों के ऊपर रख दिया।
“यह क्या है?” किशन ने भौहें सिकोड़ीं।
“यह शगुन है भैया,” राघव की आवाज़ में अब कंपन नहीं, एक अजीब सी धातुई खनक थी। “आपकी इस नई अमीरी और इस नए अहंकार के लिए। आपने ठीक कहा, मैं शायद एक लाख रुपये नहीं कमा सकता, लेकिन मैं इतना गरीब भी नहीं हूँ कि अपने बाप का इलाज आपकी ‘तरस’ से करवाऊं।”
“तुम पागल हो गए हो? पंद्रह हज़ार हैं ये!” किशन चिल्लाया।
“कीमत पैसों की नहीं, नीयत की होती है भैया,” राघव ने सीधे किशन की आंखों में देखा। “मैं यहाँ एक भाई के पास आया था, एक सेठ के पास नहीं। आपने पैसे फेंककर और सरकारी अस्पताल का ताना देकर यह साबित कर दिया कि आपके लिए रिश्ते अब सिर्फ़ ‘डील’ हैं। बाबूजी का इलाज मैं करवा लूंगा, चाहे मुझे अपनी किडनी बेचनी पड़े, या दिन-रात एक करना पड़े। लेकिन आपके यह पैसे, जिनमें प्यार की जगह घमंड की बदबू आ रही है…”
राघव एक पल रुका, उसने एक लंबी सांस ली और फिर वह वाक्य कहा जो इस कमरे की दीवारों को चीर गया।
“नहीं चाहिए भीख के पैसे!”
राघव मुड़ा और तेज़ कदमों से बाहर निकल गया। किशन सन्न रह गया। उसे उम्मीद थी कि राघव गिड़गिड़ाएगा, पैर पकड़ेगा। लेकिन राघव तो उसे बौना साबित करके चला गया था।
राघव जब घर लौटा, तो उसकी जेब खाली थी लेकिन उसका मन हल्का था। सुधा ने उसका चेहरा देखकर सब समझ लिया। उसने कुछ नहीं पूछा, बस राघव का हाथ थाम लिया।
“अब क्या करेंगे?” सुधा ने धीरे से पूछा।
“वही, जो एक कलाकार करता है,” राघव ने कहा। “सृजन।”
उस रात राघव सोया नहीं। उसने घर के आंगन में रखी उस विशाल मिट्टी के ढेर को देखा जिसे उसने अगले साल की प्रदर्शनी के लिए बचाकर रखा था। उसने पानी डाला, मिट्टी गूंथी और काम शुरू किया।
अगले दस दिन तक राघव ने खाना-पीना लगभग छोड़ दिया। वह दिन-रात काम करता रहा। सुधा उसके पसीने पोंछती, उसे चाय पिलाती और दीनानाथ जी की देखभाल करती। दीनानाथ जी की हालत स्थिर थी, लेकिन समय कम था।
दसवें दिन, राघव ने एक मूर्ति तैयार की। यह किसी देवी-देवता की मूर्ति नहीं थी। यह एक ‘मज़दूर पिता’ की मूर्ति थी जो अपने कंधे पर अपने बच्चे को उठाए हुए था, और बच्चे के हाथ में एक किताब थी। मूर्ति की आंखों में इतनी जीवंतता थी, इतना दर्द और इतनी उम्मीद थी कि देखने वाले की रूह कांप जाए।
राघव उस मूर्ति को लेकर शहर की सबसे बड़ी आर्ट गैलरी के मालिक, मिस्टर खन्ना के पास गया। मिस्टर खन्ना कला के कद्रदान थे, लेकिन बिचौलियों के कारण राघव कभी उन तक पहुँच नहीं पाया था। आज उसने गार्ड्स से लड़कर सीधे खन्ना साहब की कार के आगे अपनी मूर्ति रख दी।
खन्ना साहब कार से उतरे। उनकी नज़र उस मूर्ति पर पड़ी और वे ठिठक गए। वे पांच मिनट तक बिना पलक झपकाए उस मिट्टी के شاهकार (masterpiece) को देखते रहे।
“किसने बनाई है ये?” उन्होंने पूछा।
“मैंने,” राघव ने, जो धूल और मिट्टी में सना था, आगे बढ़कर कहा।
“क्या कीमत है इसकी?”
“एक लाख रुपये,” राघव ने बिना हिचकिचाए कहा। “मेरे पिता का जीवन इस मूर्ति में है साहब।”
खन्ना साहब ने राघव को देखा। फिर उन्होंने अपनी चेकबुक निकाली।
“कलाकार, तुम अपनी कला को कम आंक रहे हो। इस मूर्ति में जो भाव है, वो अनमोल है। मैं तुम्हें इसके लिए दो लाख रुपये दूंगा। एक लाख अभी, और एक लाख तब जब तुम मेरे लिए ऐसी ही पांच और मूर्तियां बनाओगे। मुझे अपनी गैलरी के लिए एक मुख्य मूर्तिकार की ज़रूरत है। क्या तुम काम करोगे?”
राघव की आंखों से आंसुओं की धार बह निकली। यह भीख नहीं थी। यह उसकी कला, उसकी तपस्या का मूल्य था।
दीनानाथ जी का ऑपरेशन सफल रहा। वे घर वापस आ गए।
छह महीने बाद।
शहर के टाउन हॉल में एक भव्य प्रदर्शनी लगी थी। मुख्य आकर्षण राघव की बनाई मूर्तियां थीं। पूरा शहर वहां उमड़ा था। अखबारों में राघव की तस्वीरें छपी थीं।
उस भीड़ में, एक कोने में किशन खड़ा था। उसका व्यापार पिछले कुछ महीनों में मंदी का शिकार हो गया था। गलत संगत और जुए की लत ने उसे कर्ज़ में डुबो दिया था। आज वो उसी टाउन हॉल में खड़ा था, जहाँ उसका भाई ‘मुख्य अतिथि’ के रूप में मंच पर था।
राघव ने अपनी स्पीच में कहा, “आज मैं जो कुछ भी हूँ, एक ‘ना’ की वजह से हूँ। अगर उस दिन मुझे ‘आसान मदद’ मिल गई होती, तो शायद मैं अपनी असली ताकत कभी नहीं पहचान पाता। मुझे गर्व है कि मैंने वो रास्ता चुना जहाँ मुश्किलें थीं, पर सिर झुकाने की मजबूरी नहीं थी।”
किशन की आंखों में आंसू आ गए। उसे वो पंद्रह हज़ार रुपये याद आए जो उसने राघव पर फेंके थे। आज राघव की एक-एक मूर्ति लाखों में बिक रही थी।
कार्यक्रम के बाद, किशन धीरे-धीरे राघव के पास गया। राघव महंगे कुरते में था, उसके आसपास लोग ऑटोग्राफ ले रहे थे। किशन को देख राघव रुका।
“राघव…” किशन की आवाज़ दबी हुई थी।
राघव ने सबको हटाया और भाई के पास आया। उसने झुककर किशन के पैर छुए।
“अरे, ये क्या कर रहे हो? मैं तो…” किशन शर्मिंदा हो गया।
“आप बड़े भाई हैं। आपका स्थान हमेशा ऊंचा रहेगा,” राघव ने मुस्कुराते हुए कहा।
“मुझे माफ़ कर दे भाई। उस दिन मैंने तेरे स्वाभिमान को चोट पहुंचाई थी। आज मेरा सब कुछ लुट गया है। शायद यह मेरे अहंकार की सज़ा है,” किशन रो पड़ा।
राघव ने किशन का हाथ थामा।
“भैया, समय सबका बदलता है। बाबूजी ठीक हैं, घर पर हैं। आप घर चलिए। साथ रहेंगे तो फिर से सब खड़ा कर लेंगे। आप व्यापार जानते हैं, मैं कला जानता हूँ। दोनों मिल जाएं तो क्या नहीं हो सकता?”
“लेकिन… मेरे पास कुछ नहीं है देने को,” किशन ने कहा।
“मुझे आपसे पैसे नहीं चाहिए भैया,” राघव ने कहा। “मुझे मेरा भाई चाहिए। वो भाई, जो बचपन में मेरे लिए पतंग लूटने के लिए दूसरों से लड़ जाता था। वो सेठ किशन नहीं चाहिए।”
किशन ने राघव को गले लगा लिया। उस गले मिलने में कोई अहंकार नहीं था, कोई ‘भीख’ नहीं थी। वहां सिर्फ़ पश्चाताप के आंसू और एक नए रिश्ते की नींव थी।
राघव ने साबित कर दिया था कि इंसान की असली दौलत उसका हुनर और उसका चरित्र होता है। अगर वो सलामत है, तो दुनिया की कोई भी ताकत उसे झुका नहीं सकती। और सबसे बड़ी बात—जब आप अपनी मेहनत की कमाई खाते हैं, तो उसका स्वाद किसी भी शाही दावत से बेहतर होता है।
मूल लेखक : बालेश्वर गुप्ता