“जब माता-पिता दुनिया से चले जाते हैं, तो एक बहन के लिए उसका भाई ही उसका मायका बन जाता है। वह दौलत या उपहारों की भूखी नहीं होती, वह तो बस अपने भाई की एक झलक पाकर ही अपने मायके को जीवित महसूस करती है… पर क्या आज का भाई इस मूक पुकार को सुन पाता है?”
“रघु! अरे मेरा लल्ला आया है!” उनकी आवाज़ कांप रही थी। वह रघु के पास पहुंचीं और उसे बाहों में भरने के लिए हाथ फैलाए, लेकिन फिर अपने मैले कपड़ों को देखकर थोड़ा ठिठक गईं। उन्होंने सिर्फ रघु के कंधे पर हाथ रखा और उसकी बलाएं लेने लगीं।
“कैसा है रे तू? कब आया? भाभी और बच्चे कैसे हैं? तूने तो जैसे रास्ता ही भुला दिया था मेरे भाई…” सुमित्रा एक ही साँस में सब कुछ पूछ लेना चाहती थीं। उनकी आँखों से खुशी के आँसू बह रहे थे, जो रुकने का नाम नहीं ले रहे थे।
रघुनाथ ने अपनी कलाई पर बंधी महंगी घड़ी देखी। दोपहर के दो बज रहे थे। उसकी बड़ी सी एसयूवी गाड़ी धूल भरे रास्ते पर हिचकोले खाती हुई आगे बढ़ रही थी। आज पूरे पाँच साल बाद वह उस रास्ते पर चल रहा था, जो रास्ता कभी उसके बचपन की किलकारियों से गूँजता था। लेकिन आज, इस रास्ते पर आते हुए उसे खुशी से ज्यादा एक अजीब सी झल्लाहट हो रही थी। उसे शहर वापस पहुँचने की जल्दी थी। कल उसकी कंपनी की एक अहम मीटिंग थी और यहाँ वह अपनी पुश्तैनी जमीन बेचने के सिलसिले में आया था।
गाँव के पटवारी के साथ जमीन के कागजात का काम निपटाते-निपटाते उसे याद आया कि पास वाले गाँव में ही उसकी बड़ी बहन, सुमित्रा दीदी का ससुराल है। मन में एक द्वंद्व चला। “क्या जाऊँ? अगर गया तो देर हो जाएगी। दीदी रोना-धोना लेकर बैठ जाएंगी, पुरानी बातें करेंगी, और मुझे आज ही रात तक शहर लौटना है।” रघुनाथ ने स्टेयरिंग पर उंगलियाँ थपथपाईं। तभी उसे माँ की कही एक बात याद आ गई—”रघु, हम रहें या न रहें, अपनी दीदी से रिश्ता मत तोड़ना। भाई की कलाई पर राखी तो हर कोई बांधता है, पर बहन के सिर पर हाथ रखने वाला भाई नसीब से मिलता है।”
उसने एक गहरी साँस ली और गाड़ी का मोड़ सुमित्रा दीदी के गाँव की ओर घुमा दिया। “बस आधे घंटे के लिए जाऊँगा, चाय पीकर निकल लूँगा,” उसने खुद को समझाया।
सुमित्रा का घर गाँव के आखिरी छोर पर था। एक पुराना, खपरैल वाला मकान, जिसकी दीवारों का चूना जगह-जगह से झड़ चुका था। रघुनाथ ने अपनी चमचमाती गाड़ी उनके कच्चे आंगन के बाहर खड़ी की। गाड़ी की आवाज़ सुनकर घर के भीतर से कोई बाहर आया। वह सुमित्रा दीदी थीं। पाँच साल… इन पाँच सालों में दीदी कितनी बदल गई थीं। बाल खिचड़ी हो गए थे, चेहरे पर झुर्रियां आ गई थीं और आँखों पर एक मोटा चश्मा चढ़ गया था। उन्होंने पुरानी सूती साड़ी पहन रखी थी, जिसमें कई जगह रफू किया गया था।
जैसे ही सुमित्रा की नज़र गाड़ी से उतरते रघुनाथ पर पड़ी, वह एक पल के लिए ठिठक गईं। शायद अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था। फिर अचानक उनके चेहरे पर जो चमक आई, वह करोड़ो की लॉटरी लगने से भी ज्यादा कीमती थी। वह नंगे पैर ही दौड़ पड़ीं।
“रघु! अरे मेरा लल्ला आया है!” उनकी आवाज़ कांप रही थी। वह रघु के पास पहुंचीं और उसे बाहों में भरने के लिए हाथ फैलाए, लेकिन फिर अपने मैले कपड़ों को देखकर थोड़ा ठिठक गईं। उन्होंने सिर्फ रघु के कंधे पर हाथ रखा और उसकी बलाएं लेने लगीं।
“कैसा है रे तू? कब आया? भाभी और बच्चे कैसे हैं? तूने तो जैसे रास्ता ही भुला दिया था मेरे भाई…” सुमित्रा एक ही साँस में सब कुछ पूछ लेना चाहती थीं। उनकी आँखों से खुशी के आँसू बह रहे थे, जो रुकने का नाम नहीं ले रहे थे।
रघुनाथ को थोड़ा संकोच हुआ, लेकिन दीदी का प्रेम देखकर वह पिघल गया। “बस दीदी, अभी आया हूँ। जमीन के काम से आया था, सोचा तुमसे मिलता चलूँ,” रघु ने कहा।
सुमित्रा का चेहरा थोड़ा सा फीका पड़ा, यह सुनकर कि भाई विशेष रूप से उससे मिलने नहीं, बल्कि किसी काम से आया था। लेकिन अगले ही पल उन्होंने उस भाव को छिपा लिया। “काम से ही सही, कम से कम इसी बहाने तुझे देख तो लिया। आ, भीतर आ।”
घर के अंदर गरीबी साफ झलक रही थी। बैठने के लिए कोई सोफा नहीं था, बस एक पुरानी लकड़ी की चारपाई थी जिस पर दीदी ने जल्दी से अपनी सबसे अच्छी चादर बिछा दी। “बैठ रघु, मैं तेरे लिए पानी लाती हूँ। नहीं नहीं, शरबत बनाती हूँ। तू तो गुड़ का शरबत पसंद करता था न?” वह उत्साह में यहाँ-वहाँ दौड़ने लगीं।
रघु ने चारपाई पर बैठते हुए कहा, “दीदी, परेशान मत हो। मैं बस आधे घंटे के लिए आया हूँ। मुझे निकलना है।”
रसोई से दीदी की आवाज़ आई, “आधा घंटा? ऐसे कैसे जाने दूँगी? पाँच साल बाद तो मेरा भाई मेरी देहरी पर आया है। बिना खाना खाए तो मैं तुझे जाने नहीं दूँगी। आज मैंने कढ़ी-चावल बनाए हैं, तेरे पसंदीदा।”
रघु मना करना चाहता था, लेकिन दीदी की आवाज़ में एक अधिकार और एक मनुहार थी जिसे वह टाल न सका। वह घर का मुआयना करने लगा। कोने में एक सिलाई मशीन रखी थी। उसे याद आया कि जीजाजी की तबीयत अक्सर खराब रहती है। दीदी ही सिलाई करके जैसे-तैसे घर चलाती हैं। उसे अचानक ग्लानि महसूस हुई। वह शहर में लाखों कमाता था, पर उसने कभी दीदी का हाल-चाल पूछने के लिए फोन तक नहीं किया। हर रक्षाबंधन पर दीदी की भेजी राखी और चिट्ठी आती थी, वह उसे पढ़ता और दराज में डाल देता। कभी-कभार कुछ रुपए भिजवा देता, और सोचता कि फर्ज पूरा हो गया।
थोड़ी देर में दीदी स्टील की थाली में खाना परोस कर ले आईं। साथ में आम का अचार और प्याज भी था। वह पसीने से तर-बतर थीं, शायद जल्दी-जल्दी रोटियाँ सेंकी होंगी। वह रघु के पास ज़मीन पर बैठ गईं और उसे पंखा झलने लगीं।
“खा ले बेटा। शहर जैसा स्वाद तो नहीं होगा, पर मैंने बहुत मन से बनाया है,” दीदी बोलीं।
रघु ने पहला निवाला तोड़ा। वही स्वाद… बिल्कुल माँ के हाथ जैसा। उसकी आँखों में नमी उतर आई। वह चुपचाप खाने लगा। दीदी उसे एकटक निहार रही थीं, जैसे वह खाना खाते हुए भाई को देखकर ही अपना पेट भर रही हों।
“जीजाजी कहाँ हैं?” रघु ने पूछा।
“खेत पर गए हैं, थोड़ी देर में आते ही होंगे। तूने बताया नहीं, बच्चे कैसे हैं? मेरा बंटी और गुड़िया बड़े हो गए होंगे न? मैंने उनके लिए स्वेटर बुने थे पिछली सर्दियों में, पर कूरियर करने के पैसे ही नहीं बच पाए, तो भेज नहीं सकी,” दीदी ने संकोचते हुए कहा और उठकर एक पुरानी संदूक से दो रंग-बिरंगे स्वेटर निकाल लाईं।
रघु के गले में खाना अटक गया। वह सोचने लगा कि उसके बच्चे तो ब्रांडेड जैकेट पहनते हैं, क्या वे ये हाथ से बुने स्वेटर पहनेंगे? लेकिन दीदी के लिए ये ऊन के गोले नहीं, उनके कलेजे के टुकड़ों का प्यार था।
खाना खाने के बाद रघु ने हाथ धोए और जाने के लिए खड़ा हो गया। “दीदी, अब चलना होगा। अंधेरा होने से पहले हाईवे पकड़ना है।”
सुमित्रा की आँखों में फिर से बादल घिर आए। “इतनी जल्दी? थोड़ा और रुक जाता… अभी तो जीजाजी भी नहीं आए।”
“नहीं दीदी, मजबूरी है,” रघु ने घड़ी देखते हुए कहा।
सुमित्रा अंदर गईं और एक छोटा सा पोटली नुमा थैला और एक लिफाफा लेकर आईं। उन्होंने थैला रघु के हाथ में थमाया। “इसमें तेरे खेत के चावल हैं, और वो जो पेड़ तुझे पसंद था न, उसके अमरूद हैं। भाभी को देना।”
फिर उन्होंने कांपते हाथों से वह लिफाफा रघु की जेब में डालने की कोशिश की। रघु ने हाथ पकड़ लिया। “यह क्या है दीदी?”
“अरे, कुछ नहीं। बच्चे पहली बार तो नहीं आए, पर इतने सालों बाद तू आया है। बच्चों के लिए शगुन है। खाली हाथ कैसे भेजूँ?” सुमित्रा ने जबरदस्ती लिफाफा उसकी जेब में डाल दिया।
रघु जानता था कि उस लिफाफे में 100 या 500 रुपये से ज्यादा नहीं होंगे। और वह यह भी जानता था कि ये रुपये दीदी ने एक-एक करके अपनी दवाइयों या घर के खर्च में से बचाए होंगे। उसका दिल भर आया। वह अमीर होकर भी आज इस गरीब बहन के सामने बहुत छोटा महसूस कर रहा था। उसने अपना पर्स निकाला और उसमें से दो-दो हजार के कई नोट निकालकर दीदी के हाथ पर रख दिए।
“ये क्या है रघु?” दीदी ने हाथ पीछे खींच लिया। “मैं तुझसे पैसे लेने के लिए नहीं रो रही थी पगले। मुझे तेरा पैसा नहीं चाहिए।”
“रख लो दीदी,” रघु की आवाज़ भारी हो गई। “यह पैसा नहीं है। यह मेरा प्रायश्चित है। यह उस भाई का कर्ज है जो भूल गया था कि माँ-बाप के जाने के बाद बड़ी बहन ही माँ बाप होती है। जीजाजी का इलाज अच्छे से करवाना।”
सुमित्रा की आँखों से झर-झर आंसू बहने लगे। उन्होंने नोट नहीं देखे, उन्होंने बस रघु को गले लगा लिया। उनका आलिंगन इतना कसकर था जैसे वह उसे अपनी रूह में उतार लेना चाहती हों।
“रघु,” सुमित्रा ने सिसकते हुए कहा, “पैसे मत भेज भले ही, पर आते रहा कर। जब तू आता है न, तो लगता है कि माँ और बाबूजी अभी भी जिन्दा हैं। जब तू आता है, तो मेरा सूना आंगन भर जाता है। पड़ोसनें पूछती हैं कि तेरा भाई नहीं आता, तो मेरा कलेजा फट जाता है। उन्हें क्या जवाब दूँ? बस इतना मान रख लेना… साल में न सही, दो साल में एक बार आ जाना। शक्ल दिखा जाना।”
रघु को लगा जैसे किसी ने उसके गाल पर तमाचा मार दिया हो। वह सोचता था कि पैसे भेजकर वह महान बन रहा है, लेकिन दीदी को उसकी दौलत नहीं, उसका ‘समय’ और ‘साथ’ चाहिए था। माँ-बाप के बाद, एक विवाहित बहन के लिए उसका भाई ही उसका सबसे बड़ा अभिमान होता है। जब भाई उसके घर आता है, तो उसका सिर समाज में ऊंचा हो जाता है। और जब भाई नहीं आता, तो वह धीरे-धीरे अंदर ही अंदर मरती रहती है, यह सोचकर कि अब उसका कोई “अपना” नहीं बचा।
रघु ने दीदी के पैर छुए। “वादा करता हूँ दीदी, अब हर राखी पर आऊँगा। और अगली बार अकेले नहीं, बच्चों और भाभी को भी लाऊँगा। यह मेरा भी घर है, मैं इसे कैसे छोड़ सकता हूँ?”
सुमित्रा के चेहरे पर जो मुस्कान आई, उसने जैसे उनकी झुर्रियों को मिटा दिया हो। वह गाड़ी तक उसे छोड़ने आईं। जब तक गाड़ी की धूल दिखती रही, वह वहीं हाथ जोड़कर खड़ी रहीं, जैसे किसी मंदिर के देवता को विदा कर रही हों।
गाड़ी में बैठकर रघु ने वह लिफाफा खोला जो दीदी ने दिया था। उसमें 101 रुपये थे—एक 100 का नोट और एक सिक्का। वह 100 का नोट कई जगह से मुड़ा-तुड़ा और मैला था, शायद बरसों से सहेज कर रखा गया था। रघु ने उस नोट को अपनी आँखों से लगा लिया। वह नोट उसे अपनी लाखों की सैलरी से ज्यादा भारी और कीमती लग रहा था।
उसने महसूस किया कि आज वह जमीन बेचकर जरूर आया है, लेकिन एक अनमोल खजाना वापस पाकर जा रहा है—एक ऐसा रिश्ता, जिसमें कोई मिलावट नहीं थी। उसे समझ आ गया था कि बहनों के घर जाने से भाई छोटे नहीं होते, बल्कि उनका कद और बढ़ जाता है। क्योंकि उस घर में एक ऐसी रूह बसती है, जो उसकी सलामती के लिए तब भी दुआ मांगती है जब पूरी दुनिया उसके खिलाफ हो।
रास्ते में उसने अपनी पत्नी को फोन लगाया।
“हेलो, सुनो… अगली छुट्टियों में हम मसूरी नहीं जा रहे हैं।”
पत्नी ने हैरानी से पूछा, “तो कहाँ जा रहे हैं?”
रघु मुस्कुराया, “हम दीदी के गाँव जा रहे हैं। बच्चों को भी तो पता चले कि बुआ का प्यार क्या होता है। और हाँ, कुछ अच्छे स्वेटर खरीद लेना, हाथ के बुने स्वेटर अब उन्हें चुभते होंगे, पर दीदी के प्यार की गर्माहट उन्हें महसूस करानी है।”
फोन रखकर रघु ने रीयल-व्यू मिरर में देखा। उसे अपना चेहरा अब थका हुआ नहीं, बल्कि सुकून से भरा लग रहा था। मायके की वह देहरी अब सूनी नहीं रहेगी।
समापन:
दोस्तों, यह कहानी केवल रघु और सुमित्रा की नहीं है, यह हर उस घर की कहानी है जहाँ एक बहन दरवाजे पर टकटकी लगाए अपने भाई का इंतज़ार करती है। माता-पिता के जाने के बाद भाई ही बहन के लिए “पीहर” (मायका) होता है। जब भाई उसके घर जाकर एक गिलास पानी भी पी लेता है न, तो बहन को लगता है कि उसे छप्पन भोग का सुख मिल गया।
अपने व्यस्त जीवन से थोड़ा समय निकालिए। अपनी बहनों के घर जाइए। उन्हें आपके महंगे तोहफे नहीं चाहिए, उन्हें बस यह अहसास चाहिए कि उनका “अपना” कोई अभी भी दुनिया में है जो उनकी फिक्र करता है। याद रखिए, जिस आंगन में बहन की दुआएं होती हैं, उस घर में कभी दरिद्रता नहीं आती।
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लेखक : मुकेश पटेल