मूर्ख नहीं मैं -लतिका पल्लवी : Moral Stories in Hindi

माँ कहाँ हो,कहते हुए चाँदनी नें घर मे प्रवेश किया। सामने अपनी छोटी भाभी को देखकर उसने पूछा भाभी माँ कहाँ है? यह सुनकर उसकी भाभी को बहुत ही बुरा लगा, फिर भी उसने हँसते हुए कहाँ अरे!दीदी घोड़े पर सवार क्यों हो?  थोड़ा रुको अपनी भाभी से भी तो परनामा पाती(अभिवादन और

हालचाल लेना )कर लो, भाई भतीजा का हालचाल पूछ लो। यह क्या बात हुई कि घर मे घुसे नहीं कि बस माँ को खोजना और उनके कमरा मे चले जाना।हम भी आपके कुछ लगते है।भाभी की बातो को सुनकर चाँदनी को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने भाभी से नजर चुराते हुए कहा वो ऐसा है

भाभी कि मै थोड़ा जल्दी मे हूँ तो इतना ध्यान नहीं रहा।बस माँ से दो मिनट का काम है।बहुत देर से घर से निकली हूँ।बच्चे स्कूल से आते ही होंगे तो गलती हो गईं।चाँदनी का यह आज की बात नहीं थी उसका हमेशा से यही रवैया रहा है।जब भी आती है बस माँ से मतलब रहता है।बड़ी बहू को इससे

फर्क नहीं पड़ता। वह  चाँदनी के इस व्यवहार को जानती है। इसलिए वह उसे कभी कुछ नहीं कहती है पर आज जब घर की छोटी बहू डिलीवरी के लिए  बाहर से आई है तो उसने चाँदनी को इस बात के लिए टोक दिया। बड़ी बहू नें जब देखा तो कहा छोटी इनका यही व्यवहार है तुम बेकार मे क्यों उनसे

उलझी। बस इन्हे बता देना था कि माँ जी छत पर है वह उनके पास चली जाती।  दीदी कितना मज़ा तो आया।आपने देखा नहीं मेरे बोलते ही दीदी का मुँह कैसा बन गया था।बेचारी कितना सफाई दे रही थी।आपका तो पता नहीं पर मुझे तो बहुत मज़ा आया।तुम भी ना छोटी, कहकर बड़ी बहू वहाँ से चली

गईं।थोड़ी देर बाद माँ जी नें छत से आवाज लगाई। घर की बेटी को आए हुए कितना देर हो गया,पर किसी को होश नहीं कि चाय पानी का पूछे।बड़ी बहू नें छोटी बहू से कहाँ जा जल्दी से लेकर जा नहीं तो और भी कुछ सुनना पड़ेगा। कितनी देर से बोल रही हूँ पर नहीं दीदी तो जल्दी मे है, चाय क्या

बनाना है?कह रही थी।वो तो मुझे पता है जो मैंने चाय चढ़ा दी। अभी दो चार घंटा रहेंगी। सासु माँ की गाली नहीं खानी हो तो खाने का भी पूछ लेना, हो सकता है कि खाना भी खा कर जाए। ठीक है दीदी,दे दीजिए चाय,दे आऊ आपकी प्यारी ननद को,हँसते हुए चाय लेकर छोटी बहू चली गईं। थोड़ी देर बाद

छोटी बहू नीचे आई और आकर बड़ी बहू से कहा -आप सही कह रही थी।जैसे ही मैंने खाने के लिए पूछा दीदी से पहले माँ जी नें कहा-यह भी क्या पूछने की बात है? खाने के समय पर आई है तो खाना तो खाएगी ही ना? देखा मैंने कहा था ना ये दोपहर के समय आई है तो खाना खा कर ही जाएंगी,बड़ी

बहू नें कहा।इसमें बुराई भी नहीं है।बेटी को मायके से कोई बिना खाए क्यों भेजेगा?पर झूठ तो नहीं कहनी चाहिए थी ना कि जल्दी मे हूँ,दो मिनट माँ से जरूरी है बात करनी है उसके बाद चली जाउँगी।छोटी बहू नें कहा।तुमने इन्हे अभी जाना कहाँ है। तुम तो यहाँ रहती नहीं हो।इनको तुम नहीं

समझोगी।माँ से कुछ लेना होगा तो दोपहर मे आई है।शाम को जब तुम्हारे जेठ आएंगे तो माँ उनसे बोलेंगी देने के लिए। शाम को तो भाई भी रहते है।भाई के सामने मांगनें पर भाई कही मना ना करदे,इसलिए पीछे मांगती है और माँ प्रेशर देकर तुम्हारे जेठ जी से पूरा करवाती है,बड़ी बहू नें

बताया। मै क्यों नहीं समझूंगी दीदी मेरा हार माँ जी नें यह कह कर माँगा था कि इसी जैसा चाँदनी के लिए भी बनवाना है और वह हार उन्होंने चाँदनी को दे दिया, छोटी बहू नें अपना दुख याद दिलाया। यही बात कहकर वह हार माँ नें मझसे माँगा था कि एक जैसा दोनों जेठानी देवरानी का रहेगा तो को

ई कह नहीं पाएगा, आपने मुझे खराब गहना दिया और उसे अच्छा दिया, बड़ी बहू नें सही बात बताया।अच्छा तो वह हार आपका था? हे भगवान माँ कितना झूठ बोलती है।थोड़ी देर बाद चाँदनी चली गईं। शाम मे माँ जी नें किसी से कुछ नहीं कहा तो बड़ी बहू को आश्चर्य हुआ। ऐसा कैसे हो सकता है कि चाँदनी दोपहर मे आए और उसकी कुछ माँग नहीं हो!रात बीती दूसरे दिन बड़ी बहू नें छोटी बहू से

पूछा माँ जी नें देवर जी से चाँदनी को कुछ देने को कहा है क्या? लग रहा है तुम्हारे जेठ जी से कुछ नहीं कहा है। कहा होता तो वे मुझे बताते ही। चाँदनी आए और बिना कुछ लिए मान जाए यह भी विश्वास नहीं होता।दीदी इतनी चिंता भी नहीं करो। आपकी बात सही है पर माँ जी नें आपके देवर से

नहीं मुझसे माँगा था।क्या माँगा तुमने दिया?नहीं। नहीं और घर मे हंगामा भी नहीं हुआ।क्या माँगा था?मेरे मायके से जो कंगन मिला है उसे माँग रही थी। कह रही थी कि चाँदनी को बहुत पसंद है। उसी डिजाइन का ऑडर देकर बनवाना चाहती है।मैंने कह दिया  माँ मै उसका फोटो खींचकर दीदी के

पास वाट्सअप कर देती हूँ। दिखा कर बनवा लेंगी। माँ आपने पहले ही हम जेठानी- देवरानी को बेवकूफ बना लिया है।पर काठ की हांडी बार बार नहीं चढ़ती है।अब हम बेवकूफ नहीं बनेंगे।बाबू के होने नेग मे मै दीदी के लिए अंगूठी बनवा कर लाई हूँ। माँ को दिखा कर कहा भी है कि पार्टी मे दूंगी।दीदी का मन कंगन लेने का लग रहा है पर वह कंगन मेरे मायके का है।मै उसे उन्हें क्यों दूँ।

मुहावरा —- काठ की हांडी बार बार नहीं चढ़ती 

लतिका पल्लवी

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