सुनिता सोच में डूब गई। वो कौन सी अपने भाइयों की इकलौती बहन थी? सुनिता समेत वे कुल चार बहनें थीं। तीनों बड़ी बहनों की शादी की जिम्मेदारियां भाइयों ने पिता के गुजरने के बाद अपने कंधों पर उठाई थीं। दोनों भाइयों की अपनी भी तो गृहस्थी थी, उनका अपना भी खर्च था। रमेश भइया की एक साधारण सी प्राइवेट नौकरी थी और सुरेश भइया एक छोटी सी परचून की दुकान चलाते थे।
शहनाई की गूंज और गेंदे के फूलों की महक से पूरा घर महक रहा था। घर में चहल-पहल थी, रिश्तेदार आ-जा रहे थे। आखिर घर की इकलौती बेटी, रुचि की शादी जो थी। रुचि की शादी को लेकर पूरे घर में उत्साह था, लेकिन इस उत्साह के बीच घर की बड़ी बहू, सुनिता का दिल एक अजीब सी घबराहट से सिकुड़ रहा था। वह रसोई में बैठी मेहमानों के लिए बेसन के लड्डू बांध रही थी, लेकिन उसके कान बाहर दालान में बैठी अपनी सास, कौशल्या देवी की बातों पर लगे हुए थे।
कौशल्या देवी अपनी समधनों और मोहल्ले की औरतों के बीच बैठी बड़े गर्व से कह रही थीं, “अरे, हमारी रुचि की शादी है, कोई छोटा-मोटा आयोजन थोड़े ही है! और फिर बड़ी बहू के मायके वाले भी तो आ रहे हैं भात (मायके की तरफ से दिया जाने वाला शगुन) लेकर। देखते हैं उनके भाई अपनी इकलौती बहन की ननद के लिए क्या लेकर आते हैं। हमारे जमाने में तो भाई अपनी बहनों के ससुराल में सोने की मोहरें और चांदी के थाल लेकर जाते थे, ताकि बहन का सिर ऊंचा रहे।”
ये बातें सीधे सुनिता के सीने में तीर की तरह चुभ रही थीं। सुनिता के हाथ लड्डू बांधते-बांधते रुक गए। आँखों के कोरों में एक नमी सी तैर गई जिसे उसने जल्दी से पल्लू से पोंछ लिया। वह बाहर जाकर अपनी सास को जवाब दे सकती थी, लेकिन वह नहीं चाहती थी कि ब्याह वाले घर में कोई कहासुनी हो और कलह बढ़ जाए। घर में मेहमान भरे पड़े थे, अगर सास-बहू की बहस होती तो तमाशा बन जाता। उसने गहरी सांस ली और अपने गुस्से और दुख को पी गई। उसने सोचा कि वह रात को अकेले में अपने पति, अनिल से इस बारे में बात कर लेगी।
सुनिता मन ही मन सोच रही थी कि ये क्या बात हुई कि हर रिश्ते में लेने-देने की बराबरी देखी जाए? उसके दोनों बड़े भाई, रमेश और सुरेश, अपनी क्षमता से बढ़कर हमेशा सुनिता के ससुराल में शगुन देते आए थे। लेकिन सुनिता जानती थी कि उसके भाई कुछ भी कर लें, उनकी माँ (कौशल्या देवी) को कभी कुछ नहीं भाता। उन्हें हमेशा दूसरों के दामादों और बहुओं के मायके वालों से तुलना करने की बीमारी थी।
सुनिता सोच में डूब गई। वो कौन सी अपने भाइयों की इकलौती बहन थी? सुनिता समेत वे कुल चार बहनें थीं। तीनों बड़ी बहनों की शादी की जिम्मेदारियां भाइयों ने पिता के गुजरने के बाद अपने कंधों पर उठाई थीं। दोनों भाइयों की अपनी भी तो गृहस्थी थी, उनका अपना भी खर्च था। रमेश भइया की एक साधारण सी प्राइवेट नौकरी थी और सुरेश भइया एक छोटी सी परचून की दुकान चलाते थे। ऊपर से रमेश भइया की दो बेटियां—सुनिता की भतीजियां—अब ब्याहने लायक हो रखी थीं। बड़ी भतीजी की शादी तो अगले ही साल तय करनी थी। ऐसे में सुनिता के भाई कहाँ से सोने के थाल और रेशमी साड़ियों के अंबार लाते? क्या सुनिता के ससुराल वालों को यह सामान्य सी बात समझ नहीं आती?
रात का समय हुआ। मेहमान खा-पीकर सो चुके थे। सुनिता थक कर चूर हो चुकी थी। जब वह अपने कमरे में गई, तो अनिल फोन पर किसी से बात कर रहा था। सुनिता चुपचाप बिस्तर पर बैठ गई। फोन रखने के बाद अनिल ने सुनिता की ओर देखा, “क्या हुआ सुनिता? इतनी उदास क्यों लग रही हो? काम की थकान है क्या?”
सुनिता ने धीमी लेकिन भारी आवाज़ में कहा, “थकान शरीर की नहीं, मन की है अनिल। आज दिन में माँ जी दालान में बैठकर मेरे भाइयों के भात को लेकर जो बातें कर रही थीं, वो मुझे बहुत चुभीं। आप तो जानते हैं ना मेरे भाइयों की स्थिति। चार-चार बहनों का बोझ उठाया है उन्होंने। भतीजियां बड़ी हो रही हैं। मैं नहीं चाहती कि रुचि की शादी में मेरे भाइयों को किसी भी तरह से नीचा दिखाया जाए। आप माँ जी को समझाइये ना कि वो उनसे किसी बड़ी चीज़ की उम्मीद न रखें।”
अनिल ने हल्का सा मुंह बनाते हुए कहा, “अरे सुनिता, तुम भी किन बातों को लेकर बैठ गई। माँ जी का स्वभाव है, वो थोड़ा बहुत बोल देती हैं। और फिर, यह रुचि की शादी है, हमारे घर का पहला बड़ा आयोजन। समाज में हमारी एक इज्जत है। अगर तुम्हारे भाई कुछ अच्छा लेकर आएंगे, तो इसमें तुम्हारा ही मान बढ़ेगा। आखिर मायके की इज्जत भी तो कोई चीज़ होती है।”
अनिल की बात सुनकर सुनिता सन्न रह गई। उसे लगा जैसे किसी ने ठंडे पानी की बाल्टी उसके ऊपर उड़ेल दी हो। जिस पति से वह उम्मीद कर रही थी कि वह उसकी ढाल बनेगा, वही समाज और झूठी शान की दुहाई दे रहा था। सुनिता ने उस रात फिर कुछ नहीं कहा, बस करवट बदलकर चुपचाप आंसू बहाती रही।
अगले दिन भात पहनाने की रस्म का दिन था। सुनिता के दोनों भाई, रमेश और सुरेश, अपने हाथों में कुछ बैग और सूटकेस लेकर दरवाजे पर पहुंचे। उनके माथे पर पसीना था, लेकिन चेहरे पर बहन के घर आने की एक निश्छल मुस्कान। सुनिता दौड़कर अपने भाइयों के गले लग गई। भाइयों ने प्यार से बहन के सिर पर हाथ फेरा।
दालान में रस्म शुरू हुई। रमेश ने कांपते हाथों से सूटकेस खोला। उसमें सुनिता के लिए एक सिल्क की साड़ी, रुचि (ननद) के लिए एक सोने की छोटी सी अंगूठी, एक साड़ी और कौशल्या देवी के लिए शगुन के कपड़े थे। साथ ही मिठाई के कुछ डिब्बे और 11 हजार रुपये नकद का लिफाफा था। एक सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार के हिसाब से यह बहुत था, बल्कि सुनिता जानती थी कि यह सब जुटाने के लिए भी उसके भाइयों ने अपनी कितनी ही जरूरतें मारी होंगी।
लेकिन कौशल्या देवी की नजरें तो उस सूटकेस को ऐसे चीर रही थीं, जैसे वे किसी खजाने की उम्मीद कर रही हों। जब उन्होंने सामान देखा, तो उनके चेहरे का रंग उतर गया। उन्होंने एक गहरी और व्यंग्यात्मक सांस छोड़ी और आस-पास बैठी औरतों को सुनाते हुए बोलीं, “बस? एक अंगूठी और 11 हजार का लिफाफा? अरे सुनिता, तुम्हारे भाइयों ने तो बड़ी कंजूसी दिखाई। मेरी ननद के बेटों ने तो अपनी बहन की ननद की शादी में पूरा सोने का हार और 51 हजार नकद दिए थे। खैर, जिसकी जितनी हैसियत, वो उतना ही तो करेगा।”
यह ताना सीधे रमेश और सुरेश के सीने में लगा। रमेश ने शर्म से सिर झुका लिया। सुरेश की आँखें नम हो गईं, लेकिन वह घूंट पीकर रह गया क्योंकि वह बहन का ससुराल था।
सुनिता से अब और नहीं सहा गया। वह आगबबूला हो गई। उसका धैर्य टूट चुका था। जो सुनिता कल तक ब्याह वाले घर में कलह न हो, यह सोचकर चुप थी, आज अपने भाइयों के इस सरेआम अपमान पर खामोश नहीं रह सकी।
वह अपनी जगह से उठी और सीधे अपनी सास के सामने जाकर खड़ी हो गई। उसकी आँखों में आंसू थे, लेकिन आवाज़ में एक दृढ़ता थी।
“माँ जी,” सुनिता की आवाज़ पूरे दालान में गूंज गई, जिससे अचानक वहां सन्नाटा छा गया। “मेरे भाइयों की हैसियत आप इन साड़ियों और इस छोटी सी अंगूठी से तौल रही हैं? आप जानना चाहती हैं कि उनका असली भात क्या है?”
कौशल्या देवी हक्की-बक्की रह गईं। अनिल भी घबराकर आगे आया, “सुनिता, ये क्या कर रही हो? तमाशा मत बनाओ।”
“तमाशा मैं नहीं बना रही अनिल, तमाशा तो माँ जी ने मेरे भाइयों की गरीबी का बनाया है,” सुनिता ने अनिल को हाथ दिखाकर रोक दिया। फिर वह अपनी सास की तरफ पलटी, “माँ जी, आपको इस अंगूठी का छोटापन दिख रहा है, लेकिन इसके पीछे की कीमत नहीं दिख रही। मेरे बड़े भाई रमेश जी पिछले छह महीने से अपनी फटी हुई चप्पल पहनकर ऑफिस जा रहे हैं, ताकि वो इस अंगूठी के लिए पैसे जोड़ सकें। सुरेश भइया की बेटी का कॉलेज का टूर था, उसने अपने पिता की मजबूरी देखकर टूर पर जाने से मना कर दिया, ताकि वो पैसे मेरी ननद की शादी के शगुन में काम आ सकें।”
सुनिता का गला रुंध गया, लेकिन वह रुकी नहीं। “ये जो 11 हजार का लिफाफा आप हाथ में लेकर मुंह बना रही हैं ना, ये मेरे भाइयों की रातों की नींद है। उनके घर की छत टपकती है, जिसे उन्होंने इस बरसात में इसलिए ठीक नहीं करवाया क्योंकि उन्हें अपनी बहन के घर खाली हाथ नहीं आना था। हम चार बहनें हैं माँ जी। मेरे भाइयों ने अपनी पूरी जवानी हम बहनों के हाथ पीले करने में खपा दी। उनके खुद के बच्चे आज भी पुराने कपड़ों में त्यौहार मनाते हैं। और आप उनकी तुलना उन लोगों से कर रही हैं जिनके पास हराम का या पुश्तैनी पैसा है?”
दालान में बैठे हर इंसान की सांसें जैसे रुक गई थीं। रमेश और सुरेश रो पड़े। उन्होंने सुनिता का हाथ पकड़ लिया, “चुप हो जा मेरी लाडो, कोई बात नहीं, माँ जी बड़ी हैं, उनका हक है बोलने का।”
“नहीं भइया,” सुनिता ने सुबकते हुए कहा, “आज अगर मैं चुप रही, तो ये हमेशा ऐसे ही आपको जलील करते रहेंगे। माँ जी, बेटियां जब मायके से विदा होती हैं, तो वो अपने भाइयों का प्यार और उनका आशीर्वाद चाहती हैं, उनकी बोटियां नोचकर लाया गया पैसा नहीं। अगर आपको यह शगुन कम लग रहा है, तो इसे वापस कर दीजिये। मेरे भाइयों का प्यार मेरे लिए दुनिया की सबसे बड़ी दौलत है, और मैं उसे आपकी इस खोखली शान के तराजू पर नहीं तौलने दूंगी।”
सुनिता के शब्द किसी हथौड़े की तरह वहां बैठे हर इंसान के दिल पर लगे। अनिल, जो अब तक समाज की इज्जत की दुहाई दे रहा था, शर्म से पानी-पानी हो गया। उसे अहसास हुआ कि उसने अपनी पत्नी और उसके मायके वालों के साथ कितना बड़ा अन्याय किया है।
अनिल तुरंत आगे बढ़ा और उसने रमेश और सुरेश के हाथ जोड़ लिए। “मुझे माफ़ कर दीजिये रमेश भइया, सुरेश भइया। सुनिता सही कह रही है। हम अपनी झूठी शान में इतने अंधे हो गए थे कि हमें आपका प्यार और आपका संघर्ष दिखाई ही नहीं दिया।”
फिर अनिल ने अपनी माँ की तरफ देखा, “माँ, शगुन शगुन होता है, चाहे वह एक रुपये का हो या एक लाख का। जो भाई अपनी जरूरतें मारकर अपनी बहन के लिए इतना कुछ लेकर आए हैं, हमें तो उनके पैर धोकर पीने चाहिए। आज के बाद इस घर में कभी सुनिता के मायके वालों की हैसियत पर कोई बात नहीं होगी।”
कौशल्या देवी का सिर शर्म से झुक गया था। उन्हें अपनी गलती का अहसास हो चुका था। जिस लिफाफे को वे कुछ देर पहले हिकारत से देख रही थीं, अब वही लिफाफा उन्हें दुनिया का सबसे भारी लिफाफा लगने लगा था, क्योंकि उसमें सिर्फ रुपये नहीं, बल्कि दो भाइयों का असीम त्याग, पसीना और प्यार भरा हुआ था।
उन्होंने आगे बढ़कर रमेश और सुरेश के सिर पर हाथ रखा। “मुझे माफ़ कर दो बेटा। मैं उम्र में बड़ी जरूर हूँ, लेकिन आज तुम्हारी इस बहन ने मेरी अक्ल के सारे जाले साफ कर दिए हैं। तुमने जो दिया है, वह मेरी रुचि के लिए सबसे बड़ा आशीर्वाद है।”
उस दिन के बाद से रुचि की शादी बहुत ही खुशी के माहौल में संपन्न हुई। सुनिता के भाइयों को जो सम्मान उस दिन उस घर में मिला, वह उन्हें शायद ही कभी मिला हो। सुनिता ने यह साबित कर दिया था कि एक औरत घर की शांति के लिए बहुत कुछ सह सकती है, लेकिन जब बात उसके मायके और उसके भाइयों के निस्वार्थ प्रेम के सम्मान की आती है, तो वह दुर्गा का रूप भी ले सकती है। रिश्ते सोने-चांदी के मोहताज नहीं होते, वे तो उस प्यार और त्याग से सींचे जाते हैं, जो अक्सर दुनिया की नजरों से छिप जाता है।
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मूल लेखिका : करुणा मलिक