मायके की देहरी – विनीता सिंह

समीर ने अपना लैपटॉप बंद किया और लापरवाही से कंधे उचकाते हुए बोला, “अरे यार नव्या, तुम भी छोटी-छोटी बातों का बतंगड़ बनाती हो। माँ कह रही हैं तो चली जाओ।

उनकी अपनी मान्यताएं हैं। वैसे भी मेरी इस महीने बहुत बिजी शेड्यूल है, तुम जाओगी तो मुझे भी थोड़ा काम पर फोकस करने का मौका मिल जाएगा। तुम्हारी मर्जी है, पर घर की शांति के लिए मान जाओ तो बेहतर है।”

सावन का महीना शुरू हो चुका था और मौसम में एक अजीब सी नमी और ठंडक घुल गई थी। नई-नई शादी हुई थी और नव्या अभी अपने ससुराल के तौर-तरीकों में ढलने की कोशिश ही कर रही थी।

एक सुबह जब वह रसोई में नाश्ता बना रही थी, तब उसकी सास, रुक्मिणी देवी, एक लाल रंग की खूबसूरत साड़ी और कुछ सुहाग के सामान के साथ वहां आईं। उन्होंने वो सारा सामान नव्या के हाथ में थमाते हुए कहा, “नव्या बहू, अगले हफ्ते हरियाली तीज है।

हमारे परिवार का यह बहुत पुराना और कड़ा नियम है कि सावन की तीज पर घर की बहू अपने मायके जाती है और वहीं जाकर झूला झूलती है। तुम भी अपने जाने की तैयारी कर लो और अपने घर खबर कर दो।”

नव्या यह सुनकर थोड़ी अचरज में पड़ गई। वह एक ऐसे परिवार से थी जहाँ तीज-त्यौहार मनाए तो जाते थे, लेकिन इतने कड़े नियमों के साथ नहीं। उसके मायके में सावन की तीज पर बस घेवर आ जाता था और थोड़ी बहुत पूजा हो जाती थी, मायके जाने या न जाने जैसी कोई बाध्यता कभी नहीं रही।

“पर माँ जी,” नव्या ने झिझकते हुए कहा, “हमारे यहाँ तो तीज इतने बड़े स्तर पर नहीं मनाई जाती। बस साधारण पूजा होती है। और फिर, अभी तो पिछले महीने ही मैं मायके से होकर आई हूँ। इतनी जल्दी दोबारा जाना… मुझे ये सब रस्में कुछ खास समझ नहीं आतीं। मैं यहीं आपके साथ रहकर पूजा कर लूँगी।”

रुक्मिणी देवी का चेहरा थोड़ा सख्त हो गया। “देखो बहू, मायके में क्या होता था, वह बात और थी। अब तुम इस घर की बहू हो और यहाँ के रिवाज़ तुम्हें मानने ही पड़ेंगे। हमारे यहाँ तीज पर बहू का ससुराल में रहना अच्छा नहीं माना जाता। तुम्हें जाना ही होगा और अब से हर साल यह नियम निभाना होगा।”

नव्या को अपनी सास का यह रवैया थोड़ा अजीब और थोपा हुआ लगा। जिस त्यौहार को उसने कभी उस रूप में मनाया ही नहीं, उसे अब ज़बरदस्ती क्यों गले लगाया जाए? रात को जब उसका पति, समीर, ऑफिस से लौटा, तो नव्या ने अपनी यह उलझन उसके सामने रखी।

“समीर, माँ जी मुझे ज़बरदस्ती तीज पर मायके भेज रही हैं। कह रही हैं कि ये यहाँ का कड़ा नियम है। तुम ही समझाओ ना उन्हें, मुझे नहीं जाना अभी,” नव्या ने शिकायत के लहज़े में कहा।

समीर ने अपना लैपटॉप बंद किया और लापरवाही से कंधे उचकाते हुए बोला, “अरे यार नव्या, तुम भी छोटी-छोटी बातों का बतंगड़ बनाती हो। माँ कह रही हैं तो चली जाओ। उनकी अपनी मान्यताएं हैं। वैसे भी मेरी इस महीने बहुत बिजी शेड्यूल है, तुम जाओगी तो मुझे भी थोड़ा काम पर फोकस करने का मौका मिल जाएगा। तुम्हारी मर्जी है, पर घर की शांति के लिए मान जाओ तो बेहतर है।”

पति के इस नीरस जवाब से नव्या और भी खीझ गई। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे। आखिरकार, उसने अपनी माँ को फोन मिलाया।

“माँ, यहाँ तो बड़ी अजीब मुसीबत है। माँ जी कह रही हैं कि मुझे तीज मनाने मायके ही आना पड़ेगा और अब से हर साल आना होगा। माँ, हमने तो कभी इस तरह से ये त्यौहार नहीं मनाया। मैं उन्हें कैसे मना करूँ? मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा कि कोई मुझ पर अपने रिवाज़ थोपे।”

फोन के उस पार नव्या की माँ, सरला जी, कुछ पल चुप रहीं। फिर उन्होंने एक बहुत ही गहरी और ठंडी सांस लेते हुए कहा, “बेटा, समधन जी कह रही हैं तो तू मान ले। उनकी बात मत टाल और अगले हफ्ते घर आ जा। हम घेवर भी मंगवा लेंगे और तेरे लिए झूला भी डलवा देंगे। कम से कम इस बहाने तेरा घर आना तो होगा।”

नव्या को अपनी माँ की बात सुनकर बहुत बुरा लगा। वह तमक कर बोली, “क्या माँ? आप भी उनकी ही तरफदारी कर रही हैं? और ये आपने क्या कहा कि ‘इस बहाने आना होगा’? मैं आपकी बेटी हूँ। ये मेरा अपना घर है। मुझे अपने ही घर आने के लिए, आपसे मिलने के लिए किसी बहाने या किसी त्यौहार की ज़रूरत पड़ेगी क्या? मैं जब चाहूँगी, तब अपना बैग उठाऊँगी और आपके पास आ जाऊंगी।”

सरला जी हल्की सी फीकी हंसी हँसीं और बोलीं, “तू अभी नहीं समझेगी मेरी बच्ची। अभी तेरे पंख नए हैं और उड़ान आज़ाद है। तू बस आ जा, बाकी बातें बाद में करेंगे।”

नव्या उस समय अपनी माँ के उन शब्दों का अर्थ नहीं समझ पाई थी। बेमन से ही सही, वह उस साल तीज पर मायके गई। दो दिन रही और वापस आ गई। उसे लगा कि यह बस एक बार की बात है और बाद में वह अपने ससुराल वालों को समझा लेगी।

लेकिन समय के पहिए ने अपनी गति पकड़ी और साल दर साल बीतते गए। नव्या की ज़िंदगी पूरी तरह से बदल गई। दस साल बीत चुके थे। नव्या अब दो प्यारे बच्चों की माँ बन चुकी थी। उसका घर, जो कभी उसे पराया लगता था, अब उसकी पूरी दुनिया बन चुका था। लेकिन इस दुनिया की कीमत उसने अपनी आज़ादी और अपने मायके से दूरी चुका कर दी थी।

समीर अब कंपनी में एक ऊंचे पद पर था, जिसकी वजह से उसकी व्यस्तता कई गुना बढ़ गई थी। सास-ससुर अब बूढ़े हो चले थे। रुक्मिणी देवी को घुटनों के दर्द ने घेर लिया था और ससुर जी को दिल की बीमारी थी। नव्या की ज़िंदगी अब सुबह छह बजे से शुरू होकर रात के ग्यारह बजे तक एक मशीन की तरह चलती थी। बच्चों का टिफिन, उनकी पढ़ाई, सास-ससुर की दवाइयां, डॉक्टर के चक्कर, समीर की भागदौड़, और घर के अनगिनत काम—नव्या इन सबमें इस कदर उलझ गई थी कि उसे खुद के लिए सांस लेने की फुर्सत नहीं मिलती थी।

उसे याद भी नहीं था कि उसने आखिरी बार सुकून से बैठकर चाय कब पी थी। और मायके जाना? वह तो जैसे किसी दूसरे ग्रह की यात्रा हो गई थी।

“समीर, इस वीकेंड मम्मी-पापा के घर चलें? छह महीने हो गए हैं गए हुए। मम्मी की तबीयत भी ठीक नहीं है,” नव्या ने एक दिन रात को बिस्तर पर लेटते हुए पूछा।

समीर ने मोबाइल से नज़र हटाए बिना कहा, “नव्या, इस वीकेंड तो मेरी ज़रूरी मीटिंग है। और वैसे भी, बच्चों के अगले हफ्ते से यूनिट टेस्ट शुरू हो रहे हैं, तुम जाओगी तो उनकी पढ़ाई का क्या होगा? और पिताजी को संडे को डॉक्टर को भी तो दिखाना है। ऐसा करो, अगले महीने चलते हैं।”

अगला महीना आया, तो ननद अपने परिवार के साथ आ गई। उससे अगला महीना आया, तो समीर को एक लंबी बिजनेस ट्रिप पर जाना पड़ा। नव्या की मायके जाने की योजना हर बार किसी न किसी ‘ज़रुरी’ काम के तले दब जाती। वह फोन पर अपनी माँ से बात करके ही मन मसोस कर रह जाती। उसे एहसास होने लगा था कि शादी के बाद एक औरत का अपना कोई समय नहीं होता। उसका हर एक पल उसके ससुराल, उसके पति और उसके बच्चों के नाम लिखा जा चुका होता है।

तभी अगस्त का महीना आया। सावन की झड़ियां लगनी शुरू हो गईं। एक सुबह रुक्मिणी देवी ने नव्या को आवाज़ दी, “बहू, अगले हफ्ते हरियाली तीज है। तूने अपने मायके जाने की तैयारी की या नहीं? बच्चों की छुट्टियां भी पड़ रही हैं। तू जाकर चार दिन रह आ। मैं और तेरे ससुर जी यहाँ सब मैनेज कर लेंगे।”

नव्या ठिठक गई। उसने गौर किया कि जैसे ही ‘तीज’ का ज़िक्र आया, न तो समीर ने मीटिंग का बहाना बनाया, न ही बच्चों की पढ़ाई बीच में आई, और न ही सास-ससुर की बीमारी ने उसका रास्ता रोका। यह घर का एक ‘नियम’ था, जिसे रुक्मिणी देवी ने खुद बनाया था और परिवार का कोई भी सदस्य इस नियम को तोड़ने की हिम्मत नहीं कर सकता था।

नव्या ने अपने सूटकेस में कपड़े रखने शुरू किए। कपड़े रखते-रखते अचानक उसके हाथ रुक गए और उसकी आँखों से आंसुओं की एक मोटी धार बह निकली। दस साल पहले का वो दिन उसकी आँखों के सामने किसी फिल्म की तरह घूमने लगा।

“क्या माँ? मुझे अपने ही घर आने के लिए किसी बहाने की ज़रूरत पड़ेगी क्या? मैं जब चाहूँगी, तब आ जाऊंगी।” नव्या ने तब कितने अहंकार और नासमझी में ये शब्द कहे थे।

आज उसे अपनी माँ की उस फीकी हंसी और उन शब्दों का असली और गहरा अर्थ समझ आ गया था। “तू अभी नहीं समझेगी मेरी बच्ची…”

हाँ, वह सच में नहीं समझी थी कि एक बार जब बेटी विदा होकर दूसरे घर जाती है, तो उसके पैरों में अदृश्य बेड़ियां पड़ जाती हैं। ये बेड़ियां किसी ज़ुल्म की नहीं, बल्कि ज़िम्मेदारियों की होती हैं। एक औरत अपने परिवार से इतना प्यार करने लगती है कि वह खुद ही अपने मायके जाने के अरमानों का गला घोंट देती है, सिर्फ इसलिए कि पीछे से उसके बच्चों या पति को कोई तकलीफ न हो।

उसे समझ आ गया कि रीति-रिवाज़ और त्यौहार सिर्फ भगवान की पूजा के लिए नहीं बनाए गए थे। हमारे पूर्वज बहुत समझदार थे। उन्होंने तीज, रक्षाबंधन, करवा चौथ जैसे त्यौहार इसीलिए बनाए ताकि गृहस्थी की चक्की में पिसती हुई एक औरत को, समाज और परिवार की पूरी रज़ामंदी के साथ, कुछ दिन अपने पीहर (मायके) में बिताने का हक मिल सके। यह त्यौहार नहीं, बल्कि औरतों के लिए एक ‘सांस लेने की जगह’ (Breathing space) थी।

आज नव्या अपनी सास के उस कड़े नियम के लिए मन ही मन उन्हें धन्यवाद दे रही थी। अगर उस दिन रुक्मिणी देवी ने ज़बरदस्ती यह नियम न थोपा होता, तो शायद नव्या भी उन करोड़ों औरतों की तरह होती जो सालों-साल अपने मायके की चौखट देखने को तरस जाती हैं। आज इसी ‘बहाने’ के कारण उसे हर साल तीन-चार दिन के लिए ही सही, वह लड़की बनने का मौका मिल जाता था जो बिना किसी चिंता के अपनी माँ की गोद में सिर रखकर सो सकती थी।

सूटकेस पैक करके जब नव्या अपने मायके पहुंची, तो दरवाज़े पर सरला जी खड़ी थीं। नव्या ने दौड़कर अपनी माँ को गले लगा लिया और फूट-फूट कर रोने लगी।

“क्या हुआ मेरी बच्ची? सब ठीक तो है ना?” सरला जी ने घबराकर पूछा।

नव्या ने अपने आंसू पोंछे और मुस्कुराते हुए कहा, “सब बहुत अच्छा है माँ। बस आज मुझे आपके उन शब्दों का मतलब समझ आ गया। सच कहा था आपने, बेटियों को अपने घर आने के लिए त्यौहार के बहानों की ज़रूरत पड़ती है। अगर ये तीज न होती माँ, तो शायद मैं आपकी गोदी में सर रखने के लिए और तरस जाती।”

सरला जी ने अपनी बेटी का माथा चूम लिया। उनकी आँखों में भी आंसू थे, लेकिन ये आंसू अब समझदारी और सुकून के थे। वे जानती थीं कि उनकी बेटी अब पूरी तरह से एक परिपक्व औरत बन चुकी है, जिसने ज़िंदगी के सबसे बड़े सच को स्वीकार कर लिया है।

आज नव्या जब सावन के उस झूले पर बैठी, तो वह किसी नियम के बोझ तले नहीं दबी थी, बल्कि ज़िम्मेदारियों के पिंजरे से कुछ पल के लिए आज़ाद हुई एक चिड़िया थी। उसने अपनी सास को फोन करके दिल से धन्यवाद कहा और यह मान लिया कि कुछ ‘ज़बरदस्ती’ की गई परंपराएं असल में हमारी ही भलाई का छिपा हुआ आशीर्वाद होती हैं।


अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद


 लेखिका : विनीता सिंह

error: Content is protected !!