“दीदी, चल पड़ी हो क्या?”
“हाँ भाभी, ट्रेन चल पड़ी है।”
“सीट तो ठीक मिल गई? बच्चों के साथ कोई परेशानी तो नहीं होगी? जीजाजी भी आ जाते तो अच्छा रहता।”
“नहीं-नहीं भाभी, कोई दिक्कत नहीं। आराम से पहुँच जाएँगे… चलिए रखती हूँ। मिलने पर बात करेंगे।”
“ठीक है। जल्दी से आ जाइए।”
फोन रखते ही विभा कुछ पल तक उसी सीट पर जड़-सी बैठी रह गई। उसका मन बार-बार उसी एक बात पर अटक रहा था—भाभी आज इतनी मीठी कैसे बोल रही हैं?
विभा को समझ नहीं आ रहा था कि कभी सीधे मुँह बात न करने वाली भाभी आज इतना लाड़ क्यों दिखा रही है।
ट्रेन की खिड़की से बाहर भागते खेत, दूर-दूर तक फैले पेड़, स्टेशन पर चढ़ते-उतरते लोग—सब कुछ सामान्य था, पर विभा के भीतर असामान्यता का शोर था। उसकी गोद में छोटा बेटा ऊँघ रहा था, बड़ा बेटा बगल में चुपचाप बैठा अपनी पानी की बोतल पकड़े। विभा बार-बार उनका चेहरा देखती, सामान की तरफ देखती, टिकट संभालती—पर असल में वह अपने ही मन की बेचैनी से लड़ रही थी।
अचानक, जैसे उसकी सोच की डोर टूट ही नहीं रही थी कि फोन फिर बज उठा।
विभा ने पर्स से निकालकर देखा तो हक्की-बक्की रह गई—हे भगवान, क्या होने वाला है?
स्क्रीन पर भाभी पढ़ते ही विभा किसी अनजान भय से आशंकित हो उठी।
खैर दिल थामकर फोन उठाया…
उधर से तुरंत भाभी बोलीं—
“फोन उठाने में इतनी देर क्यों लगाई? अकेली आ रही हो, दो बच्चों का साथ है। चिंता लग जाती है। कहाँ पहुँची? गाड़ी तो ठीक समय से आ रही है ना?”
“हाँ-हाँ भाभी, चिंता ना करें। गाड़ी अपने समय पर चल रही है। बस एक घंटे में घर पहुँच जाऊँगी।”
“तुम्हारे भैया स्टेशन पर ही मिलेंगे।”
“भाभी, मैं कैब से पहुँच जाऊँगी।”
“कैसी बात करती हो, दीदी! ये पहुँच जाएँगे… रखती हूँ।”
फोन कट गया, मगर विभा का माथा जैसे भारी हो गया। उसके दिल में अजीब-सी धड़कन उठने लगी—ये सब क्या है? भाभी… और इतना ख्याल?
विभा ने तुरंत अपने पति को फोन मिलाया और भाभी के अजीबोगरीब व्यवहार के बारे में बताया।
उधर से पति की हँसी सुनाई दी—
“अरे भई! तुम्हें भी चैन नहीं। हमेशा शिकायत करती हो, आज बेचारी ख्याल रख रही है तो भी शिकायत।”
फिर हल्के-से मज़ाक में बोले—
“तुम्हारी भाभी शायद सचमुच बदल गई होंगी। अब चलो, सफर पर ध्यान दो।”
विभा ने कुछ कहना चाहा, पर शब्द भीतर ही दब गए। उसे लगा—शायद सच में वह बेवजह सोच रही है। या शायद… नहीं, यह “शायद” ही उसे बेचैन कर रहा था।
ट्रेन जैसे-जैसे गंतव्य के करीब आती गई, विभा के मन में पुरानी यादें उभरने लगीं।
माँ… पापा… मायके की खुशबू… वह आँगन, जहाँ वह बचपन में खेला करती थी… रसोई का कोना जहाँ माँ गुड़ वाली चाय बनाती थीं… पापा का हँसता चेहरा, जो स्टेशन पर आकर उसे हमेशा ऐसे ही लेने आते थे जैसे वह अभी भी छोटी बच्ची हो।
माँ-पापा की मृत्यु के बाद वह स्नेह कितना दूर चला गया था। पापा की मृत्यु के दो साल बाद माँ भी चली गई थी।
उन दो सालों में विभा जब भी माँ से मिलने आई, भाभी के व्यवहार से आहत होकर ही गई।
कभी ताने—“अब तो ससुराल ही घर है, यहाँ क्यों बार-बार आती हो?”
कभी व्यंग्य—“माँ के पास बैठकर रोने से क्या होगा? काम भी तो करना है।”
कभी उपेक्षा—खाना ठीक से न देना, बच्चों की बात सुनकर भी अनसुना कर देना, और सबसे ज्यादा—विभा को यह एहसास दिलाना कि अब वह “इस घर” की नहीं रही।
माँ के जाने के बाद तो उसने दिल कड़ा करके सब्र कर लिया था कि उसका मायका केवल माँ-पापा तक ही था।
भैया अपना घर-परिवार हैं। भाभी का घर है। वहाँ मेरी जगह कहाँ?
विभा ने खुद को यही समझाया था।
इसीलिए, जब छह साल बाद भाभी ने ज़ोर देकर कहा कि “दीदी, इस बार जरूर आइए,” तो विभा ने बहुत सोचकर हाँ कहा।
वह यह सोचकर आई कि खून के रिश्ते इतनी आसानी से नहीं टूटते।
पर भीतर कहीं डर भी था—कहीं फिर वही अपमान, वही ताने, वही चुभन…
गंतव्य पर पहुँच कर विभा ने दोनों बच्चों और सामान को उतारा ही था कि भैया पर नज़र पड़ी।
वह स्टेशन के बाहर उसी तरह खड़े थे, जैसे कभी पापा खड़े हुआ करते थे—थोड़ा चिंतित, थोड़ा खुश, और बहुत अपनापन लिए।
“भैया! आप क्यों परेशान हुए, मैं आ जाती।”
भैया ने सिर पर स्नेह भरा हाथ रखा तो विभा को पिता की याद आ गई।
उसे लगा जैसे किसी ने उसके सिर पर वर्षों बाद वही सुरक्षा का हाथ रखा हो।
विभा की आँखें भर आईं। अपनी नम आँखों को सबकी नज़रों से बचाती, वह चुपचाप कार में बैठ गई।
बच्चे उत्साहित थे, स्टेशन की भीड़, गाड़ी का हॉर्न, दुकानों की आवाजें… पर विभा के भीतर बस एक ही आवाज थी—क्या सच में… सब बदल गया?
गली में मुड़ते ही अपने घर पर नज़र पड़ी तो देखा कि भाभी गेट पर दोनों भतीजों के साथ खड़ी हैं।
विभा को अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था कि हमेशा शब्दों के कटु-बाण चलाने वाली भाभी, आज उसके लिए पलकें बिछाए हैं।
कार के रुकते ही बड़े भतीजे ने दरवाज़ा खोला और बुआ के पैर छुए।
विभा का दिल भर आया—ये संस्कार… ये अपनापन…
भाभी ने दोनों बाँहें फैलाकर विभा को गले से लगा लिया—
“कोई दिक्कत तो नहीं हुई रास्ते में?”
आज भाभी के स्नेह-आँचल में लिपटी विभा को माँ के स्पर्श की अनुभूति हुई।
विभा बस एक पल के लिए अपनी आँखें बंद कर गई—उसे लगा जैसे वह माँ की गोद में सिर रखकर रो रही है।
भाभी ने जैसे अधिकार से कहा—
“चलो, हाथ-मुँह धो लो और नाश्ता कर लो। सुबह पाँच-छह बजे की चली हो।”
भाभी ने जिस अपनेपन और अधिकार से आदेश दिया, विभा के ह्रदय की भावनाएँ आँसुओं के रूप बह चलीं।
वह स्नेह, वह अधिकार, वह अपनापन—जिसके लिए वह बरसों से तरस रही थी।
नाश्ते की टेबल पर विभा की पसंद की एक-एक चीज़ सजी थी।
गरम-गरम पूड़ी, आलू की सब्जी, मीठी सेवई, और उसकी पसंद का अदरक वाला चाय का कप…
यह सब देखकर विभा की हिम्मत जवाब दे गई।
वह अपनी कुर्सी छोड़कर खड़ी हो गई और भैया के गले लगकर खूब रोई।
भैया भी चुपचाप उसके सिर पर हाथ फेरते रहे, जैसे कहते हों—“रो लो… जितना रोना है… यह घर अभी भी तुम्हारा है।”
जब सबका मन हल्का हुआ, तो भाभी विभा के दोनों हाथों को अपने हाथ में लेकर बोलीं—
“दीदी! मेरे मम्मी-पापा छह महीने पहले सड़क दुर्घटना में चल बसे।
उनकी मृत्यु के बाद भाई-भाभी के बदले हुए व्यवहार ने मेरी आँखें खोल दी हैं।
मैं आपको उस अधिकार, प्यार और सम्मान से हरगिज़ वंचित नहीं रहने दूँगी जो हर बेटी को उसके मायके में मिलना चाहिए।
हो सके तो मुझे माफ़ कर दीजिए।”
भाभी की आवाज काँप रही थी।
उनकी आँखों में पछतावा था, और एक सच्चाई—जो सिर्फ दुख ही सिखा सकता है।
विभा के मन में वर्षों से जमा सारी शिकायतें, सारी चोटें, सारी कसक—एक पल में पिघलने लगीं।
अपनी माँ समान बड़ी भाभी के हाथ जुड़ने से पहले ही विभा उनके गले जा लगी।
उस आलिंगन में वर्षों की दूरी टूट गई।
उस आलिंगन में वह मायका लौट आया, जिसे विभा ने अपने भीतर दफना दिया था।
और उस आलिंगन में एक सीख भी थी—कि इंसान जब तक खुद अपनों को खो नहीं देता, तब तक अपनों की कीमत नहीं समझता।
पाठकों से सवाल (कमेंट में जरूर लिखें)
- क्या आपको लगता है कि भाभी का बदला हुआ व्यवहार सच्चा पश्चाताप है या परिस्थितियों का असर?
- मायके में बेटी का “अधिकार” कहाँ तक होना चाहिए?
- क्या आपके जीवन में भी कभी किसी ने समय के साथ बदलकर आपको चौंका दिया है?
कमेंट में अपनी राय ज़रूर लिखिए—आपकी बात किसी और के रिश्ते को जोड़ सकती है।
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