शाम की धुंधली रोशनी खिड़की से छनकर ड्राइंग रूम में आ रही थी। 65 वर्षीय रमाकांत अपनी आराम कुर्सी पर बैठे दीवार घड़ी की टिक-टिक सुन रहे थे। टिक… टिक… टिक…। यह आवाज़ उन्हें हमेशा याद दिलाती थी कि समय कैसे रेत की तरह उनकी मुट्ठी से फिसलता जा रहा है।
रमाकांत एक रिटायर्ड बैंक मैनेजर थे। पत्नी, सुमित्रा, पांच साल पहले ही गुज़र गई थीं। उनका बेटा, विकास, और बहू, अनघा, उनके साथ ही इसी बड़े से बंगले में रहते थे। यह बंगला रमाकांत ने अपनी जवानी की मेहनत से बनवाया था। लेकिन अब उन्हें कभी-कभी लगता था कि वे इस घर के मालिक नहीं, बल्कि एक मेहमान हैं—एक ऐसे मेहमान जो शायद अपनी स्वागत अवधि से ज्यादा रुक गया है।
रसोई से बर्तनों के खटकने की आवाज़ आई। अनघा शायद रात का खाना बना रही थी। रमाकांत को प्यास लगी थी। वे उठकर रसोई की तरफ गए।
“अनघा बेटा, एक गिलास पानी मिलेगा?” उन्होंने बहुत ही धीमी आवाज़ में पूछा, जैसे डर रहे हों कि कहीं वे कोई गलत समय पर गलत मांग न कर बैठे हों।
अनघा ने मुड़कर देखा। उसके माथे पर पसीना था और चेहरे पर थकान। वह एक मल्टीनेशनल कंपनी में एचआर मैनेजर थी और अभी-अभी ऑफिस से लौटी थी।
“पापा जी, जग वहीं टेबल पर रखा है। आप खुद ले लीजिए ना,” अनघा ने थोड़ा चिड़चिड़े स्वर में कहा। फिर उसने जल्दी से जोड़ा, “सॉरी पापा जी, हाथ गंदे हैं। आटा गूंथ रही हूँ।”
रमाकांत ने कुछ नहीं कहा। उन्होंने चुपचाप जग से पानी लिया और अपने कमरे में वापस आ गए। पानी गले से नीचे उतरा तो ठंडक मिली, लेकिन दिल में एक अजीब सी टीस उठी। उन्हें याद आया जब विकास छोटा था और अनघा नई-नई बहू बनकर आई थी, तब घर कितना भरा-पूरा लगता था। तब उनकी हर छोटी ज़रूरत का ध्यान रखा जाता था। अब… अब सब बदल गया था।
विकास देर रात घर लौटा। वह एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर था और अक्सर देर तक काम करता था। आते ही वह सोफे पर धम्म से बैठ गया और मोबाइल में लग गया। रमाकांत जो इंतज़ार कर रहे थे कि बेटा आएगा तो दो बातें करेंगे, अपने कमरे के दरवाज़े से उसे देखते रहे। विकास ने एक बार भी उनकी तरफ नहीं देखा।
अगले दिन रविवार था। रमाकांत को उम्मीद थी कि आज तो सब साथ बैठकर नाश्ता करेंगे। लेकिन विकास और अनघा देर तक सोते रहे। जब वे उठे, तो दोनों जल्दी-जल्दी तैयार होकर कहीं जाने लगे।
“अरे, तुम लोग कहाँ जा रहे हो?” रमाकांत ने अखबार नीचे करते हुए पूछा।
“पापा, वो मेरे कलीग की बेटी का बर्थडे है। हम लोग लंच वहीं करेंगे। शाम तक लौटेंगे,” विकास ने जूते पहनते हुए कहा।
“और मेरा नाश्ता?” रमाकांत के मुँह से अनायास ही निकल गया।
विकास रुक गया। उसने अनघा की तरफ देखा। अनघा ने माथे पर हाथ मारा। “ओह, मेड आज छुट्टी पर है। पापा जी, फ्रिज में ब्रेड और दूध रखा है। आप ले लीजिएगा प्लीज। हमें देर हो रही है।”
और वे चले गए।
दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ के साथ रमाकांत के अंदर कुछ टूट गया। वे सोफे पर बैठ गए। सूना घर उन्हें खाने को दौड़ रहा था। उन्हें भूख नहीं थी, लेकिन आत्मा भूखी थी—प्यार की, सम्मान की, थोड़ी सी बातचीत की।
उसी शाम, उनकी बेटी, कविता का फोन आया। कविता दूसरे शहर में रहती थी और अक्सर फोन करती रहती थी।
“हेलो पापा! कैसे हैं आप? आवाज़ थोड़ी भारी लग रही है,” कविता ने तुरंत भांप लिया।
“नहीं बेटा, सब ठीक है। बस थोड़ी थकान है,” रमाकांत ने झूठ बोला।
“पापा, झूठ मत बोलिए। मैं आपकी बेटी हूँ, नस-नस से वाकिफ़ हूँ। विकास और अनघा ने फिर कुछ किया क्या?” कविता की आवाज़ में चिंता थी।
रमाकांत की रुलाई फूट पड़ी। उन्होंने कविता को सब बता दिया—कैसे वे घर में एक फर्नीचर की तरह हो गए हैं, जिससे किसी को मतलब नहीं है। कैसे उन्हें अपनी ही बनाई हुई छत के नीचे बेगानापन महसूस होता है।
कविता ने सब सुना और चुप रही। फिर उसने कहा, “पापा, मैं अगले हफ्ते आ रही हूँ। कुछ दिनों के लिए।”
अगले हफ्ते कविता आ गई। उसके आते ही घर का माहौल थोड़ा बदल गया। विकास और अनघा भी दीदी के आने से खुश थे। लेकिन कविता सिर्फ मिलने नहीं आई थी, वह एक मिशन पर थी।
कविता ने पहले दो दिन सिर्फ घर के माहौल को ऑब्जर्व किया। उसने देखा कि रमाकांत सुबह जल्दी उठ जाते हैं, अपनी चाय खुद बनाते हैं, और फिर बालकनी में बैठकर अखबार पढ़ते हैं। विकास और अनघा अपनी ही दुनिया में व्यस्त रहते हैं। वे रमाकांत से बात तो करते हैं, लेकिन वो बात सिर्फ काम की होती है—”पापा, बिल भर दिया?”, “पापा, दूध वाला आया था क्या?”। कोई भी यह नहीं पूछता था—”पापा, आज आपको कैसा लग रहा है?” या “पापा, चलिए साथ बैठकर चाय पीते हैं।”
तीसरे दिन शाम को, जब सब ड्राइंग रूम में बैठे थे, कविता ने बात छेड़ी।
“विकास, अनघा… मुझे तुम दोनों से कुछ ज़रूरी बात करनी है।”
विकास ने टीवी की आवाज़ कम कर दी। “हाँ दीदी, बोलो।”
“मैं पापा को अपने साथ ले जाना चाहती हूँ,” कविता ने सपाट स्वर में कहा।
कमरे में सन्नाटा छा गया। रमाकांत ने चौंका हुआ चेहरा उठाकर बेटी को देखा। विकास और अनघा एक-दूसरे को देखने लगे।
“क्या मतलब दीदी? पापा हमारे साथ रहते हैं। वो हमारे साथ ही रहेंगे,” विकास ने कहा, थोड़ा डिफेंसिव होकर।
“रहते हैं? या बस ‘रखे हुए’ हैं?” कविता की आवाज़ में तल्खी थी। “विकास, घर की दीवारों के बीच रहने को ‘साथ रहना’ नहीं कहते। साथ रहना वो होता है जब दिलों के बीच कोई दीवार न हो। मैंने पिछले तीन दिनों में देखा है। पापा इस घर में एक परछाई बनकर रह गए हैं। तुम दोनों अपनी ज़िंदगी में इतने व्यस्त हो कि तुम्हें यह भी याद नहीं रहता कि घर में एक और सदस्य है जिसे तुम्हारी ज़रूरत है।”
अनघा ने सफाई देने की कोशिश की, “दीदी, हम दोनों वर्किंग हैं। हमारे पास सच में समय की कमी होती है। हम चाहते हैं पापा खुश रहें, पर…”
“पर क्या अनघा?” कविता ने बीच में ही काट दिया। “समय की कमी हम सबके पास है। मैं भी जॉब करती हूँ, मेरे भी दो बच्चे हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम अपने रिश्तों को भूखा मार दें। तुम्हें पता है पापा को सबसे ज्यादा किस चीज़ की ज़रूरत है? दवाई की नहीं, खाने की नहीं… उन्हें ज़रूरत है इस एहसास की कि वे अब भी इस परिवार का अहम हिस्सा हैं। उन्हें ज़रूरत है कि कोई उनसे उनकी राय पूछे, कोई उनके पुराने किस्से सुने, कोई शाम को उनके साथ बैठकर एक कप चाय पिए।”
विकास ने सिर झुका लिया। उसे अपनी गलती का अहसास हो रहा था।
कविता ने आगे कहा, “पापा ने अपनी पूरी ज़िंदगी तुम लोगों को बनाने में लगा दी। उन्होंने कभी नहीं कहा कि ‘मेरे पास समय नहीं है’। और आज जब उन्हें तुम्हारे समय की ज़रूरत है, तो तुम लोग कतरा रहे हो। अगर तुम लोग उन्हें सम्मान और प्यार नहीं दे सकते, तो बेहतर है कि वे मेरे साथ रहें। कम से कम वहां वे अकेले तो नहीं महसूस करेंगे।”
रमाकांत की आँखों में आंसू थे। उन्होंने कविता का हाथ पकड़ लिया। “बेटा, जाने दे। बच्चे हैं, अपनी ज़िंदगी बना रहे हैं। मैं ही शायद… पुराना हो गया हूँ।”
यह सुनकर विकास का सब्र टूट गया। वह उठकर पिता के पास आया और उनके पैरों में बैठ गया। “पापा, प्लीज ऐसा मत कहिए। हम गलत थे। हमने आपको ‘ग्रांटेड’ ले लिया था। हमें लगा कि आप तो घर में ही हैं, कहीं जा थोड़े ही रहे हैं। पर हम यह भूल गए कि घर में होना और दिल में होना अलग बातें हैं। दीदी सही कह रही हैं। हमने आपको बहुत अकेला कर दिया।”
अनघा की भी आँखें भर आईं। “पापा जी, मुझे माफ़ कर दीजिए। मैं अपनी थकान और काम के तनाव में यह भूल गई कि आप भी सारा दिन हमारा इंतज़ार करते हैं। मैं वादा करती हूँ, अब ऐसा नहीं होगा।”
कविता ने देखा कि उसका तीर सही निशाने पर लगा है। लेकिन वह जानती थी कि सिर्फ भावनाओं के उबाल से बदलाव नहीं आता, आदतों को बदलना पड़ता है।
अगले दिन से, कविता ने घर में एक नया नियम बनाया—”नो मोबाइल जोन”। रात के खाने के समय कोई भी मोबाइल नहीं चलाएगा। सब साथ बैठकर खाना खाएंगे और दिन भर की बातें करेंगे।
शुरुआत में विकास और अनघा को थोड़ी दिक्कत हुई। उनकी उंगलियां बार-बार मोबाइल की तरफ जाती थीं। लेकिन धीरे-धीरे, उन्हें इसमें मज़ा आने लगा। रमाकांत ने अपने बैंक के पुराने किस्से सुनाने शुरू किए। अनघा ने अपनी ऑफिस की गॉसिप शेयर की। विकास ने अपनी नई प्रोजेक्ट की चुनौतियों के बारे में बताया।
घर की हवा बदलने लगी थी।
एक शाम, अनघा जल्दी घर आ गई। उसने देखा रमाकांत बालकनी में अकेले बैठे हैं।
“पापा जी, आज मौसम बहुत अच्छा है। चलिए, आपके लिए पकोड़े बनाती हूँ। साथ में चाय पिएंगे,” अनघा ने उत्साह से कहा।
रमाकांत का चेहरा खिल उठा। “अरे वाह! बहुत दिन हो गए तुम्हारे हाथ के पकोड़े खाए। चलो, मैं भी मदद करता हूँ।”
“नहीं-नहीं, आप बस बैठकर मुझे बताइए कि माँ जी पकोड़ों में कौन सा मसाला डालती थीं जो उनका स्वाद इतना अलग होता था,” अनघा ने कहा।
रमाकांत ने उस शाम अनघा को सुमित्रा की कुछ खास रेसिपीज़ बताईं। अनघा ने ध्यान से सुना और वैसे ही बनाया। उस दिन की चाय और पकोड़ों में स्वाद से ज्यादा अपनापन था।
सप्ताह के अंत में, कविता को वापस जाना था। वह अपना बैग पैक कर रही थी।
“दीदी, तुम सच में जा रही हो?” विकास ने उदास होकर पूछा। “तुमने तो घर का नक्शा ही बदल दिया।”
“घर का नक्शा नहीं बदला विकास, बस नज़रिया बदला है,” कविता ने मुस्कुराते हुए कहा। “याद रखना, पौधे को सिर्फ पानी नहीं चाहिए होता, उसे धूप और हवा भी चाहिए होती है। रिश्ते भी ऐसे ही होते हैं। उन्हें सिर्फ सुविधाओं से नहीं, समय और संवेदना से सींचना पड़ता है।”
कविता जब जाने लगी, तो रमाकांत ने उसे गले लगा लिया। “बेटा, तूने मेरी डूबती हुई कश्ती को किनारा दिखा दिया। अब मुझे यहाँ पराया नहीं लगता।”
कविता मुस्कुराई। “पापा, आप पराये कभी थे ही नहीं। बस अपनों की आँखों पर धूल जम गई थी, जिसे साफ़ करना ज़रूरी था।”
कविता के जाने के बाद भी, घर में वह बदलाव कायम रहा। अब रविवार को विकास और अनघा बाहर जाने के बजाय, पापा के साथ लूडो खेलते या कोई पुरानी फिल्म देखते। अनघा ने एक मेड रख ली थी ताकि उसे घर के कामों में मदद मिले और वह पापा के साथ थोड़ा वक़्त बिता सके।
एक दिन रमाकांत ने विकास से कहा, “बेटा, हमारे पड़ोस में जो ‘वृद्धाश्रम’ है, वहां कुछ पुराने कपड़े और किताबें देने जाना है। चलोगे?”
विकास हैरान हुआ। “पापा, आप वहां क्यों जाना चाहते हैं?”
“बस ऐसे ही। वहां मेरे कुछ हमउम्र लोग हैं। सोचता हूँ कभी-कभी जाकर उनसे मिल आऊं,” रमाकांत ने कहा।
विकास समझ गया। उसके पिता अब अपनी खुशियां सिर्फ घर तक सीमित नहीं रखना चाहते थे, वे उसे बांटना चाहते थे।
उस शाम जब वे वृद्धाश्रम गए, तो वहां के माहौल ने विकास को झकझोर दिया। वहां कई ऐसे बुजुर्ग थे जिनके बच्चे विदेशों में या बड़े शहरों में सेटल थे और उनके पास अपने माता-पिता के लिए वक़्त नहीं था। वे सब रमाकांत को देखकर खुश हुए, लेकिन उनकी आंखों में एक खालीपन था जो विकास को अपने पिता की आंखों में कुछ महीने पहले दिखता था।
लौटते वक्त कार में विकास ने पापा का हाथ थाम लिया। “पापा, मैं बहुत खुशकिस्मत हूँ कि आप मेरे साथ हैं। मैं वादा करता हूँ कि आपको कभी उस खालीपन का एहसास नहीं होने दूंगा।”
रमाकांत ने बेटे के हाथ को थपथपाया। “मैं जानता हूँ बेटा। अब मुझे डर नहीं लगता। क्योंकि अब मुझे पता है कि मेरा अस्तित्व सिर्फ एक ‘रिटायर्ड इंसान’ का नहीं है, बल्कि मैं इस परिवार की नींव हूँ। और नींव का मज़बूत होना ही इमारत को खड़ा रखता है।”
कहानी का अंत एक सुखद अहसास के साथ हुआ। यह कहानी सिर्फ रमाकांत की नहीं थी, यह हर उस घर की कहानी थी जहाँ बुजुर्ग अपनी जगह तलाश रहे हैं। कविता ने एक पुल का काम किया था—दो पीढ़ियों के बीच की खाई को पाटने का। उसने साबित कर दिया था कि समाधान घर तोड़ने या अलग होने में नहीं है, बल्कि एक-दूसरे को समझने और थोड़ा सा वक़्त देने में है।
घर अब सिर्फ ईंट-गारे का ढांचा नहीं था, वह एक जीवित स्थान बन गया था जहाँ तीन दिल एक साथ धड़कते थे। और उस धड़कन में सबसे तेज़ आवाज़ रमाकांत की हंसी की थी, जो अब अपने बुढ़ापे को बोझ नहीं, बल्कि एक नया बचपन समझकर जी रहे थे।
मूल लेखिका : करुणा मलिक