महंगाई – एम. पी. सिंह  

आज बजट पेश करते ही गलिओं मैं महंगाई की फुस फुसाहट शुरू हो गई. सब्जियाँ बहुत महँगी हो गई, रसोई का बजट बिगड गया है,वगैरह वगैरह. 

क्या किसी ने कभी चर्चा की कि हमारा रहन सहन, खान पान, दिन चर्या और न जाने क्या क्या बदल गया. सच बात तो ये है कि हमारा अपने आप से नियंत्रण हट गया. हम अपनी खुशी से ज्यादा लोगों के बारे मैं सोचते है, कि वो हमारे बारे मैं क्या सोचते है. लोगों कि सोच क़ो हम पकड़ नहीं सकते, फिर भी अपनी हैसियत से ज्यादा तवज्जो लोगों क़ो देते है जिससे हमारे खर्चे जरूरतो से ज्यादा फिज़ूल खर्चो मैं चले जाते हैं और फिर हम कहते है कि महंगाई बड़ गई. 

सन 1974 मे, मनोज कुमार कि एक फ़िल्म आई थीं “रोटी कपड़ा और मकान” जिसमे एक गाना था ” हाय महंगाई, महंगाई, महंगाई, तू कहाँ से आई, तुझे क्यों मौत न आई “. क्या तब महंगाई नहीं थीं? 

मिडिल क्लास के लिए महंगाई हर दौर मे एक चुनौती रही हैं, और आगे भी रहेगी. समझदारी इसी मैं है कि अपनी जरूरतों और शौक क़ो समझकर ही खर्चा करे.

धन्यवाद 

एम. पी. सिंह 

(Mohindra Singh)

error: Content is protected !!