मां सुलभा, बेचैन होकर आंगन में इधर-उधर चक्कर लगा रही थी। कभी थक हार कर कुर्सी पर बैठ जाती थी तो कभी बड़बड़ाने लगती, ” मैं तो इस लड़की से तंग आ चुकी हूं। समझती ही नहीं है, पढ़ाई लिखाई में बिल्कुल ध्यान नहीं देती है। रोज कॉलेज जाती है सिर्फ मस्ती करने और फिर आने में इतनी देर कर देती है, पूछो तो कहती है दोस्तों के साथ घूम रही थी। सौ बार मना किया है कि लड़कों से दोस्ती मत कर जमाना खराब है, पर सुनती कहां है, कहती है पुराने जमाने की बातें मत करो, भाषण मत दो। आज फिर 8:00 बजने को आए, न जाने कहां घूम रही होगी। अभी इसके पापा भी आने वाले हैं वह भी गुस्सा करेंगे। ”
सुलभा अपनी बेटी मनीषा के बारे में बड़बड़ा रही थी। मनीषा 12वीं कक्षा तक पढ़ाई में बहुत अच्छी थी, लेकिन कॉलेज में आने पर न जाने उसका ध्यान पढ़ाई से क्यों हट गया था। खाने पीने और घूमने पर ज्यादा ध्यान देने लगी थी और आवारा गर्दी करती रहती थी। उसके माता पिता उसे समझाते रहते थे, लेकिन उसके कान पर जूं तक नहीं रेंगती थी।
लगभग 8:30 बजे मनीषा घर में आई। तब तक उसके पापा भी आ चुके थे। पापा ने प्यार से पूछा-” मनीषा बेटा इतनी देर कैसे हो गई? ”
मनीषा-” मेरे दोस्त के जन्मदिन की पार्टी थी। बाकी सब लोग तो अभी तक इंजॉय कर रहे थे, मैं ही जल्दी आ गई। ” इतना कह कर वह अपने कमरे में चली गई।
थोड़े दिनों बाद मनीषा ने अपनी मम्मी से कहा-” मम्मी मैं कल अपने एक दोस्त की पार्टी में जाऊंगी, मुझे देर हो जाएगी पहले से ही बता रही हूं, बाद में मुझे डांटना मत। ”
सुलभा -” अगर देर हो जाएगी, तो कोई जरूरत नहीं है जाने की। ”
मनीषा-” मैं आपसे पूछ नहीं रही, आपको बता रही हूं कि मैं जाऊंगी। ”
सुलभा ने प्यार से समझाया -” मनीषा, तुम दिन में पार्टी में जाती हो तो हम कहां मना करते हैं, बेटी देर रात तक बाहर रहना ठीक नहीं, सर्दी के मौसम में अंधेरा कितनी जल्दी हो जाता है और बाहर सुनसान सा माहौल हो जाता है। ”
लेकिन मनीषा ने बात नहीं मानी और वह पार्टी में चली गई। लगभग 1:00 बजे रात में जब वह वापस आई, तो उसके पांव लड खडा रहे थे। सुलभा ने दरवाजा खोला और उसे लड़खड़ाते देखकर समझ गई कि इसने आज कुछ नशा किया है। वह उसे पकड़ कर कमरे में ले गई और बिस्तर पर धकेल दिया। उन्होंने सुबह मनीषा के पिता को पूरी बात बताई। सुबह मनीषा के जागने पर उन्होंने पहले उसे बहुत डांटा और फिर प्यार से समझाया।
मनीषा को अपने पीने पर थोड़ा अफसोस हो रहा था इसीलिए उसने सॉरी बोला।
माता-पिता को लगा की मनीषा को अपनी गलती समझ आ गई है, लेकिन उसने फिर एक बार ऐसा ही किया।
उस रात की पार्टी के बाद, मनीषा कुछ थकी थकी लगती थी और एक दिन उसे चक्कर आ रहे थे। सुलभा उसे जबरदस्ती डॉक्टर के पास ले गई। डॉक्टर ने सारे टेस्ट किया और अगले दिन बताया कि मनीषा प्रेग्नेंट है और 3 महीने हो चुके हैं।
मनीषा के माता-पिता के होश उड़ गए। क्या करें और क्या ना करें उनकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था। उन्होंने डॉक्टर से गर्भपात के लिए कहा। डॉक्टर ने कहा कि मनीषा का शरीर कमजोर है इसीलिए यह नहीं हो सकता।
थक हार कर उन्होंने मनीषा को दूसरे शहर उसकी बुआ के पास भेज दिया। वहां मनीषा ने एक कमजोर से पुत्र को जन्म दिया और उसे जन्म देने के बाद,उसे लगा कि मैं अब फिर से आजाद हो गई हूं। थोड़े दिन बाद उसने अपनी बुआ से कहा-” मैं घर जाना चाहती हूं, आगे की पढ़ाई करनी है। ”
उसकी बुआ ने कहा-” पढ़ाई का तो बहाना है, तुम्हारा पढ़ाई में मन लगता कहां है, यहीं रहो और अपने बच्चों को संभालो। ”
मनीषा-” इसे फेंक दो कहीं पर, मैं नहीं संभाल सकती, मुझे नहीं चाहिए। ”
बुआ ने उसके माता-पिता को फोन पर पूरी बात बताई। मनीषा के माता-पिता को मनीषा के व्यवहार पर अफसोस हो रहा था। उन्हें समझ में आ गया था कि यह लड़की कुछ पढ़ाई लिखाई करने वाली नहीं है। इसीलिए एक लड़का ढूंढ कर इसकी शादी करवा देते हैं। उन्होंने उसके लिए लड़का ढूंढ कर मनीषा के वापस आने के थोड़े दिन बाद उसकी शादी करवा दी। उन्होंने जानबूझकर एक मध्यम आय वाला लड़का ढूंढा था। मनीषा का पति विपुल उससे बहुत प्यार करता था। वह अकेला ही था। उसके माता-पिता का देहांत हो चुका था।
शादी को काफी समय बीत चुका था। विपुल चाहता था कि हमारा परिवार अब आगे बढ़े। मनीषा बच्चा नहीं चाहती थी क्योंकि वह आजादी से रहना चाहती थी इसीलिए वह चुपचाप विपुल को बताए बिना, गर्भनिरोधक दवाइयां खाती रही। डॉक्टर से बिना पूछे, बिना सलाह लिए दवाइयां खाने के कारण उसके शरीर में बहुत सारे साइड इफेक्ट होने लगे।
विपुल को समझ नहीं आ रहा था कि मनीषा गर्भधारण क्यों नहीं कर पा रही है। वह उसे डॉक्टर के पास ले जाना चाहता था लेकिन मनीषा हर बार कोई ना कोई बहाना कर देती थी।
एक बार विपुल अपनी जिद पर अड़ गया और उसे जबरदस्ती डांट डपटकर डॉक्टर के पास ले गया। डॉक्टर ने सारे टेस्ट किया और एक हफ्ते बाद रिपोर्ट लेने को कहा। जब विपुल रिपोर्ट लेने गया तो डॉक्टर साहब ने बताया-” ज्यादा गर्भनिरोधक दवाई खाने के कारण मनीषा कभी माँ नहीं बन सकती।”
विपुल के घर जाने पर वह बहुत उदास था और उसने मनीषा से कहा कि तुमने मुझसे झूठ बोला और तुम दवाइयां खाती रही। अब मैं तुम्हारे साथ नहीं रहना चाहता, मैं तुम्हें तलाक देना चाहता हूं तुम इसी समय अपने घर मायके चली जाओ।
मनीषा को कोई परवाह नहीं थी क्योंकि उसे आजादी चाहिए थी। वह तुरंत अपने मायके चली गई कुछ समय बाद दोनों का तलाक हो गया।
अब वह अपनी सहेलियों से अपने दोस्तों से मिलने निकल पड़ी। सब लोग अपनी जिंदगी में आगे बढ़ चुके थे। कोई जॉब कर रहा था तो किसी की शादी हो चुकी थी।
अब मनीषा को विपुल की याद सताने लगी थी। उसे उसके बिना अकेलापन महसूस होने लगा था और जब वह किसी छोटे से प्यारे बच्चे को देखते तो उसे भी मन करने लगता कि मैं भी किसी बच्चे के साथ खेलूं। उसे अपना पहले वाला बच्चा याद आने लगा था। एक दिन उसने अपने माता-पिता के सामने रो-रो कर माफी मांगी और कहा -” भगवान ने मुझे सजा दी है क्योंकि मैं अपने बच्चों को त्याग दिया था। यह मेरी भूल थी। विपुल ने भी मुझे छोड़ दिया। काश! मैं उसे बच्चों को फिर से पा सकती। मेरी भूल की सजा वह कहीं पर भटक कर भुगत रहा होगा। ”
सुलभा ने कहा -” अच्छा हुआ वह तुम्हारे पास नहीं है, क्योंकि अगर वह तुम्हारे पास होता तो उसे पालने की जिम्मेदारी तुम हमारे ऊपर छोड़ देती, पढ़ाई लिखाई तो तुमने की नहीं है इसीलिए तुम्हें कोई जॉब तो मिलेगी नहीं और अब हम किसी बच्चे को नहीं पाल सकते। तुम्हारे पापा उतना काम अब नहीं कर पाते हैं।। ”
मनीषा ने कहा-” अगर वह मेरे पास होता, तो मैं उसके लिए कुछ भी करती, शायद मैं पार्लर का काम सीख लेती या फिर मैं बुटीक खोल लेती। ”
सुलभा -” कहना आसान है बिटिया, ना तो तुम्हें ब्यूटी पार्लर का काम आता है और ना ही सिलाई। ”
मनीषा-” मां, वैसे भी मेरा घर में मन नहीं लगता, क्यों ना मैं ब्यूटी पार्लर का कोर्स सीखना शुरू कर दूँ। उसके लिए तो पापा पैसे दे देंगे ना और फिर मैं बाहर के कमरे में पार्लर खोल सकती हूं। ”
पूरे 1 साल तक मनीषा ने ब्यूटी पार्लर का काम सीखा और फिर उसके पापा ने उसे बाहर के कमरे में थोड़ा बहुत खर्चा करके पार्लर खुलवा कर दे दिया। शुरू शुरू में बहुत कम आय होती थी लेकिन धीरे-धीरे पार्लर चल पड़ा। मनीषा सारा दिन उसमें व्यस्त रहती थी लेकिन जब वह माता-पिता के साथ खाना खाने बैठती थी तो बड़ी उदास नजर आती थी।
माता-पिता से उसकी उदासी छुपती नहीं थी। उन्हें भी चिंता होती थी कि हमारे बाद इसका क्या होगा। एक दिन उसके पापा ने कहा -” मैं अपनी बहन से मिलने जा रहा हूं, मनीषा तुम चलोगी? ”
मनीषा ने मना कर दिया। अगले दिन मनीषा पार्लर का सामान लेने बाजार गई थी। वापस आने पर उसने देखा कि पापा वापस आ चुके हैं। उसके पापा ने कहा कि जो मनीषा अपने कमरे में थोड़ा आराम कर लो। मनीषा ने जैसे ही दरवाजा खोला वह देखकर हैरान रह गई कि वहां एक लगभग 7- 8 साल का बच्चा बैठा है।
बच्चे ने मनीषा को देखते ही उसे कहा-” मम्मी, आप आ गई और वह उससे लिपट गया। ”
मनीषा-” आप कौन हो बेटा, मुझे मम्मी क्यों कह रहे हो? ”
बच्चा- मेरा नाम पीयूष है और आप मेरी मम्मी हो। ”
मनीषा दौड़ती हुई बाहर आई और अपने माता-पिता से कहने लगी-” पापा कौन है यह बच्चा, यह तो मुझे मम्मी कह रहा है, मैं तो इसे पहचानती भी नहीं। ”
पापा ने कहा-” मनीषा, यह सही कह रहा है। यह तुम्हारा ही बेटा है। यह बुआ जी के पास ही था। हमने ही उन्हें कहा था इसे पालने के लिए। वह इसे अब देना नहीं चाहती थी लेकिन हम उन्हें समझा बुझा कर इसे ले आए और जब तुमने ब्यूटी पार्लर का कोर्स सीखना शुरू किया था तब हमने उन्हें कहा था कि मोबाइल में तुम्हारी फोटो दिखाकर बच्चों को धीरे-धीरे समझना शुरू कर दे कि यह तुम्हारी मम्मी है। ऐसा हमने इसीलिए किया क्योंकि हमें लग रहा था कि तुम अब समझदार और जिम्मेदार बन रही हो और हमें यह भी चिंता थी कि हमारे बाद तुम्हारा क्या होगा, दूसरी शादी तुम करना नहीं चाहती हो तो तुम्हारा जीवन अकेले कैसे कटेगा। यही सब सोच कर हम इसे तुम्हारे पास ले आए। ”
मनीषा को तो मानो सारी दुनिया ही मिल गई। बेटे के साथ मिलकर माता-पिता से आशीर्वाद लिया। अपनी गलतियों की माफी मांगी और अपने बच्चों को सीने से लगाकर उसे प्यार करती रही, अब उसे अपने अपराध बोध से धीरे-धीरे मुक्ति मिल रही थी।
अप्रकाशित स्वरचित गीता वाधवानी दिल्ली