मौन की गूंज: एक अनकही दास्तान – राजेन्दर सक्सेना

सुबह के पांच बज रहे थे। अलार्म बजने से पहले ही वंदना की आँखें खुल गईं। यह उसके जीवन का वह अलिखित नियम था, जिसमें रविवार की कोई छुट्टी नहीं होती थी। बिस्तर से उठते ही उसने सबसे पहले अपनी सास सुमित्रा जी का गर्म पानी तैयार किया, फिर रसोई में जाकर बच्चों के टिफिन के लिए सब्जियां काटने लगी।

वंदना एक बेहद पढ़ी-लिखी महिला थी, जिसने शादी से पहले अर्थशास्त्र में मास्टर्स किया था। लेकिन शादी के बाद, परिवार की जिम्मेदारियों, बच्चों की परवरिश और पति के करियर को उड़ान देने के लिए उसने अपनी डिग्रियों को अलमारी के सबसे निचले हिस्से में एक पुरानी फाइल में दफन कर दिया था।

उसका पति, विकास, एक मल्टीनेशनल कंपनी में सीनियर प्रोजेक्ट मैनेजर था। विकास को अपनी नौकरी, अपनी सैलरी और अपने ‘मैनेजमेंट स्किल्स’ पर बहुत घमंड था।

विकास जब सुबह साढ़े सात बजे सोकर उठा, तो उसके हाथ में उसकी कड़क चाय होनी चाहिए थी। वंदना ने चाय का कप थमाते हुए कहा, “आज शाम को जल्दी आ जाइयेगा, निक्की के स्कूल में पैरेंट-टीचर मीटिंग है।”

विकास ने चाय का घूंट भरते हुए मुंह बनाया और झुंझलाते हुए कहा, “वंदना, तुम्हें पता है मेरे ऊपर कितना प्रेशर रहता है? ऑफिस में करोड़ों का प्रोजेक्ट मैनेज करना पड़ता है। तुम घर पर दिन भर फ्री रहती हो, ये छोटे-मोटे काम तुम खुद क्यों नहीं देख लेतीं?

बाहर की दुनिया में पैसा कमाना और लोगों को मैनेज करना कितना मुश्किल है, ये तुम घर की चारदीवारी में बैठकर नहीं समझ सकतीं।”

वंदना ने कुछ नहीं कहा। वह चुपचाप उसका टिफिन पैक करने लगी। यह पहली बार नहीं था जब विकास ने उसके वजूद को, उसकी मेहनत को इस तरह नकारा था। सुमित्रा जी भी अक्सर यही कहती थीं, “औरत का काम ही क्या है? पति कमाकर लाता है, उसी से घर चलता है।

औरतों को बस घर संभालना चाहिए, वही उनका असली धर्म है।” वंदना की बेटी निक्की, जो अब बारह साल की हो चुकी थी, यह सब देखती और सुनती थी। वंदना को सबसे ज्यादा डर इसी बात का लगता था कि कहीं उसकी बेटी भी यही न मान ले कि एक औरत की जिंदगी सिर्फ दूसरों की परछाई बनकर जीने के लिए होती है।

समय बीतता गया। एक दिन वंदना की पुरानी सहेली, राधिका, उससे मिलने आई। राधिका शहर की एक जानी-मानी इवेंट प्लानर थी। बातों-बातों में राधिका ने बताया कि उसे एक बहुत बड़े प्रोजेक्ट का टेंडर मिला है, लेकिन उसकी टीम का मुख्य डिजाइनर बीमार पड़ गया है। राधिका वंदना की रचनात्मकता और उसके चीजों को व्यवस्थित करने के हुनर से वाकिफ थी। उसने वंदना से कहा, “वंदना, तू क्यों नहीं मेरी मदद कर देती? सिर्फ पंद्रह दिन का काम है। घर से ही सारा मैनेजमेंट करना है। मैं तुझे इसके लिए अच्छी खासी रकम दूंगी।”

शुरुआत में वंदना झिझकी। विकास क्या सोचेगा? घर का क्या होगा? लेकिन फिर निक्की का चेहरा उसकी आँखों के सामने घूम गया। उसने राधिका का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।

अगले पंद्रह दिन वंदना के लिए किसी युद्ध से कम नहीं थे। वह सुबह चार बजे उठती, घर का सारा काम निपटाती, विकास और बच्चों को विदा करती और फिर अपने लैपटॉप पर राधिका के प्रोजेक्ट का काम शुरू कर देती। उसने बजटिंग से लेकर वेंडर्स को मैनेज करने तक का सारा काम इतनी कुशलता से किया कि राधिका भी हैरान रह गई। लेकिन इस दौरान विकास का रवैया और भी चिड़चिड़ा हो गया। एक दिन जब विकास ऑफिस से लौटा, तो वंदना अपने प्रोजेक्ट के एक जरूरी फोन कॉल पर थी। विकास को पानी देने में पांच मिनट की देरी हो गई।

विकास ने गुस्से में अपना बैग सोफे पर पटका और चिल्लाते हुए बोला, “ये क्या तमाशा लगा रखा है तुमने? शौक के लिए दो-चार रुपये क्या कमाने लगीं, घर को ही भूल गईं? मैंने तुम्हें पहले ही कहा था कि ये बाहर के काम, ये बिजनेस मैनेजमेंट तुम्हारे बस की बात नहीं है। इसके लिए दिमाग चाहिए होता है। तुम सिर्फ रोटियां बेल सकती हो। अगर मेरी चाय और मेरे कपड़ों का ध्यान नहीं रख सकतीं, तो बंद करो अपना ये फालतू का शौक!”

फोन लाइन पर राधिका सब सुन रही थी, लेकिन वंदना ने चुपचाप फोन काट दिया। आज वंदना की चुप्पी टूटने वाली थी। उसके भीतर का वह ज्वालामुखी जो सालों से शांत था, आज फटने को तैयार था। सुमित्रा जी भी वहां आ गईं और विकास का पक्ष लेते हुए बोलीं, “सही तो कह रहा है विकास। औरतों को ज्यादा पंख नहीं पसारने चाहिए। आदमी थक-हार कर बाहर से आता है, उसे शांति चाहिए होती है।”

वंदना ने एक गहरी सांस ली। उसकी आँखों में आंसू नहीं, बल्कि एक अजीब सी चमक और आत्मविश्वास था। वह विकास के ठीक सामने खड़ी हो गई और बिल्कुल शांत लेकिन दृढ़ स्वर में बोली, “तुमने अभी क्या कहा विकास? कि मुझे सिर्फ रोटियां बेलना आता है? बाहर के काम और मैनेजमेंट मेरे बस की बात नहीं है?”

विकास ने व्यंग्य से हंसते हुए कहा, “और नहीं तो क्या? मैनेजमेंट कोई हलवा है जो कोई भी बना लेगा?”

वंदना की आवाज अब पूरे कमरे में गूंज रही थी, “विकास, मैं आज तुम पुरुषों के इस अहंकार भरे सवाल का जवाब देना चाहती हूँ। मैं पूछना चाहती हूँ कि आखिर हमें क्या नहीं आता? जो स्त्री मौत के मुंह में जाकर एक बच्चे को जन्म दे सकती है, उसे बोलना, चलना और दुनिया के हर काम सिखा सकती है, क्या वह खुद वो काम नहीं कर सकती? तुम कहते हो न कि पैसे कमाना हमारे बस की बात नहीं है? तो सुनो… जिसके लिए तुम लोग लाखों रुपये देकर मैनेजमेंट की डिग्रियां लेते हो न, वह हम लड़कियां बचपन से अपने घर में बिना किसी डिग्री के करती हैं।”

विकास स्तब्ध रह गया। वंदना ने बोलना जारी रखा, “तुम ऑफिस में एक बजट पास करने के लिए दस लोगों की मीटिंग लेते हो। मैं इस घर को हर महीने तुम्हारे दिए हुए सीमित पैसों में इस तरह मैनेज करती हूँ कि महीने के अंत में किसी चीज की कमी नहीं होती, और फिर भी मुसीबत के लिए कुछ पैसे बचा लेती हूँ। इसे क्या कहते हैं? क्या यह फाइनेंस मैनेजमेंट नहीं है? तुम लोग पैसे कमाने के लिए जिस हुनर का रोना रोते हो, वह हमारे हाथों में होता है। सिलाई, कढ़ाई, बुनाई, बेहतरीन खाना बनाना, घर की सजावट करना… ये सब वो काम हैं जिनसे हम चाहें तो आसानी से बहुत पैसा कमा सकती हैं। पर हम लोग कमाते नहीं हैं। जानते हो क्यों? ताकि तुम्हारे पुरुष होने का अहंकार आहत न हो।”

सुमित्रा जी ने बीच में टोकना चाहा, “ये कैसी बातें कर रही हो वंदना! पति से ऐसे बात करते हैं?”

वंदना ने हाथ जोड़कर अपनी सास से कहा, “मां जी, आज मुझे बोलने दीजिए। आज अगर मैं नहीं बोली, तो कल मेरी बेटी भी उसी घुटन में जिएगी जिसमें मैं जी रही हूँ। जो पापा, भाई या पति ने बोल दिया, हम औरतें चुपचाप वही करने लगती हैं। हम अपने सपनों का गला घोंट देती हैं क्योंकि हमारे लिए हमारे परिवार की शांति हमारे वजूद से ज्यादा अहम होती है।”

वंदना फिर विकास की तरफ मुड़ी, “और विकास, मान लो कि अगर हम औरतें बाहर जाकर पैसे कमाने भी लगें, जैसा कि मैंने अभी इन पंद्रह दिनों में किया। तो तुम मर्द लोग क्या करते हो? तुम लोग घर के किसी भी काम में मदद करने से अपने हाथ खड़े कर देते हो। यानी अगर मैं बाहर जाकर तुमसे ज्यादा पैसे भी कमा लाऊँ, तो भी घर आकर तुम्हारे नखरे मुझे ही उठाने हैं, तुम्हारी चाय मुझे ही बनानी है और तुम्हारा बिस्तर मुझे ही ठीक करना है। हमारी दोहरी मेहनत को तुम हमारा फर्ज बता देते हो और अपनी एक नौकरी को दुनिया का सबसे बड़ा एहसान!”

कमरे में सन्नाटा छा गया था। निक्की भी अपने कमरे के दरवाजे से सब सुन रही थी। वंदना ने एक लिफाफा विकास के हाथ में थमा दिया।

“ये क्या है?” विकास ने कांपते हाथों से पूछा।

“ये उन पंद्रह दिनों की मेरी मेहनत की कमाई है विकास। खोलकर देखो।”

विकास ने लिफाफा खोला। उसमें राधिका की कंपनी की तरफ से वंदना के नाम का एक लाख रुपये का चेक था। विकास की आँखें फटी की फटी रह गईं।

वंदना ने मुस्कुराते हुए कहा, “ये पैसा मैंने घर के किसी काम को बिना नुकसान पहुंचाए, सिर्फ अपने फोन और लैपटॉप से कमाया है। हम महिलाएं बहुत आसानी से घर और बाहर की जिम्मेदारी एक साथ उठा सकती हैं। हम चाहें तो अपने कमाए पैसों से अपने लिए एक अलग घर, एक अलग दुनिया बना सकती हैं। पर हम वो घर नहीं बनातीं… क्योंकि हम तुम्हारे घर को ही अपनी दुनिया मान लेती हैं। हम उस दुनिया को छोड़कर कहीं जाना नहीं चाहतीं। हम तुम्हारे दिए हुए घर को ‘मकान’ से ‘परिवार’ बनाती हैं। इसे हमारी कमजोरी या बेवकूफी समझने की भूल मत करो विकास। जिस दिन औरत अपनी पर आ गई, उस दिन तुम्हारे ये सारे मैनेजमेंट के सिद्धांत धरे के धरे रह जाएंगे।”

विकास के पास कहने के लिए एक भी शब्द नहीं था। उसका पुरुषवादी अहंकार ताश के पत्तों की तरह ढह चुका था। उसे पहली बार यह अहसास हो रहा था कि जिस पत्नी को वह एक साधारण गृहिणी समझकर हमेशा जलील करता रहा, वह असल में उससे कहीं ज्यादा समझदार, सक्षम और मजबूत थी। सुमित्रा जी की आँखें भी शर्म से झुक गई थीं। उन्हें महसूस हुआ कि उन्होंने भी एक औरत होकर हमेशा एक औरत की ही क्षमताओं को कम आंका था।

उस शाम घर में किसी ने खाना नहीं खाया। रात को जब वंदना रसोई समेट कर कमरे में आई, तो उसने देखा कि विकास उसका इंतजार कर रहा था। विकास की आँखों में आज वो पुराना घमंड नहीं था, बल्कि एक गहरा पश्चाताप था।

उसने वंदना का हाथ पकड़कर कहा, “मुझे माफ कर दो वंदना। मैं अपनी डिग्रियों और अपनी सैलरी के नशे में यह भूल ही गया था कि इस घर की असली मैनेजर तुम हो। तुमने अपना सब कुछ मेरे लिए छोड़ दिया और मैंने तुम्हारी उसी कुर्बानी को तुम्हारी नाकामी समझ लिया। आज तुमने सिर्फ मेरी आँखें नहीं खोली हैं, बल्कि मुझे यह भी सिखा दिया है कि एक औरत अगर झुकना जानती है, तो वह उड़ना भी जानती है। कल से निक्की की पैरेंट-टीचर मीटिंग में मैं जाऊंगा, और सुबह की चाय भी मैं ही बनाऊंगा।”

वंदना के होठों पर एक हल्की सी मुस्कान आ गई। उसने अपनी लड़ाई किसी को नीचा दिखाने के लिए नहीं लड़ी थी, बल्कि सिर्फ अपना खोया हुआ सम्मान वापस पाने के लिए लड़ी थी। और आज, उसने न सिर्फ अपना सम्मान वापस पाया था, बल्कि अपनी बेटी निक्की के लिए भी एक ऐसा रास्ता खोल दिया था जहाँ उसे कभी अपनी काबिलियत पर शक नहीं होगा।

क्या आपके आस-पास या आपके घर में भी कोई ऐसी वंदना है जो रोज अपनी इच्छाओं को मारकर सिर्फ परिवार के लिए जी रही है? क्या हमने कभी उनके उस मौन मैनेजमेंट की तारीफ की है? अपनी राय कमेंट में जरूर बताएं।

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 लेखक : राजेन्दर सक्सेना

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